सोमवार, अक्टूबर 31, 2005

कामसूत्र का नया अध्याय

वात्स्यायन अभी जीवित होते तो शायद अपनी लोकप्रिय किताब कामसूत्र में एक नया चैप्टर जोड़ने पर विचार कर रहे होते. यह अध्याय यौन-क्रीड़ा के विभिन्न आसनों से ही जुड़ा होता, लेकिन बिल्कुल ही नए क़िस्म के आसन. क्योंकि बात अंतरिक्षयात्रा के दौरान सेक्स की संभावनाओं की हो रही है.

अंतरिक्षयात्री भी मानव ही हैं, लेकिन हमारे जैसे मामूली लोगों की तरह उनके पाँव सतह पर मज़बूती से नहीं पड़ते. अंतरिक्ष यात्राओं के दौरान उन्हें भारहीनता की स्थिति में रहना पड़ता है, क्योंकि वे धरती के गुरुत्वाकर्षण के बिना रह रहे होते हैं. जब आपके पाँव सतह पर टिक नहीं रहे हों, वैसी स्थिति में कामसूत्र के लोकप्रिय आसनों का कोई ख़ास महत्व नहीं रह जाता है.

ये जाना-माना तथ्य है कि अंतरिक्षयात्रियों को किसी मिशन के दौरान सेक्स की मनाही होती है. हो भी क्यों नहीं. किसी एस्ट्रोनॉट के दिल की एक-एक धड़कन पर मिशन कंट्रोल वालों की निगरानी रहती है क्योंकि न सिर्फ़ महत्वपूर्ण प्रयोगों को पूरा करने, बल्कि ख़ुद एस्ट्रोनॉट को सही-सलामत रखने की चुनौती जो होती है. और सेक्स के दौरान मानव शरीर में होने वाली उथल-पुथल ना जाने अंतरिक्ष में क्या स्थिति बना दे.

एक और समस्या है:- वैज्ञानिकों को अभी इस बात का ज़्यादा अंदाज़ा नहीं है कि अंतरिक्ष में ठहरा गर्भ धरती पर किस तरह के गुण-अवगुण वाले बच्चे के जन्म का कारण बन सकता है. आप कह सकते हैं कि अंतरिक्ष यात्री सेक्स के दौरान गर्भनिरोधक का सहारा ले सकते हैं, लेकिन जब सेक्स हार्मोन्स ज़ोर मार रहे हों तो कई बार गर्भनिरोधकों की बात याद नहीं रख जाती. आप कहेंगे, यदि गर्भ ठहर ही जाता है तो धरती पर आने के बाद उससे मुक्ति पा ली जाएगी. सैद्धांतिक रूप से ऐसा संभव है, लेकिन सिद्धांतत: ही सही, समान मानवाधिकारों के इस युग में कोई एस्ट्रोनॉट-युगल बच्चा जनने के अधिकार को लेकर अदालत की राह भी तो पकड़ सकता है.


चित्र: भारहीनता का खेल

ख़ैर, आइए इस सारे विवाद की जड़ पर. अमरीका के नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज के एक अध्ययन में कहा गया है कि अंतरिक्ष में सेक्स के सवाल से समय रहते नहीं निपटा गया तो चाँद और मंगल पर भविष्य में भेजे जाने वाले मानव मिशनों के दौरान गड़बड़ियाँ सामने आ सकती हैं. न्यू साइंटिस्ट के ताज़ा अंक में इस अध्ययन का ज़िक्र किया गया है.

अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी, नासा से इस मसले पर गंभीरता से विचार करने की अपील करते हुए नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज की रिपोर्ट लिखने वाली टीम के सदस्य और यूनिवर्सिटि ऑफ़ साउदर्न कैलिफ़ोर्निया के मेडिकल एंथ्रोपोलोजिस्ट लॉरेंस पैलिंकस कहते हैं, "दीर्घावधि के अंतरिक्ष मिशनों की संभावनाओं को देखते हुए सेक्सुअल्टि के सवाल को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है."

पैलिंकस की चिंताओं से सहमति जताते हुए कैलिफ़ोर्निया में ही ओकलैंड स्थित यौन संबंधों से जुड़े मसलों के विशेषज्ञ मनोविश्लेषक रिन्क्लेब एलिसन कहते हैं, "पार्टनर बनाने और सेक्स से जुड़ी मूल भावनाओं की बात करें तो मानव आदिमकालीन स्थिति से आगे नहीं जा पाया है."

