Friday, February 01, 2008

चाँद छूने के बाद (भाग-2)

चंद्रोदयइस लेख के पहले हिस्से में हमने चाँद पर क़दम रखने वाले लोगों में से सात के बारे में पढ़ा. आइए बाक़ी के पाँच मूनवॉकर के बारे में जानते हैं कि धरती से इतर किसी ज़मीन पर क़दम रखने की उपलब्धि हासिल करने के बाद उनकी ज़िंदगी कैसी रही-

8. जेम्स इरविन, अपोलो 15 (30 जुलाई 1971)
इरविन की मानें तो चाँद पर क़दम रखने के साथ ही उनका ईश्वर से साक्षात्कार हुआ था. भगवान से इस मुलाक़ात ने उनकी ज़िंदगी को बदल कर रख दिया. धरती पर वापस लौटते ही उन्होंने नासा छोड़ दिया. वे न सिर्फ़ धर्म की शरण में आ गए, बल्कि High Flight Foundation नामक एक संगठन की स्थापना भी की जो कि ईसाइयत की विभिन्न शाखाओं को साथ लेकर चलती है. इस संगठन का नेतृत्व करते हुए वो चार बार मिशन लेकर तुर्की गए Noah's Ark की खोज करने. यानि उस नौका के अवशेष ढूंढने जो कि मिथकों के अनुसार महाप्रलय के दौरान ईश्वरीय निर्देश पर तत्कालीन दुनिया के एकमात्र सदचरित्र व्यक्ति नोह और उसके परिवार तथा प्रमुख जीव प्रजातियों को बचाने के लिए बना था. इरविन को इस मिथकीय नौका को ढूँढ निकालने के अपने प्रयास में हर बार नाकामी ही मिली. इरविन का 1991 में निधन हुआ.

9. जॉन डब्ल्यू यंग, अपोलो 16 (21 अप्रैल 1972)
यंग छह बार अंतरिक्ष यात्राएँ करने वाले पहले व्यक्ति बने. ये रिकॉर्ड अभी भी उनके नाम है. चंद्रयात्रा के बाद 32 साल तक वे नासा के साथ रहे और 74 साल की उम्र में 2004 में सेवानिवृति ली. अत्यंत प्रतिभावान यंग ने नासा के 50 वर्षों के इतिहास में लगभग सभी प्रमुख परियोजनाओं में अपना योगदान दिया. उनके साथी अंतरिक्षयात्रियों की मानें तो यंग विनम्रता की प्रतिमूर्ति हैं.

10. चार्ल्स ड्यूक, अपोलो 16 (21 अप्रैल 1972)
ड्यूक को चाँद पर जा कर इतनी ख़ुशी हुई कि उन्हें वहाँ हेलमेट उतारने की इच्छा पर काबू करने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी. चंद्रयात्रा के बाद वे बोरियत का शिकार हो गए. उन्होंने नासा को छोड़ दिया और ढेर सारा पैसा बनाने का फ़ैसला किया. उन्होंने बीयर के धंधे में ख़ूब पैसा बनाया भी. लेकिन बोरियत एक बार फिर उन पर हावी हो गई, और वे दिन-रात बीयर में डूबे रहने लगे. उनकी पत्नी डॉटि को भी ड्यूक पर चंद्र की कुदृष्टि पड़ने का अहसास हुआ. उन्होंने चंद्रयात्रा के बाद ड्यूक के ग़ुस्सैल हो जाने और परिवार से दूर काम में ही मशगूल रहने की शिकायत की. इन सबके बीच डॉटि भी नशाखोरी में डूब गई. लेकिन बाद में वह ईश्वर की शरण में आ गई. इसके बाद ड्यूक ने भी बीयर का धंधा छोड़ धर्म की राह पकड़ ली. इस तरह अंतत: पति-पत्नी चंद्रमा के अभिशाप से मुक्त हुए. अब दोनों ईसाइयत का प्रचार करते हैं, लोगों को सदकर्म के लिए प्रेरित करते हैं.

11. यूजिन कर्नेन, अपोलो 17 (11 दिसंबर 1972)कर्नेन
कर्नेन चंद्रमा पर उतरने वाले ग्यारहवें लेकिन चंद्र सतह पर चलने वाले अंतिम व्यक्ति हैं. दरअसल वापसी के दौरान वे बारहवें मूनवॉकर श्मिट के बाद अपोलो चंद्र मॉड्यूल में वापस लौटे थे. कर्नेन 1975 में प्राइवेट सेक्टर में आ गए, लेकिन नासा की परियोजनाओं में योगदान देते रहे. कर्नेन मानव अंतरिक्ष मिशन के बड़े पैरोकारों में से हैं. वर्षों से वे चाँद पर दोबारा मानव मिशन भेजे जाने के साथ-साथ मंगल ग्रह पर भी मनुष्य को पहुँचाने के लिए जनमत बनाने का प्रयास करते रहे हैं.

12. हैरिसन जैक श्मिट, अपोलो 17 (11 दिसंबर 1972)
चाँद पर उतरने वाले बारहवें व्यक्ति और एकमात्र वैज्ञानिक श्मिट 1975 में नासा को छोड़ कर राजनीति में आ गए. वे 1977 में अमरीकी सीनेट के लिए चुने गए. लेकिन अगले कार्यकाल के लिए नहीं चुने जाने पर 1982 में उन्होंने राजनीति को नमस्कार कह दिया. अब उनका समय हीलियम-3 पर रिसर्च में बीतता है. माना जाता है कि चाँद पर बहुतायत में उपलब्ध हीलियम-3 भविष्य में ऊर्जा का स्वच्छ स्रोत साबित हो सकता है.

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Thursday, January 31, 2008

चाँद छूने के बाद

चाँद पर आर्मस्ट्राँगधरती से इतर किसी ज़मीन पर पाँव रखने का मौक़ा सिर्फ़ 12 लोगों को ही मिला है. इन लोगों ने अमरीका के अपोलो अभियान की विभिन्न उड़ानों के सहारे चाँद पर जाकर ये उपलब्धि अर्जित की.

इन्होंने जुलाई 1969 से दिसंबर 1972 के बीच 'मूनवॉकिंग' की. उसके बाद इनकी ज़िंदगी ने क्या रुख़ किया? मुझे इस सवाल का जवाब हाल ही में एक लेख में मिला. आश्चर्य हुआ कि इनमें से ज़्यादातर ने बाद में वैज्ञानिक कार्यों से मुँह मोड़ लिया.

आइए क्रमवार देखते हैं कि चाँद को छूने वाले दर्जन भर लोगों का बाद का जीवन कैसा रहा-

1. नील आर्मस्ट्राँग, यान- अपोलो 11 (चाँद पर उतरने की तारीख़- 21 जुलाई 1969)
चाँद पर सबसे पहले क़दम रखने वाले आर्मस्ट्राँग बारह मूनवॉकर्स में सबसे रहस्मय माने जाते हैं. नायक वाली छवि उन्हें कभी रास नहीं आई. उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर उपस्थिति, इंटरव्यू, विज्ञापन आदि से अपने को अलग रखा. वे 1971 में सेवानिवृति तक नासा से जुड़े रहे. इस समय वे अपनी पत्नी के साथ अमरीका के ओहायो में रहते हैं. अभी भी वे ऑटोग्राफ़ देने से मना कर देते हैं.

2. बज़्ज़ एल्ड्रिन, अपोलो 11 (21 जुलाई 1969)
चाँद से लौटने के बाद बज़्ज़ को बुरे वक़्त ने घेर लिया. अपोलो 11 अभियान में उनके सहयोगी माइक कॉलिन की मानें तो बज़्ज़ को शुरू से ही इस बात का मलाल रहा कि वे चाँद पर क़दम रखने वाला पहला नहीं, बल्कि दूसरा मानव बने. शीघ्र ही बज़्ज़ शराब में गोते लगाने लगे, उन्हें अवसाद ने घेर लिया. उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ दी. एक-एक कर दो पत्नियों से तलाक हुआ. तीसरी शादी के बाद ही वे 1988 में फिर से सामान्य ज़िंदगी की ओर लौटते दिखे. बाद में उन्होंने एक लेखक के रूप में पहचान बनाई. बज़्ज़ अंतरिक्ष-पर्यटन के बड़े समर्थकों में से हैं.

