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सोमवार, सितंबर 10, 2007

नए राष्ट्रों की नई खेप

अलग राष्ट्र के गठन की माँग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से उठती ही रहती है. कहीं संघीय सरकार की पकड़ से छूटने की हसरत होती है, तो कहीं अपने समुदाय के बेहतर विकास और सुरक्षा की बात होती है, तो कहीं बिछुड़े हिस्से से जुड़ने की लालसा. नवराष्ट्र के सृजन के लिए विभिन्न समुदाय या तो हिंसक-अहिंसक आंदोलनों को ज़रिया बनाते हैं, या फिर जनमत संग्रह जैसे क़ानूनी रास्तों को अपनाते हैं.

अंग्रेज़ी की पत्रिका Monocle ने उन दस इलाक़ों पर रोशनी डाली है, जो कि निकट भविष्य में सारे अधिकारों से सुसज्जित नए राष्ट्रों के रूप में सामने आ सकते हैं. आइए देखें नवसृजित संप्रभु राष्ट्रों की सूची में शामिल होने की संभावना लिए ये इलाक़े कौन-कौन से हैं-

1. फ़लस्तीन- पश्चिम एशिया या मध्य-पूर्व के संकट का समाधान एक संप्रभु फ़लस्तीनी राष्ट्र की स्थापना से ही संभव हो सकता है. लेकिन दो फ़लस्तीनी धड़ों फ़तह और हमास के बीच के भारी मनमुटाव को देखते हुए एक संयुक्त फ़लस्तीन की जगह दो अलग-अलग राष्ट्रों के उदय की संभावना ज़्यादा बन रही है. ये होंगे पूर्वी फ़लस्तीन यानि फ़तह के नियंत्रण वाला पश्चिम तट, और पश्चिमी फ़लस्तीन या हमास के नियंत्रण वाला गज़ा इस्लामी गणतंत्र. यदि ऐसा हुआ तो शायद इसराइल भी इन राष्ट्रों को परोक्ष रूप से मान्यता दे देगा, क्योंकि एक की जगह दो फ़लस्तीनी राष्ट्रों का वज़ूद उसकी सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर विकल्प साबित हो सकता है.

2. शिन्जियांग- पश्चिमोत्तर चीन के इस इलाक़े के लोगो ने 60 साल पहले भी पूर्वी तुर्केस्तान के नाम से अलग राष्ट्र की माँग ज़ोरशोर से रखी थी. यहाँ कि मुस्लिम उइग़ुर लोग अपनी माँग को लेकर हिंसा पर भी उतारू रहे हैं. लेकिन मौजूदा चीन सरकार आज़ादी की माँग करने वाले इन आंदोलनकारियों को आतंकवादी घोषित कर चुकी है. लेकिन जैसा कि अल्जीरिया में फ़्रांस को सबक मिला था, कि जब आतंकवाद उफ़ान पर होता है तो कितनी भी निष्ठुर सेना हो, उसकी नाक में दम किया जा सकता है.

3. दक्षिणी कैमरून- फ़्रांसीसी भाषी कैमरून के दो अंग्रेज़ीभाषी प्रांतों में एक अलग राष्ट्र की माँग को लेकर एक अहिंसक आंदोलन चल रहा है. कैमरून में तानाशाही जैसा शासन चलाने वाले पॉल बिया अहिंसक आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ दमनकारी क़दम उठाते रहे हैं. यदि दमन बढ़ा या जारी रहा, तो स्वंत्रता की माँग के ज़ोर पकड़ने की पूरी संभावना है.

4. संयुक्त कोरिया गणतंत्र- ये नवस्वतंत्र नहीं बल्कि दो स्वतंत्र राष्ट्रों के संयोग से बनने वाला नवसृजित राष्ट्र होगा. कम्युनिस्ट उत्तर कोरिया की आर्थिक परेशानियों ने उसे परमाणु कार्यक्रम छोड़ने के अमरीकी प्रस्ताव को स्वीकार करने पर मज़बूर किया है. यदि आर्थिक मुश्किलें आगे भी जारी रहती हैं, और वह शरारत के बजाय सहयोग पर राज़ी हो जाता है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि उसका पड़ोसी दक्षिण कोरिया उसे उसी तरह आत्मसात करने पर गंभीरता से विचार करेगा- जैसा कि पश्च्मी जर्मनी ने 1990 में पूर्वी जर्मनी को आत्मसात किया था.

5. कुर्दिस्तान- इराक़ पर अमरीकी हमले का एकमात्र अच्छा परिणाम है वहाँ के कुर्द लोगों की ख़ुशहाली. इराक़ी कुर्द इलाक़ा आमतौर पर हिंसारहित है, वहाँ के राजनीतिक आपसी रंजिशों को ताक पर रख चुके हैं, उनका अपना एयरलाइंस अंतरराष्ट्रीय उड़ाने भर रहा है. कुर्दों को तुर्की सेना की धमकियाँ मिलती रहती हैं, लेकिन यूरोपीय संघ में शामिल होने की आकांक्षा रहते तुर्की कोई परेशानी खड़ा करने से बचेगा. वैसे भी कुर्द पहले इराक़ी इलाक़े में राष्ट्र की नींव डालना चाहेंगे, और संयुक्त कुर्दिस्तान की माँग को आगे के लिए टाल देंगे. ईरान भी अपने परमाणु कार्यक्रम संबंधी अंतरराष्ट्रीय दबाव से जूझने पर ध्यान केंद्रित किए हुए है. अमरीकी हमेशा के लिए इराक़ में रहेगा नहीं, तो ऐसे में एक आज़ाद कुर्दिस्तान की संभावना भरी पूरी लगती है.

6. सोमालीलैंड- सोमालीलैंड सोमालिया को वह हिस्सा है जो कभी ब्रिटिश प्रभुत्व में हुआ करता था. यों तो सोमालीलैंड ने 1991 में आज़ादी का ऐलान कर दिया था, लेकिन उसे अभी भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता का इंतज़ार है. लेकिन हाल के दिनों में सोमालीलैंड ने अपनी अलग सरकार, अलग सेना और अलग न्यायपालिका का गठन कर लिया है. अपनी करेंसी और अलग पासपोर्ट भी जारी किया है. ऐसे में लगता है कि कुछ अफ़्रीकी सरकारें उसे मान्यता देने पर ज़रूर ग़ौर कर रही होंगी.

