बुधवार, नवंबर 16, 2005

पॉज़िटिव से निगेटिव बनने का मामला

समझ में नहीं आने वाला यह चित्र किसी समकालीन पेंटर का बनाया मॉडर्न आर्ट हो सकता है. लेकिन नहीं, ये तो हाल के वर्षों में मानव जाति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन कर उभरे वायरस एचआईवी का चित्रण है. एचआईवी यानि जानलेवा बीमारी एड्स का जनक.


...और ये हैं एंड्रयू स्टिम्पसन. लंदन में रहते हैं. उम्र है 25 साल. जनाब पिछले सप्ताह पश्चिमी समाचार जगत में छाए रहे. इनकी उपलब्धि है बिना किसी इलाज के एचआईवी पॉज़िटिव से एचआईवी निगेटिव बन जाना.

एक अनुमान के अनुसार इस वक़्त दुनिया भर में साढ़े तीन करोड़ से ज़्यादा लोग एचआईवी संक्रमित यानि एचआईवी पॉज़िटिव हैं. और स्टिम्पसन का मामला एकमात्र मामला है जिसमें किसी व्यक्ति ने एचआईवी को हराया हो. जड़ी-बूटियों से एचआईवी का सामना करने की ख़बरे दुनिया भर से आती रहती हैं, लेकिन उनका कोई रिकॉर्ड नहीं होता जिससे पता चले कि दावे में कितना दम है. दूसरी ओर स्टिम्पसन का मामला लंदन के एक अस्पताल में होने के कारण पूरे रिकॉर्ड के साथ उपलब्ध है.

एंड्रयू स्टिम्पसन अगस्त 2002 का वो दिन कभी नहीं भूलते जब लंदन के एक अस्पताल ने उन्हें एचआईवी-ग्रसित होने की ख़बर दी. लेकिन डॉक्टरों ने स्टिम्पसन के शरीर पर एचआईवी के किसी नकारात्मक असर को नहीं पाया तो साल भर बाद अक्टूबर 2003 में उनकी फिर से जाँच की गई. और इसमें स्टिम्पसन को एचआईवी निगेटिव पाया गया, मतलब ख़तरनाक वायरस उनके शरीर से ग़ायब हो चुका थे.

स्टिम्पसन ने एचआईवी पॉज़िटिव ठहराने वाले अस्पताल पर मुआवज़े का दावा ठोक दिया. अपने पॉज़िटिव से निगेटिव तक के सफ़र पर सवाल उठाते हुए उन्होंने आशंका जताई कि शायद अस्पताल ने ग़लत रिपोर्ट देते हुए उन्हें एचआईवी ग्रसित क़रार दिया होगा. लेकिन अस्पताल विक्टोरिया क्लिनिक फ़ॉर सेक्सुअल हेल्थ ने उनके दावे को ठुकराते हुए अपने टेस्ट को हर तरह से सही बताया.

ख़ैर, इसी क़ानूनी खेल के कारण ये मामला मीडिया की पकड़ में आया वरना ऐसे मामलों में रोगी को शत-प्रतिशत गोपनीयता की गारंटी होती है. और अब जब मामला दुनिया के सामने है, एचआईवी-एड्स पीड़ितों के लिए काम करने वाले संगठन और ख़ुद ब्रितानी सरकार भी चाहती है कि स्टिम्पसन अपने ऊपर अध्ययन किए जाने की अनुमित दें ताकि इस बात का खुलासा हो सके कि आख़िर कैसे उनके शरीर ने एचआईवी को निकाल बाहर किया. डॉक्टरों का कहना है कि वायरस एचआईवी की चाल-ढाल और उससे लड़ने की मानव शरीर की प्रक्रिया को अब भी पूरी तरह नहीं समझा जा सका है, ऐसे में स्टिम्पसन का शरीर संभव है कोई नई और क्रांतिकारी जानकारी दे दे.

लेकिन स्टिम्पसन भाई साहब अड़ गए हैं कि नहीं, अब कोई टेस्ट नहीं. उनका कहना है कि वो पहले ही पॉज़िटिव-निगेटिव के खेल में अपना चैन गँवा चुके हैं. स्टिम्पसन का दावा है कि उन्होंने भोजन में पौष्टिक आहार की मात्रा बढ़ाने और कुछ अतिरिक्त विटामिन लेने के अलावा इलाज के नाम पर कुछ नहीं किया है. मतलब उन्होंने एचआईवी रोगियों को दी जाने वाली कोई एंटीरेट्रोवाइरल दवाई नहीं ली.

कई मेडिकल जर्नल में स्टिम्पसन के मामले को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, जैसा कि ख़ुद स्टिम्पसन भी देखते हैं. इन संदेहियों को लगता है चूक उन्हें पॉज़िटिव ठहराने वाले अस्पताल से हुई होगी. लेकिन अस्पताल है कि सारे टेस्ट को सौ फ़ीसदी सही ठहरा रहा है. क्या पता, लाखों पाउंड का मुआवज़ा चुकाने के डर से अस्पताल ऐसा कर रहा हो.

विशेषज्ञों के अनुसार जाँच में गड़बड़ी आमतौर पर होती नहीं है. हालाँकि एचआईवी की पड़ताल का मूल सिद्धांत ही थोड़ा अटपटा होता है. किसी व्यक्ति को उसके शरीर में एचआईवी से लड़ने वाले तत्वों या एंटीबॉडी की उपस्थिति के आधार एचआईवी पॉज़िटिव बताया जाता है. मतलब ख़ून के नमूने में एचआईवी को नहीं, बल्कि उससे लड़ने वाली ख़ास एंटीबॉडी को ढूंढा जाता है. वो ख़ास एंटीबॉडी उपस्थित है तो व्यक्ति एचआईवी ग्रसित हुआ, नहीं है तो टेस्ट निगेटिव माना जाएगा.

क्या पता स्टिम्पसन के शरीर में वो विशेष एंटीबॉडी किसी अन्य कारण से हो, या क्या पता कि अस्पताल में उनके ख़ून के नमूने की फेरबदल हो गई हो. क्या पता?

2 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ला ने कहा…

ये तो ऐसा लगता है कि किसी गोले पर खूबसूरत पत्थर चिपका
दिये गये हों।

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