शुक्रवार, मार्च 31, 2006

आयो रे दिन परमाणु ऊर्जा के!

दुनिया एक बार फिर परमाणु ऊर्जा की ओर उम्मीदों भरी नज़र से देख रखी है. ये हसरत भरी नज़र सिर्फ़ भारत की ही नहीं है, बल्कि चीन, इंग्लैंड और अमरीका जैसे देश भी परमाणु ऊर्जा के विकल्प पर विचार कर रहे हैं. ऐसा सिर्फ़ ग्रीनहाउस गैस रहित ऊर्जा पर ज़ोर होने के कारण ही नहीं है, बल्कि अन्य कई आर्थिक, सामरिक और व्यावहारिक कारण भी हैं.

तो क्या समझा जाए, हम परमाणु ऊर्जा की दूसरी लहर को देखने वाले हैं. यदि परम विश्वसनीय माने जाने वाली पत्रिका नेशनल ज्यॉग्राफ़िक के अप्रैल 2006 अंक में छपे एक विशेष लेख की बात करें तो इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि अगले कुछ वर्षों में हमें कई बड़े और शक्तिशाली देश परमाणु ऊर्जा के विकल्प पर तेज़ी से काम करते नज़र आएँगे.

परमाणु ऊर्जा की बात की जाए तो सबसे बढ़िया उदाहरण फ़्रांस का है. फ़्रांस की कुल बिजली ज़रूरतों का क़रीब 80 प्रतिशत परमाणु रिएक्टरों से पूरा होता है. अमरीका तो ऊर्जा का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता रहा है, और वहाँ भी 20 प्रतिशत बिजली परमाणु बिजली ही है. अमरीका में 103 परमाणु रिएक्टर सक्रिया हैं यानि दुनिया के कुल रिएक्टरों का एक चौथाई. तूफ़ानी गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले भारत और चीन जैसे देश तो ऊर्जा के हर विकल्प पर हाथ डालने को मज़बूर हैं, लेकिन आपको जान कर आश्चर्य होगा कि नन्हें से देश में फ़िनलैंड में न सिर्फ़ एक परमाणु रिएक्टर निर्माणाधीन है, बल्कि फ़िनलैंड के ऊर्जा उत्पादन का क़रीब एक तिहाई परमाणु ऊर्जा के रूप में आता है.

नेशनल ज्यॉग्राफ़िक के लेख का शीर्षक परमाणु ऊर्जा से जुड़े उधेड़बुन के बारे में सब कुछ बता देता है- 'यह भयावह है. यह महँगी है. यह धरती को बचा सकती है.'

ग़ौरतलब है कि परमाणु ऊर्जा का विरोध या फिर इसे लेकर उत्साह की कमी तीन कारणों के चलते है- बहुत ज़्यादा लागत, दुर्घटना की आशंका और रेडियोधर्मी कचरे को ठिकाने लगाने की समस्या. ग्रीनपीस जैसे संगठनों के विरोध को चौथा कारण बताया जा सकता है, हालाँकि आर्थिक और सामरिक रणनीति पर निगाह रखने वाली सरकारें इस तरह के विरोध को ज़्यादा गंभीरता से नहीं लेती हैं.

कहने की ज़रूरत नहीं कि एक परमाणु रिएक्टर को स्थापित करना अब भी भारी लागत वाला काम है, इसीलिए तो ज़्यादा मामलों में सरकारें स्वयं इसका ख़र्च वहन करती है यानि इस बाबत पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप वाली चीज़ कम ही दिखती है. लेकिन इसका तोड़ यह है कि रिएक्टर पर काम करने वाली कंपनियों(ज़्यादातर प्राइवेट) ने पहले से कहीं ज़्यादा सक्षम रिएक्टरों के डिज़ायन बना रखे हैं. मतलब ऐसे रिएक्टर जो कम ख़र्च पर ज़्यादा उत्पादन करे, और कचरा भी कम निकाले.