7. कोसोवा- कोसोवो या कोसोवा पिछले आठ वर्षों से संयुक्तराष्ट्र के संरक्षण में है. यूगोस्लाव नेता स्लोबोदान मिलोसेविच की सेनाओं ने कोसोवो की अल्बानियाई मूल की जनता पर भारी अत्याचार किया था. संयुक्तराष्ट्र ने कोसोवो को एक अलग संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने का एक प्रस्ताव सुरक्षा परिषद के समक्ष रखा है. ज़ाहिर है सर्बिया और रूस को इस प्रस्ताव पर आपत्ति है, और रूस को तो सुरक्षा परिषद में वीटो का भी अधिकार है. ऐसे में आज़ादी की राह में अड़चनें आ सकती हैं. लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय में कोसोवो की आज़ादी को लेकर आमतौर पर सहमति हो तो लगता नहीं कि कोसोवो राष्ट्र की स्थापना को रोका जा सकेगा. और इसका नाम कोसोवा होगा, कोसोवो नहीं. क्योंकि पहला अल्बानियाई उच्चारण है, जबकि दूसरा सर्ब उच्चारण.

8. ताइवान- वैसे तो ताइवान का एक अलग राष्ट्र के रूप में अस्तित्व है, लेकिन आधिकारिक रूप से उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मान्यता नहीं मिली है. क्योंकि चीन उसे अपना अभिन्न हिस्सा मानता है. लेकिन ताइवान के राष्ट्रवादी नेता आज़ादी की खुली घोषणा करने को तैयार बैठे हैं. ऐसा हुआ तो सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या चीन ताइवान के ख़िलाफ़ सैनिक कार्रवाई करने के विकल्प को चुनता है, और चुनता ही है तो क्या अमरीकी ताइवान के समर्थन में आगे आता है.

9. शियास्तान- सिद्धान्तत: इसका कोई कारण नहीं दिखता कि क्यों इराक़ का दक्षिणी शहर बसरा भी दुबई की तरह संपन्न नहीं हो सकता. ब्रिटेन को शिया बहुल दक्षिणी इराक़ में टिके रहने में ज़्यादा लाभ नहीं दिख रहा, जबकि अमरीका को भी इस कबाइली इलाक़े के आंतरिक खींचतान का सिरदर्द ईरान को देने में ज़्यादा ऐतराज़ नहीं होगा.

10. स्कॉटलैंड- स्वतंत्र स्कॉटलैंड की हामी स्कॉटिश नेशनल पार्टी स्कॉटलैंड की क्षेत्रीय संसद में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई है. पार्टी आज़ादी के मुद्दे पर जनमत संग्रह की बात औपचारिक रूप से उठा भी चुकी है. यदि जनमत संग्रह होता है, और उसमें आज़ादी के पक्ष में फ़ैसला आता है, तो स्वतंत्र स्कॉटलैंड की स्थापना को ज़्यादा दिन तक टाल पाना संभव नहीं होगा. यहाँ उल्लेखनीय है कि इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की क्रिकेट और फ़ुटबॉल की टीमें अलग-अलग हैं. इतना ही नहीं, ब्रिटेन में दो तरह की पाउंड करेंसी भी चलती है, जिनमें से एक है- स्कॉटिश पाउंड. हालाँकि बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के पाउंड और रॉयल बैंक ऑफ़ स्कॉटलैंड के पाउंड के लेनदेन या प्रचलन में कोई अंतर नहीं है.

शनिवार, अगस्त 11, 2007

मानवता के लिए मधुमक्खियों को बचाओ!

यूरोपीय मधुमक्खीऐसे अवसर कम ही होते हैं जब एक ही तरह की ख़बर दुनिया के हर कोने से आ रही हो. पिछले सप्ताह ऐसा ही हुआ, जब एक बुरी ख़बर पहले अमरीका से आई, उसके बाद अमरीकी महाद्वीप के कनाडा और ब्राज़ील जैसे देशों से, फिर ब्रिटेन से, उसके बाद ऑस्ट्रेलिया से और अंत में वही ख़बर भारत से भी मिली. ये समाचार था मधुमक्खियों की आबादी में तेज़ी से आ रही गिरावट का.

अमरीका से ख़बर आई कि एक रहस्मय बीमारी ने मधुमक्खियों को अपना निशाना बनाया है जिसके कारण मधुमक्खियों के छत्ते या मधुमक्खी पालन करने वालों के छत्ताबक्से अचानक बिना किसी पूर्व चेतावनी के उजाड़ हो रहे हैं. मधुमक्खियाँ अपने अंडे-बच्चे और शहद को छोड़ कर ग़ायब हो रही हैं. विशेषज्ञों ने इस अभूतपूर्व घटना को Colony Collapse Disorder या CCD का नाम दिया है.

माना जाता है कि सीसीडी अमरीका के मधुमक्खी छत्तों या छत्तापेटिकाओं में से एक चौथाई का सत्यानाश कर चुकी है. देखते ही देखते इस बीमारी ने अमरीकी महाद्वीप के ब्राज़ील और कनाडा जैसे देशों में भी अपने पैर पसार दिए हैं.

ब्रिटेन समेत यूरोप के कई देशों में भी मधुमक्खियों की आबादी में भारी गिरावट की बात मानी जा रही है. भारत में मधुमक्खियों पर ख़तरे की ख़बर जम्मू-कश्मीर से आई है, और स्थानीय विशेषज्ञों ने इसके लिए T. Clarea और Vorroa नामक दो परजीवियों को दोषी ठहराया है. और ऑस्ट्रेलिया में तो केंद्र सरकार ने मधुमक्खियों पर आए ख़तरे पर विचार के लिए एक संसदीय समिति का गठन कर दिया है. माना जाता है कि ऑस्ट्रेलिया की मधुमक्खियों का संकट Verroa जैसे परजीवी कीटों के हमले के अलावा जंगलों में लगने वाली आग के चलते भी है.

