सोमवार, जुलाई 05, 2010

होम्योपैथी के पक्ष में एक दमदार आवाज़

होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति को मानने वाले जितने लोग हैं, उसे नहीं मानने वालों की संख्या उनसे कम नहीं होगी. हालाँकि  विगत कुछ महीनों से होम्योपैथी के विरोधियों का पलड़ा भारी दिख रहा है, क्योंकि उनके अभियान से कई नामी-गिरामी चिकित्सक ही नहीं, बल्कि कई प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिकाएँ भी जुड़ गई लगती हैं.

ऐसे में होम्योपैथी के पक्ष में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार विजेता एक वैज्ञानिक का सामने आना महत्वपूर्ण है. फ़्रांस के इस महानुभाव का नाम है- ल्यूक मोन्टैग्नीर. (वैसे कई नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक या तो होम्योपैथी के ख़िलाफ़ बयान दे चुके हैं, या फिर वैसे बयानों से सहमति जता चुके हैं.)

मोन्टैग्नीर का परिचय देने से पहले ये स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि उन्होंने होम्योपैथी का प्रत्यक्ष तौर पर बचाव नहीं किया है, बल्कि उनका एक नया सिद्धांत सीधे-सीधे होम्योपैथी का सिद्धांत नज़र आता है.

प्रोफ़ेसर ल्यूक मोन्टैग्नीर एक विषाणु विशेषज्ञ हैं. उन्होंने 1980 के दशक में अपने अनुसंधान के ज़रिए एचआईवी की खोज की और उसके एड्स से संबंध को साबित किया. इस महती कार्य के लिए उन्हें 2008 में चिकित्सा विज्ञान क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया.

पिछले सप्ताह जर्मनी में एक अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा सम्मेलन में (जहाँ 60 नोबेल पुरस्कार विजेताओं समेत क़रीब 800 वैज्ञानिक जमा हुए थे) प्रोफ़ेसर मोन्टैग्नीर ने विषाणु संक्रमण का पता लगाने की एक नई पद्धति का उल्लेख किया. जटिल वैज्ञानिक शब्दावली वाले  उनके व्याख्यान के मूल में उनका ये दावा है कि संक्रमित करने में सक्षम जीवाणु या विषाणु (एचआईवी समेत) के डीएनए युक्त घोल से कम फ़्रीक़्वेंसी की रेडियो तरंग निकलती है. इस घोल के संपर्क में आने वाले साधारण पानी में भी अल्प मात्रा में उस रेडियो तरंग की छाप देखी जा सकती है.

दूसरे शब्दों में कहें तो प्रोफ़ेसर मोन्टैग्नीर की दलील ये है कि किसी घोल को कितना भी पतला किया जाए (यहाँ तक किसी मूल डीएनए के निशान ग़ायब होने तक) उसमें उन तत्वों की कुछ-न-कुछ छाप रह जाती है जिनसे कि विगत में उसका संपर्क हुआ है. उस छाप को या उस रेडियो तरंग को पहचान कर अंतत: बीमारी विशेष का पता लगाया जा सकता है.

उपरोक्त विवरण भले ही टेक्निकल लग रहा हो, (और प्रोफ़ेसर मोन्टैग्नीर ने होम्योपैथी का नाम भी नहीं लिया) लेकिन मोटे तौर पर देखा जाए तो ये होम्योपैथी के काम करने के तरीक़े से मिलता-जुलता है.

आने वाले महीनों और वर्षों में ये देखने वाली बात होगी कि क्या एचआईवी संबंधी खोज से लाखों एड्स पीड़ितों को जीवनदान दिलाने में सहायक प्रोफ़ेसर मोन्टैग्नीर अपनी नई खोज से होम्योपैथी को एक ठोस और सर्वमान्य वैज्ञानिक आधार दिला सकेंगे!

5 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

हमारी आस्था है होम्योपैथी में..

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

हमारी आस्था है होम्योपैथी में
इसका विरोध करने वाले सिर्फ अपने व्यवसायिक हित देख रहें है उन्हें मानवता से कोई लेना देना नहीं , वरना इस तरह की सस्ती पद्धति का तो विरोध की बजाय प्रसार करना चाहिए |

PARAM ARYA ने कहा…

HOMOEOPATHY के नियम ऋषियों द्वारा पूर्व में ही खोजे जा चुके थे ¤

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

होमियोपैथी काम करती है, कैसे? यह हम नहीं जानते। दुनिया में बहुत चीजें अज्ञात हैं, लेकिन अज्ञेय कुछ भी नहीं।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रभाव देखा जाये । प्रभाव थ्योरी का मोहताज़ नहीं ।