गुरुवार, फ़रवरी 23, 2006

पहला मल्टीमीडिया पत्रकार

पत्रकारिता जगत में इतनी ज़्यादा प्रतियोगिता है कि एक औसत पत्रकार मात्र एक एक्सक्लुसिव ख़बर के लिए सारे सिद्धांतों को ताक पर रखने को तैयार बैठा रहता है. और यह सच्चाई पत्रकारिता के हर स्तर के बारे में है. मतलब भारत के एक कस्बाई पत्रकार से लेकर लंदन या न्यूयॉर्क में बैठा अंतरराष्ट्रीय स्तर का पत्रकार तक, हर कोई किसी ख़ास ख़बर के बदले अपने तथाकथित सिद्धांतों की पोटली का सौदा करने को तैयार हैं.

लेकिन इस माहौल में भी कुछ पत्रकार ऐसे हैं जिनका ज़िक्र होने पर मन में उनके प्रति सम्मान भाव जाग उठता है. निश्चय ही हर इंसान की तरह इन सच्चे पत्रकारों के भी अपने पूर्वाग्रह होंगे, अपनी पसंद-नापसंद होगी. लेकिन जिन ख़ासियतों के कारण ये कलमघिस्सूओं की जमात में अलग नज़र आते हैं, उनमें शामिल हैं- इनकी निडरता, निष्पक्षता, सम्यक भाव, व्यापक दृष्टि, सच्चाई तक पहुँचने की जिजीविषा, समाज के प्रति जवाबदेही का भाव और मानव मात्र के कल्याण की भावना.

भीड़ से अलग दिखने वाले मुट्ठी भर पत्रकारों में से एक हैं केविन साइट्स. टेलीविज़न पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़ा नाम है. अमरीका के दो बड़े टीवी नेटवर्क एनबीसी और सीएनएन के लिए दुनिया के ख़तरनाक क्षेत्रों से साहसिक रिपोर्टिंग करके नाम कमा चुके हैं. ब्लॉग जगत के लिए विशेष ख़ुशी की बात ये है कि अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में अपनी ड्यूटी के दौरान उन्होंने नियमित रूप से ब्लॉगिंग के लिए भी समय निकाला.

लेकिन आज केविन साइट्स का दुनिया भर में जिस कारण नाम है वो है उनका पत्रकारिता की एक नई विधा को अपनाना. यह है मल्टीमीडिया जर्नलिज़्म की विधा. ज़ाहिर है मल्टीमीडिया जर्नलिज़्म सबसे ज़्यादा चुनौतियों वाली पत्रकारिता है. इसमें आपको वीडियो, ऑडियो, फ़ोटो और टेक्स्ट- सब कुछ जुटाना होता है. नए ज़माने की नई विधा होने के कारण मल्टीमीडिया जर्नलिज़्म से जुड़ी कुछ अनजानी दिक्कतें भी हो सकती हैं. और जब पत्रकार केविन साइट्स हो, तो पत्रकारिता की विधा कुछ भी हो वो 'बाइ डिफ़ॉल्ट' ख़तरों के बीच से ही रिपोर्टिंग करना चाहेगा.

केविन साइट्स छह महीने पहले एक ख़तरनाक यात्रा पर निकल पड़े. इस यात्रा में उन्होंने दुनिया के उन सभी इलाक़ों से रिपोर्टिंग करने की ठानी है जो बारूद के ढेर पर माने जाते हैं, संघर्ष के केंद्र माने जाते हैं- अशांत और ख़तरनाक माने जाते हैं. साइट्स ख़ुद को 'सोजो' कहते हैं यानि 'सोलो जर्नलिस्ट', मतलब 'वन मैन आर्मी'.

अपनी साल भर की इस यात्रा का आधा पूरा कर चुके केविन साइट्स सोमालिया, ईरान, लेबनान, उगांडा, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कोंगो और सूडान से गुजर चुके हैं. अभी कश्मीर और नेपाल समेत संघर्ष के कई केंद्रों में उनको पहुँचना है. केविन साइट्स की यह यात्रा संभव हो पाई है याहू! के कारण.

याहू! का पत्रकारिता से कोई सीधा संबंध नहीं है. इतना ही नहीं चीन में कई साहसिक पत्रकारों को जेल भिजवाने में सहायक बन कर उसने साहसिक पत्रकारिता की राह में रोड़े ही अटकाए हैं. लेकिन भला हो याहू! के उन साहबों का जिन्होंने केविन साइट्स की ख़तरनाक परियोजना को हाथ में लेने का साहस किया. आज याहू! के हॉटज़ोन पर केविन की मल्टीमीडिया पत्रकारिता को पूरे प्रभाव के साथ देखा जा सकता है- मतलब दुनिया के ज्ञात संघर्ष केंद्रों से दिल को छू लेने वाली रिपोर्टें- वीडियो, ऑडियो, फ़ोटो और रिपोर्टताज के रूप में. याहू! ने केविन साइट्स की रिपोर्टिंग को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने के लिए अपने लॉस एंज्लिस स्थित मीडिया मुख्यालय में तीन प्रतिभाशाली लोगों की समर्पित टीम तैनात कर रखी है.

टीवी पत्रकारिता से इंटरनेट पत्रकारिता की ओर आने के पीछे केविन साइट्स के एक कड़वे अनुभव की भूमिका मानी जाती है. बात है नवंबर 2004 की. साइट्स इराक़ में चरमपंथियों का गढ़ माने जाने फ़लूजा शहर में थे. अमरीकी सेना के साथ, एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अमरीकी टीवी नेटवर्क एनबीसी के लिए काम करते हुए. वहाँ से उन्होंने कई स्तब्धकारी दृश्य भेजे. लेकिन एक दृश्य ने उन्हें दक्षिणपंथी अमरीकियों के ग़ुस्से का निशाना बना दिया.

दरअसल सच्चाई दिखाने की अपनी आदत से मज़बूर केविन साइट्स ने ज़ुल्म का वह दृश्य दुनिया को दिखा दिया जिसमें एक अमरीकी मरीन एक बेबस इराक़ी को मौत की नींद सुलाता है, वो भी फ़लूजा की एक मस्जिद के भीतर. साइट्स के इस निष्पक्ष और साहसिक काम के बाद साइट्स के ब्लॉग पर एक से एक घटिया संदेश आने लगे. फ़ॉक्स न्यूज़ जैसे बुश-परस्त मीडिया ने उन्हें खलनायक के रूप में पेश किया और एनबीसी नेटवर्क ने भी उनसे दूरी बनाने में अपनी भलाई समझी.


ख़ुशी की बात है तमाम आलोचनाओं के बावज़ूद केविन साइट्स निराश नहीं हुए, बल्कि उन्होंने पहले से कहीं ज़्यादा उत्साह से पत्रकारिता जारी रखने का फ़ैसला किया.

3 टिप्‍पणियां:

Tarun ने कहा…

kevin ke baare me batane ka shukriya...he is really a one man army

आकाश तोमर ने कहा…

आपकी कहानी बहुत ही बढिया है. दिल चाहता है आप रोज़ाना लिखते रहें और हमारा ज्ञान बढाते रहें. हिंदी लिंक का रंग रूप अब बहुत ही आकर्षक बन गया है. आपको इन प्रयासों के लिये बधाई. उम्मीद है कभी आप अपने बारे में भी हमें कुछ बतायेंगे.

अनूप शुक्ला ने कहा…

बढ़िया लेख,जानकारी।बधाई!