एलिसन का मतलब साफ़ है कि मानवीय यौन भावनाओं को पूरी तरह नियंत्रित करना लगभग असंभव है. इसका उदाहरण 2000 की उस घटना में देखा भी जा सकता है जब अंतरिक्ष यात्रा के लिए भारहीनता की आठ महीने तक चलने वाली ट्रेनिंग के दौरान एक रूसी(पुरुष) और एक कनाडियन(महिला) वैज्ञानिकों को अलग-अलग कक्षों में अभ्यास कराने की व्यवस्था करनी पड़ी थी. दरअसल दो बार रूसी वैज्ञानिक को कनाडियन रिसर्चर को चूमने की अनधिकृत कोशिश करते पकड़ा गया था.

पैलिंकस और ऐलिसन दोनों ही लंबे अंतरिक्ष मिशनों के दौरान सेक्स की संभावनाओं को तलाशने के पक्षधर हैं. पैलिंकस का मानना है कि सेक्स के सहारे अंतरिक्ष यात्रियों में स्थायित्व और सब कुछ सामान्य होने की भावना घर कर सकेगी. इसी तरह ऐलिसन का मानना है कि सेक्स और अन्य यौन-क्रीड़ाओं के ज़रिए एस्ट्रोनॉट्स लंबी यात्राओं के दौरान बोरियत और चिंताओं से निज़ात पा सकेंगे.

ऐलिसन ने कहा है कि नासा को दुनिया से बाहर दुनियादारी की व्यावहारिक समस्याओं पर विचार शुरू कर देना चाहिए. उन्होंने समस्याओं में से कुछ का उदाहरण दिया, "भारहीनता की स्थिति में कैसे सेक्स किया जा सकता है? प्राइवेसी भी एक समस्या होगी क्योंकि हर अंतरिक्ष यात्री के दिल की धड़कन और शरीर के तापमान तक पर भी हमेशा निगरानी रहती है."

यहाँ नासा के सलाहकार रहे जी. हैरी स्टाइन की किताब लिविंग इन स्पेस का ज़िक्र करना उचित होगा.स्टाइन ने लिखा है कि अल्बामा के मार्शल स्पेस फ़्लाइट सेंटर में प्रयोगों के दौरान पाया गया कि भारहीनता की स्थित में सेक्स संभव तो है, लेकिन यह बहुत ही मुश्किल काम है. उनकी माने तो कोई तीसरा अंतरिक्ष यात्री सेक्स करने के इच्छुक जोड़ी में से एक को सहारा दे तब शायद काम कुछ आसान हो जाएगा. वैसे यह भी बताता चलूँ कि स्टाइन अल्बामा में जिन आधिकारिक और ग़ैरआधिकारिक प्रयोगों की बात करते हैं उनकी सच्चाई संदिग्ध मानी जाती है.

इसी तरह विज्ञान से जुड़ी रिपोर्टों के लिए मशहूर फ़्रांसीसी लेखक पिएरे कोहलर ने कुछ वर्ष पहले इस कथित रहस्योदघाटन से सनसनी फैला दी थी कि अमरीकी और रूसी वैज्ञानिकों ने भारहीनता की स्थिति में सेक्स के ऊपर प्रयोग किया है. कोहलर ने द फ़ाइनल मिशन: मीर, द ह्यूमैन एडवेंचर में अमरीका और रूस सरकारों के गोपनीय आवरण को छिन्न-भिन्न करने की भूमिका बनाते हुए लिखा है कि 1996 में एक शटल मिशन के दौरान कुल 20 सेक्स आसनों को आजमाया गया ताकि टॉप-टेन पोज़ीशन्स चुने जा सकें. कोहलर की मानें तो चुने गए 10 आसनों में से मात्र चार ऐसे थे जो कि बिना किसी तीसरे व्यक्ति या मेकेनिकल उपकरणों(स्पेशल बेल्ट, नली आदि) की सहायता के संभव हैं. उन्होंने एक और सनसनीखेज बात बताई है कि धरती पर सबसे लोकप्रिय मिशनरी सेक्स पोज़ीशन को भारहीनता की स्थिति में आज़माना संभव नहीं है. न तो रूसी और न ही अमरीकी सरकार ने इस रहस्योदघाटन की सच्चाई की पुष्टि की है.