3. चार्ल्स पीट कोनरैड (अपोलो 12, 19 नवंबर 1969)
करिश्माई व्यक्तित्व वाले कोनरैड ने 1974 में नासा को छोड़ कर प्राइवेट सेक्टर का रुख़ किया. उन्होंने मैकडोनेल-डगलस की व्यावसायिक अंतरिक्ष यात्रा परियोजना में योगदान दिया. अपोलो 12 के इस कमांडर की मौत 1999 में मोटरसाइकिल दुर्घटना में हुई.

4. एलन बीन, अपोलो 12 (19 नवंबर 1969)
अपोलो 12 अभियान की सफलता के 12 साल बाद तक बीन नासा से जुड़े रहे. वहाँ से 1981 में सेवानिवृति के बाद उन्होंने चित्रकारी का पेशा चुना. उनके चित्र मुख्यत: चाँद और अन्य अंतरिक्षीय विषयों पर आधारित होते हैं.

5. एलन शेपर्ड, अपोलो 14 (5 फ़रवरी 1971)
शेपर्ड मई 1961 में अंतरिक्ष में पहुँचने वाले पहले अमरीकी बने थे. क़रीब दस साल बाद उन्हें चाँद पर क़दम रखने वाला पाँचवाँ व्यक्ति बनने का सौभाग्य मिला. सैनिक पृष्ठभूमि वाले शेपर्ड को बड़ा ही कड़क यान-कप्तान माना जाता था. लेकिन जब उन्होंने चाँद पर क़दम रखा तो अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए और रो पड़े. चंद्रयात्रा के बाद उनका व्यक्तित्व बिल्कुल बदल गया. वे शांत प्रकृति के इंसान बन गए. नासा से 1974 में सेवानिवृत होने के बाद उन्होंने निजी क्षेत्र में काम किया. वे 1998 में ल्यूकीमिया का शिकार होकर इस दुनिया से विदा हुए.

6. एडगर मिशेल, अपोलो 14 (5 फ़रवरी 1971)
मिशेल ने ही कहा था कि चाँद से धरती को देखने पर सार्वभौम-जुड़ाव का अहसास होता है. चंद्रयात्रा के तुरंत बाद उन्होंने नासा को छोड़ दिया. उन्होंने 1973 में Institute of Noetic Sciences की स्थापना की जहाँ आध्यात्मिक ऊर्जा, वैकल्पिक चिकित्सा और परामानसिक क्षमता जैसे विषयों पर अनुसंधान होता है. मिशेल ने 2004 में दावा किया कि वैंकूवर के एक किशोर ने हज़ारों मील दूर रहते हुए उनका कैंसर ठीक कर दिया. उन्होंने अमरीकी सरकार से पराग्रहीय जीवों के बारे में सच्चाई सार्वजनिक करने की माँग की है. मिशेल का मानना है कि दूसरे ग्रहों के जीव दशकों से धरती पर आते रहे हैं.

7. डेविड स्कॉट, अपोलो 15 (30 जुलाई 1971)
डाक-टिकट घोटाले में शामिल होने के आरोपों में अमरीकी सरकार ने स्कॉट को दोबारा अंतरिक्ष में भेजे जाने पर रोक लगा दी थी. उन पर आरोप था कि वे अपने साथ विशेष अवसर पर जारी किए जाने वाले 398 डाक-टिकट साथ ले गए थे. कथित तौर पर उनकी एक जर्मन व्यवसायी से सांठगांठ थी जिसने भारी क़ीमत पर उनमें से सौ डाक-टिकट ख़रीदने का वादा किया था. 1975 में नासा से रिटायर होने के बाद वे सार्वजनिक मंच से ग़ायब ही हो गए. वापस 2003 में वो तब चर्चा में आए, जब समाचार-वाचिका एना फ़ोर्ड ने उनसे अपनी सगाई की ख़बर दी. हालाँकि ये संबंध ज़्यादा दिन नहीं चल पाया. स्कॉट इन दिनों 'मोटिवेशनल स्पीकर' का काम करते हैं.

...अगली पोस्ट में जारी...

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Sunday, October 07, 2007

क्या विज्ञान दुनिया को बचा सकता है?

धरती मातादुनिया में कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कई संधियाँ हो चुकी हैं. निजी कंपनियाँ भी ग्लोबल वार्मिंग के ख़िलाफ़ नई-नई घोषणाएँ कर रही हैं. ज़िम्मेदार लोग निजी कारों की बजाय ज़्यादा-से-ज़्यादा सार्वजनिक परिवहन का उपयोग कर, और कम-से-कम हवाई यात्राएँ कर अपना 'कार्बन फ़ुटप्रिंट' छोटा करने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन दुनिया भर में बड़ी संख्या में ऐसे वैज्ञानिक हैं, जो मानते हैं कि मात्र जीवन के रंग-ढंग बदलकर पर्यावरण को हुए नुक़सान की भरपाई नहीं की जा सकती. क्योंकि दशकों की बेफ़िक्री ने जलवायु परिवर्तन की समस्या को बहुत ही जटिल और गंभीर बना दिया है. वैज्ञानिकों की इस जमात का दृढ़ विश्वास है कि जलवायु में कार्बन डाइऑक्साइड की लगातार बढ़ती मात्रा पर विज्ञान के ज़रिए ही रोक लगाई जा सकती है. इस तरह के वैज्ञानिक उपायों को जियो-इंजीनियरिंग (Geo-engineering) का नाम दिया गया है.

संडे ऑब्जर्वर ने उन छह जियो-इंजीनियरिंग उपायों का आकलन किया है, जो कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार पर रोक लगा सकते हैं. आइए इन उपायों पर एक नज़र डालें-

1. समुद्री पम्प-

ब्रिटेन के दो प्रसिद्ध वैज्ञानिकों, क्रिस रैप्ली और जेम्स लवलॉक को पूरा विश्वास है कि समुद्र में बड़ी संख्या में पाइप डाल कर कार्बन डाइऑक्साइड की बड़ी मात्रा को वायुमंडल से अलग किया जा सकता है. उनका कहना है कि पानी के भीतर खड़ा किए गए इन पाइपों से पंप का काम लेते हुए समुद्र की गहराई के ठंडे पानी को सतह तक लाएगा. चूँकि ठंडे पानी में गर्म पानी के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा जीवन पाया जाता है, इसलिए समुद्र के गर्म सतह वाले हिस्सों में अपेक्षाकृत ठंडे पानी को ऊपर ला कर जीवन के ज़्यादा प्रकारों को वायुमंडल के संपर्क में लाया जा सकेगा. ऐसी जीव और पौध प्रजातियाँ बड़ी मात्रा में वायुमंडल के कार्बन डाइऑक्साइड को सोख सकेगी. अपनी उम्र पूरी होने के बाद ये नीचे समुद्र की तलहटी से जा लगेंगी, और इस तरह इनके साथ ही बड़ी मात्रा में कार्बन भी अनंत काल के लिए वायुमंडल से दूर चला जाएगा.

वैज्ञानिक इस उपाय की सफलता की संभावना को 3/5 आँकते हैं. और इसके विरोधियों का कहना है कि इस तरह समुद्र में बड़ी संख्या में पाइपें खड़ी करने से व्हेल और डॉलफ़िन जैसी जीव प्रजातियों को बहुत नुक़सान पहुँचेगा.

