शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009

वैलेंटाइन्स डे का बढ़ता विरोध

मैं न तो दिलजला हूँ, और न ही बजरंग दल या तालेबान जैसे गुटों से मुझे कोई सहानुभूति है. हाँ, 14 फ़रवरी को जिस तरह बाज़ारवाद नंगा होकर नाचता है, उसे देख कर थोड़ी चिढ़ ज़रूर होती है. ऐसे में बाज़ारवाद का मंगलगान करने में सबसे आगे रहने वाले अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल में वैलेंटाइन्स डे के विरोध पर एक लेख पा कर हार्दिक प्रसन्नता हुई. इसमें बताया गया है कि अमरीका में क्रिसमस के बाज़ारीकरण से चिढ़ने वालों की भी बड़ी संख्या है, लेकिन बाज़ारवाद के जिस उत्सव के ख़िलाफ व्यवस्थित तरीक़े से एक आंदोलन खड़ा होता दिखता है, वो है- वैलेंटाइन्स डे.

अमरीकी लेखिका जेनिफ़र ग्राहम के इस लेख के ज़रिए ही जब ई-कार्ड के थोक भंडार अमेरिकन ग्रीटिंग्स की वेबसाइट पर गया तो वहाँ एन्टी-वैलेंटाइन्स-डे या एन्टी-वैल कार्ड की भारी मौजूदगी को देख कर सुखद आश्चर्य हुआ.(वैसे, ये भी बाज़ारवाद का ही कमाल है!)

वॉल स्ट्रीट जर्नल के लेख में दिए गए आँकड़ों की बात करें तो भारी आर्थिक मंदी में जकड़े होने के बाद भी अमरीकी इस वैलेंटाइन्स डे के मौक़े पर 14 अरब डॉलर ख़र्च कर रहे हैं. ये कोई आम अटकलबाज़ी नहीं है, बल्कि नेशनल रिटेल फ़ेडरेशन का अनुमान है. यह राशि मुख्यत: कार्डों, फूलों और उपहारों पर और रेस्तराँ में ख़र्च की जा रही है. क्रिसमस के बाद साल में सबसे ज़्यादा कार्ड वैलेंटाइन्स डे(बहुतों के लिए एन्टी-वैल डे) पर ही बिकते हैं. जबकि फूलों की बिक्री के हिसाब से तो पहले नंबर पर वैलेंटाइन्स डे ही है.

लेखिका जेनिफ़र के शब्दों में ही कहें तो वैलेंटाइन्स डे अस्पष्टता से परिभाषित एक ऐसा दिन है जब (क्यूपिड के)तीर की नोक पर लोग अपने अंतर्मन में बसी भावनओं को व्यक्त करने के लिए बाध्य किए जाते हैं. बहुतों को तो असल के अभाव में बनावटी भावनाओं का प्रदर्शन करना पड़ता है. इसीलिए आश्चर्य नहीं कि बहुत से लोग इस दिन को FAD या Forced Affection Day कहते हैं.

वैलेंटाइन्स डे का विरोध करने वालों में कई वर्ग के लोग शामिल हैं, जिनमें प्रमुख हैं- अविवाहित लोग जिन्हें रोमाँस पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिया जाना पसंद नहीं, अभिभावकों का वर्ग जो कि वैलेंटाइन्स डे पर बच्चों द्वारा किए जाने वाले ख़र्च से परेशान रहते हैं और आनंदपूर्वक समय बिता रहे वैसे विवाहित/अविवाहित युगल जिन्हें प्रेम का प्रदर्शन करने की बाध्यता बिल्कुल रास नहीं आती.

इस वैलेंटाइन्स डे विरोधी गुट का लाभ उठाने के लिए भी करोड़ों डॉलर का बाज़ार तैयार हो चुका है. एन्टी-वैल कार्डों की चर्चा पहले ही हो चुकी है. हर अमरीकी शहर में कम-से-कम ऐसा एक रेस्तराँ या बार ज़रूर है जहाँ 14 फ़रवरी को 'क्यूपिड-इज़-स्टूपिड' टाइप थीम पार्टी रखी जाती हैं.