बुधवार, अक्टूबर 26, 2005

जब धन बन जाता है धेला

कहते हैं कि बुरा दिन आता है तो सारी धन-दौलत रखी रह जाती है. इसका ताज़ा उदाहरण है कुछ महीनों पहले तक रूस के सबसे धनी व्यक्ति मिखाइल खोदरकोव्स्की का. माना जाता है कि अब भी यूकोस तेल कंपनी के इस पूर्व प्रमुख के दुनिया भर के बैंक खातों में कई अरब डॉलर हैं.

राजधानी मास्को में एक किलेनुमा घर में रहने वाले खोदरकोव्स्की इन दिनों हैं तो रूस में ही लेकिन अपने परिजनों से लगभग 5,000 किलोमीटर दूर. दरअसल, वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में दोषी पाए गए खोदरकोव्स्की दो साल से जेल में हैं और पिछले दिनों उन्हें चीन की सीमा से सटे शहर क्रैसनोकामेन्सक की एक जेल में डाल दिया गया है. खोदरकोव्स्की बाकी छह साल की सजा YaG 14/10 नामक जेल में छोटे स्तर के चोरों और गिरहकटों के साथ गुजारेंगे. हालाँकि भाग्य ने उनका साथ दिया तो वे चार साल बाद पैरोल पर रिहा भी हो सकते हैं.

पश्चिमी देशों की माने तो खोदरकोव्स्की को सरकार पर रूसी पाइपलाइनों के निजीकरण का अनुचित दबाव बनाने और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के राजनीतिक विरोधियों पर धनवर्षा करने का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा है. हालाँकि आम रूसियों(मास्को और सेंट पीटर्सबर्ग से बाहर रहने वाले) से बात करें तो वे एक सुर से कहेंगे कि 42 वर्षीय खोदरकोव्स्की जैसे धनकुबेरों ने राष्ट्रपति बोरिस येल्तिसन के कार्यकाल के अंतिम दिनों में सरकारी संसाधनों की लूट से अपना साम्राज्य खड़ा किया है. इस सरकारी लूट की मार रूस के ग़रीबों पर पड़ी है. सरकार के हाथों से भारी मात्रा में संसाधन निकल जाने के बाद जनता को मिलने वाली सरकारी सहायता में लगातार कटौती होती गई है.

ख़ैर, खोदरकोव्स्की के पास अब भी बहुत धन है और उनकी पत्नी इना और माँ मेरिना निजी जेट से पाँच हज़ार किलोमीटर की यात्रा कुछ घंटों में तय कर नियमित रूप से उनसे मिल सकती हैं. वकीलों की फ़ौज तो क्रैसनोकामेन्सक शहर में डेरा डाले रहेगी ही. लेकिन ख़ुद खोदरकोव्स्की क्या कर रहे होंगे? तो भई, अधिकारियों ने उनके साथ थोड़ी नरमी बरती है और उन्हें दर्जनों पत्र-पत्रिकाएँ और जर्नल्स मँगाने की अनुमति दी है. कहा जा रहा है खोदरकोव्स्की साहब किसी विषय(बताया नहीं है) पर पीएचडी की तैयारी करेंगे.

लेकिन खोदरकोव्स्की को पढ़ाई के लिए समय निकालना होगा क्योंकि उन्हें जेल(जो कि ज़ार निकोलस के ज़माने का श्रम शिविर है) में बाकी क़ैदियों के समान काम करना पड़ेगा. काम के बदले उन्हें रोज़ 65 रूबल मिलेंगे यानि क़रीब 100 रुपये. इसमें से आधा उनकी ख़ुराक पर ख़र्च होगा. बाकी 30-35 रूबल से वो जेल के अंदर की दुकान से कुछ ख़रीद सकेंगे. काम उन्हें कुछ भी करना पड़ सकता है- वर्दी सीना, गाय पालना या फिर सूअरों की देखभाल करना. अभी वहाँ पाँच डिग्री सेल्सियस तापमान है जो कि कुछ ही दिनों में माइनस में चला जाएगा और ज़ोरदार सर्दी के दिनों में -40 सेल्सियस तक.