2. गंधकीय चादर-

बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों के बाद पूरी धरती का तापमान कम हो जाता है. उदाहरण के लिए 1991 में फ़िलिपींस में माउंट पिनातुबो के फटने के बाद पूरी दुनिया के तापमान में 0.6 प्रतिशत की गिरावट आई थी. वैज्ञानिकों ने ज्वालामुखी विस्फोट से वायुमंडल के मध्यवर्ती हिस्से स्ट्रैटोस्फेअर मे एक करोड़ टन गंधक रसायन के आने को तापमान में गिरावट का कारण बताया. ऐसे में ओज़ोन लेयर पर अपने काम के कारण 1995 में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले वैज्ञानिक पॉल क्रूटज़ेन की तरफ़ से सुझाव आया कि क्यों नहीं माउंट पिनातुबो के उदाहरण को अपनाया जाए! प्रोफ़ेसर क्रूटज़ेन का कहना है कि वायुमंडल में गंधक की एक चादर तैयार कर धरती की सतह पर पहुँचने वाली सूर्य की किरणों की मात्रा को कम किया जा सकेगा. उनका कहना है कि रॉकेटों के ज़रिए स्ट्रैटोस्फेअर में क़रीब दस लाख टन गंधक रसायन पहुँचा कर धरती को ठंडा किया जा सकेगा.

वैज्ञानिक इस उपाय की सफलता की संभावना को 1/5 मानते हैं. इसके विरोधियों का कहना है वायुमंडल में इतनी ज़्यादा मात्रा में गंधक रसायन डालने से अम्लीय वर्षा बढ़ सकती है, और इस उपाय से ओज़ोन सतह को भी नुक़सान पहुँच सकता है.

3. अंतरिक्षीय दर्पण-

सूर्य की विकिरण धरती को गर्म करती है और यहाँ जीवन को संभव बनाती है. लेकिन जैसे-जैसे धरती गर्म होती जा रही है, धरती पर पहुँचने वाली सौर विकिरण की मात्रा को कम करने की आवश्यकता बढ़ती जा रही है. कैलिफ़ोर्निया की लॉरेंस लाइवमोर राष्ट्रीय प्रयोगशाला के भौतिकविद लॉवेल वुड का मानना है कि वायुमंडल में अत्यंत पतले अल्युमिनियम धागे की जाली तान कर बड़ी मात्रा में विकिरण को परावर्तित किया जा सकता है. उनका कहना है कि एक ईंच के दस लाखवें हिस्से की मोटाई वाली अल्युमिनियम की तार की जाली एक विंडो-स्क्रीन का काम करेगी. इससे सूर्य का प्रकाश तो नहीं रुकेगा, लेकिन अवरक्त किरणें ज़रूर परावर्तित हो जाएँगी.

इस उपाय की सफलता की संभावना 1/5 मानी जाती है, और इस पर संदेह करने वालों का कहना है कि सौर विकिरण में एक प्रतिशत की भी कटौती करने के लिए कुल मिला कर छह लाख वर्गमील आकार की जाली ताननी होगी, जिस पर बहुत ही ज़्यादा लागत आएगी.

4. मेघ आवरण-

कोलोराडो के राष्ट्रीय वायुमंडलीय अनुसंधान केंद्र के जॉन लैथम और एडिनबरा विश्वविद्यालय के स्टीफ़न साल्टर का कहना है कि बादलों की मात्रा में चार प्रतिशत की वृद्धि कर धरती पर सौर विकिरण की मात्रा में पर्याप्त कमी लाई जा सकती है. इन दोनों महानुभावों का कहना है कि 'क्लाउड सीडिंग' की 'सीवॉटर स्प्रे' प्रक्रिया के ज़रिए कृत्रिम रूप से बादलों का आवरण तैयार करना आसान है, और इस पर अपेक्षाकृत बहुत कम ख़र्च आएगा.

इस उपाय की सफलता की संभावना 2/5 बताई जाती है, और इसके विरोधियों का कहना है कि बड़ी मात्रा में कृत्रिम बादल पैदा करने से मौसम का पैटर्न गड़बड़ा सकता है.

5. कृत्रिम पेड़-

कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम करने के लिए पेड़ लगाने का तरीका बहुत ही लोकप्रिय है, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक विशेष प्रकार के कृत्रिम पेड़ लगा कर कहीं ज़्यादा कार्बन वायुमंडल से बाहर करने का उपाय खोजा है. इस उपाय का प्रतिपादन सबसे पहले कोलंबिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक क्लाउस लैकनर ने किया. विशेष रसायनों से निर्मित ये पेड़ न बढ़ेंगे, न फलेंगे, न फूलेंगे...लेकिन लैकनर का दावा है कि उनके द्वारा विकसित प्रत्येक कृत्रिम पेड़ वायुमंडल से प्रतिवर्ष 90 हज़ार टन कार्बन डाइऑक्साइड सोख सकेगा. यानि कार्बन डाइऑक्साइड सोखने (Carbon Sequestration) के मामले में कृत्रिम पेड़ एक वास्तविक पेड़ के मुक़ाबले एक हज़ार गुना ज़्यादा कारगर होगा.

वैज्ञानिक इस उपाय की सफलता की संभावना को 4/5 बताते हैं, और इसके विरोधियों का कहना है कि ऐसे पेड़ तैयार करने की प्रक्रिया में वायुमंडल को फ़ायदे की तुलना में नुक़सान ज़्यादा होगा, क्योंकि पेड़ बनाने के कारखानों में ऊर्जा की बहुत ज़्यादा खपत होगी.

6. जल पौध-

समुद्र की सतह पर उतराती सूक्ष्म पौध प्रजातियाँ(Plankton और Algae) कार्बन डाइक्साइड की भक्षक मानी जाती हैं. अपनी उम्र पूरी होने के बाद वे अपने साथ बड़ी मात्रा में कार्बन लिए समुद्र की तलहटी में जा बैठती हैं. यानि समुद्र की सतह पर शैवाल और अन्य सूक्ष्म पौध प्रजातियों की मात्रा बढ़ाओ, कार्बन डाइऑक्साइड की मात्र अपने-आप कम हो जाएगी. अमरीका के वुड्स होल समुद्र विज्ञान संस्थान में हाल ही में एक सम्मेलन में इस उपाय पर व्यापक चर्चा की गई. इस सम्मेलन में अनेक विशेषज्ञों की राय थी कि लौह उर्वरक का इस्तेमाल कर समुद्री पौध प्रजातियों की मात्रा बढ़ाना संभव है. घुलनशील लौह यौगिकों को समुद्र में डालते हुए दुनिया भर में इस उपाय से जुड़े प्रयोग शुरू भी किए जा चुके हैं.

इस उपाय की सफलता की संभावना 2/5 मानी जाती है, और इसके विरोधियों का कहना है कि इस विधि से ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड नहीं सोखा जा सकता, जबकि इससे समुद्र में अत्यंत ख़तरनाक प्रदूषण फैल सकता है.

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Thursday, March 08, 2007

बचा जा सकता है इस प्राकृतिक आपदा से

एस्टेरॉयड की टक्कर, चित्र कल्पना- नासाअमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने यह कह कर चौंका दिया है कि धरती को नुक़सान पहुँचाने में सक्षम अंतरिक्षीय पिंडों का समय रहते पता लगाने की क़ाबिलियत तो उसके पास है, लेकिन इस काम के लिए ज़रूरी धन उसके पास नहीं है. नासा की यह परेशानी वाशिंग्टन में Planetary Defense Conference में प्रस्तुत एक रिपोर्ट में सामने आई है. सौर मंडल में अपनी कक्षाओं में घूमते या भटकते हुए धरती के पास आ सकने वाले ऐसे पिंडों(धूमकेतु भी शामिल) को वैज्ञानिकों ने Near-Earth Objects या 'निओ' नाम दिया है.

धरती को 20 हज़ार से ज़्यादा अंतरिक्षीय पिंडों से ख़तरा बताया जाता है. अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी का कहना है कि वर्ष 2020 तक वह इनमें से कम से कम 90 प्रतिशत का पता लगाने में सक्षम है, लेकिन इसके लिए ज़रूरी एक अरब डॉलर की राशि की व्यवस्था कर पाना उसके लिए संभव नहीं है. (मालूम रहे कि अमरीका इराक़ में इतना धन हर पखवाड़े ख़र्च कर रहा है.)