नए डिज़ायनों वाले रिएक्टर की बात छोड़ भी दें तो अनुभव के आधार पर पुराने रिएक्टरों को भी ज़्यादा सुरक्षित, ज़्यादा उत्पादक बनाया जा रहा है. उदाहरण के तौर पर अमरीका की बात करें तो वहाँ कुल विद्युत उत्पादन में परमाणु बिजली का हिस्सा 20 प्रतिशत बना हुआ है. ये आश्चर्यजनक बात लग सकती है क्योंकि क़रीब तीन दशकों से अमरीका में कोई नया परमाणु रिएक्टर स्थापित नहीं किया गया है, और इस दौरान हाइड्रोकार्बन आधारित बिजली उत्पादन में 15 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. तो फिर परमाणु बिजली का योगदान 20 प्रतिशत कैसे बना रहा. सीधी-सी बात है, पहले परमाणु रिएक्टरों को मरम्मत के लिए या सावधानीवश हर दूसरे-तीसरे दिन शटडॉउन करना पड़ता था और ऐसे में रिएक्टरों की 65 प्रतिशत क्षमता का ही दोहन हो पाता था. अब वैसी बात नहीं रही, रिएक्टर कम ही बंद करने पड़ते हैं और उनकी औसत 90 प्रतिशत क्षमता का दोहन होता है.

जहाँ तक ख़तरे की बात है तो पूरी दुनिया में अभी तक तीन ही परमाणु दुर्घटनाओं को याद किया जाता है- बीस साल पहले 1986 की चेर्नोबिल(यूक्रेन) की दुर्घटना, 1979 में थ्री माइल्स आइलैंड(अमरीका) की दुर्घटना और 1957 में विंडस्केल(ब्रिटेन) की दुर्घटना. याद रहे की इन दुर्घटनाओं में जानमाल की उतनी क्षति नहीं हुई जितना हर साल ऊर्जा के तथाकथित सुरक्षित विकल्पों के दोहन के दौरान कोयला खानों और तेल उत्पादन केंद्रों में होती है. नेशनल ज्यॉग्राफ़िक के इसी अंक की कवर स्टोरी को देखने से पता चलता है कि चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया था क्योंकि इस तरह की किसी दुर्घटना से निपटने की कोई तैयारी नहीं थी. लेकिन अब वैसी बात नहीं रही. बीते बीस साल में विभिन्न देश परमाणु दुर्घटनाओं से निपटने की कारगर रणनीतियाँ तैयार कर चुके हैं.

और रही परमाणु कचरे को ठिकाने लगाने की बात तो नए समुन्नत परमाणु रिएक्टर बिजली के लिए यूरेनियम जैसे ईंधन में समाई ऊर्जा के अंतिम अंश तक का दोहन करने की कोशिश करते हैं. मतलब पहले की तुलना में काफ़ी कम कचरा जमा होने की आशंका है. इसके अलावा अमरीका, फ़्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों की कंपनियाँ परमाणु कचरे को ठिकाने लगाने की ज़्यादा सुरक्षित, ज़्यादा आसान और कम ख़र्चीले तरीक़े पर लगातार काम कर रही हैं.

रही बात परमाणु ऊर्जा के उज्जवल भविष्य की, तो फ़िनलैंड जैसे छोटे से देश का उदाहरण तो इस लेख के शुरू में ही है. अमरीका की चौथी सबसे बड़ी बिजली उत्पादक कंपनी एनटर्जी कॉरपोरेशन ने 2008 में नए रिएक्टर की स्थापना की अनुमति के लिए संघीय सरकार को आवेदन सौंपने की योजना बनाई है. दो साल बाद इसलिए, क्योंकि जेनरल इलेक्ट्रिक और वेस्टिंगहाउस नामक कंपनियों ने नए ज़माने के ज़्यादा सुरक्षित और ज़्यादा सक्षम परमाणु रिएक्टर का डिज़ायन तैयार करने के लिए इतना समय और माँगा है. माना जाता है कि 2010 तक संघीय सरकार नए रिएक्टरों की स्थापना का फ़ैसला सुना देगी. परमाणु ऊर्जा को जन्म देने वाले देश की नीति में यह परिवर्तन निश्चय ही भारत जैसे महत्वाकांक्षी देश के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकेगा, और यदि भारत-अमरीका परमाणु सहयोग की ताज़ा संधि अमरीकी संसद में स्वीकृत हो गई- तब तो भैया समझ लो, भारत के लिए सोने पे सुहागा!