चित्र: YaG 14/10 जेल, क्रैसनोकामेन्स्क, रूस

यहाँ अपने देश की स्थिति से तुलना करें तो सबसे धनी आदमी की तो बात ही छोड़िए, घोटालों पर घोटाला करने वाले एक छुटभैया नेता तक का बाल बाँका नहीं हो पाता. और धनकुबेरों की तो छोड़िए, दो नंबर के कामों से पैसा कमाने वाला कोई धनपशु अपनी गाड़ी से चार-छह लाचार ग़रीबों को बिना कारण कुचल कर मार दे तो भी उसका कुछ नहीं होता.

(भारत में विस्तृत क़ानूनी प्रावधान उपलब्ध हैं, लेकिन वो दिन कब आएगा जब क़ानून समदृष्टि से न्याय करेगा? शायद अभी वक़्त लगेगा जब भारत में भी ग़रीब-अमीर, वोटर-नेता और निर्बल-बाहुबली क़ानून की नज़र में एक समान अधिकारों वाले हो सकेंगे.)

शनिवार, अक्टूबर 22, 2005

एपोफ़िस और तोरिनो पैमाना


अभी कश्मीर में भयानक भूकंप आया और एक बार फिर आम लोगों की ज़ुबान पर रिक्टर पैमाने का नाम चढ़ गया. कोई मुज़फ़्फ़राबाद के पास केंद्रित इस भूकंप को रिक्टर पैमाने पर 7.6 बता रहा था तो कोई 7.8 या और ज़्यादा.

इसी तरह अमरीका में तबाही मचाने वाले कैटरीना तूफ़ान ने जनसामान्य को फिर से याद दिलाया कि तूफ़ानों की एक से पाँच तक की कैटगरी के क्या मायने होते हैं.

लेकिन हमें नहीं लगता प्राकृतिक आपदा के एक और अहम पैमाने 'तोरिनो' की आमलोगों को ज़्यादा जानकारी है. जानकारी हो भी कैसे, क्योंकि इस पैमाने से जुड़ी कोई तबाही अभी हमें देखने को जो नहीं मिली है. भगवान न करे ऐसा कभी हो क्योंकि ऐसी तबाही में हज़ारों या लाखों में नहीं, बल्कि करोड़ों की संख्या में लोगों के मरने की आशंका होगी. और एक महाटक्कर से होने वाली इस तबाही के कारण पर्यावरण में होने वाला बदलाव भी बाद के वर्षों में करोड़ों अन्य लोगों की मौत का सीधा कारण बनेगा.

तोरिनो पैमाना है क्या बला? पहले तो ये बता दूँ कि तोरिनो नाम इटली के मशहूर शहर तूरिन से लिया गया है जिसे पश्चिमोत्तर इटली में तोरिनो नाम से ही जाना जाता है.(आपको आश्चर्य होगा कि इटली में मिलान को मिलानो, रोम को रोमा, फ़्लोरेंस को फ़िरेंज़ी और वेनिस को वेनित्सिया नाम से जाना जाता है.) तोरिनो से जुड़ी एक और रोचक बात यह है कि भारत की कांग्रेस पार्टी की भाग्य-विधाता पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विधवा सोनिया का ताल्लुक इसी शहर से है.

तो, तोरिनो में 1999 में खगोल भौतिकशास्त्रियों की एक बैठक हुई एस्टेरॉयड या उल्का-पिंडों और पुच्छल तारों के ख़तरे पर विचार के लिए.(एस्टेरॉयड मंगल और बृहस्पति के बीच लाखों की संख्या में मौजूद पत्थर और धातु के उन पिंडों को कहा जाता है जो कि एक ग्रह के समान ही सूर्य का चक्कर लगा रहे हैं. क्या पता किसी बड़े ग्रह से ही टूट कर बिखरे हों. इनमें से कुछ तो 1,000 किलोमीटर व्यास के हैं तो अनेक साधारण कंकड़-पत्थर जितने बड़े.)

पुच्छल तारों और एस्टेरॉयड के अपनी कक्षा से भटक कर धरती की ओर आने का ख़तरा हमेशा से बना रहा है. इस ख़तरे को हॉलीवुड ने बढ़ा-चढ़ाकर डीप इम्पैक्ट जैसी फ़िल्मों के ज़रिए बेचा भी है. हाल के इतिहास में तो ऐसी किसी टक्कर का ज़िक्र नहीं है, लेकिन माना जाता है कि ऐसी ही टक्करों से धरती के कई बड़ी झीलें बनी हैं और ऐसी ही किसी बड़ी टक्कर ने डायनोसोरों का काम तमाम किया होगा.