अंतरराष्ट्रीय खगोलविदों को सबसे ज़्यादा डर एपोफ़िस नामक उल्का पिंड को लेकर है. करीब 400 मीटर आकार के इस एस्टेरॉयड के 2036 में धरती के पास होने की गणना की गई है. इसके धरती से टकराने की आशंका 45,000 में एक मानी जा रही है. यदि मौजूदा अनुमानों के मुताबिक यह किसी आबादी वाले इलाक़े पर नहीं, बल्कि प्रशांत महासागर में गिरता है तो भी इससे होने वाले नुक़सान की कल्पना नहीं की जा सकती. बहुत कम विनाश हुआ तो भी प्रशांत महासागर से जुड़े कई देश तबाह हो जाएँगे, और सुनामी के चलते अमरीका के पश्चिमी तट पर मौत का तांडव होगा.

इस सप्ताह वाशिंग्टन में हुए सम्मेलन में जिन बातों पर विचार किया गया उनमें प्रमुख थे- किस आकार के निओ पिंडों को धरती के लिए वास्तविक ख़तरा माना जाए, धरती से भिड़ने को तत्पर अंतरिक्षीय पिंडों से किन उपायों से पार पाया जा सकता है और यदि ऐसी कोई टक्कर टालने से भी नहीं टल रही हो तो लोगों को ख़तरे की पूरी जानकारी दी जाए या नहीं!

धरती से टक्कर लेने को तैयार दिख रहे किसी अंतरिक्षीय पिंड से निपटने के जिन तरीक़ों की चर्चा अक्सर की जाती हैं, वे हैं- मिसाइल प्रहार से पिंड को नष्ट कर देना; उसके क़रीब परमाणु बम फोड़ कर उसकी राह बदल देना; धरती तक पहुँचने से बरसों पहले पिंड के ऊपर एक विशालकाय यान उतार कर उसे राह से भटकाने का प्रयास करना; या उस पर शक्तिशाली लेज़र बीम डाल कर उसकी कक्षा बदलने की कोशिश करना.

टक्कर मारने का विकल्प सबसे आसान, लेकिन सबसे ख़तरनाक है क्योंकि टक्कर के बाद पिंड के टुकड़े भी धरती की दिशा में बढ़ते रह सकते हैं. या टक्कर धरती से ज़्यादा दूर नहीं हुई तो अतिरिक्त ऊर्जा का प्रवाह धरती तक पहुँच कर नुक़सान कर सकते हैं. एस्टेरॉयड को दूर ठेलने का उपाय सबसे भरोसेमंद माना जाता है, बशर्ते संभावित टक्कर से कम से कम एक दशक पहले ये प्रयास शुरू कर दिया जाए.

लेकिन इन उपायों को आजमाने के लिए ज़रूरी है कि समय रहते सभी ख़तरनाक निओ पिंडों का पता लगाया जाए. वैज्ञानिकों का मानना है कि 40 मीटर आकार तक के पिंड धरती के वायुमंडल को पार करते-करते ही स्वाहा हो जाते हैं. इससे बड़े पिंड को वायुमंडल नहीं रोक पाएगा. एक किलोमीटर आकार तक के निओ पिंड टक्कर वाले इलाक़े में कहर बरपा सकते हैं. इससे भी बड़े पिंड की टक्कर का प्रत्यक्ष या परोक्ष असर पूरी धरती पर पड़ेगा. और वैज्ञानिकों की ही मानें तो एक किलोमीटर से बड़े आकार के 1100 निओ पिंडों का अस्तित्व तो ज़रूर ही होगा.

नासा के ताज़ा आंकड़ों की बात करें तो फ़रवरी महीने के अंत तक कुल 4566 निओ पिंड खोजे जा चुके थे, जिनमें से 705 का आकार एक किलोमीटर से बड़ा है. खोजे गए निओ पिंडों में से 847 को ख़तरनाक एस्टेरॉयड के रूप में चिन्हित किया गया है.

धरती को संभावित विनाश(डायनोसोर किसी एस्टेरॉयड के धरती से टकराने के कारण ही विलुप्त हुए) से बचाने के लिए पहला काम है सारे निओ पिंडों का पता लगाना. ख़ुशी की बात है कि संयुक्तराष्ट्र ने इस मामले में पहल कर दी है. इसी साल मई में स्ट्रॉसबर्ग में एक सम्मेलन में एस्टेरॉयड के धरती से टक्कर की आशंका के मुद्दे पर एक अंतरराष्ट्रीय संधि की रूपरेखा तय की जाएगी. आशा है, सम्मेलन में नासा के धनाभाव के बहाने पर भी विचार किया जाएगा.

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Saturday, January 20, 2007

अमरीका को चुनौती, भारत को सीख

उपग्रहभेदी व्यवस्थादोगलेपन के लिए अमरीका को चिढ़ाने का काम कई देश कर सकते हैं और करते भी रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर चुनौती देने का काम दो देश ही कर सकते हैं- रूस और चीन. अमरीकी सामरिक नीतिकारों के लिए ताज़ा चुनौती चीन के तरफ़ से आई है, जो कि भारत के लिए सीख है.

प्रतिष्ठित पत्रिका एविएशन वीक ने 17 जनवरी को अपनी वेबसाइट पर यह रहस्योदघाटन कर सनसनी फैला दी कि चीन ने सप्ताह भर पहले एक उपग्रहभेदी मिसाइल का सफल परीक्षण किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने 11 जनवरी को अपने ही एक बुढ़ा चुके मौसम-उपग्रह को अंतरिक्ष में ही सफलतापूर्वक मार गिराया. चीन ने आधिकारिक रूप से इस बारे में कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन अमरीका तथा ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे उसके पिछलग्गों के खुल कर विरोध जताने से साफ़ है कि चीन स्टार-वॉर्स के क्षेत्र में अमरीका को चुनौती देने की दिशा में पहला क़दम बढ़ा चुका है.

अमरीका को अंतरिक्षीय युद्ध के क्षेत्र में चीन की प्रगति की भनक बहुत पहले लग चुकी थी और पेंटागन ने The Military Power of the People’s Republic of China 2005 नामक अपनी रिपोर्ट में इस बात का खुल का ज़िक्र भी किया था. लेकिन चूँकि रिपोर्ट में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया था, इसलिए तब इस बात का अनुमान नहीं लगाया जा सका था कि चीन को इतनी जल्दी सफलता मिल जाएगी.

इससे पहले किसी उपग्रहभेदी हथियार का परीक्षण अंतिम बार 1985 में अमरीका ने किया था. वह परीक्षण राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन के स्टार-वॉर्स के सपने को साकार करने के प्रयासों के तहत किया गया था. उसके बाद विभिन्न कारणों से (जिनमें से प्रमुख था आर्थिक कारण) अमरीका की अंतरिक्षीय युद्ध नीति में व्यापक बदलाव किया गया, और स्टार-वॉर्स के अपेक्षाकृत सीमित रूप वाले National Missile Defense(NMD) नामक योजना को आगे बढ़ाया गया. इसमें सारा ज़ोर अमरीकी हितों की ओर बढ़ने वाले किसी मिसाइल को रास्ते में ही मार गिराने पर है.

रक्षात्मक उपाय के रूप में पेश की गई NMD योजना ही लगातार शक्तिशाली बनते जा रहे चीन को चिढ़ाने के लिए काफ़ी थी, क्योंकि अमरीका न सिर्फ़ जापान बल्कि ताइवान को भी अपने मिसाइलरोधी कवच के भीतर रखना चाहता है. ग़ौरतलब है कि चीन की नज़र में ताइवान एक विद्रोही प्रांत भर है, और उसका कहना है कि अंतत: ताइवान को चीन का हिस्सा बनना ही पड़ेगा.

