Sunday, April 16, 2006

उपग्रहभेदी हथियारों की योजना

दुनिया को अस्थिर बनाने में इकलौते सुपर-पॉवर अमरीका की भूमिका से कोई इनकार नहीं करता. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमरीका की असल ताक़त डॉलर नहीं बल्कि इसकी सेना है. और अमरीका की सेना अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी के बल पर ही सबसे ताक़तवर है. ये अलग बात है कि हर तरह से ताक़तवर होने के बावजूद अमरीकी सेना को वियतनाम में मुँह की खानी पड़ी थी, अफ़ग़ानिस्तान में वो पूरी तरह सफल नहीं रही है, और इराक़ में अमरीकी सेना की मौजूदगी के बावज़ूद क्या कुछ हो रहा है उसके बारे में ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं.

बात अमरीकी सेना की ताक़त और उस ताक़त के तकनीकी आधार की करें तो प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका न्यू साइंटिस्ट के 15 अप्रैल 2006 अंक में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट छपी है. इसमें बताया गया है कि कैसे अमरीकी रक्षा विभाग पेंटागन चोरी-चुपके ऐसे हथियारों का विकास कर रहा है जो कि दूसरे देशों के उपग्रहों को मार गिरा सके.

कितना गंभीर ख़तरा हैं ये उपग्रहभेदी या एंटी-सैटेलाइट(ASAT) हथियार? यह जानने के लिए कल्पना कीजिए कि अमरीका भारत को दुश्मन मान लेता है(वास्तव में परमाणु संधि के बाद निकट भविष्य में दोनों देशों की दुश्मनी की कल्पना भी उचित नहीं लगती) और वह भारत में अव्यवस्था फैलाने की ठान लेता है. अमरीका आसानी से यह काम कर सकेगा भारत के स्वदेश में ही विकसित इनसेट पीढ़ी के अत्यंत शक्तिशाली संचार उपग्रहों को निशाना बना कर.

अमरीका उपग्रहभेदी प्रणाली चोरी-चुपके क्यों विकसित कर रहा है? इस बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिक्ष में लड़ाई की कोई भी प्रणाली विकसित करने पर पूरी दुनिया में विरोध के स्वर उठ सकते हैं. यहाँ तक कि अमरीकी जनता और संसद भी ऐसी किसी योजना पर आसानी से हामी नहीं भरेंगे. इसी कारण इस पर खुल कर कुछ नहीं कहा जा रहा है. पेंटागन ने 2007 के लिए क़रीब 439 अरब डॉलर का रक्षा बजट तैयार किया है माना जाता है कि उसमें एक अरब डॉलर विशेष तौर पर अंतरिक्ष में लड़ाई लड़ने के लिए उपकरणों के विकास और परीक्षण के लिए है. हालाँकि इसे मिसाइल सुरक्षा एजेंसी और वायु सेना के हिस्से के बजट में मिला कर पेश किया जा रहा है.

आश्चर्य नहीं कि सैटेलाइटों को मार गिराने के लिए हथियार विकसित करने की योजना को विवादों में घिरे मौजूदा अमरीकी रक्षा मंत्री डोनल्ड रम्सफ़ेल्ड का पूरा समर्थन मिला हुआ है. इस मामले में भी रम्सफ़ेल्ड ने भयादोहन की नीति अपनाई है, यानि लोगों को अवास्तविक ख़तरों का डर दिखाओ, और भय के माहौल में अपनी विवादास्पद योजनाओं को आगे बढ़ा ले जाओ.

पाँच साल पहले रम्सफ़ेलड की अध्यक्षता वाली एक समिति ने आगाह किया कि अमरीका या तो अंतरिक्ष में अपने हितों की रक्षा के लिए हथियार प्रणाली विकसित करे या फिर धरती से दूर पर्ल हार्बर जैसे किसी बड़े हादसे के लिए तैयार रहे. इस चेतावनी के बाद अमरीकी वायु सेना ने अंतरिक्ष में लड़ाई को भी अपने 'मिशन स्टेटमेंट' में शामिल कर लिया है. अमरीकी वायु सेना के लक्ष्यों में अंतरिक्ष में हावी होने की बात को भी समेट लिया गया है.

सामरिक महत्व के विषयों पर नज़र रखने वाली वाशिंग्टन स्थित संस्थाओं सेंटर फ़ॉर डिफ़ेंस इन्फ़ॉर्मेशन और हेनरी एल स्टिम्सन सेंटर के विशेषज्ञों की मानें तो पेंटागन तीन तरह की अंतरिक्षीय हथियार प्रणाली पर काम कर रहा है. पहली योजना है Multiple Kill Vehicles विकसित करने की, यानि अंतरिक्ष यान के साथ ऐसी मिसाइल भेजने की जो कि एक ही साथ कई उपग्रहों को निशाना बना सके. दूसरी योजना को MicroSat नाम दिया गया है और इसमें ऐसे मारक उपग्रह विकसित करने पर ज़ोर है जो कि दुश्मन उपग्रहों को पहचान कर उसमें टक्कर मार सके. तीसरी योजना लेज़र आधारित हथियारों की है जो कि धरती से ही ताक़तवर लेज़र प्रवाह के ज़रिए उपग्रहों का नाश कर सके.