तो भैया, तोरिनो के सम्मेलन में एमआईट के वैज्ञानिक रिचर्ड बिन्ज़ेल द्वारा कुछ साल पहले प्रतिपादित पैमाने को स्वीकार कर लिया गया और उसे तोरिनो पैमाने के नाम से जाना जाने लगा. जहाँ तक एस्टेरॉयड के ख़तरे की बात है तो 1994 में ऐसी किसी टक्कर में मारे जाने की आशंका को किसी भयावह भूकंप के ख़तरे से ज़्यादा प्रबल बताया गया यानि 20 हज़ार में एक. लेकिन चार साल बाद अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने ऐसे सारे संभावित ख़तरों की गिनती की. नासा ने बताया कि कोई 700 एस्टेरॉयड ऐसे हैं जो कभी न कभी धरती का रुख़ कर सकते हैं. ऐसे में एस्टेरॉयड की टक्कर से मरने की आशंका घट कर 2,00,000 में एक कर दी गई. हालाँकि इस तरह की वैज्ञानिक गणनाओं पर पूरी तरह भरोसा भी नहीं किया जा सकता.

ख़ैर, दिसंबर 2004 में वैज्ञानिकों ने पाया कि 400 मीटर आकार का एक उल्का-पिंड वर्ष 2029 में धरती से टकरा सकता है. इस एस्टेरॉयड को विनाश के ग्रीक देवता एपोफ़िस का नाम दिया गया. और तोरिनो पैमाने पर इसे नंबर दिया गया 4. विश्वास करें कि किसी भी उल्का-पिंड को ख़तरे की दृष्टि से दिया गया यह सबसे बड़ा नंबर है. हालाँकि हाल के महीनों में ज़्यादा सही गणना का दावा करते हुए कहा गया है कि शायद एपोफ़िस धरती के बगल से गुजर जाए. लेकिन बेफ़िक्र होने की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि वैज्ञानिकों को मालूम नहीं कि 2029 में धरती के पास गुजरते वक़्त धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति एपोफ़िस की कक्षा और गति पर क्या असर करेगी. और भगवान न करे, कुछ गड़बड़ हुआ तो एपोफ़िस 2035-36 में एक बार फिर धरती माता को टक्कर देने की स्थिति में होगा.

भगवान बचाए. शुभ-शुभ!

चलते-चलते प्रस्तुत हैं 'गूगल अर्थ' के सौजन्य से दो अंतरराष्ट्रीय सामरिक ठिकानों के चित्र. (चित्र भारतीय सनसनी मीडिया के लिए हैं, न कि चरमपंथियों के लिए)-

पेंटागन, वाशिंग्टन, डीसी


बकिंघम पैलेस, लंदन

सोमवार, अक्टूबर 17, 2005

सनसनी चैनल की ख़बर, महामहिम की मुहर

कुछ विवाद ऐसे होते हैं जिनमें बड़ों का कूदना शोभा नहीं देता. ऐसा ही एक विवाद है गूगल अर्थ की सेवाओं का. लेकिन भारत में इस विवाद में स्वयं महामहिम राष्ट्रपति कूद पड़े हैं.

भारत में अक्सर ही किसी अधकचरी जानकारी को सनसनीखेज ख़बर का रूप दे दिया जाता है. टीवी चैनल ख़ास कर टीआरपी रेटिंग की लड़ाई में इस हथकंडे का उपयोग करते हैं. इस समय का नंबर एक समाचार चैनल कहलाने वाले 'स्टार न्यूज़' के एक स्वनामधन्य पत्रकार ने पिछले सप्ताह दूर की कौड़ी लाते हुए ख़बर दी कि गूगल अर्थ ने भारतीय सुरक्षा व्यवस्था को ख़तरे में डाल दिया है. 'ये ख़बर सिर्फ़ स्टार न्यूज़ के पास है' की बार-बार दुहाई देते हुए बताया गया कि गूगल की इस नई सेवा में राष्ट्रपति भवन और संसद को साफ़-साफ़ देखा जा सकता है.