उपरोक्त कारणों के अलावा भी कई कारण दिए जा रहे हैं मधुमक्खियों की संख्या घटते जाने के पीछे, जैसे- जीन संवर्द्धित फसल, ग्लोबल वॉर्मिंग, प्रदूषण, हानिकारक विकिरण आदि-आदि.

अब कारण चाहे जो भी हो, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मधुमक्खियों की आबादी घटते जाने की ख़बर आतंकवाद के ख़ूनी प्रसार की ख़बर से भी ज़्यादा चिंतनीय है. परागण की प्रक्रिया से जुड़े कृषि उत्पादों में से 80 प्रतिशत मधुमक्खियों पर आश्रित होते हैं. इसका सीधा-सरल मतलब ये हुआ कि मानव उपभोग के खाद्य पदार्थों में से एक तिहाई का अस्तित्व मधुमक्खियों से सीधा जुड़ा हुआ है.

इसलिए इस कथन में दम लगता है(जिसे कई स्रोत आइंस्टाइन की उक्ति बताते हैं)- "यदि पृथ्वी से मधुमक्खियों का अस्तित्व समाप्त हो जाए तो मानव जाति चार वर्षों तक ही बच पाएगी. यदि मधुमक्खियाँ नहीं होंगी, तो परागण नहीं होगा, ...तो पौधे नहीं होंगे, ...तो जानवर नहीं होंगे, ...तो जीवन नहीं होगा!"

कहते हैं जब तॉल्सतॉय ने सब कुछ छोड़ दिया- माँस, तंबाकू और यहाँ तक कि धर्म भी- उसके बाद भी अपनी मधुमक्खियों से उनका लगाव नहीं छूटा था. मधुमक्खियों को शुरू से ही मानव जाति का मित्र माना जाता रहा है. मनुष्यों की तरह ही मधुमक्खियाँ भी सामाजिक प्राणीयों के वर्ग में आती हैं. वो भी आमजनों की तरह मेहनतकश होती हैं. इसलिए मधुमक्खियों की आबादी घटते जाने पर चिंता सिर्फ़ सरकारों और मधुमक्खी पालकों को ही नहीं, बल्कि हम सबको होनी चाहिए.

गुरुवार, अप्रैल 26, 2007

'जापानी नौसेना' के बदलते अंदाज़

जापानी नौसैनिक
द्वितीय विश्व युद्ध में पराजित होने के बाद अमरीका के निर्देश पर जापान का जो संविधान रचा गया था उसमें सशस्त्र सेना की कोई जगह नहीं है. सशस्त्र सेनाओं की जगह जापान का आत्मरक्षा बल या सेल्फ़ डिफ़ेंस फ़ोर्स (SDF) है. इसकी सशस्त्र सेनाओं की तरह ही थल, जल और वायु की तीन शाखाएँ हैं. यानि आधिकारिक रूप से जापान की कोई नौसेना भी नहीं है, और उसके समुद्री बल का नाम है- MSDF या Maritime Self-Defence Force.

दरअसल 1947 में जापान का जो संविधान रचा गया, या अमरीका ने उसके लिए जो संविधान तैयार किया, उस पर द्वितीय विश्व युद्ध के उन दिनों के छाया स्पष्ट दिखती है जब जापानी सैनिक चीन समेत पूर्वी एशिया और प्रशांतीय क्षेत्र के देशों को रौंद रहे थे. उसके ख़ौफ़ से ब्रितानी साम्राज्यवादी भी थरथरा रहे थे. इसलिए अंतत: एटम बम की मार के साथ हुई जापान की पराजय के बाद विजयी ताक़तों की सलाह पर अमरीका ने उसके संविधान में 'अनुच्छेद 9' नामक ऐसा पेंच डाल दिया कि वह कभी दोबारा हमला नहीं कर सके. बदले में अमरीका ने उसकी सुरक्षा की पूरी ज़िम्मेवारी अपने कंधों पर लेने का काम भी किया.

जापानी संविधान के नौवें अनुच्छेद में दोटूक शब्दों में लिखा गया है कि 'जापानी जनता हमेशा के लिए राष्ट्र के युद्ध करने के संप्रभु अधिकार, और अंतरराष्ट्रीय विवादों को ताक़त के ज़ोर पर हल करने की धमकी का त्याग करती है...जापान जल, थल और वायु सेना के साथ-साथ युद्ध का कारक बनने वाले किसी भी बल को धारण नहीं करेगा.'

जापानी संविधान के इस नौवें अनुच्छेद को 'शांति अनुच्छेद' के नाम से जाना जाता है. और, विश्ववास नहीं होता कि संविधान लागू होने के कई साल बाद तक जापान का कोई अपना सशस्त्र बल नहीं था. लेकिन 1950 के दशक के शुरू में अमरीका को लगने लगा कि निहत्था जापान कोई अच्छी बात नहीं है. दरअसल तब शीतयुद्ध शुरू हो चुका था, और सोवियत साम्यवाद दुनिया भर में पसरने लगा था. ऐसे ही माहौल में जापान में अमरीकी प्रशासन के कमांडर जनरल डगलस मैकआर्थर ने वहाँ एक सशस्त्र National Police Reserve के गठन का आदेश दिया. और, यही NPR आगे चल कर Self-Defence Forces के रूप में विकसित हुआ.

जैसा कि इस लेख के शुरू में ज़िक्र किया गया है, जापान की सुरक्षा की पूरी गारंटी अमरीका ने उठा रखी है. अमरीका-जापान सुरक्षा संधि के तहत जापान में क़रीब 40 हज़ार अमरीकी सैनिक तैनात हैं. इसी के साथ अमरीका ने जापान के ऊपर घोषित तौर पर आणविक सुरक्षा छतरी भी तान रखी है.

इसलिए एसडीएफ़ के गठन पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, ख़ास कर पूर्वी एशिया के देशों की चिंता स्वभाविक ही थी. लेकिन तब अमरीका ने जापान की वकालत करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को समझाया कि SDF के गठन से जापानी संविधान का कोई उल्लंघन नहीं होता क्योंकि इसका एकमात्र उद्देश्य रक्षात्मक है.

