बुधवार, मई 30, 2007

प्रतिभा और प्रतिभावान -1

लियोनार्दो का लाल चॉक से बनाया स्वचित्रबारहवीं की परीक्षा के परिणाम आने के बाद अख़बारों में एक से बढ़कर एक प्रतिभाशाली बच्चों के बारे में ख़बरें छप रही हैं. हिंदी ब्लॉग जगत ने भी कुछ मेधावी बच्चों को मंच दिया. प्रतिभावानों की इज़्ज़त में लिखे जाने के इस ख़ास अवसर पर संयोग से मेरे हाथ एक बेहतरीन पुस्तक हाथ लगी है- The Observer Book of GENIUS.

इस पुस्तक के सारे 112 पेज पढ़ जाने के बाद ये स्पष्ट हो जाता है कि प्रतिभा या मेधा शुरू से ही अल्प आपूर्ति में रही है. आख़िर प्रतिभा है क्या? आधुनिक काल के सिद्ध प्रतिभावानों में से एक थॉमस एडिसन की मानें तो प्रतिभा में एक प्रतिशत अंत:प्रेरणा और निन्यानवे प्रतिशत मेहनत है. हालाँकि एडिसन से कहीं ज़्यादा प्रतिभावान माने जाने वाले लियोनार्दो दा विंची का कहना था कि उच्चतम प्रतिभा वाला व्यक्ति तब सर्वाधिक सक्रिय होता है, जब वह सबसे कम काम कर रहा हो!

यानि मेधा आख़िर क्या बला है, इस पर शताब्दियों से सिद्ध प्रतिभावान तक एकमत नहीं हो सके हैं. इस बारे में तरह-तरह के सवाल हैं, लेकिन कोई निश्चित जवाब नहीं. क्या प्रतिभा मस्तिष्क की किसी विशेष कोशिका का कमाल है, क्या यह कोई आनुवंशिक चीज़ है, क्या यह प्रकृति के किसी अबूझ फ़ॉर्मूले का कमाल है...या फिर, क्या प्रतिभा सही प्रशिक्षण से, सही दवाओं के ज़रिए या सिर के किसी ख़ास हिस्से में लगी चोट से विकसित की जा सकती है?

जब प्रतिभा की परिभाषा तक पर एका नहीं तो उसे मापने की विधि कितनी भरोसेमंद कही जा सकती है! लेकिन फिर भी दुनिया एक तरीक़े पर काफ़ी हद तक भरोसा करती है. ये है IQ Test, यानि Intelligence Quotient की जाँच. फ़्रांसीसी मनोविज्ञानी अल्फ़्रेड बिनेट ने थियोडोर सिमोन के साथ 1908 में इसकी शुरुआत की. यहाँ ये उल्लेखनीय है कि इस विधि से बच्चों की प्रतिभा ही जाँची जा सकती है. इसमें बच्चों की मानसिक और वास्तविक उम्र का अनुपात निकाला जाता है. मान लीजिए एक 10 साल का बच्चा अपने से तीन साल बड़े यानि 13 साल के बच्चों जितना समझदार है. ऐसे में उसका IQ निकालने के लिए 13 में 10 से भाग देंगे और औसत IQ यानि 100 से गुणा करेंगे. इस तरह उस बच्चे का IQ हुआ 130.

मान्य पंरपराओं के अनुसार 130 से अधिक IQ वाले किसी बच्चे को आमतौर पर प्रतिभाशाली माना जाता है. उच्चतर IQ वालों की संस्था मेन्सा में भी इस IQ स्तर वालों को आमतौर पर प्रवेश मिल जाता है. हालाँकि यह संस्था IQ की जाँच के अलग-अलग तरीक़े अपनाती है. इस समय दुनिया भर के क़रीब एक लाख व्यक्ति मेन्सा के सदस्य हैं.

The Observer की क़िताब में कुल 20 प्रतिभावान लोगों की विस्तार से चर्चा है. ये महानुभाव हैं:-

1. Imhotep (b.2667 BC, d.2648 BC). बहुआयामी प्रतिभा के धनी. स्थापत्य और चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में मानव इतिहास का पहला बड़ा नाम. उनकी ये उक्ति बहुत प्रसिद्ध है- 'खाओ, पीओ और आनंद मनाओ क्योंकि एक दिन हमें मर जाना है.'