चीन ने रूस के साथ मिल कर अंतरिक्ष को हथियार-रहित बनाने के लिए खुल कर अभियान चलाया है, लेकिन पिछले एक दशक के दौरान जब कभी भी इसके लिए किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते की संभावना बनी, अमरीका ने उसमें अड़ंगा लगाने में कोई देर नहीं की. इतना ही नहीं जैसा कि इस ब्लॉग में पिछले साल अप्रैल में विस्तार से ज़िक्र किया गया था, अमरीका ज़्यादा शोर मचाए बिना तरह-तरह के एंटी-सैटेलाइट(एसैट) हथियार बनाने में भी जुटा हुआ है. इन फ़्यूचरिस्टिक हथियारों से हर उस देश को ख़तरा होगा जो कि अमरीका के सुर में सुर मिलाने से इनक़ार करेंगे.

भविष्य में चीन भी निश्चय ही फ़्यूचरिस्टिक अंतरिक्षीय युद्ध लड़ने में सक्षम होगा, लेकिन उसके पहले सफल उपग्रहभेदी हथियार के पीछे बिल्कुल सरल सिद्धांत है- निशाने पर उपग्रह को लो, उसकी सही-सही अवस्थिति सुनिश्चित करो, और उसमें तेज़ गति से बैलिस्टिक मिसाइल टकरा दो. न बारूद, न बम, न लेज़र विकिरण, और न ही कोई आणविक हथियार...सिर्फ़, तेज़ टक्कर मारने वाली मिसाइल यानि Kinetic Kill Vehicle!!

मतलब दुश्मन के उपग्रहों को चकनाचूर करने के लिए चीन को सिर्फ़ अपनी टोही क्षमता पक्की करने की ज़रूरत होगी. इतना भर जानना होगा कि उपग्रह विशेष की अवस्थिति क्या है. बाक़ी, बैलिस्टिक मिसाइल को उपग्रह से टकराने की क्षमता का प्रदर्शन तो उसने कर ही दिया है.

चीन ने धरती से कोई 800 किलोमीटर दूर की कक्षा में स्थापित अपने एक बेकार होते जा रहे उपग्रह को सफलापूर्वक निशाना बनाया स्वविकसित KT-1 बैलिस्टिक मिसाइल से. लेकिन ऐसी ख़बरें भी हैं कि चीन KT-2 और KT-2A पर भी काम कर रहा है. इन बूस्टरयुक्त मिसाइलों के ज़रिए 20,000 किलोमीटर दूर मध्यवर्ती उपग्रहीय कक्षा ही नहीं, बल्कि 36,000 किलोमीटर दूर भूस्थिर कक्षा के उपग्रहों को भी निशाना बनाया जा सकेगा. यदि ऐसा हुआ, तो अमरीका के 40-50 उपग्रहों को निशाना बना कर चीन कुछ ही घंटों के भीतर अमरीकी सैन्य तंत्र को अंधा-गूंगा-बहरा बना सकेगा.

दरअसल हाल के वर्षों में किसी भी लड़ाई में उपग्रहों ने अमरीकी युद्ध मशीनरी के तंत्रिका-तंत्र की भूमिका निभाई है. तस्वीरें उतारने समेत अधिकतर ज़मीनी ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने का काम निचली कक्षाओं में स्थापित उपग्रहों के ज़रिए होता है. (चीनी परीक्षण की भेंट चढ़ा उपग्रह ऐसी ही कक्षा में था.) इससे आगे बढ़ें, तो अत्यंत सटीक क्रूज़ मिसाइलों और अन्य Smart Weapons की जान होते हैं GPS उपग्रह, जो कि धरती से 15,000 से 20,000 किलोमीटर दूर की कक्षा में होते हैं. और आगे बढ़ें तो अमरीका के हाईटेक युद्ध में तीन चौथाई से भी ज़्यादा सैनिक संचार 36,000 किलोमीटर दूर भूस्थिर कक्षा के उपग्रहों पर निर्भर करता है.

चीन की ताज़ा सफलता निश्चय ही अमरीका के लिए चुनौती है. संभव है वो एक बार फिर बैलिस्टिक मिसाइलों को सीमित करने और अंतरिक्षीय युद्ध के डर को समाप्त करने के लिए एक नई अंतरराष्ट्रीय या बहुपक्षीय संधि पर बातचीत के लिए तैयार हो जाए. यदि ऐसा नहीं होता है...तो भारत जैसे चीन के पड़ोसी देश के पास एंटी-सैटेलाइट हथियार विकसित करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाएगा. जैसे, परस्पर विनाश की गारंटी देने वाले परमाणु हथियार भरोसेमंद सुरक्षा का उपाय माने जाते हैं, उसी तरह एंटी-सैटेलाइट मिसाइल भारतीय उपग्रहों की सुरक्षा की गारंटी बन सकेंगे.

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Thursday, November 16, 2006

रोमाँचकारी होगा आने वाला कल

दुनिया के ज्ञानियों-ध्यानियों की मानें तो आने वाला कल बड़ा ही रोमाँचकारी होगा. प्रतिष्ठित विज्ञान जर्नल न्यू साइंटिस्ट ने अपने प्रकाशन के 50 साल पूरे होने का जश्न भविष्य की कल्पना करते हुए एक विशेष अंक निकाल कर मनाया है. इस विशेषांक में मौजूदा वैज्ञानिक समुदाय के कुछ बड़े नामों का योगदान है, जिन्होंने पाँच दशक बाद की दुनिया की रूपरेखा खींची है.

न्यू साइंटिस्ट के स्वर्णजयंती अंक में सबसे रोमाँचक लेख इस पुराने सवाल के ऊपर है कि क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं? इस सवाल के जवाब में वैज्ञानिकों का कहना है कि अब तक धरती से परे जीवन की खोज नहीं होने पाने का साफ़ मतलब है कि जीवन बड़ा ही विरल है. लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल ही नहीं है कि ब्रह्मांड में धरती के अलावा कहीं और जीवन नहीं है.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी के फ़्रीमैन डायसन का मानना है कि एक बार हमें धरती से दूर जीवन के अस्तित्व का सबूत मिल जाए तो आगे की खोजें अपेक्षाकृत जल्दी हो सकेंगी. क्योंकि तब वैज्ञानिकों को पता रहेगा कि वो आख़िर ढूँढ क्या रहे हैं.

एरिज़ोना स्टेट यूनीवर्सिटी के पॉल डेवीज़ कहीं ज़्यादा आशावादी हैं. उनका कहना है कि एलियन्स को ढूँढने में रेडियो टेलीस्कोपों के ज़रिए ही सफलता मिले ये कोई ज़रूरी नहीं है. उनका कहना है कि ज़्यादातर जीव सूक्ष्म रूप में यानि जीवाणु या विषाणु के रूप में हैं. ऐसे में क्या पता बाहर का कोई सूक्ष्म जीव धरती पर हमारे ही बीच पल रहा हो!

यदि धरती से दूर जीवन का कोई रूप मिल भी गया तो वो कितना अलग होगा? नासा के क्रिस मैकके की मानें तो ये अंतर अंग्रेज़ी और चीनी भाषाओं के अंतर जितना हो सकता है.

जहाँ तक 50 साल बाद के चिकित्सा जगत की बात है तो वैज्ञानिकों का मानना है कि आज की दवाइयों को तब उसी रूप में देखा जाएगा जैसाकि अभी ओझा-गुनी के सुझाए उपचारों को देखते हैं. यूनीवर्सिटी ऑफ़ शिकागो के ब्रुस लान के अनुसार पाँच दशक बाद प्रत्यारोपण के लिए अंग किसी ज़िंदा या मुर्दा व्यक्ति से लेने की ज़रूरत नहीं होगी, बल्कि अंगों की फ़ार्मिंग की जाएगी. सूअर जैसे जंतुओं में मनुष्यों के लिए अंग उगाए जाएँगे. यानि, अंग प्रत्यारोपण की ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टर किसी व्यावसायिक अंग उत्पादन कंपनी को ऑर्डर कर मरीज़ के 'इम्युनोलॉजिकल प्रोफ़ाइल' के अनुरूप टेलरमेड अंग मँगा सकेगा.

हालाँकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि अंगों की फ़ार्मिंग के आने वाले युग में भी मस्तिष्क या दिमाग़ को कृत्रिम रूप से बनाए जाने की संभावना दूर-दूर तक नज़र नहीं आती है. मतलब, कृत्रिम दिमाग़ के नाम पर आगे भी सुपरकंप्यूटरों से काम चलाते रहिए!

चिकित्सा जगत में आने वाले दिनों में एक और बड़ी प्रगति होगी छिपकली की पूँछ की तरह मानव अंग को भी दोबारा उगाने के क्षेत्र में. फ़िलाडेल्फ़िया में वाइस्टर इंस्टीट्यूट की एलेना हेबर-कैट्ज़ की मानें तो जल्दी ही ऐसी दवाएँ आने वाली हैं जिनके ज़रिए कमज़ोर दिल अपनी मरम्मत ख़ुद कर सकेगा. उनका मानना है कि पाँच से दस साल के भीतर उँगलियों जैसे अंगों को दोबारा उगाना संभव हो सकेगा.

अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी मानव लंबी छलाँग लगाने वाला है. प्रिंसटन यूनीवर्सिटी के जे रिचर्ड गॉट के अनुसार कुछ दशकों के भीतर मानव मंगल ग्रह पर अपनी स्वपोषित कॉलोनी बसा सकेगा. उनके अनुसार इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होगा कि प्रलय या महाविभीषिका की किसी स्थिति में भी धरती से दूर मानव जीवन का अस्तित्व बना रहेगा.

यूनीवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन के रिचर्ड मिलर की मानें तो 2056 आते-आते ऐसे लोगों की बड़ी संख्या होगी जो सौ साल या उससे भी बड़ी उम्र में कामकाज़ी जीवन बिता रहे होंगे. ये चमत्कार होगा मोलेक्युलर बायोलॉजी के क्षेत्र में लगातार हो रही प्रगति के कारण.

...और अंत में एक भविष्यवाणी यूनीवर्सिटी ऑफ़ ब्रिटिश कोलंबिया के डेनियल पॉली की. इनका कहना है कि कुछ दशकों के बाद पूरी दुनिया शाकाहारी होनेवाली है. दरअसल पॉली साहब एक ऐसे यंत्र की कल्पना साकार होते देख रहे हैं, जिसके ज़रिए हम जंतुओं की भावनाओं और विचारों को जान सकेंगे, महसूस कर सकेंगे. ऐसे में किसी विचारवान जीव को मार कर खाने की अनैतिकता भला कितने लोगों को पचेगी!

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Thursday, August 24, 2006

ख़त्म हुआ प्लूटो का राजयोग

प्लूटोआख़िरकार प्लूटो को ग्रहों की पंक्ति से बाहर निकाल ही दिया गया. छोटे उस्ताद एक-दो नहीं, बल्कि पूरे 75 साल तक आठ बड़ों के साथ बड़ा बन कर रहे.

प्लूटो की ग्रहदशा ख़राब की, प्राग में जुटे 75 देशों के खगोलविदों ने 24 अगस्त 2006 को, जब अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ की महासभा में ग्रह की परिभाषा पर सहमति बनी. नई कसौटी पर प्लूटो खरा नहीं उतर पाया.

आश्चर्य की बात है कि आज तक ग्रह की कोई सर्वमान्य या औपचारिक परिभाषा नहीं थी. प्राग में क़रीब ढाई हज़ार खगोलविदों के बीच मतदान के ज़रिए जिस परिभाषा पर अंतत: सहमति बनी है, उसमें सौरमंडल के किसी पिंड के ग्रह होने के लिए तीन मानक तय किए गए हैं-

1. यह सूर्य की परिक्रमा करता हो
2. यह इतना बड़ा ज़रूर हो कि अपने गुरुत्व बल के कारण इसका आकार लगभग गोलाकार हो जाए
3. इसमें इतना ज़ोर हो कि ये बाक़ी पिंडों से अलग अपनी स्वतंत्र कक्षा बना सके

...और तीसरी अपेक्षा पर प्लूटो खरा नहीं उतरता है, क्योंकि सूर्य की परिक्रमा के दौरान इसकी कक्षा नेप्चून की कक्षा से टकराती है.

अब प्लूटो ग्रह कहलाने का हक़दार नहीं रह गया है. लेकिन जब 1930 में प्लूटो को ढूँढा गया तो बड़े ही सम्मान के साथ उसे ग्रह का दर्जा दे दिया गया था. हालाँकि शुरू से ही खगोलविदों का एक वर्ग इसे, ख़ास कर इसके छोटे आकार के कारण (अपने चंदा मामा से भी छोटा), ग्रह माने जाने के ख़िलाफ़ था.

अक्तूबर 2003 में हब्बल टेलीस्कोप से खींचे गए एक चित्र के आधार पर पिछले साल 2003यूबी313 (अस्थाई नाम ज़ेना) की खोज के बाद तो प्लूटो को ग्रह की कुर्सी से गिराने वालों ने बक़ायदा अभियान शुरू कर दिया. दरअसल ज़ेना आकार और द्रव्यमान में प्लूटो से भी बड़ा है. हालाँकि उसकी कक्षा भी प्लूटो के समान ही बेतरतीब है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ की दुविधा ये थी कि या तो ज़ेना को दसवाँ ग्रह माने या फिर प्लूटो को ग्रह की श्रेणी से हटाए.

इतना ही नहीं, खगोलीय दूरबीनों की क्षमता लगातार बढ़ते जाने को देखते हुए ऐसी भी आशंकाएँ व्यक्त की जाने लगी थीं कि आने वाले वर्षों में प्लूटो जैसे दर्जनों और पिंड मिल सकते हैं जो कि ग्रहों के क्लब के दरवाज़े पर दस्तक देते मिलेंगे.

अभी पिछले हफ़्ते ही प्राग सम्मेलन में मौजूद खगोलविदों के बीच एक प्रस्ताव आया था कि ग्रहों की तीन श्रेणी बना दी जाए ताकि प्लूटो तो ग्रह बना रहे ही, तीन और पिंडों को ग्रह मान लिया जाए, यानि कुल एक दर्जन ग्रह! लेकिन प्लूटो को ग्रहों के समूह से बाहर निकालने का अभियान चलाने वाले सफल रहे और फ़ैसला ग्रहों की संख्या आठ करने के पक्ष में सामने आया.

तो आज से सौरमंडल में आठ ही ग्रह रह गए हैं- बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्चून.

बौने ग्रहों का एक नया वर्ग बनाया गया है, जिसमें हैं- प्लूटो, 2003यूबी313 और सीरेज़.

सीरेज़ सौरमंडल में मौजूद सबसे बड़ा एस्टेरॉयड या क्षुद्र ग्रह है, और इसकी विशेषता है इसका गोल आकार. जबकि 2003यूबी313 सौरमंडल के सुदूरवर्ती हिमपिंडों की पट्टी में स्थित एक गोलाकार पिंड है. मतलब बौने ग्रह की श्रेणी में भी शामिल होने के लिए भी किसी सौरपिंड का गोलाकार होना ज़रूरी है.

ग्रह नहीं होते हुए भी 75 साल तक ग्रहों के बीच बना रहा प्लूटो पता नहीं अपने में क्या-क्या रहस्य छुपाए हुए है. उसे क़रीब से परखने के लिए अमरीका का न्यू होराइज़न यान इसी साल जनवरी में अपनी लंबी यात्रा पर निकल चुका है. यदि सब कुछ ठीक से चला, तो यह यान 2015 में प्लूटो के पास होगा.