लेकिन उसके बाद जापनी आत्मरक्षा बल का आकार और उसकी क्षमता में लगातार बढ़ोत्तरी ही होती गई है. आज जापान दुनिया की बड़ी और संपन्न सैनिक ताक़तों की पहली पंक्ति में खड़ा है. यदि बजट की बात करें तो पिछले साल जापान सरकार ने ढाई लाख थल सैनिकों, नौसैनिकों और वायुसैनिकों वाले एसडीएफ़ पर क़रीब 50 अरब डॉलर ख़र्च किए. राष्ट्रीय सेना पर इससे ज़्यादा ख़र्च सिर्फ़ दो और देश करते हैं- अमरीका और चीन.

जापानी आत्मरक्षा बल के ज़मीनी रक्षा विभाग में कोई डेढ़ लाख सैनिक हैं. उनके पास एक हज़ार अत्याधुनिक टैंक और अन्य समुन्नत साज़ोसामान हैं. इसी तरह वायु रक्षा विभाग में 373 लड़ाकू विमान के साथ क़रीब 50 हज़ार वायु सैनिक हैं. जहाँ तक जलीय रक्षा बल की बात है तो यह विभाग तुलनात्मक रूप से सर्वाधिक समृद्ध है. जापानी की जलीय रक्षा बल में कार्यरत कोई 45 हज़ार नौसैनिकों के ज़िम्मे 16 पनडुब्बियों और 53 विध्वंसक पोत समेत कुल 151 युद्धक पोत हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ये एक बहुत ही बड़ी नौसैनिक ताक़त है.

इतनी समुन्नत सेना होने के बावजूद पाँच साल पहले तक जापानी सैनिकों के बारे में कहीं कोई चर्चा नहीं होती थी, न उनकी तस्वीरें छपती थीं. संविधान की कड़ी शर्तों से बंधे जापानी आत्मरक्षा बल की पूरी ऊर्जा जापानी द्वीपों के इर्दगिर्द ही केंद्रित रही हैं.

लेकिन 11 सितंबर 2001 में न्यूयॉर्क और वाशिंग्टन में हुए हमलों के तुरंत बाद अमरीका ने जापान की सैनिक ताक़त को लेकर थोड़ी और नरमी दिखाने का संकेत दिया. आतंकवाद के ख़तरे की आड़ में जापानी संसद ने अक्तूबर 2001 में जो क़ानून पारित किया उसमें यह व्यवस्था है कि आंतकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में जापान अमरीका का साथ दे सकेगा. हालाँकि हमले की कार्रवाइयों में जापानी बलों को लगाने की इजाज़त अब भी नहीं होगी. इसके दो साल बाद एक और क़ानून पारित किया गया जिसमें जापानी बलों को इराक़ में अनाक्रमक भूमिका में तैनात करने की छूट है. और तीसरा महत्वपूर्ण क़ानून इस साल पारित किया गया है. इसमें देश की 'रक्षा एजेंसी' का नाम बदल कर 'रक्षा मंत्रालय' करने का फ़ैसला किया गया है.

कहने को तो ये क़दम सांकेतिक हो सकते हैं, लेकिन इसमें अनिष्ट की आशंका देखने वालों की संख्या कम नहीं है. ज़ाहिर है, सबसे ज़्यादा आपत्ति चीन और उत्तर कोरिया को है. क्योंकि अमरीका से छत्तीस का आंकड़ा रखने वाले ये देश अपने इलाक़े में मौजूद उसके परम-मित्र राष्ट्र जापान के बदलते तौर-तरीकों को लेकर चिंतित हैं.

कहने को तो जापान में रक्षा बजट को देश के सकल घरेलू उत्पाद के एक प्रतिशत से ज़्यादा नहीं करने का बंधन है. लेकिन यदि जापान को खुला छोड़ दिया जाए, या फिर चीन के बढ़ते प्रभुत्व की काट के नाम पर उसे अमरीका की शह मिलने लगे तो उसके अग्रणी आक्रामक ताक़त के रूप में परिवर्तित होने में दशक भर का भी समय नहीं लगेगा. और, यदि ऐसा हुआ तो अभी मलक्का जलडरमरुमध्य इलाक़े में जलदस्यु गिरोहों के ख़िलाफ़ गश्त लगाने वाले जापानी MSDF के, साम्राज्यवादी Imperial Navy में तब्दील होते क्या देर लगेगी!

रविवार, जुलाई 02, 2006

दुनिया को बदलता भारत

दुनिया भर की शायद ही कोई प्रतिष्ठित पत्रिका बची हो जिसने पिछले कुछ महीनों में भारत से आ रही अच्छी ख़बरों पर केंद्रित विशेषांक न निकाला हो. सारे प्रतिष्ठित अख़बार भी इस मुद्दे पर हर दूसरे-तीसरे महीने विशेष परिशिष्ट निकालते रहते हैं. प्रतिष्ठित अमरीकी साप्ताहिक 'टाइम' के तीन जुलाई के अंक में तेज़ी से बदल रहे भारत पर नज़र डाली गई है.

'टाइम' के भारत केंद्रित इस अंक की एक छोटी-सी प्रस्तुति मुझे बहुत दिलचस्प लगी. इसका शीर्षक है- 10 WAYS, INDIA IS CHANGING THE WORLD. इसमें भारत के बारे में ज़्यादातर अच्छे तथ्य ही हैं.

'टाइम' द्वारा जुटाए आँकड़ों के स्रोत भी कुल मिला कर अत्यंत विश्वसनीय कहे जा सकते हैं. ये हैं: संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, भारत सरकार, ब्रिटेन का राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, फ़ोर्ब्स, मैकेन्ज़ी एंड कंपनी और प्राइसवाटरहाउसकूपर्स.


दुनिया को 10 तरह से बदलता भारत

1. अर्थव्यवस्था: भारत का सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) 2005 में 800 अरब डॉलर से ज़्यादा रहा. भारत की अर्थव्यवस्था पिछले तीन वर्षों से सालाना 8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. मतलब भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया भर में दूसरी सबसे तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था है.

2. इंटरनेट: भारत के इंटरनेट प्रौद्योगिकी उद्योग(अन्य आउटसोर्सिंग सेवाएँ शामिल) ने वर्ष 2005 में 36 अरब डॉलर का व्यवसाय किया. साल भर पहले के मुक़ाबले यह 28 प्रतिशत ज़्यादा है.