विशेषज्ञों को आशंका है कि प्रोटोटाइप के परीक्षण के नाम पर पेंटागन उपग्रहभेदी हथियारों को वास्तव में अंतरिक्ष में तैनात भी कर सकता है. ऐसी आशंका के पीछे यह धारणा है कि पेंटागन का मौजूदा असैनिक नेतृत्व औपचारिक रूप से आज अनुमति लेने के बज़ाय कल माफ़ी माँगने को ज़्यादा आसान मानता है. और पेंटागन ने अंतरिक्ष में लड़ाई की योजना पर क़दम बढ़ाया तो भविष्य में माफ़ी माँगने की नौबत ज़रूर ही आएगी.

उपग्रहभेदी हथियारों के विकास के ख़िलाफ़ जो सबसे मज़बूत तर्क दिया जाता है वो है ऐसे हथियारों के इस्तेमाल से पैदा होने वाला मलबे या कचरे का ख़तरा. अंतरिक्षीय कूड़ा कितना ख़तरनाक साबित हो सकता है ये पिछले ही महीने तब सामने आया जब 29 मार्च को किसी अंतरिक्षीय मलबे का एक टुकड़ा रूस के एक संचार उपग्रह की राह में आ गया. टक्कर हुई और उपग्रह को ठंडा रखने वाले द्रव की टंकी में छेद हो गया है. द्रव के तेज़ी से निकलने की प्रतिक्रिया में उपग्रह घिरनी की तरह घूमने लगा. अब उपग्रह किसी काम का नहीं रह गया है, और उसे ऊपर की कक्षा में धकेल कर निष्क्रिय बनाना पड़ेगा.

लेकिन ऐसे ख़तरों के बावज़ूद अमरीका सरकार उपग्रहभेदी हथियारों का विकास करने की ठान चुकी है. पेंटागन इसकी आक्रामक और रक्षात्मक दोनों तरह की उपयोगिता देखता है. आक्रामक उपयोगिता होगी युद्ध की स्थिति में शत्रु देश की संचार व्यवस्था को चौपट करना और रक्षात्मक उपयोगिता होगी शत्रु देशों के संभावित हमले से अपने उपग्रहों को बचाना.

उपग्रहों की युद्ध के दौरान उपयोगिता का ताज़ा उदाहरण है तीन साल पहले इराक़ पर हमला. इराक़ पर हमले के दौरान उपग्रहों से मिली स्पष्ट तस्वीरों के कारण सद्दाम की सेना और ठिकानों को कुछ ही दिनों में नाकाम बनाना संभव हुआ था, इसलिए अमरीका अपने संचार उपग्रहों को हर क़ीमत पर सुरक्षित रखना चाहेगा. लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी देश के पास अमरीकी उपग्रहों को निशाना बनाने की क्षमता है भी? पिछले साल अमरीकी रक्षा विभाग ने संसद को सौंपी एक रिपोर्ट में चीन का उल्लेख करते हुए कहा है कि चीन उपग्रहभेदी हथियारों के रूप में एक भूआधारित लेज़र हथियार तंत्र विकसति कर रहा है. अमरीका की माने तो चीन यदि इस प्रणाली के विकास में कामयाब रहा तो कम ताक़त की लेज़र किरणों के बल पर वह किसी भी उपग्रह को अंधा बना सकेगा, वहीं शक्तिशाली लेज़र किरणों के प्रवाह से किसी उपग्रह को नष्ट भी किया जा सकेगा.

पिछले साल इसराइली संसद के विदेशी मामलों और रक्षा से जुड़ी समिति ने सरकार से उपग्रहभेदी हथियार कार्यक्रम शुरू करने की माँग की थी. तेज़ी से एक अंतरराष्ट्रीय ताक़त के रूप में उभर रहा भारत भी अपने कई महत्वपूर्ण सैन्य कार्यक्रमों पर गोपनीयता के आवरण में काम करता रहा है. क्या पता भारत भी प्रौद्योगिकी आधारित लड़ाई के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा हो!

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3 Comments:

  • यह सचमुच में अत्यंत ही गम्भीर मसला है.

    By Blogger Pankaj Bengani, at 4:11 AM  

  • बहुत महत्वपूर्ण सूचना वाला ब्लौग है ये। इस तरह का युद्ध भी कभी न कभी तो शुरू होगा। भारत को भी ऐसी तकनीक विकसित करनी चाहिए।

    By Blogger रजनीश मंगला, at 7:14 PM  

  • aisa americi filmo mei hi dekhne ko milta tha. ab america ise sach karna chahta hai.bharat ko bhi chand pariyojna ki bajaye aise kamo per dhyan dena chahiye.

    By Blogger creativetoofan, at 1:51 PM  

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