2. Pythagoras of Samos ( b.582-580 BC, d.547-496 BC). गणितज्ञ, खगोलविद, वैज्ञानिक और दार्शनिक. अंकों के जनक के रूप में विशेष प्रसिद्धि. उन्होंने एक विज्ञानप्रेरित समाज की स्थापना की जिसे पाइथागोरियन्स कहा जाता था. उनका मानना था कि सब कुछ गणित से संबद्ध है और अंक ही अंतिम सच हैं.

3. Plato (b.428 BC, d.349 BC). प्राचीन यूनान की प्रसिद्ध विद्वत तिकड़ी में से एक. बाक़ी दो थे- सुकरात और अरस्तू. प्लेटो एक दार्शनिक के अलावा एक गणितज्ञ भी थे. पश्चिमी जगत में उच्चतर शिक्षा के लिए पहली संस्था की स्थापना उन्होंने ही एथेंस में की थी.

4. Archimedes (b.287 BC, d.212 BC). गणितज्ञ, भौतिकशास्त्री, इंजीनियर, खगोलविद और दार्शनिक. उनके कई आविष्कार आज भी उपयोग में लाए जाते हैं. मशहूर जर्मन गणितज्ञ कार्ल फ़्रेडरिक गॉस ने आर्कमिडिज़ को तीन कालजयी गणितज्ञों में से एक माना है. बाक़ी दो हैं- न्यूटन और आइंस्टाइन. आर्कमिडिज़ की प्रसिद्ध उक्ति- 'मुझे खड़े होने की एक जगह दो, मैं धरती को हिला दूँगा.'

5. Brahmagupta (b.598, d.668). गणितज्ञ और खगोलविद. राजस्थान में पैदा हुए ब्रह्मगुप्त सम्राट हर्ष के ज़माने में उज्जैन की वेधशाला के प्रमुख रहे थे. ब्रह्मगुप्त को गणित-चक्र-चूड़ामणि के नाम से भी जाना जाता था. उन्होंने खगोलशास्त्र में बीजगणित का इस्तेमाल शुरू किया था. शून्य को एक स्वतंत्र अंक का दर्जा उन्होंने ही दिया था.

6. Dante Alighieri (b.1 June 1265, d.13 September 1321). कवि. प्रमुख कृतियाँ- The Divine Comedy, La Vita Nuova, De Vulgari Eloquentia, Monarchia और The Convivio. उनका प्रमुख कथन- 'नरक में सबसे बुरी जगह उन लोगों के लिए सुरक्षित है, जो नैतिक संकट की घड़ियों में तटस्थ रहते हैं.'

7. Leonardo da Vinchi (b. 15 April 1452, d. 2 May 1519). बहुआयामी प्रतिभा के धनी. खगोलशास्त्र, सिविल इंजीनियरिंग, ऑप्टिक्स, चिकित्सा शास्त्र और हाइड्रोडाइनमिक्स के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान. एक कलाकार के रूप में Mona Lisa और The Last Supper का चित्रांकन. आविष्कारक के रूप में मानवचालित हेलीकॉप्टर, टैंक, ग्लाइडर, पैराशूट, कैलकुलेटर आदि का डिज़ायन तैयार किया. इस्तांबुल के सुल्तान बेयाज़िद द्वितीय के लिए लियोनार्दो ने एक पुल का डिज़ायन किया था, जिसे असंभव मान कर सुल्तान ने नहीं बनवाया, लेकिन 2001 में नॉर्वे में उस डिज़ायन को सफलतापूर्वक कार्यरूप दिया गया.

8. Michelangelo (b. 6 March 1475, d. 18 February 1564). पेन्टर, मूर्तिकार, वास्तुशिल्पी, कवि और इंजीनियर. रोम के सिस्टीन चैपल में उन्होंने The Scenes from Genesis और The Last Judgment के रूप में जो फ़्रेस्को चित्रकारी की उसकी दूसरी मिसाल नहीं. इसी तरह उनकी बनाई डेविड की मूर्ति भी अद्वितीय कृति ही मानी जाती है.

9. William Shakespeare (b. 26 April 1564, d. 23 April 1616). कवि और नाटककार. उनके दुखान्त, ऐतिहासिक, रोमांटिक और हास्यपूर्ण नाटकों को अंग्रेज़ी साहित्य में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है. उन्होंने अपने कई नाटकों में अभिनय भी किया था. शेक्सपियर ने प्यार, सुंदरता और जीवन की क्षणभंगुरता पर कई ख़ूबसूरत कविताएँ भी लिखी हैं.

