रविवार, मई 31, 2009

ग्लोबल वार्मिंग का मुक़ाबला सफ़ेदी पोत के

स्टीफ़न चूग्लोबल वार्मिंग की समस्या से पार पाने के लिए तरह-तरह के ऊपाय बताए जाते हैं, जैसे- जैव ईंधन का कम प्रयोग, जल विद्युत और नाभिकीय ऊर्जा को बढ़ावा, सस्ते और टिकाऊ सौर-पैनलों का विकास आदि-आदि. लेकिन अमरीका के ऊर्जा मंत्री डॉ. स्टीफ़न चू ने ग्लोबल वार्मिंग को कम करने का जो रास्ता सुझाया है वो सबसे रोचक है. चू साहब का कहना है कि लोग अपने घर की छतों को सफ़ेद रंग से रंग दें, और शहरों के फ़ुटपाथों को हल्के रंग का बना दिया जाए तो ग्लोबल वार्मिंग में पर्याप्त कमी की जा सकती है.

स्टीफ़न चू कोई जॉर्ज बुश टाइप बुद्धिजीवी नहीं हैं, बल्कि वे एक जाने-माने वैज्ञानिक हैं. उनके नाम 1997 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी है. इसलिए उनकी बातों को दुनिया ओबामा प्रशासन की नीति के साथ-साथ गंभीर वैज्ञानिक विचार के तौर पर भी लेती है.

छतों पर सफ़ेदी पोतने का चू का सुझाव पिछले हफ़्ते लंदन में आया जहाँ वे जलवायु परिवर्तन की समस्या पर 20 नोबेल विजेता वैज्ञानिकों की बैठक से पहले मीडिया को संबोधित कर रहे थे.

डॉ. चू का कहना है कि छतों और फ़ुटपाथों को सफ़ेद या हल्के रंग का रूप देने से ऊर्जा का संरक्षण होने के साथ-साथ एक बड़े क्षेत्र से सूर्य के प्रकाश को सीधे परावर्तित करना संभव होगा.

अपनी बात को विस्तार देते हुए चू ने कहा, "यदि कोई भवन वातानुकूलित है तो उसकी छत पर सफ़ेदी करने के बाद ये पहले से कहीं ज़्यादा ठंडा हो सकेगा. यानि उस भवन में 10 से 15 प्रतिशत कम बिजली की ज़रूरत होगी."

"इसी तरह छतों-फ़ुटपाथों पर सफ़ेदी पोत कर आप धरती की परावर्तक सतह का स्वरूप बदल सकते हैं. इसे ज़्यादा परावर्तक बना सकते हैं. ताकि सूर्य का प्रकाश नीचे आए और तुरंत वापस अंतरिक्ष में जाए. धरती पर ग्रीनहाउस की स्थिति में योगदान दिए बिना."

अमरीकी ऊर्जा मंत्री ने आगे कहा, "आपको अभी हँसी आ रही हो, लेकिन यदि आप सारे मकानों की छतों पर सफ़ेदी पोत दें, और यदि सारे फ़ुटपाथों को भी काले के बजाय कंक्रीट टाइप रंग का बना दें, और ऐसा एकरूपता से करें...तो ऐसे में कार्बन उत्सर्जन में इतनी कमी हो सकेगी जितनी कि दुनिया की सारी कारें 11 वर्षों की अवधि में उत्सर्जित करती हैं. ऐसे समझें कि मानो 11 साल तक एक भी कार न चली हो."

डॉ. स्टीफ़न चू सफ़ेदी के दायरे को छतों और फ़ुटपाथों से भी आगे बढ़ा कर कारों को भी उसके भीतर लाना चाहते हैं. उनका कहना है- "यदि सभी कारों को सफ़ेद या हल्के रंगों में रंग दिया जाए तो अच्छा-ख़ासा पैसा बचाया जा सकता है क्योंकि तब उनकी एयरकंडीशनिंग की डाउनसाइज़िंग हो सकेगी. इससे एयरकंडीशनिंग ज़्यादा असरदार भी हो जाएगी, और ऊर्जा का अपेक्षाकृत कम उपयोग करना पड़ेगा."

चू साहब अपनी इस तरक़ीब को 'जियोइंजीनियरिंग' का एक बढ़िया उदाहरण बताते हैं. हालाँकि इस बात का जवाब उनके पास नहीं है कि चारों ओर सफ़ेद-सफ़ेद ही दिखने से मानव सौंदर्य बोध का क्या होगा! इसके अलावा सपाट छतों की तो कोई बात नहीं, लेकिन जहाँ तक यूरोप की बात है तो वहाँ के छप्परनुमा छतों के रंग-रूप को लेकर कई देशों में स्थानीय नियम-क़ानूनों में प्रावधान बने हुए है. अधिकांश स्थानीय निकाय उन छतों की सफ़ेदी की इजाज़त नहीं देते जो कि राह चलते नज़र आती हों.

मान लीजिए दुनिया भर की सरकारें ज़्यादातर छतों की सफ़ेदी पर सहमत हो भी जाती हैं तो क्या ये सचमुच में ग्लोबल वार्मिंग की समस्या का प्रभावी समाधान है? आप ख़ुद विचार करें, यदि आपको बता दिया जाए कि धरती की सतह का मात्र डेढ़ प्रतिशत शहरों और महानगरों के रूप में है.

यहाँ ये उल्लेखनीय है कि ऊर्जा मंत्री के रूप में स्टीफ़न चू के कई फ़ैसलों की पर्यावरणवादियों ने जलवायु को नुक़सान पहुँचाने वाला बताते हुए आलोचना की है. इन फ़ैसलों में अमरीका में नए कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों के निर्माण पर रोकटोक हटाना, हाइड्रोजन ईंधन चालित वाहनों के विकास के लिए सरकारी फ़ंडिंग में कटौती, परमाणु कचरा भंडारण की एक योजना के लिए फ़ंडिंग ख़त्म करना आदि. चू का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने का सबसे प्रभावी और आसान तरीक़ा है- ऊर्जा दक्षता. भवनों के बेहतर डिज़ायन और छतों-फ़ुटपाथों की पुताई इसी ऊर्जा दक्षता के अंतर्गत आते हैं.

1 टिप्पणी:

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

हां ,यह पढ़ा। शायद ऐसे छोटे छोटे कदमों से ही बचेगा पर्यावरण।
कौन रखेगा छोटा कदम? गम्भीरता नहीं दिखती कम से कम भारत में।