चलो भई, ये भारतीय पत्रकार और ख़ास कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार तो ख़बरों की सनसनी की कमाई ही खाते हैं, इसलिए उनकी चाल(नादानी भी हो सकती है) को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए. लेकिन नहीं जनाब, राष्ट्रपति एपीजी अब्दुल कलाम भला विवाद में क्यों न कूदते. तो उन्होंने 15 अक्तूबर 2005 को मीडिया की लगाई आग में हवा डाल दी कि गूगल ठीक नहीं कर रहा...इस संबंध में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय क़ानून पर्याप्त नहीं हैं. उन्होंने भी दूर की कौड़ी लाई कि विकासशील देश पहले से ही आतंकवादी ख़तरों का सामना कर रहे हैं और इन्हीं के संवेदनशील प्रतिष्ठानों को ख़ास कर स्पष्ट चित्रित किया गया है.

जबकि ऐसी बात बिल्कुल ही नहीं है. महामहिम ने गूगल अर्थ पर दो-चार मिनट दिए होते तो उन्हें व्हाइट हाउस और क्रेमलिन भी राष्ट्रपति भवन के समान ही स्पष्ट दिखते. प्रस्तुत हैं व्हाइट हाउस और क्रेमलिन के चित्र जो कि ज़ाहिर है गूगल अर्थ पर बहुत ही साफ़ नज़र आते हैं.


व्हाइट हाउस, वाशिंग्टन, डीसी


क्रेमलिन, रेड स्क़्वायर, मास्को


राष्ट्रपति भवन की बात आ ही गई तो क्या ये ठीक नहीं होगा कि इस आधार पर इसे म्यूज़ियम में बदल दिया जाना चाहिए कि इसके 100 से ज़्यादा कमरों का कभी कोई उपयोग होता ही नहीं है? क्या ये ठीक नहीं होगा कि महामहिम भी प्रधानमंत्री की तरह ही अपेक्षाकृत छोटे भवन में रहें? एक सवाल यह भी कि हमेशा ओपन-सोर्सिंग की तरफ़दारी करते रहे महामहिम इस मामले में क्यों सूचना के खुले प्रवाह पर लगाम लगाना चाहते हैं?

वर्षों से मैकडोनल्ड्स जीपीएस सुविधा का इस्तेमाल दुनिया के प्रमुख शहरों में अपने रेस्तराँ की लोकेशन चुनने में करता रहा है, क्या ग़लत है जो लाखों अन्य लोगों को भी विभिन्न रूपों में उपयोग के लिए मुफ़्त में विस्तृत भौगोलिक सूचनाएँ मिलती हों?

रही बात आतंकवाद के ख़तरे की, तो उससे सूचना प्रवाह रोकने के प्रयास से तो निज़ात नहीं ही पाई जा सकती है क्योंकि इस युग में सूचना प्रवाह रोकने की कोशिश करना मुट्ठी में बालू भरने के समान है.

रविवार, अक्टूबर 16, 2005

ईरानी मुल्ला से सीख लेंगे हमारे नेता?

ईरान का नाम लेते ही हमारे दिमाग में पश्चिमी मीडिया द्वारा निर्मित एक देश और उसके लोगों की छवि बन जाती है. यह छवि कमोबेश ये होती है कि वहाँ एक मुल्ला तंत्र सत्ता में है, वहाँ के युवा इस तंत्र से आज़ादी चाहते हैं लेकिन बहुमत अभी भी देश को इस्लामी तंत्र के रूप में देखने वालों की है.

इसी ईरान के एक मुल्ला का विस्तृत साक्षात्कार विज्ञान पत्रिका न्यू साइंटिस्ट के 15 अक्टूबर 2005 के अंक में छपा है. इस मुल्ला का नाम है मोहम्मद अली अबताही. बहुत दिनों तक ये सांसद रहने के अलावा राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी के शासन में ये उपराष्ट्रपति के पद पर थे, खातमी के प्रमुख सलाहकारों में माने जाते थे. लेकिन न्यू साइंटिस्ट ने उनका साक्षात्कार एक प्रगतिशील राजनेता के रूप में नहीं बल्कि एक ब्लॉगर के रूप में छापा है.