ब्रिटेन की बात करें तो परमाणु ऊर्जा से कुल बिजली ज़रूरतों का 20 प्रतिशत जुटाने वाला यह देश अपनी परमाणु नीति पर पुनर्विचार करने वाला है. वरना अभी तक की स्थिति ये है कि उसे 2023 तक सारे रिएक्टर बंद करने होंगे(जर्मनी की पिछली सरकार ने तो अपने सारे रिएक्टर 2020 तक बंद करने का फ़ैसला भी कर लिया है. मेरे विचार से श्रोएडर सरकार में शामिल ग्रीन पार्टी का दबाव असर कर गया होगा). अब ब्लेयर सरकार ने इस नीति को बदलने का मन बना लिया है. कहा जाता है सामरिक और आर्थिक ज़रूरतों के अलावा यहाँ सरकार पर परमाणु धंधे से जुड़ी कंपनियों का दबाव भी काम कर रहा है.

और अंत में भारत की बात करें तो नेशनल ज्यॉग्राफ़िक का लेख पढ़ कर गर्व की अनुभूति होती है. इसलिए नहीं कि इस समय दुनिया में सर्वाधिक आठ परमाणु रिएक्टर भारत में निर्माणाधीन हैं. भारत की परमाणु क्षमता के बारे में क्या लिखा है, एक बानगी प्रस्तुत है-

"भारत की परमाणु क्षमता पर बाहरी ताक़तों का नहीं के बराबर प्रभाव है. कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो यह पूरी तरह स्वदेश में विकसित है. भारत के पास 'एकला चलो रे' के अलावा कोई विकल्प नहीं था. इसने 1974 में भूमिगत परमाणु धमाका किया. इसमें संभवत: 1950 के दशक में कनाडा की सहायता से निर्मित परीक्षण परमाणु रिएक्टर से ग़ायब किए गए प्लूटोनियम का इस्तेमाल किया गया. धमाके के बाद विश्व समुदाय ने भारत को अलग-थलग कर दिया. विभिन्न देशों ने भारत को तकनीकी सहयोग देना बंद कर दिया. राजस्थान के रिएक्टर पर काम कर रहे कनाडा के इंजीनियर वापस लौट गए. ऐसे में भारत ने अपने दम पर रिएक्टर निर्माण का काम पूरा कर दिखाया. अब तो यह स्थिति है कि भारत परमाणु तकनीक से जुड़े हर काम का माहिर है. कैगा के रिएक्टर के लिए यूरेनियम ईंधन कोलकाता से पश्चिम स्थित खदानों(मेरे विचार से झारखंड) से आता है, दक्षिण भारत स्थित एक कारखाने(मेरे विचार से भेल) ने 65 फ़ीट ऊँचे और 110 टन वज़नी स्टीम जेनेरेटर की आपूर्ति का काम सँभाला. कंट्रोल सिस्टम, ज़िरकोनियम मिश्र धातु के बने ईंधन ट्यूब और 22 टन वज़नी रिएक्टर के उपकरण हैदराबाद से आए."

पत्रिका में भारतीय अधिकारियों के कुछ बयान में भी हैं. देखिए बानगी कितने आत्मविश्वास भरे बयान हैं:

चेन्नई के पास इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र के निदेशक बलदेव राज कहते हैं-'हमारी ऊर्जा नीति एकदम सरल है. यदि बिजली बनाने की कोई जुगत मौज़ूद है, तो उसकी सहायता से जितनी बिजली बना सकते हो बनाओ.'

भारतीय परमाणु ऊर्जा विभाग के प्रवक्ता स्वपनेश मलहोत्रा कहते हैं-'हम पीछे नहीं जा सकते. हम सिर्फ़ आगे ही बढ़ेंगे. ज़िंदगी ऊर्जा पर निर्भर करती है. कहाँ से लाएँगे ऊर्जा? कहीं न कहीं से तो लाना ही पड़ेगा.'

1 टिप्पणी:

अनूप शुक्ला ने कहा…

बड़ा जानकारीपूर्ण लेख है।