3. धनकुबेर: शेयर बाज़ार में तेज़ी के कारण भारत में अरबपतियों की संख्या बढ़ कर 23 हो गई है. इनमें से 10 व्यक्ति इस साल भारतीय अरबपति क्लब में शामिल हुए. (चीन में अरबपतियों की संख्या मात्र आठ है.) भारत के अरबपतियों के पास हैं कुल 99 अरब डॉलर. साल भर पहले की तुलना में यह 60 प्रतिशत ज़्यादा है.

4. उपभोक्ता: वर्ष 1996 के बाद से भारत में विमान यात्रियों की संख्या में छह गुना बढ़ोत्तरी हुई है. मतलब हर साल भारत में क़रीब पाँच करोड़ यात्री हवाई मार्ग का उपयोग करते हैं. इन दस वर्षों में भारत में मोटरसाइकिल और कारों की बिक्री दोगुनी हो चुकी है.

5. मनोरंजन उद्योग: भारत का फ़िल्म उद्योग डेढ़ अरब डॉलर का है. निर्मित फ़िल्मों की संख्या और टिकट बिक्री, दोनों ही लिहाज़ से भारतीय फ़िल्म उद्योग दुनिया में पहले नंबर पर है. भारत में सालाना हॉलीवुड के मुक़ाबले पाँच गुना ज़्यादा यानि क़रीब 1,000 फ़िल्में बनती हैं.

6. अंतरराष्ट्रीय पर्यटन: पिछले दो वर्षों में भारतीय पर्यटन उद्योग में 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. पिछले साल ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी के 9,93,000 पर्यटक भारत पहुँचे. यानि भारत पहुँचे कुल विदेशी पर्यटकों में से 24 प्रतिशत इन तीन देशों से थे.

7. प्रतिभा निर्यात: भारतीय मूल के क़रीब 20 लाख व्यक्ति अमरीका में और क़रीब 10 लाख ब्रिटेन में रहते हैं. अमरीका में भारतीय प्रवासियों की औसत घरेलू आय वहाँ किसी भी जातीय समूह में सबसे ज़्यादा है.

8. जनापूर्ति: भारत में एक अरब से ज़्यादा लोग रहते हैं. दूसरे शब्दों में दुनिया का हर छठा व्यक्ति भारत में रहता है. अनुमान हैं कि दस वर्षों के भीतर भारत दुनिया का सबसे ज़्यादा आबादी वाला राष्ट्र होगा.

9. संकट केंद्र: एड्स से जुड़े वायरस एचआईवी से संक्रमित सबसे ज़्यादा लोग भारत में हैं. विभिन्न अनुमानों के अनुसार कोई 57 लाख.

10. चीन को चुनौती: भारत सकल घरेलू उत्पाद और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामलों में चीन से पीछे है. लेकिन भारतीय समाज ज़्यादा मुक्त है और अर्थव्यवस्था सरपट आगे भाग रही है- ऐसे में लंबी अवधि में वह चीन से आगे जा सकता है.

बुधवार, जून 28, 2006

भारत, अमरीका और अपराध

सप्ताह भर से हिंदी ब्लॉग जगत में भारत और अमरीका को लेकर तीखी बहस जारी है. रीडर्स डाइजेस्ट के सर्वे के बहाने शुरू बहस ने दुर्भाग्य से देसी बनाम अमरीकावासी ब्लॉगरों के बीच नोंकझोंक का रूप ले लिया.

बहस में शामिल देसी ब्लॉगरों ने दीनहीन भाव से इतना मात्र कहना चाहा कि भारत समस्याओं से भरा है, लेकिन अमरीकी समाज में भी विसंगतियाँ होंगी. बदले में अमरीकावासी ब्लॉगरों में से कुछ ने भारत की छवि भिखमंगों, असभ्यों, बलात्कारियों के समाज के रूप में अंकित करनी चाही(भले ही अनचाहे ऐसा हुआ हो). इतना ही नहीं अमरीका को भारत के मुक़ाबले झंझटमुक्त और स्वर्गिक समाज घोषित करने की भी चेष्टा हुई(तथ्यों से ज़्यादा भावनात्मक दलीलों के सहारे).

मेरी टिप्पणियों को या तो दरकिनार किया गया या फिर उसे एक सिरे से खारिज करने का प्रयास हुआ. बहस के दौरान एक पोस्ट से टीपे सूत्रों पर कुछ घंटे लगा कर मैंने दो महान देशों(अमरीका के साथ ही भारत को भी महान कह रहा हूँ, जिनकी भावनाओं को चोट पहुँचे कृपया माफ़ करेंगे) में अपराध की स्थिति की तुलना की है.

अच्छी बात तो यह रही कि हिंदी ब्लॉग जगत में इस बहस के दौरान ही सर्वशक्तिमान एफ़बीआई ने अमरीका में अपराध के ताज़ा आँकड़े जारी कर दिए हैं. इसमें अमरीका में अपराध की शहरवार स्थिति देखी जा सकती हैं. आँकड़े आरंभिक हैं, यानि मुकम्मल तस्वीर सितंबर-अक्तूबर तक उभरेगी, लेकिन एफ़बीआई ने साफ़ कर दिया है कि दुनिया में अपराध के सबसे बड़े केंद्रों में से एक अमरीका में क़ानून-व्यवस्था की चुनौती दिनोंदिन गंभीर बनती जा रही है. एफ़बीआई ने नस्ली अपराधों की सूची अलग से देना ज़रूरी समझा है.

आँकड़ों में जाने से पहले दो दिलचस्प तथ्यों पर ग़ौर करें: अमरीका में रूस से आठ गुना ज़्यादा आपराधिक घटनाएँ होती हैं, लेकिन रूस के मुक़ाबले वहाँ जजों और मजिस्ट्रेटों की संख्या लगभग आधी है; अमरीका में प्रति हज़ार व्यक्ति में से सात जेल में बंद हैं.

