शुक्रवार, दिसंबर 15, 2006

थोरियम युग में छा जाएगा भारत

थोरियम अयस्कभविष्य में ऊर्जा संकट की आशंका से पूरी दुनिया जूझ रही है, और डर के इस माहौल में एक बार फिर से थोरियम पॉवर की चर्चा फ़ैशन में आ गई है. इसे भविष्य का परमाणु ईंधन बताया जा रहा है. थोरियम के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम की तुलना में यह कहीं ज़्यादा स्वच्छ, सुरक्षित और 'ग्रीन' है. और, इन सब आशावादी बयानों में भारत का भविष्य सबसे बेहतर दिखता है क्योंकि दुनिया के ज्ञात थोरियम भंडार का एक चौथाई भारत में है.

अहम सवाल ये है कि अब तक थोरियम के रिएक्टरों का उपयोग क्यों नहीं शुरू हो पाया है, जबकि इस तत्व की खोज हुए पौने दो सौ साल से ऊपर बीत चुके हैं? इसका सर्वमान्य जवाब ये है- थोरियम रिएक्टर के तेज़ विकास के लिए विकसित देशों की सरकारों और वैज्ञानिक संस्थाओं का सहयोग चाहिए, और इसके लिए वे ज़्यादा इच्छुक नहीं हैं. सबको पता है कि यूरेनियम और प्लूटोनियम की 'सप्लाई लाईन' पर कुछेक देशों का ही नियंत्रण है, जिसके बल पर वो भारत जैसे बड़े देश पर भी मनमाना शर्तें थोपने में सफल हो जाते हैं. इन देशों को लगता है कि थोरियम आधारित आणविक ऊर्जा हक़ीक़त बनी, तो उनके धंधे में मंदी आ जाएगी, उनकी दादागिरी पर रोक लग सकती है...और भारत जैसा देश परमाणु-वर्ण-व्यवस्था के सवर्णों की पाँत में शामिल हो सकता है.

थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर के विकास में खुल कर अनिच्छा दिखाने वालों में यूरोपीय संघ सबसे आगे है. शायद ऐसा इसलिए कि ज्ञात थोरियम भंडार में नार्वे के अलावा यूरोप के किसी अन्य देश का उल्लेखनीय हिस्सा नहीं है. (वैसे तो, रूस में भी थोरियम का बड़ा भंडार नहीं है, लेकिन वहाँ भविष्य के इस ऊर्जा स्रोत पर रिसर्च जारी है. शायद, थोरियम रिएक्टरों के भावी बाज़ार पर रूस की नज़र है!)

यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन(CERN) ने थोरियम ऊर्जा संयंत्र के लिए ज़रूरी एडीएस रिएक्टर(accelerator driven system reactor) के विकास की परियोजना शुरू ज़रूर की थी. लेकिन जब 1999 में एडीएस रिएक्टर का प्रोटोटाइप संभव दिखने लगा तो यूरोपीय संघ ने अचानक इस परियोजना की फ़ंडिंग से हाथ खींच लिया.

यूनीवर्सिटी ऑफ़ बैरगेन के इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़िजिक्स एंड टेक्नोलॉजी के प्रोफ़ेसर एगिल लिलेस्टॉल यूरोप और दुनिया को समझाने की अथक कोशिश करते रहे हैं कि थोरियम भविष्य का ऊर्जा स्रोत है. उनका कहना है कि वायुमंडल में कार्बन के उत्सर्जन को कम करने के लिए ऊर्जा खपत घटाना और सौर एवं पवन ऊर्जा का ज़्यादा-से-ज़्यादा दोहन करना ज़रूरी है, लेकिन ये समस्या का आंशिक समाधान ही है. प्रोफ़ेसर लिलेस्टॉल के अनुसार भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ़ परमाणु ऊर्जा ही दे सकती है, और बिना ख़तरे या डर के परमाणु ऊर्जा हासिल करने के लिए थोरियम पर भरोसा करना ही होगा.

उनका कहना है कि थोरियम का भंडार यूरेनियम के मुक़ाबले तीन गुना ज़्यादा है. प्रति इकाई उसमें यूरेनियम से 250 गुना ज़्यादा ऊर्जा है. थोरियम रिएक्टर से प्लूटोनियम नहीं निकलता, इसलिए परमाणु बमों के ग़लत हाथों में पड़ने का भी डर नहीं. इसके अलावा थोरियम रिएक्टर से निकलने वाला कचरा बाक़ी प्रकार के रिएक्टरों के परमाणु कचरे के मुक़ाबले कहीं कम रेडियोधर्मी होता है.