जी हाँ, ईरान वही देश है जहाँ सबसे ज़्यादा संख्या में ब्लॉगरों पर पुलिस की मार पड़ती है. ऐसे में अभी भी सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़ा एक हाई-प्रोफ़ाइल मुल्ला ब्लॉग लिखे और वो ब्लॉग ईरान के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग के रूप में जाना जाता हो, तो ज़रूर ही कोई विशेष बात होगी.

जी हाँ, 48 साल के मोहम्मद अबताही का ब्लॉग वेबनेवेश्तेहा ईरान का सबसे लोकप्रिय ब्लॉग माना जाता है. यह अंग्रेज़ी समेत तीन भाषाओं में है.

प्रस्तुत है मोहम्मद अली अबताही का साक्षात्कार-


आपने ब्लॉग क्यों शुरू किया?
मैं अपने आधिकारिक और सरकारी दायित्वों से अलग रहते हुए अपने विचार व्यक्त करना चाहता था. ब्लॉग की कोई विरासत नहीं होती और वो किसी के बाप की अमानत भी नहीं होता. कोई भी, किसी भी तरह के विचार वाला ब्लॉगों में लिख सकता है. लोगों की इसमें दिलचस्पी है.

आपके राजनीतिक सहयोगी इस बारे में क्या सोचते हैं?
अधिकतर को मेरे ब्लॉगिंग करने की बात तब तक नहीं पता चलती जब तक उनके बच्चों को इस बात का पता न चल जाता हो और बच्चे उन्हें जाकर यह बात बताते न हों...कई बार मेरा यह कार्य विवादास्पद भी बना. मैं अधिकारियों की तस्वीर लेकर इंटरनेट पर डाल देता हूँ. मेरे ब्लॉग को शासन के तरफ़ से कई बार चुनौती मिली, हालाँकि मैंने स्पष्ट कर रखा है कि ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं और सरकार की राजनीति से इसका कुछ लेना-देना नहीं है.

आपको अपने ब्लॉग के चलते कोई नुक़सान भी हुआ?
मुझे बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी. ईरानी सत्ता के रूढ़ीवादी तत्वों ने कई आरोप लगाए और मेरी व्यक्तिगत ज़िंदगी के बारे में कई झूठी बातें फैलाई. मसलन, पिछले साल उन्होंने ये अफ़वाह फैलाई कि मैंने उपराष्ट्रपति का पद छोड़ दिया है, क्यों..क्योंकि मैंने तेहरान के एक ऐसे स्विमिंग-पूल में तैराकी की जिसमें कि औरतें भी तैर रही थीं. आपको भले ही यह आरोप गंभीर नहीं लग रहा हो, ईरान में यह बहुत ही गंभीर बात है.

इससे पहले इसी साल सुरक्षा बलों ने सात दिनों के लिए मेरे ब्लॉग को हैक कर लिया था. ये इसलिए कि क्योंकि मैं अपने विचार व्यक्त करने के कारण जेल भेजे गए ब्लॉगरों की आवाज़ बन गया था. मैंने यह लिखा था कि कैसे उन ब्लॉगरों को प्रताड़ित किया गया.

हैकिंग की इस घटना के बाद मैं ईरान से बाहर के एक वेब-सर्वर की सेवाएँ लेने को बाध्य हो गया ताकि सुरक्षा बल फिर से परेशानी खड़ा नहीं कर सकें.

कौन से तत्व आपकी वेबसाइट को निशाना बनाते हैं?
सारा दबाव रूढ़ीवाद शासन का है. हमेशा से यही स्थिति रही है. जनता साथ देती है, लेकिन अधिकतर ब्लॉगर युवा हैं और जल्दी डर जाते हैं. ब्लॉगरों को जले भेजे जाने का असर उन पर गहरा होता है. मैं वेबसाइटों को सेंसर किए जाने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता रहा हूँ. अभी भी ईरान में इंटरनेट की फ़िल्टरिंग होती है. सर्विस प्रोवाइडर्स को सरकार की बात माननी पड़ती है वरना उन्हें बंद कर दिया जाएगा.

लेकिन इतनी निगरानी के बाद भी आप बिना ज़्यादा परेशानी के कैसे बच निकलते हैं?
मैं बच जाता हूँ राजनीतिक एक्टिविस्ट की अपनी पृष्ठभूमि के कारण. मैं इस कारण बच जाता हूँ कि मुझे सब जानते हैं. यदि शासन मेरे ब्लॉग को सेंसर करने की कोशिश करेगा तो जनता के विरोध के रूप में उन्हें ख़ामियाज़ा भुगतना होगा.