भारत और अमरीका में अपराध का तुलनात्मक अध्ययन:

कुल अपराध- भारत 1.633 अमरीका 80.064 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

हत्या- भारत 0.034 अमरीका 0.042 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

बलात्कार- भारत 0.014 अमरीका 0.301 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

डाका- भारत 0.026 अमरीका 1.385 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

धोखाधड़ी- भारत 0.038 अमरीका 1.257 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

गबन- भारत 0.014 अमरीका 0.058 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

सेंधमारी- भारत 0.103 अमरीका 7.099 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

मारपीट- भारत 0.218 अमरीका 7.569 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

क़ैदी- भारत 29 अमरीका 715 (प्रति 100,000 व्यक्ति)


आँकड़ों के स्रोत:
1. Seventh United Nations Survey of Crime Trends and Operations of Criminal Justice Systems, covering the period 1998 - 2000 (United Nations Office on Drugs and Crime, Centre for International Crime Prevention)
2. CIA World Factbook

शनिवार, मई 27, 2006

कैसी-कैसी नौसेनाएँ!

दक्षिणी पूर्वी यूरोप में बाल्कन के लोगों ने पिछले दिनों राष्ट्र के बँटवारे यानि बाल्कनाइज़ेशन का एक और फ़ैसला किया. इस बार मॉन्टिनीग्रो की जनता ने जनमत संग्रह में सर्बिया से अलग अपना देश बनाने के बारे में जनादेश दिया है. भारी मन से ही सही, सर्बिया ने जनादेश का आदर करने का फ़ैसला किया है. इसी के साथ यूरोप के शक्तिशाली देशों में से एक यूगोस्लाविया की अंतिम निशानी भी ख़त्म हो रही है, क्योंकि अकेले सर्बिया में यूगोस्लाविया का उत्तराधिकारी कहलाने की कोई विशेषता नहीं रह जाएगी.

मॉन्टिनीग्रो के अलग होने के फ़ैसले से सर्बिया की जनता में भारी निराशा है क्योंकि इस बार मुसलमानों या किसी अन्य जातीयता के लोगों ने उससे अलग होने का फ़ैसला नहीं किया है. दरअसल मॉन्टिनीग्रो में भी सर्ब मूल के लोगों की बहुलता है, इसलिए सर्बिया के लोगों को इस विभाजन को स्वीकार करने में बहुत पीड़ा का अनुभव हुआ होगा. लेकिन सर्बियाई नौसेना की पीड़ा कुछ ज़्यादा ही है. इसे समझने के लिए साथ लगे मानचित्र पर एक नज़र डालना ही काफ़ी होगा. बात ये है कि दो स्वायत्त प्रांतों सर्बिया और मॉन्टिनीग्रो के संघ सर्बिया-मॉन्टिनीग्रो राष्ट्र का समुद्र से वास्ता मॉन्टिनीग्रो के तटों के ज़रिए ही था और अब मॉन्टिनीग्रो के अलग होने के बाद सर्बियाई नौसेना के अस्तित्व का कोई कारण ही नहीं बचता है.

इस समय सर्बियाई नौसेना के पास पनडुब्बियों समेत 30 युद्धपोत हैं. समुद्र तक पहुँच या किसी नौसैनिक अड्डे के अभाव में उनका क्या होगा, कहा नहीं जा सकता. सर्बियाई नौसैनिकों के पास दो विकल्प ज़रूर हैं- या तो वे डैन्यूब नदी में कुछ गश्ती नौकाएँ डाल कर ख़ुद को व्यस्त रखें या फिर अलग राष्ट्र के रूप में जन्म ले रहे मॉन्टिनीग्रो में काम करने को तैयार हो जाएँ. मॉन्टिनीग्रो सरकार के एक सलाहकार ने पत्रकारों से बातचीत में सर्बियाई नौसैनिकों को अपने यहाँ आमंत्रित भी किया है, हालाँकि वहाँ भी नौसैनिकों का काम सीमित ही होगा क्योंकि अलग मॉन्टिनीग्रो राष्ट्र नौसेना के बजाय मात्र तटरक्षक बल से ही काम चलाने की सोच रहा है. मॉन्टिनीग्रो की सरकार बंद किए जाने वाले सर्बियाई नौसैनिक अड्डों को पर्यटक केंद्रों के रूप में विकसित करने पर विचार कर रही है.

सर्बिया की सरकार प्रथम विश्व युद्ध में पराजय के साथ अपनी समुद्री सीमा से हाथ धोने वाले ऑस्ट्रिया का उदाहरण अपनाती है या फिर चिली से हार कर समुद्री सीमाएँ खो देने वाले बोलीविया का ये देखने वाली बात होगी. ऑस्ट्रिया ने जहाँ अपनी नौसेना भंग कर दी थी, वहीं बोलीविया ने 1884 में प्रशांत महासागर तट पर स्थित एरिका बंदरगाह चिली के हाथों गँवाने के बाद आज तक अपनी नौसेना भंग नहीं की है. बोलीविया ने टिटिकाका झील में अपनी नौसेना तैनात कर रखी है. उसके पास 4,000 से भी ज़्यादा नौसैनिक हैं. इतना ही नहीं बोलीविया के पास एक युद्धक पोत भी है. स्वतंत्रता सेनानी साइमन बोलिवर के नाम वाले इस युद्धपोत को अर्जेंटीना के रोज़ैरियो बंदरगाह पर तैनात रखा गया है.

समुद्र को लेकर बोलीविया में काफ़ी उन्माद रहा है. अभी भी हर साल 23 मार्च को समुद्र दिवस मनाया जाता है और समुद्र का एक हिस्सा वापस लेने की कसमें खायी जाती हैं. माना जाता है कि चिली से हार का पुराना ज़ख़्म पाले बोलीविया ने 1932 में पारागुए पर यह सोच कर हमला किया, कि हथियाए गए इलाक़े से नदियों के ज़रिए (अर्जेंटीना होते हुए) अटलांटिक महासागर तक पहुँच बनाई जा सके. हालाँकि बोलीविया को पारागुए से भी हार का ही मुँह देखना पड़ा. उल्लेखनीय है कि पारागुए भी एक भूबद्ध राष्ट्र है, लेकिन उसने भी एक नौसेना बना रखी है. (संभवत: बोलीवियाई नौसेना के मुक़ाबले के लिए!)