10. Galileo Galilei (b. 15 February 1564, d. 8 January 1642). भौतिकशास्त्री, खगोलविद और दर्शनशास्त्री. उन्होंने धरती केन्द्रित खगोलशास्त्र को चुनौती देते हुए सूर्य केन्द्रित खगोल विज्ञान का प्रतिपादन किया. सापेक्षवाद के बारे में भी उन्होंने विचार व्यक्त किए थे. उन्होंने गणित, सैद्धान्तिक भौतिकी और प्रायोगिक भौतिकी के अन्तर्संबंधों पर प्रकाश डाला. गैलीलियो ने विज्ञान को दर्शन शास्त्र और धर्म से अलग करने का हरसंभव प्रयास किया, और इसी कारण कैथोलिक चर्च से दुश्मनी मोल ले ली. आइन्सटाइन ने उन्हें आधुनिक विज्ञान का जनक कहा है. उनकी एक प्रसिद्ध उक्ति- 'ईश्वर की भाषा है गणित.'

(अगले पोस्ट में जारी...)

सोमवार, मई 14, 2007

ड्रेनपाइप में होटल

द पार्क होटल, ऑतेनशाइम, ऑस्ट्रियाकोई ज़रूरी नहीं कि विवादों से ही कला को मान्यता मिलती हो. यदि कलाकार व्यावहारिक और उपयोगी कृतियाँ बनाए तो न सिर्फ़ उसकी दुनिया भर में चर्चा होती है, बल्कि उसकी तारीफ़ भी होती है.

चर्चा और सराहना का ये शुभ-संयोग ऑस्ट्रिया के आंद्रियास स्ट्रॉस के नाम भी आया है. स्ट्रॉस कला की शिक्षा ले रहे हैं. यूरोप के अधिकांश छात्रों की तरह ही उन्हें भी बैकपैकिंग या कम पैसे ख़र्च करते हुए लंबी-लंबी पर्यटन यात्राएँ करने का शौक है. और इन यात्राओं के दौरान उन्हें सस्ते होटलों की गंदगी का अनुभव हुआ. स्ट्रॉस ने अपनी पहली प्रमुख कलाकृति में अपने इसी अनुभव की रचनात्मक भड़ास निकाली. और जन्म हुआ, एक बहुत ही साफ़-सुथरे 'होटल' का.

इस होटल में अभी मात्र तीन कमरे हैं. तीनों कमरे Ottensheim शहर में डैन्यूब के किनारे एक पार्क में रखे हुए हैं. जी हाँ रखे हुए हैं...क्योंकि ये कोई आम कमरे नहीं, बल्कि शहरों के नाले में प्रयुक्त कंक्रीट की पाइप के परिवर्तित रूप हैं.

तीन कमरों या यूनिटों की इस व्यवस्था को नाम दिया गया है- Das Park Hotel या 'द पार्क होटल'. कंक्रीट की ड्रेनपाइप में डबल-बेड लगाया गया है. दो मीटर व्यास वाली पाइप में अच्छी-ख़ासी जगह है. इसलिए इसमें एक छोटे स्टोरेज-स्पेस या अलमारी की व्यवस्था भी संभव हो सकी है. इसमें एक लैम्प है, एक खिड़की है और मोबाइल फ़ोन, आइपॉड आदि को चार्ज करने के लिए एक प्लग-प्वाइंट भी है.

ड्रेनपाइप का...माफ़ कीजिए... कमरे का दरवाज़ा, इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था से खुलता है. मतलब कमरा छोड़ कर आप पास के सार्वजनिक शौचालय या रेस्तराँ तक गए तो आपकी चीज़ें पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी. क्योंकि आपके द्वारा रिज़र्व किए गए समय में कमरे को खोलने का यूनिक़-कोड सिर्फ़ आपके पास होगा.

ड्रेनपाइप में रहने का स्वप्निल अनुभव...और कहीं ये तो नहीं सोच रहे कि रात में आप सो रहे हों और शरारती तत्व ड्रेनपाइप को लुढ़का कर डैन्यूब में गिरा दे! नहीं जनाब, ऐसा संभव नहीं दिखता. एक तो ऑस्ट्रिया के इस शहर में लुच्चे-लफंगों का आतंक नहीं, और दूसरे किसी ने शरारत करने की ठानी भी तो कम-से-कम क्रेन की व्यवस्था तो करनी ही होगी...क्योंकि हर ड्रेनपाइप नौ टन वज़नी है!