प्रोफ़ेसर एगिल लिलेस्टॉल के बारे में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन की थोरियम रिएक्टर परियोजना में वो उपप्रमुख की हैसियत से शामिल थे. उनका कहना है कि मात्र 55 करोड़ यूरो की लागत पर एक दशक के भीतर थोरियम रिएक्टर का प्रोटोटाइप तैयार किया जा सकता है. लेकिन डर थोरियम युग में भारत जैसे देशों के परमाणु ईंधन सप्लायर बन जाने को लेकर है, सो यूरोपीय संघ के देश थोरियम रिएक्टर के विकास में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे.

ख़ुशी की बात है कि भारत अपने बल पर ही थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा के लिए अनुसंधान में भिड़ा हुआ है. भारत की योजना मौजूदा यूरेनियम आधारित रिएक्टरों को हटा कर थोरियम आधारित रिएक्टर लगाने की है. कहने की ज़रूरत नहीं कि भारत को इसमें सफलता ज़रूर ही मिलेगी.

14 टिप्‍पणियां:

संजय बेंगाणी ने कहा…

हमे भी उस दिन का इंतजार है.

शशि सिंह ने कहा…

मुद्दा मौजूं और लेख जानदार है.

vishal ने कहा…

लेख पढ कर अच्छा लगा।
शायद भारत के थोरियम भण्डारों और थोरियम आधारित प्रौद्योगिकी में हमारे अनुसंधान को देख के ही अमेरिका नाभिकीय संबन्ध बढाना चाहता है। लेकिन दुर्भाग्य से आत्मनेर्भर बनने में सहयोग की जगह टॉग अडाना चाहता है।

Pratik ने कहा…

यह तो वाक़ई अच्छी ख़बर है। आपने बहुत सुन्दर लेख लिखा है। आशा है कि थोरियम युग का आगाज़ शीघ्र ही होगा।

eswami ने कहा…

वो सुबह कभी तो आएगी! :(

अनूप शुक्ला ने कहा…

यह लेख पढ़कर यही लगा कि हमारे देशवालों को जुट जाना चाहिये थोरियम से ऊर्जा पाने की तरकीब बनाने में!अच्छी जानकारी है!

Hindi Blogger ने कहा…

धन्यवाद! भारत थोरियम ऊर्जा के क्षेत्र में सफल रहेगा इसमें कोई संदेह नहीं. सवाल सिर्फ़ ये है कि इसमें कितने साल लगते हैं.

यहाँ ये बात उल्लेखनीय है कि दुनिया का एकमात्र थोरियम आधारित प्रायोगिक रिएक्टर भारत में ही है. भले ही, कामिनी नामक यह रिएक्टर मात्र 30Kw क्षमता का है, लेकिन इसे थोरियम आधारित ऊर्जा प्रौद्योगिकी का पहला सफल प्रदर्शन तो कहा ही जा सकता है.

श्रीश । ई-पंडित ने कहा…

अच्छी जानकारी दी है। भारत को इस दिशा में खोज जारी रखनी चाहिए फिर उसमें चाहे १०० साल लग जाएं कभी तो आत्मनिर्भर बन पाएंगे।

बेनामी ने कहा…

yani ki bahut jald bharat ke 6 lakh ganw bijlimay hone wale hai...aur jab duniya se oil khatm ho jayegi tab humlog superpower ho jayenge...america aur europe katora lekar thorium ke liye hamare choukhat per khade honge..ya ye bhi ho sakta hai america suraj ki kirno se hi bijli banane lage!

raj ने कहा…

प्रोफ़ेसर एगिल लिलेस्टॉल ko bharat davara fund jaari kar dena chahiye unhe bharat ke liye reactor teyar karane mein madad karani chahiye

बेनामी ने कहा…

मैं भी बेसब्री से उस दिन का इंतेजार कर रहा हूं।

बेनामी ने कहा…

देखना अमेरिका एक दिन हमारे(भारत) तलवे तले होगा।

फिरोज़ भाई

बेनामी ने कहा…

i like this
jay hind

बेनामी ने कहा…

यूपीए के शाषनकाल में भारत से लाखो टन बहुमूल्य थोरियम को रेत बता कर भारत के बाहर भेज दिया गया. क्या भारत सरकार को ये जानकारियाँ नहीं है क्या ?