जब लैटिन अमरीका में पागलपन की हद तक नौसेना की चाहत हो, तो फिर अफ़्रीका के देश क्यों पीछे रहें. जब कुख़्यात ईदी अमीन युगांडा का शासक था तो उसने विक्टोरिया झील में अपनी नौसेना बना रखी थी. हालाँकि सच कहा जाए तो ईदी अमीन की कथित नौसेना में तीन गश्ती नौकाएँ भर ही थीं. मलावी ने तो न्यासा झील में आज भी अपनी नौसेना तैनात कर रखी है जिसके पास मात्र दो गश्ती नौकाएँ हैं. स्वाज़िलैंड के पास हाल तक एक नौसेना थी लेकिन उसके एकमात्र पोत स्वाज़िमार के लापता हो जाने के बाद उसकी नौसेना का अस्तित्व नही रह गया है.

स्विटज़रलैंड के पास झीलों में निगरानी व्यवस्था के लिए 18 गश्ती नौकाएँ हैं लेकिन उसे नौसेना के बज़ाय पुलिस व्यवस्था का ही अंग बताया जाता है.

इसी तरह फ़लस्तीनियों के पास भी एक नौसेना है, लेकिन इसराइल ने उसे समुद्र में नौसैनिकों की तैनाती का कोई मौक़ा ही नहीं दे रखा है. जो भी हो फ़लस्तीनियों की बात अलग है क्योंकि उन बेचारों के पास तो अपना राष्ट्र तक नहीं है, लेकिन राष्ट्रपति है.

शनिवार, अप्रैल 29, 2006

विदेश में भारत का पहला सैनिक अड्डा

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बढ़ती हैसियत के सबूत नियमित रूप से मीडिया में होते हैं. विश्व के बड़े राजनेताओं का एक ही साँस में चीन और भारत दोनों का नाम लेना साफ ज़ाहिर करता है कि तमाम कमियों के बावज़ूद भारत अंतत: एक बड़े राष्ट्र के रूप में तेज़ी से उभर रहा है. भारत के उदय से जुड़ी एक महत्वपूर्ण ख़बर को किन्हीं कारणों से मीडिया में उतना स्थान नहीं मिला, जितना कि मिलना चाहिए था.

लंदन के अख़बार 'गार्डियन' ने इस महत्वपूर्ण ख़बर को दो कॉलम में छापा. ख़बर के शीर्षक से ही लग जाता है इसके महत्व का अंदाज़ा- 'India flexes its muscles with first foreign military base'. ख़बर में बताया गया है कि भारत इस साल विदेशी ज़मीन पर अपना पहला सैनिक अड्डा मध्य एशिया के देश ताजिकिस्तान में स्थापित कर रहा है.

जानी-मानी रक्षा पत्रिका 'जेम्स डिफ़ेंस वीकली' के हवाले से दी गई इस ख़बर के अनुसार ताजिकिस्तान की राजधानी दुशाम्बे से 60 मील दूर फ़ारखोर हवाई ठिकाने पर भारत जल्दी ही अपनी वायु सेना के मिग-29 विमानों के दो स्क़्वाड्रन तैनात करेगा. भारत के इस क़दम को विश्व मंच पर भारत की बढ़ती ताक़त के रूप में देखा जा रहा है.

फ़ारखोर हवाई ठिकाने से भारत का रिश्ता पुराना है. भारतीय सेना ने 1997 से 2001 तक यहाँ अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान लड़ाकों से टक्कर ले रहे उत्तरी गठजोड़ के विद्रोहियों के लिए सैनिक अस्पताल का संचालन किया था. दरअसल फ़ारखोर है भी अफ़ग़ानिस्तान सीमा के क़रीब ही.(कुछ अन्य रिपोर्टों में फ़ारखोर के बजाय ताजिकिस्तान में भारत के भावी सैनिक अड्डे की जगह अयनी को बताया गया है जोकि दुशाम्बे से मात्र 20 किलोमीटर दूर है.)

रिपोर्टों के अनुसार भारत फ़ारखोर में 40 वायु सैनिकों समेत एक दर्जन मिग-29 विमान तैनात करेगा. भारतीय वायु सेना की इकाई फ़ारखोर हवाई ठिकाने पर दो विमान हैंगरों का इस्तेमाल करेगी. वहाँ मौजूद तीसरा हैंगर ताजिक वायुसेना के इस्तेमाल के लिए होगा. दरअसल फ़ारखो में ताजिक वायुसेना को भारत की ओर प्रशिक्षण देने की योजना भी बनाई गई है.

'गार्डियन' के अनुसार ताजिक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इगोर सत्तोरोफ़ ने ताजिकिस्तान में भारतीय सैनिक अड्डे की योजना की ख़बर की पुष्टि या खंडन करने से इनकार कर दिया. लेकिन कई स्रोतों से आ रही मिलती-जुलती रिपोर्टों को देखते हुए ख़बर पर भरोसा करना ही ज़्यादा सही लगता है. यदि ऐसा हुआ तो भारत मध्य एशियाई देशों में सैन्य उपस्थिति दर्ज कराने वाला मात्र चौथा देश होगा. भारत से पहले सिर्फ़ तीन देश रूस, अमरीका और जर्मनी ने ही मध्य एशियाई देशों में अपनी स्थायी सैन्य उपस्थिति बना रखी है. रूस के सैनिक अड्डे ताजिकिस्तान और किर्गिज़स्तान में हैं. अमरीका का सैनिक अड्डा किर्गिज़स्तान में है, जबकि जर्मनी ने दक्षिणी उज़बेकिस्तान में एक सैनिक अड्डा बना रखा है.

जहाँ तक मध्य एशिया में सैनिक उपस्थिति के पीछे भारत के उद्देश्यों की बात है तो पहली नज़र में तेल और गैस ही सामने आता है. यानि अपनी गतिविधियाँ बढ़ा कर तेल और गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करने का प्रयास. इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान से भारत के बेहतर रिश्तों, अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान की दखलअंदाज़ी को देखते हुए भी ताजिकिस्तान में भारत के स्थायी सैनिक अड्डे की बात समझ में आती है. वैसे, मध्य एशिया में भारत की दिलचस्पी का एक और महत्वपूर्ण प्रमाण है शंघाई सहयोग संगठन में भारत का पर्यवेक्षक के रूप में शामिल होना. चीन और रूस की अगुआई वाले इस संगठन के पूर्ण सदस्यों में मध्य एशिया के देश कज़ाख़स्तान, किरगिज़स्तान, ताजिकिस्तान और उज़बेकिस्तान शामिल हैं.