यदि पार्क जैसे सार्वजनिक स्थल में संपूर्ण निजता का लुत्फ़ उठाना चाहते हैं, तो देर किस बात की. जल्दी से www.dasparkhotel.net पर जा कर अपना कमरा रिज़र्व कराएँ. कितना ख़र्च आएगा? ये सवाल तो पूछिए भी मत. स्ट्रॉस साहब की यह अनूठी कला-परियोजना Pay As You Wish की व्यवस्था से चलती है. यानि जाको रही भावना जैसी. मतलब जितना आर्थिक सहयोग उचित लगे करें.

ऑस्ट्रिया के स्वप्नदर्शी कला छात्र आंद्रियास स्ट्रॉस के, उन्हीं के शब्दों में, 'a new kind of hospitality-tool in public Space' में आपका स्वागत है!

गुरुवार, अप्रैल 26, 2007

'जापानी नौसेना' के बदलते अंदाज़

जापानी नौसैनिक
द्वितीय विश्व युद्ध में पराजित होने के बाद अमरीका के निर्देश पर जापान का जो संविधान रचा गया था उसमें सशस्त्र सेना की कोई जगह नहीं है. सशस्त्र सेनाओं की जगह जापान का आत्मरक्षा बल या सेल्फ़ डिफ़ेंस फ़ोर्स (SDF) है. इसकी सशस्त्र सेनाओं की तरह ही थल, जल और वायु की तीन शाखाएँ हैं. यानि आधिकारिक रूप से जापान की कोई नौसेना भी नहीं है, और उसके समुद्री बल का नाम है- MSDF या Maritime Self-Defence Force.

दरअसल 1947 में जापान का जो संविधान रचा गया, या अमरीका ने उसके लिए जो संविधान तैयार किया, उस पर द्वितीय विश्व युद्ध के उन दिनों के छाया स्पष्ट दिखती है जब जापानी सैनिक चीन समेत पूर्वी एशिया और प्रशांतीय क्षेत्र के देशों को रौंद रहे थे. उसके ख़ौफ़ से ब्रितानी साम्राज्यवादी भी थरथरा रहे थे. इसलिए अंतत: एटम बम की मार के साथ हुई जापान की पराजय के बाद विजयी ताक़तों की सलाह पर अमरीका ने उसके संविधान में 'अनुच्छेद 9' नामक ऐसा पेंच डाल दिया कि वह कभी दोबारा हमला नहीं कर सके. बदले में अमरीका ने उसकी सुरक्षा की पूरी ज़िम्मेवारी अपने कंधों पर लेने का काम भी किया.

जापानी संविधान के नौवें अनुच्छेद में दोटूक शब्दों में लिखा गया है कि 'जापानी जनता हमेशा के लिए राष्ट्र के युद्ध करने के संप्रभु अधिकार, और अंतरराष्ट्रीय विवादों को ताक़त के ज़ोर पर हल करने की धमकी का त्याग करती है...जापान जल, थल और वायु सेना के साथ-साथ युद्ध का कारक बनने वाले किसी भी बल को धारण नहीं करेगा.'

जापानी संविधान के इस नौवें अनुच्छेद को 'शांति अनुच्छेद' के नाम से जाना जाता है. और, विश्ववास नहीं होता कि संविधान लागू होने के कई साल बाद तक जापान का कोई अपना सशस्त्र बल नहीं था. लेकिन 1950 के दशक के शुरू में अमरीका को लगने लगा कि निहत्था जापान कोई अच्छी बात नहीं है. दरअसल तब शीतयुद्ध शुरू हो चुका था, और सोवियत साम्यवाद दुनिया भर में पसरने लगा था. ऐसे ही माहौल में जापान में अमरीकी प्रशासन के कमांडर जनरल डगलस मैकआर्थर ने वहाँ एक सशस्त्र National Police Reserve के गठन का आदेश दिया. और, यही NPR आगे चल कर Self-Defence Forces के रूप में विकसित हुआ.

जैसा कि इस लेख के शुरू में ज़िक्र किया गया है, जापान की सुरक्षा की पूरी गारंटी अमरीका ने उठा रखी है. अमरीका-जापान सुरक्षा संधि के तहत जापान में क़रीब 40 हज़ार अमरीकी सैनिक तैनात हैं. इसी के साथ अमरीका ने जापान के ऊपर घोषित तौर पर आणविक सुरक्षा छतरी भी तान रखी है.