ग्रहों की दशा को मानव भला कब जान पाया है. खगोलविदों का एक अच्छा-ख़ासा वर्ग प्लूटो का दर्जा घटाए जाने को लेकर नाराज़ है. क्या पता भविष्य में नए सबूतों और नए तर्कों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ दोबारा प्लूटो को ग्रह मानने को तैयार हो जाए. लेकिन तब तक हम आने वाली पीढ़ी को ये बताते हुए झूठे गर्व का अनुभव करते रहेंगे कि- 'बच्चे, हमारे ज़माने में सौरमंडल में नौ ग्रह हुआ करते थे!'

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Sunday, April 16, 2006

उपग्रहभेदी हथियारों की योजना

दुनिया को अस्थिर बनाने में इकलौते सुपर-पॉवर अमरीका की भूमिका से कोई इनकार नहीं करता. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमरीका की असल ताक़त डॉलर नहीं बल्कि इसकी सेना है. और अमरीका की सेना अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी के बल पर ही सबसे ताक़तवर है. ये अलग बात है कि हर तरह से ताक़तवर होने के बावजूद अमरीकी सेना को वियतनाम में मुँह की खानी पड़ी थी, अफ़ग़ानिस्तान में वो पूरी तरह सफल नहीं रही है, और इराक़ में अमरीकी सेना की मौजूदगी के बावज़ूद क्या कुछ हो रहा है उसके बारे में ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं.

बात अमरीकी सेना की ताक़त और उस ताक़त के तकनीकी आधार की करें तो प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका न्यू साइंटिस्ट के 15 अप्रैल 2006 अंक में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट छपी है. इसमें बताया गया है कि कैसे अमरीकी रक्षा विभाग पेंटागन चोरी-चुपके ऐसे हथियारों का विकास कर रहा है जो कि दूसरे देशों के उपग्रहों को मार गिरा सके.

कितना गंभीर ख़तरा हैं ये उपग्रहभेदी या एंटी-सैटेलाइट(ASAT) हथियार? यह जानने के लिए कल्पना कीजिए कि अमरीका भारत को दुश्मन मान लेता है(वास्तव में परमाणु संधि के बाद निकट भविष्य में दोनों देशों की दुश्मनी की कल्पना भी उचित नहीं लगती) और वह भारत में अव्यवस्था फैलाने की ठान लेता है. अमरीका आसानी से यह काम कर सकेगा भारत के स्वदेश में ही विकसित इनसेट पीढ़ी के अत्यंत शक्तिशाली संचार उपग्रहों को निशाना बना कर.

अमरीका उपग्रहभेदी प्रणाली चोरी-चुपके क्यों विकसित कर रहा है? इस बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिक्ष में लड़ाई की कोई भी प्रणाली विकसित करने पर पूरी दुनिया में विरोध के स्वर उठ सकते हैं. यहाँ तक कि अमरीकी जनता और संसद भी ऐसी किसी योजना पर आसानी से हामी नहीं भरेंगे. इसी कारण इस पर खुल कर कुछ नहीं कहा जा रहा है. पेंटागन ने 2007 के लिए क़रीब 439 अरब डॉलर का रक्षा बजट तैयार किया है माना जाता है कि उसमें एक अरब डॉलर विशेष तौर पर अंतरिक्ष में लड़ाई लड़ने के लिए उपकरणों के विकास और परीक्षण के लिए है. हालाँकि इसे मिसाइल सुरक्षा एजेंसी और वायु सेना के हिस्से के बजट में मिला कर पेश किया जा रहा है.

आश्चर्य नहीं कि सैटेलाइटों को मार गिराने के लिए हथियार विकसित करने की योजना को विवादों में घिरे मौजूदा अमरीकी रक्षा मंत्री डोनल्ड रम्सफ़ेल्ड का पूरा समर्थन मिला हुआ है. इस मामले में भी रम्सफ़ेल्ड ने भयादोहन की नीति अपनाई है, यानि लोगों को अवास्तविक ख़तरों का डर दिखाओ, और भय के माहौल में अपनी विवादास्पद योजनाओं को आगे बढ़ा ले जाओ.

पाँच साल पहले रम्सफ़ेलड की अध्यक्षता वाली एक समिति ने आगाह किया कि अमरीका या तो अंतरिक्ष में अपने हितों की रक्षा के लिए हथियार प्रणाली विकसित करे या फिर धरती से दूर पर्ल हार्बर जैसे किसी बड़े हादसे के लिए तैयार रहे. इस चेतावनी के बाद अमरीकी वायु सेना ने अंतरिक्ष में लड़ाई को भी अपने 'मिशन स्टेटमेंट' में शामिल कर लिया है. अमरीकी वायु सेना के लक्ष्यों में अंतरिक्ष में हावी होने की बात को भी समेट लिया गया है.

सामरिक महत्व के विषयों पर नज़र रखने वाली वाशिंग्टन स्थित संस्थाओं सेंटर फ़ॉर डिफ़ेंस इन्फ़ॉर्मेशन और हेनरी एल स्टिम्सन सेंटर के विशेषज्ञों की मानें तो पेंटागन तीन तरह की अंतरिक्षीय हथियार प्रणाली पर काम कर रहा है. पहली योजना है Multiple Kill Vehicles विकसित करने की, यानि अंतरिक्ष यान के साथ ऐसी मिसाइल भेजने की जो कि एक ही साथ कई उपग्रहों को निशाना बना सके. दूसरी योजना को MicroSat नाम दिया गया है और इसमें ऐसे मारक उपग्रह विकसित करने पर ज़ोर है जो कि दुश्मन उपग्रहों को पहचान कर उसमें टक्कर मार सके. तीसरी योजना लेज़र आधारित हथियारों की है जो कि धरती से ही ताक़तवर लेज़र प्रवाह के ज़रिए उपग्रहों का नाश कर सके.

विशेषज्ञों को आशंका है कि प्रोटोटाइप के परीक्षण के नाम पर पेंटागन उपग्रहभेदी हथियारों को वास्तव में अंतरिक्ष में तैनात भी कर सकता है. ऐसी आशंका के पीछे यह धारणा है कि पेंटागन का मौजूदा असैनिक नेतृत्व औपचारिक रूप से आज अनुमति लेने के बज़ाय कल माफ़ी माँगने को ज़्यादा आसान मानता है. और पेंटागन ने अंतरिक्ष में लड़ाई की योजना पर क़दम बढ़ाया तो भविष्य में माफ़ी माँगने की नौबत ज़रूर ही आएगी.

उपग्रहभेदी हथियारों के विकास के ख़िलाफ़ जो सबसे मज़बूत तर्क दिया जाता है वो है ऐसे हथियारों के इस्तेमाल से पैदा होने वाला मलबे या कचरे का ख़तरा. अंतरिक्षीय कूड़ा कितना ख़तरनाक साबित हो सकता है ये पिछले ही महीने तब सामने आया जब 29 मार्च को किसी अंतरिक्षीय मलबे का एक टुकड़ा रूस के एक संचार उपग्रह की राह में आ गया. टक्कर हुई और उपग्रह को ठंडा रखने वाले द्रव की टंकी में छेद हो गया है. द्रव के तेज़ी से निकलने की प्रतिक्रिया में उपग्रह घिरनी की तरह घूमने लगा. अब उपग्रह किसी काम का नहीं रह गया है, और उसे ऊपर की कक्षा में धकेल कर निष्क्रिय बनाना पड़ेगा.

लेकिन ऐसे ख़तरों के बावज़ूद अमरीका सरकार उपग्रहभेदी हथियारों का विकास करने की ठान चुकी है. पेंटागन इसकी आक्रामक और रक्षात्मक दोनों तरह की उपयोगिता देखता है. आक्रामक उपयोगिता होगी युद्ध की स्थिति में शत्रु देश की संचार व्यवस्था को चौपट करना और रक्षात्मक उपयोगिता होगी शत्रु देशों के संभावित हमले से अपने उपग्रहों को बचाना.

