मंगलवार, फ़रवरी 27, 2007

बीमारी हमारी, और फ़ायदा तुम्हारा?

विश्व स्वास्थ्य संगठन और बहुराष्ट्रीय दवा निर्माता कंपनियों से सफलतापूर्वक पंगा लेकर इंडोनेशिया ने एक ऐसा रास्ता तैयार किया है, जिस पर चल कर भारत समेत तमाम विकासशील देश फ़ायदा उठा सकते हैं.

इंडोनेशिया की इस सफल लड़ाई की जड़ में है बर्ड फ़्लू की बीमारी. चिड़ियों के ज़रिए फैलने वाली ऐसी बीमारी, जिसके मानवीय महामारी का रूप लेने की आशंका लगातार बनी हुई है. सर्वाधिक डर यूरोपीय देशों को है, हालाँकि इस बीमारी की चपेट में आकर मनुष्यों के मरने की लगभग सभी घटनाएँ अभी पूर्वी एशियाई देशों तक ही सीमित रही हैं.

वैसे, यूरोपीय देशों के दरवाज़े पर बर्ड फ़्लू ने दस्तक ज़रूर दे दी है. इसी महीने ब्रिटेन के एक टर्की फ़ार्म में बर्ड फ़्लू का मामला पकड़ में आया. बीमारी एक फ़ार्म के पक्षियों तक ही सीमित थी, इसलिए क़रीब एक लाख साठ हज़ार टर्कियों को मार कर उसके प्रसार की आशंका आसानी से समाप्त कर दी गई.

बर्ड फ़्लू के अभी तक सामने आए रूपों में सबसे ख़तरनाक है एच5एन1 प्रकार के वायरस से फैलने वाला बर्ड फ़्लू. यह वायरस यूरोप में हंगरी, जर्मनी और ब्रिटेन तक पहुँच गया है. इसके ख़िलाफ़ एक कारगर दवाई या टीका बनाने के लिए ज़रूरी है कि एच5एन1 की उत्पत्ति और विकास का लगातार अध्ययन किया जाए.

एच5एन1 के शुरुआती नमूने इंडोनेशिया के पास हैं. जहाँ इस वायरस की चपेट में आकर कई लोग मारे भी जा चुके हैं. और, स्थापित अंतरराष्ट्रीय परंपराओं के अनुसार इंडोनेशिया इस बात के लिए बाध्य है कि वो एक ख़तरनाक बीमारी से जुड़े नमूने नियमित रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन को सौंपे. लेकिन इंडोनेशिया ने पिछले दिनों ऐसा करने से इनकार कर दिया.

इंडोनेशिया ने बर्ड फ़्लू मामले में सहयोग नहीं करने के दो प्रमुख कारण बताए. पहला कारण ये कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को सौंपे जाने के बाद बीमारी के नमूने बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों तक पहुँच जाएँगे. बीमारी के नमूनों का अध्ययन करते हुए दवा कंपनियाँ दवाइयाँ या टीके बना कर ख़ुद तो अरबों डॉलर कमाएँगीं, लेकिन इंडोनेशिया को धेला तक नहीं देंगी.

इंडोनेशिया का दूसरा तर्क ये था कि यदि बीमारी ने विश्वव्यापी महामारी का रूप लिया तो पश्चिमी दवा कंपनियाँ पहले विकसित देशों की सरकारों को दवाइयों की आपूर्ति सुनिश्चत करेंगी जहाँ उनके अधिकतर उत्पादन केंद्र स्थित हैं. दवा कंपनियों की इस प्राथमिकता की कई मिसालें पहले से ही मौजूद हैं.

विज्ञान पत्रिका 'न्यू साइंटिस्ट' के अनुसार इंडोनेशिया ने भले ही विरोध करने का फ़ैसला अब किया हो, लेकिन समस्या दशकों पुरानी है. चूँकि अन्य कई प्रकार के विषाणुओं और जीवाणुओं के समान फ़्लू वायरस भी दवाओं के ख़िलाफ़ ख़ुद को ढालने की काबिलियत रखते हैं, इसलिए हर देश प्रत्येक साल विश्व स्वास्थ्य संगठन को वायरस के नए नमूने सौंपता है ताकि टीकों को अद्यतन बनाया जा सके, अपडेट किया जा सके.

पिछले दिनों इंडोनेशिया ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को दो टूक शब्दों में कह दिया कि अनुसंधान के लिए वह फ़्लू वायरस के नए नमूने तभी सौंपेगा, जब उसे नमूनों के किसी व्यावसायिक परियोजना में उपयोग नहीं किए जाने की गारंटी दी जाती हो. साथ ही, इंडोनेशिया ने मेलबोर्न की दवा कंपनी सीएसएल के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की धमकी भी दे डाली, जिसने विश्व स्वास्थ्य संगठन को इससे पहले सौंपे गए इंडोनेशियाई नमूनों के आधार पर एक नया टीका तैयार करने की घोषणा की थी.

अब ताज़ा जानकारी ये है कि इंडोनेशिया सरकार की माँग के आगे विश्व स्वास्थ्य संगठन को झुकना पड़ा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इंडोनेशिया को उसके एच5एन1 नमूनों के आधार पर तैयार टीकों में साझेदारी दिलवाने का आश्वासन दिया है. इसके अलावा इंडोनेशिया को अपने यहाँ बर्ड फ़्लू टीका उत्पादन केंद्र बनाने में भी सहायता दी जाएगी.

इतना ही नहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पूरी दुनिया को यह समझाने के लिए इंडोनेशिया की तारीफ़ की है कि वायरस के नमूने उपलब्ध कराने वाले देशों को नए टीकों के साथ-साथ बाक़ी फ़ायदे भी मिलने चाहिए.

आशा है, 'बायोपाइरेसी' के ख़िलाफ़ इंडोनेशिया की सफल लड़ाई से अन्य विकासशील देश भी सीख ले सकेंगे. साथ ही, विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की खुली लूट पर रोक लगाने का संबल मिल सकेगा.

1 टिप्पणी:

Aflatoon ने कहा…

सुना है चेचक,प्लेग आदि ख़तम हो चुकी बीमारियों के विषाणुओं के नमूने विलायत और अमरिका में सुरक्षित हैं। तकनीकी तौर पर क्या यह सम्भव है कि उनका इस्तेमाल उन बीमारियों को फिर से फैलाने में किया जाए।
भारत की हजारों चावल की प्रजातियों को फिलिपींस के जीन बैंक तक पहुँचाने की डकैती की भी कभी चर्चा कीजिए।पहुँचाने में जिन महाशय को दोषी माना जाता है,वे भारतीय टेक्नोक्रेसी के शीर्ष-जनों में हैं।जीन के स्तर पर फेरबदल से पहले जब कोष के स्तर पर फेरबदल से नई प्रजातियाँ आती थीं,उनके मूल में तीसरी दुनिया(जैव विविधता की पट्टी) से प्राप्त गुण होते थे और मुनाफ़ा पूरा दैत्याकार बीज कंपनियों का।जीन स्तर की छेड़-छाड़ तो महाराष्ट्र के बी टी कपास के किसान भुगत ही रहे हैं।