इसलिए एसडीएफ़ के गठन पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, ख़ास कर पूर्वी एशिया के देशों की चिंता स्वभाविक ही थी. लेकिन तब अमरीका ने जापान की वकालत करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को समझाया कि SDF के गठन से जापानी संविधान का कोई उल्लंघन नहीं होता क्योंकि इसका एकमात्र उद्देश्य रक्षात्मक है.

लेकिन उसके बाद जापनी आत्मरक्षा बल का आकार और उसकी क्षमता में लगातार बढ़ोत्तरी ही होती गई है. आज जापान दुनिया की बड़ी और संपन्न सैनिक ताक़तों की पहली पंक्ति में खड़ा है. यदि बजट की बात करें तो पिछले साल जापान सरकार ने ढाई लाख थल सैनिकों, नौसैनिकों और वायुसैनिकों वाले एसडीएफ़ पर क़रीब 50 अरब डॉलर ख़र्च किए. राष्ट्रीय सेना पर इससे ज़्यादा ख़र्च सिर्फ़ दो और देश करते हैं- अमरीका और चीन.

जापानी आत्मरक्षा बल के ज़मीनी रक्षा विभाग में कोई डेढ़ लाख सैनिक हैं. उनके पास एक हज़ार अत्याधुनिक टैंक और अन्य समुन्नत साज़ोसामान हैं. इसी तरह वायु रक्षा विभाग में 373 लड़ाकू विमान के साथ क़रीब 50 हज़ार वायु सैनिक हैं. जहाँ तक जलीय रक्षा बल की बात है तो यह विभाग तुलनात्मक रूप से सर्वाधिक समृद्ध है. जापानी की जलीय रक्षा बल में कार्यरत कोई 45 हज़ार नौसैनिकों के ज़िम्मे 16 पनडुब्बियों और 53 विध्वंसक पोत समेत कुल 151 युद्धक पोत हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ये एक बहुत ही बड़ी नौसैनिक ताक़त है.

इतनी समुन्नत सेना होने के बावजूद पाँच साल पहले तक जापानी सैनिकों के बारे में कहीं कोई चर्चा नहीं होती थी, न उनकी तस्वीरें छपती थीं. संविधान की कड़ी शर्तों से बंधे जापानी आत्मरक्षा बल की पूरी ऊर्जा जापानी द्वीपों के इर्दगिर्द ही केंद्रित रही हैं.

लेकिन 11 सितंबर 2001 में न्यूयॉर्क और वाशिंग्टन में हुए हमलों के तुरंत बाद अमरीका ने जापान की सैनिक ताक़त को लेकर थोड़ी और नरमी दिखाने का संकेत दिया. आतंकवाद के ख़तरे की आड़ में जापानी संसद ने अक्तूबर 2001 में जो क़ानून पारित किया उसमें यह व्यवस्था है कि आंतकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में जापान अमरीका का साथ दे सकेगा. हालाँकि हमले की कार्रवाइयों में जापानी बलों को लगाने की इजाज़त अब भी नहीं होगी. इसके दो साल बाद एक और क़ानून पारित किया गया जिसमें जापानी बलों को इराक़ में अनाक्रमक भूमिका में तैनात करने की छूट है. और तीसरा महत्वपूर्ण क़ानून इस साल पारित किया गया है. इसमें देश की 'रक्षा एजेंसी' का नाम बदल कर 'रक्षा मंत्रालय' करने का फ़ैसला किया गया है.

कहने को तो ये क़दम सांकेतिक हो सकते हैं, लेकिन इसमें अनिष्ट की आशंका देखने वालों की संख्या कम नहीं है. ज़ाहिर है, सबसे ज़्यादा आपत्ति चीन और उत्तर कोरिया को है. क्योंकि अमरीका से छत्तीस का आंकड़ा रखने वाले ये देश अपने इलाक़े में मौजूद उसके परम-मित्र राष्ट्र जापान के बदलते तौर-तरीकों को लेकर चिंतित हैं.

कहने को तो जापान में रक्षा बजट को देश के सकल घरेलू उत्पाद के एक प्रतिशत से ज़्यादा नहीं करने का बंधन है. लेकिन यदि जापान को खुला छोड़ दिया जाए, या फिर चीन के बढ़ते प्रभुत्व की काट के नाम पर उसे अमरीका की शह मिलने लगे तो उसके अग्रणी आक्रामक ताक़त के रूप में परिवर्तित होने में दशक भर का भी समय नहीं लगेगा. और, यदि ऐसा हुआ तो अभी मलक्का जलडरमरुमध्य इलाक़े में जलदस्यु गिरोहों के ख़िलाफ़ गश्त लगाने वाले जापानी MSDF के, साम्राज्यवादी Imperial Navy में तब्दील होते क्या देर लगेगी!

