बुधवार, जून 28, 2006

भारत, अमरीका और अपराध

सप्ताह भर से हिंदी ब्लॉग जगत में भारत और अमरीका को लेकर तीखी बहस जारी है. रीडर्स डाइजेस्ट के सर्वे के बहाने शुरू बहस ने दुर्भाग्य से देसी बनाम अमरीकावासी ब्लॉगरों के बीच नोंकझोंक का रूप ले लिया.

बहस में शामिल देसी ब्लॉगरों ने दीनहीन भाव से इतना मात्र कहना चाहा कि भारत समस्याओं से भरा है, लेकिन अमरीकी समाज में भी विसंगतियाँ होंगी. बदले में अमरीकावासी ब्लॉगरों में से कुछ ने भारत की छवि भिखमंगों, असभ्यों, बलात्कारियों के समाज के रूप में अंकित करनी चाही(भले ही अनचाहे ऐसा हुआ हो). इतना ही नहीं अमरीका को भारत के मुक़ाबले झंझटमुक्त और स्वर्गिक समाज घोषित करने की भी चेष्टा हुई(तथ्यों से ज़्यादा भावनात्मक दलीलों के सहारे).

मेरी टिप्पणियों को या तो दरकिनार किया गया या फिर उसे एक सिरे से खारिज करने का प्रयास हुआ. बहस के दौरान एक पोस्ट से टीपे सूत्रों पर कुछ घंटे लगा कर मैंने दो महान देशों(अमरीका के साथ ही भारत को भी महान कह रहा हूँ, जिनकी भावनाओं को चोट पहुँचे कृपया माफ़ करेंगे) में अपराध की स्थिति की तुलना की है.

अच्छी बात तो यह रही कि हिंदी ब्लॉग जगत में इस बहस के दौरान ही सर्वशक्तिमान एफ़बीआई ने अमरीका में अपराध के ताज़ा आँकड़े जारी कर दिए हैं. इसमें अमरीका में अपराध की शहरवार स्थिति देखी जा सकती हैं. आँकड़े आरंभिक हैं, यानि मुकम्मल तस्वीर सितंबर-अक्तूबर तक उभरेगी, लेकिन एफ़बीआई ने साफ़ कर दिया है कि दुनिया में अपराध के सबसे बड़े केंद्रों में से एक अमरीका में क़ानून-व्यवस्था की चुनौती दिनोंदिन गंभीर बनती जा रही है. एफ़बीआई ने नस्ली अपराधों की सूची अलग से देना ज़रूरी समझा है.

आँकड़ों में जाने से पहले दो दिलचस्प तथ्यों पर ग़ौर करें: अमरीका में रूस से आठ गुना ज़्यादा आपराधिक घटनाएँ होती हैं, लेकिन रूस के मुक़ाबले वहाँ जजों और मजिस्ट्रेटों की संख्या लगभग आधी है; अमरीका में प्रति हज़ार व्यक्ति में से सात जेल में बंद हैं.

भारत और अमरीका में अपराध का तुलनात्मक अध्ययन:

कुल अपराध- भारत 1.633 अमरीका 80.064 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

हत्या- भारत 0.034 अमरीका 0.042 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

बलात्कार- भारत 0.014 अमरीका 0.301 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

डाका- भारत 0.026 अमरीका 1.385 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

धोखाधड़ी- भारत 0.038 अमरीका 1.257 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

गबन- भारत 0.014 अमरीका 0.058 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

सेंधमारी- भारत 0.103 अमरीका 7.099 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

मारपीट- भारत 0.218 अमरीका 7.569 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

क़ैदी- भारत 29 अमरीका 715 (प्रति 100,000 व्यक्ति)


आँकड़ों के स्रोत:
1. Seventh United Nations Survey of Crime Trends and Operations of Criminal Justice Systems, covering the period 1998 - 2000 (United Nations Office on Drugs and Crime, Centre for International Crime Prevention)
2. CIA World Factbook

8 टिप्‍पणियां:

Tarun ने कहा…

अच्छा तुलनात्मक विवरण है, लेकिन भारत के आंकड़ों में शायद प्लस का अंतर थोड़ा जायेदा होगा क्योंकि कई बार पुलिस अपराध दर्ज ही नही करती। ऐसा गलत नियत से नही कर रहा हूँ लेकिन थोड़ा सच तो है। अमेरिका के अपराध पर मैने भी पिछले साल एक पोस्ट लिखा था

अनूप शुक्ला ने कहा…

अच्छा तुलनात्मक विवरण है। जैसा कि तरुन ने बताया कि हमारे यहाँ काफी अपराधों की सूचना ही नहीं हो पाती है लिहाजा असली आँकड़े भारत के में कुछ और होंगे। ये देशी-अमरीकी ब्लागरों में नोकझोंक जैसा कुछ नहीं हैं। यही अंदाज होता है शायद बहस का, समूह में। आपके तर्कों को दरकिनार करने जैसी बात भी नहीं है। स्वामी के लिखने का अंदाज ही कुछ ऐसा है। उसे 'नागा बाबा'की उपाधि कुछ ऐसे ही थोड़ी मिली है,उसके
लिये मेहनत करता है वह। जैसा कि रमण ने लिखा परेशानियाँ वहाँ भी है लेकिन टोटल पैकेज आकर्षक लगता है वहाँ। इस तरह की बातचीत चलती रहनी चाहिये। अब आपने फिर उकसाया है तो फिर कुछ लेख लिखूँगा इस पर। मेहनत करके विवरण खोजने के लिये बधाई।आप जरा जल्दी-जल्दी लिखा करें ना जी!पढ़ना अच्छा लगता है।

ई-छाया ने कहा…

माननीय हिंदी ब्लोगर जी,
कृपया ये मत भूलें कि हम सभी भारतीय हैं, हमारा देश अच्छा या बुरा पर हमारा है। इस बहस में आपके तर्कों को पूरी तरह खारिज करने का मेरा कोई इरादा नही था, लेकिन मै क्या कोई भी व्यक्ति जिसने दोनों देश देखे होंगे, कभी भी ये नही मानेगा कि अमेरिका की स्थिति भारत से बुरी है। मैने कहीं नही कहा है कि "अमरीका 'सबसे अच्छा' या 'दूध का धुला' है, या फिर उसमें कोई कमी नहीं है, या अमरीका में सब कुछ 'परम आदर्श स्थिति' में है"। बहुत कुछ ऐसा है जो सुधार के लायक है। अगर आप मेरे उत्तर फिर से पढने का कष्ट करेंगे, तो पायेंगे, मैने केवल ये कहा है कि भारत से ज्यादा बुरा नही है, बिल्कुल बुरा नही है ऐसा नही कहा। मेरा जवाब आप यहॉ पढ सकते हैं।
http://www.blogger.com/comment.g?blogID=26625939&postID=115136881771961715
रही बात आंकडों की, तो आंकडे कितने सच हैं या कितने सच आंकडे बन पाते हैं, यह ध्यान रखना चाहिये।
अगर प्रति हजार भारत में (आंकडों के अनुसार) अपराध जरा सा कम हैं, तो इसका मतलब भी यही हुआ कि कुल अपराध भारत में अमेरिका से कई गुना ज्यादा हैं, क्योंकि हमारी जनसंख्या अमेरिका से बहुत ज्यादा है, प्रति वर्ग किलोमीटर में जनसंख्या निकालकर जरा हिसाब लगायें कि प्रति वर्ग किलोमीटर अपराध में अमेरिका आगे है या भारत।
वहीं दूसरी ओर अमेरिका में लोग किसी भी बात पर मुकदमा ठोकते हैं, कितने अपराध तो ऐसे ही होंगे (जैसे वित्तीय)।
कुल मिलाकर बात फिर वही है, हमें दंभ नही भरना चाहिये कि हम अमेरिका से आगे हैं। कई मामलों में हम बेहतर हैं, पर ज्यादातर में हमें हमारी विशिष्टता बनाये हुए बहुत आगे जाना होगा।

ई-स्वामी ने कहा…

हिंदी ब्लागर भाई हमे आपकी शैली बहुत पसंद है! आपकी टिप्पणियों को किसी ने भी दरकिनार नही किया. कई ब्लागर्स ने तो उन पर बिन्दूवार लिखा है.

