बुधवार, जुलाई 06, 2005

खेल ओलंपिक मेज़बानी का

लंदन ने 2012 के ओलंपिक खेलों की मेज़बानी पाकर साबित कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति में सब कुछ खुला और निष्पक्ष नहीं है. लंदन की जीत, अंग्रेज़ों की लॉबिइंग कला की जीत और ओलंपिक समिति पर फ़्रांसीसियों के भरोसे की हार कही जा सकती है.

डेढ़ साल पहले जब 2012 ओलंपिक की रेस शुरू हुई तो लंदन संभावित आयोजन स्थलों की सूची में बहुत ही नीचे था. यहाँ तक कि दो महीने पहले जब अंतिम पाँच दावेदारों की घोषणा हुई तो लंदन को चौथे या फिर तीसरे स्थान पर माना जा रहा था. दूसरी ओर पेरिस शुरू से ही अव्वल दावेदार के रूप में देखा जा रहा था.

लेकिन छह जुलाई को जब सिंगापुर में ओलंपिक समिति के सदस्यों ने मतदान में भाग लिया तो ब्रिटेन को उसकी चालाकी का फ़ायदा आख़िरकार मिल ही गया. पेरिस की दावेदारी से जुड़ी टीम ने जहाँ ओलंपिक समिति की कार्य प्रक्रिया की खामियों का फ़ायदा उठाने का प्रयास नहीं करने का फ़ैसला किया, वहीं लंदन ने हर ऐसी खामी को अपने हित में इस्तेमाल करने की बेशर्मी दिखाई. और पेरिस को भलमनसाहत का पुरस्कार मिला, तीसरी बार उसकी दावेदारी ठुकराए जाने के रूप में.

मतदान के पहले दौर में मॉस्को बाहर हुआ, लेकिन 15 मत पाकर उसने प्रेक्षकों को चौंकाया क्योंकि उसे इतने मत मिलने की उम्मीद रूस से बाहर किसी को नहीं थी. दूसरे दौर में न्यूयॉर्क के बाहर होने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ, हालाँकि हिलेरी क्लिंटन और ऑल टाइम ग्रेट मुक्केबाज़ मोहम्मद अली न्यूयॉर्क की दावेदारी के समर्थन में सिंगापुर पहुँचे थे. विश्लेषकों को आश्चर्य इस बात पर ज़रूर हुआ कि न्यूयॉर्क दूसरे दौर में भी ज़्यादा मत क्यों नहीं जुटा पाया.

कोई शक नहीं कि मॉस्को के बाहर होने के बाद उसे मिले अधिकतर वोट मैड्रिड को मिले. मैड्रिड ने कैसे किया यह कमाल, किसी को पता नहीं. ख़ैर, तीसरे दौर में बाहर होने वाले मैड्रिड को मिले समर्थन से सब को आश्चर्य हुआ. दरअसल मात्र एक वोट से वह पेरिस से पीछे था. मैड्रिड को बाहर करने में रेस से बाहर हुए न्यूयॉर्क के समर्थकों के वोटों का हाथ रहा, जो कि निश्चय अगले दौर में ब्रिटेन को मिले.

मैड्रिड के बाहर होने के बाद मामला लंदन और पेरिस के बीच आ गया. यहाँ अंग्रेज़ों की साम-दाम-दंड-भेद की नीति काम कर गई. फ़्रांसीसी फ़ेयर-प्ले के चक्कर में रह गए और मात्र चार मतों से मामला लंदन के हक़ में चला गया. निर्णायक दौर में पेरिस को मिले 50 मत और लंदन को 54, यानी मात्र चार ज़्यादा.

भारतीय ओलंपिक समिति का एक वोट किसे मिला, कहा नहीं जा सकता. शायद लंदन को क्योंकि अंग्रेज़ों ने भारतीय मूल के लॉर्ड स्वराज पॉल को सिंगापुर में लगा रखा था भारत का वोट जुटाने के लिए.

हर चीज़ में मुनाफ़ा खोजने वाले ब्रितानी 2012 लंदन ओलंपिक से कितना माल बनाएँगे या कुछ भी माल बना भी पाएँगे या नहीं, ये तो सात साल बाद ही पता चलेगा.(अटलांटा, सिडनी और एथेंस को ओलंपिक से कुल मिलाकर घाटा ही हुआ है.) लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं कि 1948 के बाद एक बार फिर लंदन को ओलंपिक दिलाकर अंग्रेज़ों ने दिखा दिया कि कूटनीति(छल-कपट) में उनका कोई जवाब नहीं. साथ ही यह भी साफ हो गया कि साल्ट लेक शीत ओलंपिक घोटाले से मुँह काला कर चुकी अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति अब भी दागदार है.

भारत सरकार को चाहिए कि 2012 में कुछ स्वर्ण-पदकों के लिए अभी से योजनाएँ तो बनाए ही, 2016 या फिर 2020 की ओलंपिक दावेदारी की तैयारी भी शुरू कर दे.

3 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ला ने कहा…

देर काफी हो गयी लेकिन इतनी भी नहीं कि स्वागत न किया जा सके।स्वागत हिंदी ब्लागजगत में।

अनुनाद सिंह ने कहा…

वाह भाई वाह ! आपने एक रोचक विषय विषय तो चुना ही , बडे ही रोचक ढंग से इसको प्रस्तुत भी किया है । पढकर मजा आ गया । पर मेजबानी लंदन को मिलने का दुख मुझे भी हो रहा है ।

आप ने सही कहा है कि आगे के ओलम्पिकों के लिये अब हमे भी दावेदारी शुरू कर देनी चाहिये । अगर हम विश्व-शक्ति बनने के तरफ बढ रहे हैं तो इसकी भी जरूरत है ।

अनुनाद

आशीष ने कहा…

हमने पढ़ा था कि कपिल देव का वोट इंग्लैंड को गया। लगता है कि कपिल को अंग्रेज़ों ने घूस दी थी।