मंगलवार, अप्रैल 03, 2007

'चीन गणतंत्र' के डाक-टिकट पर 'ताइवान'

ताइवान के नाम का डाक-टिकटचीन नाम से दो देश हैं. पहला है चीन लोकतांत्रिक गणराज्य, जिसे कि आमतौर पर सिर्फ़ चीन कहा जाता है. दूसरा है चीन गणतंत्र, जिसे आमतौर पर ताइवान के नाम से जाना जाता है.

संपूर्ण चीन के प्रतिनिधि के रूप में ताइवान (चीन गणतंत्र) संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक राष्ट्रों में से एक था. सुरक्षा परिषद का सदस्य था. लेकिन 1971 में संयुक्त राष्ट्र में ताइवान की जगह चीन (चीन लोकतांत्रिक गणराज्य) को दे दी गई. इतना ही नहीं चीन ने अपनी 'एक चीन' नीति पर सख़्ती से अमल करते हुए ताइवान के स्वतंत्र अस्तित्व को अवैध करार दिया. चीन ने खुलेआम घोषणा कर दी कि जो कोई देश ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देगा, उसके साथ चीन कोई संबंध नहीं रखेगा. अब आलम ये है कि मात्र 24 देशों का ताइवान के साथ कूटनीतिक रिश्ता है. यानि, दो दर्जन देश ही ताइवान को एक अलग देश के रूप में मान्यता देते हैं. इन देशों में से कुछ इतने पिद्दी हैं कि चीन उनके ताइवान को मान्यता देने की बात पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत ही नहीं समझता. इसके बाद भी कोई संदेह नहीं कि आने वाले महीनों और वर्षों में 24 देशों की ये सूची छोटी होती जाएगी.

चीन ने संयुक्त राष्ट्र ही नहीं, बल्कि उन सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों से ताइवान को बाहर करा रखा है, जिनका थोड़ा-सा भी महत्व है. स्काउट आंदोलन के विश्व संगठन में ताइवान को चीनी प्रतिनिधि के रूप में जगह सिर्फ़ इसलिए मिली हुई है, क्योंकि ख़ुद चीन इस संगठन का सदस्य नहीं है.

ओलंपिक खेलों में ताइवान की टीम चीनी टीम से अलग जाती तो है, लेकिन उसे 'चीन गणतंत्र' या 'ताइवान' के नाम से भाग नहीं लेने दिया जाता. ओलंपिक में ताइवान की टीम 'चीनी ताइपेई' की टीम के नाम से जानी जाती है. ताइपेई ताइवान का सबसे बड़ा नगर और राजधानी है. ओलंपिक खेलों में चीनी ताइपेई के नाम से भाग लेने वाले ताइवानी खिलाड़ी अपना राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहरा सकते हैं, अपना राष्ट्रगान नहीं गा सकते हैं. इतना ही नहीं ताइवानी दर्शक भी ओलंपिक खेलों के दौरान अपने खिलाड़ियों के समर्थन में राष्ट्र ध्वज नहीं लहरा सकते.

अमरीका और जापान के ताइवान के साथ घनिष्ठ संबंध हैं, लेकिन ये दोनों देश भी चीन को नाराज़ नहीं करना चाहते, और ताइवान को परोक्ष रूप से ही मान्यता देते हैं. मसलन, ताइवान में अमरीका की मौजूदगी 'अमेरिकन इंस्टीट्यूट इन ताइवान' के नाम से है, जबकि अमरीका में ताइवान की उपस्थिति 'ताइपेई इकॉनोमिक एंड कल्चरल रिप्रेजेन्टेटिव ऑफ़िस' के मुखौटे के साथ है.

अमरीका को नाम से कोई ख़ास मतलब नहीं है. उसे तो बस इस बात से मतलब है कि चीन की नाक के नीचे ताइवान रूपी उसका चेला खड़ा है. अमरीका ताइवान पर चीन का क़ब्ज़ा बिल्कुल नहीं चाहता, लेकिन वह ये भी नहीं चाहता कि ताइवान ख़ुलेआम अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करे. मतलब अमरीका अभी तक तो यथास्थिति के पक्ष में है. लेकिन, तेज़ी से बदलती भूराजनैतिक परिस्थितियों के मद्देनज़र पता नहीं कितने वर्षों तक वह ताइवान के ख़िलाफ़ चीन के शक्ति-प्रदर्शन को टाल पाएगा.