ईरानी समाज और राजनीति पर ब्लॉगिंग का क्या असर हो रहा है?
सुधार पहले समाज में होता है, फिर सरकार में. राष्ट्रपति खातमी के शासन में ईरान में कुछ सुधार हुआ, लेकिन सुधार की गति से लोग ख़ुश नहीं थे. नेट भी समाज द्वारा उपयोग में लाया जा रहा एक माध्यम है. इसका विकास हो रहा है और यह बदलाव भी ला रहा है. नेट प्रभावशाली है और यह परिवर्तन के लिए और ज़्यादा दबाव पैदा करेगा. यह नई पीढ़ी का औजार है, और चूँकि युवा वर्ग ख़ुद को विश्वव्यापी समाज का हिस्सा मानता हो सो उनकी आकांक्षाएँ बड़ी हैं.

एक एक्टिविस्ट के रूप में अपनी पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताएँ?
मैं एक धार्मिक परिवार से हूँ. मेरे पिता एक धार्मिक विद्वान थे. ईरान की 1979 की क्रांति से पहले जब मैं एक किशोर था, मेरे पास एक सुपर8 कैमरा हुआ करता था. जहाँ भी मैं जाता था शॉर्ट फ़िल्में बना लेता. मेरी सहायता से मेरे पिता इन फ़िल्मों और स्लाइडों को अपनी धार्मिक तक़रीरों के दौरान इस्तेमाल करते थे. उस समय के माहौल में ये बिल्कुल ही अस्वाभाविक चीज़ थी.

क्रांति के दौरान मैं बहुत सक्रिय रहा. मैंने भाषण दिए, फ़िल्में बनाईं और पर्चे बाँटे. सड़क पर निकल कर आंदोलन में शामिल होना बड़ा ही उत्तेजक अनुभव होता था. मैं शाह के शासन को अन्यायपूर्ण मानता था और मैं बहुत ही आदर्शवादी था, लोगों को आज़ादी दिलाना चाहता था.

जब मैं 18 साल का था, अयातुल्ला खुमैनी के भाषण प्रकाशित करने और ख़ुद के भाषण के कारण मुझे गिरफ़्तार भी होना पड़ा था.

मैं ख़ुद को क्रांति की संतान मानता हूँ. मुझे लगता है मौजूदा शासन उन सिद्धांतों के ख़िलाफ़ काम कर रहा है, जिनके लिए मैंने आंदोलन में भाग लिया था. सुधार होगा, लेकिन 1979 के जैसा ही जनता की अगुआई में. जनता खेल में आगे है और नेट समाज सुधार के सबसे महत्वपूर्ण माध्यमों में शामिल है.

लोग आपके ब्लॉग पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं?
मैं बड़ी मुश्किल स्थिति में हूँ. क्योंकि मैं एक मीडिया शख़्सियत हूँ, कुछ रूढ़ीवादी मुझे रैडिकल मानते हैं. दूसरी ओर जनता का एक वर्ग मुझे सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा मानता है. हालाँकि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय एक व्यक्ति के साथ इंटरएक्ट करना लोगों को उत्साहित करता है. ब्लॉग पर मैंने एक सवाल-जवाब का हिस्सा बना रखा है जहाँ लोग आपस में बहस करते हैं- राजनीति पर, शासन पर और बाकी विषयों पर जिनमें से कुछ मैं उन्हें देता हूँ. वे सवाल पूछते हैं, वे मेरा अपमान भी करते हैं, वे रूढ़ीवादियों का भी अपमान करते हैं, लेकिन बहुमत मेरे साथ सहानुभूति रखता है. मैं अपने ब्लॉग पर सबकी राय छापता हूँ जब तक कि वो अनैतिक न हो.

(ज़रूरत है कि भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े कुछ लोग मोहम्मद अली अबताही जैसा ही साहस दिखाएँ और देश के युवा वर्ग से सीधा संवाद क़ायम करें. वरना मौजूदा माहौल में लोकतंत्र के दंभ और तकनीकी विकास के हमारे दावे का क्या मतलब?)