हाल ही में मैंने विकिपीडिया के लिए छोटा अनुवाद लेख लिखा जो बिल्कुल अलग शैली में था, पसंद किया गया. उसे लिखने में दो दिन लगे थे.

प्रोजेक्ट मेनेजमेंट, तकनीकी मुद्दों, विकिपीडिया और नेटपत्रिकाओं वाली लेखनी से हट कर मुक्त ब्लाग वाली शैली में अपनी भाषा में लिख कर, पढ कर लगता है जैसे घर की गली में मित्रों के बीच बैठ लिये. किसी आलोचक को प्रभावित करने के लिए नहीं होता लेखन, समय नही होता. ऐसे में इमानदारी और सच्चाई की कीमत है. हम मे से अधिकतर ब्लागर्स वही लिखते हैं जो पता हैं, महसूस करते हैं, हमारा सत्य है और ये महत्वपूर्ण है.

Raviratlami ने कहा…

...कई बार पुलिस अपराध दर्ज ही नही करती।...


कई बार? अक्सर और अनेक बार! अगर एफ़आईआर सही तरीके से दर्ज हो तो भारत और अमरीका के ये आंकड़े न सिर्फ उलट जाएंगे, बल्कि अनुपात कहीं ज्यादा होगा!

मेरा दोपहिया वाहन एक बार चोरी हो गया था. चोरों की एक गैंग ने कॉलोनी में सात जगह हाथ मारे थे. तीन दोपहिया वाहन अलग-अलग स्थान से चोरी हुए और बाकी जगह सूने मकानों में चोरी की. जब एफआईआर की बारी आई तो मेरे आवेदन पर इन सातों अपराधों को एक साथ क्लब कर दिया गया और एक ही एफआईआर लिखा गया.

मेरा एफ़आईआर इसलिए भी लिखा गया था कि उनकी नज़रों में मैं कोई रसूख वाला था, और अगर एफ़आईआर दर्ज नहीं होता तो उन्हें समस्या आ सकती थी..

दरअसल यहाँ का सिस्टम ही गलत है. थाने में चार्ट लगा रहता है कि पिछले साल की अपेक्षा इस साल अपराध कम हुए या ज्यादा. तुलनात्मक रूप से कम होने पर अधिकारी को शाबासी मिलती है. इसलिए अपराध दर्ज ही नहीं होते. गंभीर किस्म के और मीडिया में उछलने वाले अपराधों को ही आजकल दर्ज किया जाता है - यह कड़वा सत्य है.

Hindi Blogger ने कहा…

तरुण जी, अनूप जी, ईशैडो जी, ईस्वामी जी और रवि जी, आप सभी को पोस्ट पढ़ने और टिप्पणी करने के लिए धन्यवाद!

शुरू में मैंने सोचा था कि बहस में टिप्पणियों के ज़रिए ही भाग लूँगा, लेकिन जब अमरीका में अपराध की स्थिति पर भी सवाल उठाए गए तो लगा थोड़ी आँकड़ेबाज़ी की जाए. दरअसल बचपन से ही सुनता-पढ़ता आया हूँ कि अमरीका एक हिंसक समाज है.

रही बात भारत की, तो उस पर तो हम सभी सहमत हैं कि विकास की दौड़ में भारत मीलों पीछे है..और शायद अभी लंबे समय तक पीछे ही रहेगा. तब तक इतना भर से संतोष किया जा सकता है कि देर से और धीरे-धीरे ही सही, भारत विकास की राह पर चल पड़ा है.

बेनामी ने कहा…

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बेनामी ने कहा…

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