जहाँ तक चीन सरकार की बात है तो वह ताइवान को 'चीन गणतंत्र' के बजाय 'ताइवान प्रांत' के रूप में प्रचारित करती है. चीन के सरकारी नक्शों में उसे ताइवान प्रांत के रूप में ही चित्रित किया जाता है. यानि 'प्रांत' शब्द के साथ जुड़ा हो तो चीन को 'ताइवान' शब्द से चिढ़ नहीं है. लेकिन सिर्फ़ 'ताइवान' या फिर 'ताइवान गणतंत्र' जैसे नाम चीन को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं.

इसके बावजूद पिछले कुछ महीनों से ताइवानी सरकार ताइवान शब्द का प्रयोग बढ़ाते जा रही है. कई मामलों में तो नामों में चीन शब्द की जगह ताइवान शब्द डाला गया है. सरकारी डाक-विभाग को पहले 'चाइना पोस्ट' के नाम से जाना जाता था, जो अब 'ताइवान पोस्ट' है. सरकारी पेट्रोलियम और जहाज़रानी कंपनियों के नामों में भी चीन की जगह ताइवान डाल दिया गया है. इसी तरह ताइपेई के 'चियांग काइ-शेक स्मारक' का नाम बदल कर 'ताइवान लोकतंत्र स्मारक' कर दिया गया है.

ज़ाहिर है ताइवान शब्द का प्रचलन कर मौजूदा ताइवानी सरकार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को धार दे रही है, चीन के आगे सीना फुलाने की कोशिश कर रही है. ताइवानी सरकार के इसी नए रवैये का उदाहरण है फ़रवरी में जारी डाक-टिकट जिसमें पहली बार चीन गणतंत्र की जगह ताइवान शब्द छापा गया है. ताइवानी सरकार ने विदेश में स्थित अपने अनौपचारिक कूटनीतिक केंद्रों के नामों में भी ताइवान शब्द डालने की मंशा जताई है.

चीन गणतंत्र के नाम से ताइवानी डाक-टिकटलेकिन चीन की बढ़ती ताक़त को देखते हुए लगता नहीं कि अपने नए रूप में ताइवानी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ज़्यादा ऊँची उड़ान भर पाएगा. ताइवान के नाम से डाक-टिकट जारी किए जाने को चीन के विरोध की थाह लेने की एक कोशिश के रूप में देखा जाना ही ज़्यादा उचित लगता है.

गुरुवार, मार्च 08, 2007

बचा जा सकता है इस प्राकृतिक आपदा से

एस्टेरॉयड की टक्कर, चित्र कल्पना- नासाअमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने यह कह कर चौंका दिया है कि धरती को नुक़सान पहुँचाने में सक्षम अंतरिक्षीय पिंडों का समय रहते पता लगाने की क़ाबिलियत तो उसके पास है, लेकिन इस काम के लिए ज़रूरी धन उसके पास नहीं है. नासा की यह परेशानी वाशिंग्टन में Planetary Defense Conference में प्रस्तुत एक रिपोर्ट में सामने आई है. सौर मंडल में अपनी कक्षाओं में घूमते या भटकते हुए धरती के पास आ सकने वाले ऐसे पिंडों(धूमकेतु भी शामिल) को वैज्ञानिकों ने Near-Earth Objects या 'निओ' नाम दिया है.

धरती को 20 हज़ार से ज़्यादा अंतरिक्षीय पिंडों से ख़तरा बताया जाता है. अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी का कहना है कि वर्ष 2020 तक वह इनमें से कम से कम 90 प्रतिशत का पता लगाने में सक्षम है, लेकिन इसके लिए ज़रूरी एक अरब डॉलर की राशि की व्यवस्था कर पाना उसके लिए संभव नहीं है. (मालूम रहे कि अमरीका इराक़ में इतना धन हर पखवाड़े ख़र्च कर रहा है.)

