सोमवार, जनवरी 23, 2006

राष्ट्रपति का स्वेटर

बोलीविया में एवो मोरालेस का राष्ट्रपति बनना कई दृष्टि से महत्वपूर्ण है. एवो ज़मीन से जुड़े नेता हैं, वो देश में अमीरी-ग़रीबी की खाई को पाटने का सपना देखते हैं, वो अमरीकी चौधराहट के ख़िलाफ़ सीना ठोंक कर बोलने की हिम्मत रखते हैं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के षड़यंत्र को समझने की दृष्टि है उनमें और इससे भी ऊपर वो देश की सत्ता संभालने वाले पहले मूल बोलीवियाई(इंडियन या आदिवासी) हैं.

अमरीका चाहता है कि बोलीविया के किसान कोका का उत्पान पूरी तरह रोक दें क्योंकि इसका कोकीन बनाने में प्रयोग होता है. एवो का तर्क है कि बोलीवियाई कोका की कितनी मात्रा कोकीन में बदलती है ये तो अध्ययन का विषय हो सकता है, लेकिन इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि बोलीविया के मूल निवासियों के जीवन में कोका पत्तियों के दर्जनों उपयोग हैं. उनका एक तर्क ये भी है कि कोका के हानिकारक उपयोग के प्रति जागरूक अमरीका अपने यहाँ वर्जीनिया में तंबाकू की खेती और कैलीफ़ोर्निया में अंगूर की खेती(शराब उद्योग का कच्चा माल) क्यों नहीं बंद कराता.

लेकिन आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि पश्चिमी लोकप्रिय मीडिया ने उनकी इन ख़ासियतों पर विश्लेषणात्मक रिपोर्ट देने के बजाय पिछले दिनों इस बात को तूल दिया कि एवो मोरालेस राष्ट्रपति चुने जाने के बावजूद आमलोगों जैसा पहनावा धारण करते हैं, सूट-बूट की जगह स्वेटर पहनते हैं.

थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो भारतीय प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के देसी पहनावे को लेकर भी इसी तरह चटखारे लेकर ख़बरें लिखी जाती थीं. ख़ासकर जूते की जगह चप्पल पहनने की उनकी आदत भारतीय आभिजात्य वर्ग को भी मज़ाक लगता था. थोड़ा और पीछे मुड़कर देखें तो गांधीजी के पहनावे पर चर्चिल की अनेक भद्दी टिप्पणियाँ किताबों में दिख जाएँगी. (बड़े और महान लोगों को छोड़ अपनी ही बात करूँ तो शर्ट को पैंट में खोंसकर नहीं पहनने की आदत के कारण कई दोस्तों को मैं थोड़ा गँवार-सा दिखता हूँ. ये शुभचिंतक ऐसा खुलकर तो नहीं कहते लेकिन उनकी जलेबीनुमा टिप्पणियों को सीधा करके देखने पर उनकी राय स्पष्ट हो जाती है.)

ख़ैर, अभी बात एवो मोरालेस पर ही केंद्रित रखते हैं. लैटिन अमरीका के सबसे ग़रीब देश का राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उन्होंने विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और नेताओं से मुलाक़ात की. इन नेताओं में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़, क्यूबा के राष्ट्रपति फ़िडेल कैस्ट्रो, चीन के प्रधानमंत्री हु जिंताओ और स्पेन के प्रधानमंत्री होज़े लुइस रोड्रिग्ज़ ज़पातेरो शामिल हैं. ज़ाहिर है इन मुलाक़ातों में एवो मोरालेस वही बने रहे जो कि वो हैं यानि एक आम बोलीवियाई. उन्होंने सूट-बूट के बजाय स्वेटर पहनने की अपनी आदत को क़ायम रखा.

लेकिन जब स्पेन के राजा हुआन कार्लोस द्वितीय से मुलाक़ात के दौरान भी एवो ने ख़ुद को ऑरिजनल एवो बनाए रखा तो स्पेन के दक्षिणपंथी मीडिया का सब्र का पैमाना छलक गया. रूढ़ीवादी अख़बार एबीसी में एक लेखक ने टिप्पणी की- क्या मोरालेस को गहरे रंग का एक सूट उधार देने वाला कोई नहीं है? संतोष की बात है कि इस बेहूदे सवाल का जवाब दिया स्पेन के ही वामपंथी रुझान वाले अख़बार अल पेइस ने यह कह कर कि एवो का स्वेटर गुमनामी के ख़िलाफ़ एक बुना हुआ ऐलान है. एल पेइस के स्तंभकार मैनुएल राइवस लिखते हैं- लैटिन अमरीकी नेताओं की पीढ़ियाँ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की नीतियों को ओढ़ती रही हैं, ऐसे में मोरालेस ने दिखा दिया है कि वो जनता के प्रतिनिधि हैं.

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि एवो मोरालेस के स्वेटरों में लाल, धूसर, नीली और सफ़ेद पट्टियों वाला स्वेटर उनका ट्रेडमार्क बन गया है. बाज़ार पर नज़र रखने वाले गिद्धों को यह बात तुरंत समझ में आ गई और एक अमरीकी परिधान कंपनी ने एवो फ़ैशन सिरीज़ शुरू करने की खुली इच्छा ज़ाहिर की है. कंपनी ने एवो स्वेटर बनाना शुरू भी कर दिया. लेकिन अमरीकी एवो स्वेटर पहनने वाले उपभोक्ताओं को शायद पता नहीं होगा कि बोलीवियाई राष्ट्रपति का स्वेटर एंडीज़ पहाड़ों की ऊँचाइयों(जहाँ एक गाँव में उनका जन्म हुआ था) से आने वाले अलपासा ऊन का बना और हाथ से बुना होता है, न कि फ़ैक्ट्रियों में सिंथेटिक धागों से बना स्वेटर.

एवो मोरालेस कितने निर्धन परिवार से हैं यह इस तथ्य से जाना जा सकता है कि उनके सात में से चार भाई-बहन शैशवावस्था में ही कुपोषण के कारण दुनिया छोड़ गए. एक ग़रीब देश के राष्ट्रपति के रूप में एवो मोरालेस दुनिया के स्वयंभू चौधरी अमरीका से कितने दिनों तक पंगा ले सकते हैं ये तो देखने वाली बात होगी, लेकिन उनके बुलंद इरादों की दाद देनी ही पड़ेगी.

4 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ला ने कहा…

आपके लेख पढ़कर मन खुश हो जाता है।

Pratik ने कहा…

आपने बहुत बढिया लेख लिखा है। पढ़ कर अच्‍छा लगा।

मनोज ने कहा…

बोलिविया एक छोटा सा देश है। महज ८० लाख की आबादी वाले इस देश के नये प्रतिनिधि पर
दुनिया भर की निगाहें टिकी हैं; जाहिर है इन निगाहों में कार्पोरेट मीडिया की गिध्‍द निगाहें भी शामिल हैं।

लैटिन अमेरीकी देशों में एक के बाद एक वामपंथी रूझान के नेताओं की चुनावी विजय इस
तथ्‍य को प्रमाणित करती है कि हम 'पोस्‍ट कोल्‍ड वार' के दौर में नहीं, बल्‍कि
'वाशिंगटन सहमति' के बाद के दौर में रह रहे हैं।

इवो की सफलता इस तथ्‍य को और पुख्‍ता करेगी, लिहाजा उसका रास्‍ता आसान नहीं
है।

अजय मिश्रा ने कहा…

आपका लेख,आपकी लेखन शैली और विषयों का चयन बहुत ही लाजवाब है. लेख बहुत ही अच्छा लगा.