कई जगह मौक़े का फ़ायदा उठाने में आगे रहने वाले फ़िटनेस सेंटर या व्यायामशालाओं में एन्टी-वैल मुक्केबाज़ी सेशन रखा जाता है. इस दौरान वहाँ संबंध-विच्छेद के तनाव से पार पाने के गुर सिखाए जाते हैं. एक तरीका है अपने छूट चुके प्रेमी/प्रेमिका की तस्वीर पर घूंसे बरसाना. इसी तरह ऊन बनाने वाली एक कंपनी जिमी बीन्स वूल ने तो फ़रवरी का महीना एन्टी-वैल युवतियों को समर्पित करते हुए लाल या गुलाबी रंग की जगह पूरे महीने सिर्फ़ नीले रंग के ऊन को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है.

इतना ही नहीं पेटीशन्सऑनलाइन नामक वेबसाइट पर किसी ने वैलेंटाइन्स डे का आयोजन बंद कराने के लिए एक याचिका भी डाल दी है, जिसका शीर्षक है- End Valentine's Day. हालाँकि इस लेख को लिखे जाने तक 68 लोगों ने ही याचिका पर हस्ताक्षर किए थे.

6 टिप्‍पणियां:

Tarun ने कहा…

ऐसे लेख सिर्फ वॉल स्ट्रीट में नही हैं यहाँ के अन्य अखबारों में भी हैं। आपने इस पर लिखा है इसलिये बताता चलूँ कि सीएनएन के रोलेंड मार्टिन ने भी वैलेंटाईन को कमर्शियल होलीडे कहते हुए लिखा है - डोंट बी माय वैलेंटाईन

ज्ञानदत्त । GD Pandey ने कहा…

जो भी चर्चा में हो उसका बाजार उपयोग कर लेता है। चाहे वेलेण्टाइन समर्थन हो या विरोध।

Anil ने कहा…

बाजारवाद का विरोध करने के लिये और भी विचारणीय बिंदु हैं। कुछ उदाहरण: विवाह के समय दूल्हा नोटों की माला क्यों पहनता है? विवाह के समय पैसे का घोर आदान-प्रदान क्यों होता है? होली पर फूलों से रंग न बनाकर प्लास्टिक की थैलियों में भरा रंग क्यों खेला जाता है? दीपावली पर घर में बनी गुजिया-मिठाइयों की जगह हल्दीराम जैसी कंपनियों की मिठाइयां क्यों बांटी जाती हैं? दीपावली पर मासूम बाल-मजदूरों द्वारा बनाये गये पटाखे क्यों फोड़े जाते हैं? क्रिकेट मैच के दौरान कैमरे वाले भारी मेकप और कम कपड़े वाली महिलाओं पर कैमरा क्यों केंद्रित करते हैं? चलिये छोड़िये, संजीदा न होते हुये इस मामले को यहीं खत्म किया जाये!

संगीता पुरी ने कहा…

जानकारी देने का बहुत बहुत धन्‍यवाद......

Neeraj Rohilla ने कहा…

"14 फ़रवरी को जिस तरह बाज़ारवाद नंगा होकर नाचता है, उसे देख कर थोड़ी चिढ़ ज़रूर होती है|"

हमको भी बहुत सी चीजों को देखकर/सुनकर चिढ होती है। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि हर वो चीज जो हमें पसन्द नहीं है तोड-फ़ोड/नष्ट कर दी जाये।

Hindi Blogger ने कहा…

लेख पर प्रतिक्रियाओं के लिए आप सब का आभार!
@नीरज जी, पहली पंक्ति में ही मैंने लिख दिया है कि हमें बजरंग दल या तालेबान जैसे गुटों से कोई सहानुभूति नहीं है. फिर भी आपने लिखा है तो और स्पष्ट कर दूँ कि आप की तरह मैं भी तोड़-फोड़ करने वालों का घोर विरोधी हूँ.
@तरुण जी, एक रोचक लेख पढ़वाने के लिए धन्यवाद!