अंतरराष्ट्रीय खगोलविदों को सबसे ज़्यादा डर एपोफ़िस नामक उल्का पिंड को लेकर है. करीब 400 मीटर आकार के इस एस्टेरॉयड के 2036 में धरती के पास होने की गणना की गई है. इसके धरती से टकराने की आशंका 45,000 में एक मानी जा रही है. यदि मौजूदा अनुमानों के मुताबिक यह किसी आबादी वाले इलाक़े पर नहीं, बल्कि प्रशांत महासागर में गिरता है तो भी इससे होने वाले नुक़सान की कल्पना नहीं की जा सकती. बहुत कम विनाश हुआ तो भी प्रशांत महासागर से जुड़े कई देश तबाह हो जाएँगे, और सुनामी के चलते अमरीका के पश्चिमी तट पर मौत का तांडव होगा.

इस सप्ताह वाशिंग्टन में हुए सम्मेलन में जिन बातों पर विचार किया गया उनमें प्रमुख थे- किस आकार के निओ पिंडों को धरती के लिए वास्तविक ख़तरा माना जाए, धरती से भिड़ने को तत्पर अंतरिक्षीय पिंडों से किन उपायों से पार पाया जा सकता है और यदि ऐसी कोई टक्कर टालने से भी नहीं टल रही हो तो लोगों को ख़तरे की पूरी जानकारी दी जाए या नहीं!

धरती से टक्कर लेने को तैयार दिख रहे किसी अंतरिक्षीय पिंड से निपटने के जिन तरीक़ों की चर्चा अक्सर की जाती हैं, वे हैं- मिसाइल प्रहार से पिंड को नष्ट कर देना; उसके क़रीब परमाणु बम फोड़ कर उसकी राह बदल देना; धरती तक पहुँचने से बरसों पहले पिंड के ऊपर एक विशालकाय यान उतार कर उसे राह से भटकाने का प्रयास करना; या उस पर शक्तिशाली लेज़र बीम डाल कर उसकी कक्षा बदलने की कोशिश करना.

टक्कर मारने का विकल्प सबसे आसान, लेकिन सबसे ख़तरनाक है क्योंकि टक्कर के बाद पिंड के टुकड़े भी धरती की दिशा में बढ़ते रह सकते हैं. या टक्कर धरती से ज़्यादा दूर नहीं हुई तो अतिरिक्त ऊर्जा का प्रवाह धरती तक पहुँच कर नुक़सान कर सकते हैं. एस्टेरॉयड को दूर ठेलने का उपाय सबसे भरोसेमंद माना जाता है, बशर्ते संभावित टक्कर से कम से कम एक दशक पहले ये प्रयास शुरू कर दिया जाए.

लेकिन इन उपायों को आजमाने के लिए ज़रूरी है कि समय रहते सभी ख़तरनाक निओ पिंडों का पता लगाया जाए. वैज्ञानिकों का मानना है कि 40 मीटर आकार तक के पिंड धरती के वायुमंडल को पार करते-करते ही स्वाहा हो जाते हैं. इससे बड़े पिंड को वायुमंडल नहीं रोक पाएगा. एक किलोमीटर आकार तक के निओ पिंड टक्कर वाले इलाक़े में कहर बरपा सकते हैं. इससे भी बड़े पिंड की टक्कर का प्रत्यक्ष या परोक्ष असर पूरी धरती पर पड़ेगा. और वैज्ञानिकों की ही मानें तो एक किलोमीटर से बड़े आकार के 1100 निओ पिंडों का अस्तित्व तो ज़रूर ही होगा.

नासा के ताज़ा आंकड़ों की बात करें तो फ़रवरी महीने के अंत तक कुल 4566 निओ पिंड खोजे जा चुके थे, जिनमें से 705 का आकार एक किलोमीटर से बड़ा है. खोजे गए निओ पिंडों में से 847 को ख़तरनाक एस्टेरॉयड के रूप में चिन्हित किया गया है.

धरती को संभावित विनाश(डायनोसोर किसी एस्टेरॉयड के धरती से टकराने के कारण ही विलुप्त हुए) से बचाने के लिए पहला काम है सारे निओ पिंडों का पता लगाना. ख़ुशी की बात है कि संयुक्तराष्ट्र ने इस मामले में पहल कर दी है. इसी साल मई में स्ट्रॉसबर्ग में एक सम्मेलन में एस्टेरॉयड के धरती से टक्कर की आशंका के मुद्दे पर एक अंतरराष्ट्रीय संधि की रूपरेखा तय की जाएगी. आशा है, सम्मेलन में नासा के धनाभाव के बहाने पर भी विचार किया जाएगा.