उपग्रहों की युद्ध के दौरान उपयोगिता का ताज़ा उदाहरण है तीन साल पहले इराक़ पर हमला. इराक़ पर हमले के दौरान उपग्रहों से मिली स्पष्ट तस्वीरों के कारण सद्दाम की सेना और ठिकानों को कुछ ही दिनों में नाकाम बनाना संभव हुआ था, इसलिए अमरीका अपने संचार उपग्रहों को हर क़ीमत पर सुरक्षित रखना चाहेगा. लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी देश के पास अमरीकी उपग्रहों को निशाना बनाने की क्षमता है भी? पिछले साल अमरीकी रक्षा विभाग ने संसद को सौंपी एक रिपोर्ट में चीन का उल्लेख करते हुए कहा है कि चीन उपग्रहभेदी हथियारों के रूप में एक भूआधारित लेज़र हथियार तंत्र विकसति कर रहा है. अमरीका की माने तो चीन यदि इस प्रणाली के विकास में कामयाब रहा तो कम ताक़त की लेज़र किरणों के बल पर वह किसी भी उपग्रह को अंधा बना सकेगा, वहीं शक्तिशाली लेज़र किरणों के प्रवाह से किसी उपग्रह को नष्ट भी किया जा सकेगा.

पिछले साल इसराइली संसद के विदेशी मामलों और रक्षा से जुड़ी समिति ने सरकार से उपग्रहभेदी हथियार कार्यक्रम शुरू करने की माँग की थी. तेज़ी से एक अंतरराष्ट्रीय ताक़त के रूप में उभर रहा भारत भी अपने कई महत्वपूर्ण सैन्य कार्यक्रमों पर गोपनीयता के आवरण में काम करता रहा है. क्या पता भारत भी प्रौद्योगिकी आधारित लड़ाई के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा हो!

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Saturday, October 22, 2005

एपोफ़िस और तोरिनो पैमाना


अभी कश्मीर में भयानक भूकंप आया और एक बार फिर आम लोगों की ज़ुबान पर रिक्टर पैमाने का नाम चढ़ गया. कोई मुज़फ़्फ़राबाद के पास केंद्रित इस भूकंप को रिक्टर पैमाने पर 7.6 बता रहा था तो कोई 7.8 या और ज़्यादा.

इसी तरह अमरीका में तबाही मचाने वाले कैटरीना तूफ़ान ने जनसामान्य को फिर से याद दिलाया कि तूफ़ानों की एक से पाँच तक की कैटगरी के क्या मायने होते हैं.

लेकिन हमें नहीं लगता प्राकृतिक आपदा के एक और अहम पैमाने 'तोरिनो' की आमलोगों को ज़्यादा जानकारी है. जानकारी हो भी कैसे, क्योंकि इस पैमाने से जुड़ी कोई तबाही अभी हमें देखने को जो नहीं मिली है. भगवान न करे ऐसा कभी हो क्योंकि ऐसी तबाही में हज़ारों या लाखों में नहीं, बल्कि करोड़ों की संख्या में लोगों के मरने की आशंका होगी. और एक महाटक्कर से होने वाली इस तबाही के कारण पर्यावरण में होने वाला बदलाव भी बाद के वर्षों में करोड़ों अन्य लोगों की मौत का सीधा कारण बनेगा.

तोरिनो पैमाना है क्या बला? पहले तो ये बता दूँ कि तोरिनो नाम इटली के मशहूर शहर तूरिन से लिया गया है जिसे पश्चिमोत्तर इटली में तोरिनो नाम से ही जाना जाता है.(आपको आश्चर्य होगा कि इटली में मिलान को मिलानो, रोम को रोमा, फ़्लोरेंस को फ़िरेंज़ी और वेनिस को वेनित्सिया नाम से जाना जाता है.) तोरिनो से जुड़ी एक और रोचक बात यह है कि भारत की कांग्रेस पार्टी की भाग्य-विधाता पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विधवा सोनिया का ताल्लुक इसी शहर से है.

तो, तोरिनो में 1999 में खगोल भौतिकशास्त्रियों की एक बैठक हुई एस्टेरॉयड या उल्का-पिंडों और पुच्छल तारों के ख़तरे पर विचार के लिए.(एस्टेरॉयड मंगल और बृहस्पति के बीच लाखों की संख्या में मौजूद पत्थर और धातु के उन पिंडों को कहा जाता है जो कि एक ग्रह के समान ही सूर्य का चक्कर लगा रहे हैं. क्या पता किसी बड़े ग्रह से ही टूट कर बिखरे हों. इनमें से कुछ तो 1,000 किलोमीटर व्यास के हैं तो अनेक साधारण कंकड़-पत्थर जितने बड़े.)

पुच्छल तारों और एस्टेरॉयड के अपनी कक्षा से भटक कर धरती की ओर आने का ख़तरा हमेशा से बना रहा है. इस ख़तरे को हॉलीवुड ने बढ़ा-चढ़ाकर डीप इम्पैक्ट जैसी फ़िल्मों के ज़रिए बेचा भी है. हाल के इतिहास में तो ऐसी किसी टक्कर का ज़िक्र नहीं है, लेकिन माना जाता है कि ऐसी ही टक्करों से धरती के कई बड़ी झीलें बनी हैं और ऐसी ही किसी बड़ी टक्कर ने डायनोसोरों का काम तमाम किया होगा.

तो भैया, तोरिनो के सम्मेलन में एमआईट के वैज्ञानिक रिचर्ड बिन्ज़ेल द्वारा कुछ साल पहले प्रतिपादित पैमाने को स्वीकार कर लिया गया और उसे तोरिनो पैमाने के नाम से जाना जाने लगा. जहाँ तक एस्टेरॉयड के ख़तरे की बात है तो 1994 में ऐसी किसी टक्कर में मारे जाने की आशंका को किसी भयावह भूकंप के ख़तरे से ज़्यादा प्रबल बताया गया यानि 20 हज़ार में एक. लेकिन चार साल बाद अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने ऐसे सारे संभावित ख़तरों की गिनती की. नासा ने बताया कि कोई 700 एस्टेरॉयड ऐसे हैं जो कभी न कभी धरती का रुख़ कर सकते हैं. ऐसे में एस्टेरॉयड की टक्कर से मरने की आशंका घट कर 2,00,000 में एक कर दी गई. हालाँकि इस तरह की वैज्ञानिक गणनाओं पर पूरी तरह भरोसा भी नहीं किया जा सकता.

ख़ैर, दिसंबर 2004 में वैज्ञानिकों ने पाया कि 400 मीटर आकार का एक उल्का-पिंड वर्ष 2029 में धरती से टकरा सकता है. इस एस्टेरॉयड को विनाश के ग्रीक देवता एपोफ़िस का नाम दिया गया. और तोरिनो पैमाने पर इसे नंबर दिया गया 4. विश्वास करें कि किसी भी उल्का-पिंड को ख़तरे की दृष्टि से दिया गया यह सबसे बड़ा नंबर है. हालाँकि हाल के महीनों में ज़्यादा सही गणना का दावा करते हुए कहा गया है कि शायद एपोफ़िस धरती के बगल से गुजर जाए. लेकिन बेफ़िक्र होने की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि वैज्ञानिकों को मालूम नहीं कि 2029 में धरती के पास गुजरते वक़्त धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति एपोफ़िस की कक्षा और गति पर क्या असर करेगी. और भगवान न करे, कुछ गड़बड़ हुआ तो एपोफ़िस 2035-36 में एक बार फिर धरती माता को टक्कर देने की स्थिति में होगा.

भगवान बचाए. शुभ-शुभ!

चलते-चलते प्रस्तुत हैं 'गूगल अर्थ' के सौजन्य से दो अंतरराष्ट्रीय सामरिक ठिकानों के चित्र. (चित्र भारतीय सनसनी मीडिया के लिए हैं, न कि चरमपंथियों के लिए)-

पेंटागन, वाशिंग्टन, डीसी


बकिंघम पैलेस, लंदन

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