सोमवार, अप्रैल 10, 2006

स्विस गार्ड यानि पोप की सेना

रोम के बीचोंबीच एक नन्हें लेकिन अत्यंत प्रभावशाली संप्रभु राष्ट्र के रूप में बसे वैटिकन का बड़ा ही घटनापूर्ण इतिहास रहा है. ये अपने साथ अनेक विचित्र परंपराओं को साथ लेकर चल रहा है.

याद करें मौजूदा पोप बेनेडिक्ट सोलहवें (जोज़फ़ रैत्सिंगर) के चुनाव के दौरान कैसे पूरी दुनिया टेलीविज़न से चिपकी रहती थी ये देखने के लिए कि सिस्टीन चैपल की चिमनी से काला धुआँ निकलता है या सफेद. काला धुआँ यानि कार्डिनल की बैठक में नए पोप के नाम पर सहमति नहीं, और सफेद धुआँ यानि नया पोप चुन लिया गया.

इन्हीं विचित्र परंपराओं में से एक है- वैटिकन की सेना. कहने की ज़रूरत नहीं कि मौज़ूदा काल में वैटिकन को किसी सेना की कोई ज़रूरत नहीं है, लेकिन पुराने दिनों में यानि शताब्दियों पहले ऐसा नहीं था. धर्म के नाम पर आज की तरह तब आतंकवाद हमले नहीं होते थे, बल्कि खुला युद्ध हुआ करता था. ऐसी ही लड़ाइयों के लिए पोप ने भी अपनी सेना बना रखी थी, या यों कहें कि भाड़े के सैनिक जमा कर रखे थे. पोप के भड़ैती सैनिकों को एक संस्थागत रूप दिया गया था आज से ठीक पाँच सौ साल पहले. और आधी सहस्राब्दी बाद भी ये संस्था आज भी मौज़ूद है. आज भी वैटिकन की एक सेना है जिसे स्विस गार्ड के नाम से जाना जाता है.

मुझे पहली बार 2003 में वैटिकन जाने का मौक़ा मिला था. सेंट पीटर्स स्क़्वायर, सेंट पीटर्स गिरजाघर, सिस्टीन चैपल और वैटिकन म्यूज़ियम के बाद सबसे ज़्यादा ध्यान खींचा था सतरंगा ड्रेस पहने स्विस गार्ड्स ने. वैटिकन पहुँचने वाला शायद ही कोई पर्यटक लंबा-सा भाला लिए और खंभे की तरह स्थिर रहने वाले स्विस गार्ड की तस्वीर क्लिक करना भूलता हो.

यदि स्विस गार्ड्स के इतिहास को देखें तो कई बातें चौंकाने वाली लगती हैं. पहली बात ये कि मध्ययुगीन यूरोप में भाड़े के सैनिकों की आपूर्ति मुख्य तौर पर स्विटज़रलैंड से हुआ करती थी. (आज के शांतिपूर्ण और तटस्थ स्विटज़रलैंड से तुलना करें.) स्विस भाड़े के सैनिकों के चलन का मुख्य कारण था स्विटज़रलैंड की ग़रीबी.(उस समय पर्यटन का धंधा शुरू नहीं हो पाया था, और न ही गुप्त खाते वाले बैंकों की शुरुआत हुई थी. आज प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से स्विटज़रलैंड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊपर की पाँत में आता है.) इसके अलावा स्विस भड़ैती सैनिकों को अत्यंत भरोसेमंद भी माना जाता था.(आज दो नंबर के काम से पैसा कमाने वालों के लिए स्विस बैंकों जितना विश्वसनीय कोई और नहीं.) स्विस गार्ड के मौज़ूदा कमांडर-इन-चीफ़ हैं पोप बेनेडिक्ट सोलहवें.

पोप जूलियस द्वितीय ने 1505 में स्विस परिसंघ से कुछ भड़ैती सैनिकों की माँग की. (ग़ौर करें, पाँच सौ साल पहले सैनिकों की आपूर्ति को संस्थागत रूप दिया जा चुका था.) उस साल सितंबर में रवाना हुए 150 स्विस लड़ाके जनवरी 1506 में पोप की नगरी में पहुँचे. तब से लगातार स्विस गार्ड वैटिकन के इतिहास के अभिन्न अंग बने हुए हैं. पोप के प्रति इनके अगाध समर्पण और इनके अदम्य साहस का पहला बड़ा उदाहरण सामने आया 6 मई 1527 को जब रोमन शासक चार्ल्स पंचम की आक्रणकारी सेना से पोप क्लीमेंट सप्तम का सफलतापूर्वक बचाव करते हुए वैटिकन स्विस गार्ड के 189 में से 147 सैनिकों ने अपनी जान दे दी थी.

वैटिकन स्विस गार्ड को कभी-कभार प्रतिबंधित भी किया गया. सैनिकों की संख्या भी कम-ज़्यादा होती रही. अभी इस सेना में कुल 110 सैनिक हैं (पोप षष्ठम के कार्यकाल में 1970 में मात्र 42 रह गए थे).

आज वैटिकन स्विस गार्ड की प्रसिद्धि दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे छोटी सेना के रूप में है. ये मत समझें कि चटक नीले, केसरिया और नारंगी रंग के ढीली वर्दी पहने ये गार्ड पर्यटकों के फ़ोटो और वीडियो का हिस्सा बनने मात्र के लिए तैनात हैं. हर गार्ड स्विटज़रलैंड की सेना में नियमित प्रशिक्षण लेने के बाद ही वैटिकन की सेना में स्थान पाता है. उसे स्विस नागरिक और रोमन कैथोलिक होना चाहिए. भर्ती के समय उसकी उम्र 19 से 30 साल की हो. रंगरूट अविवाहित हो, हाई स्कूल पास हो और कम से कम 174 सेंटीमीटर लंबा हो.

स्विस गार्ड को आधुनिक हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है.वैसे वैटिकन में तैनात किसी गार्ड के पास शायद ही आपको कोई बंदूक दिखे. हथियारबंद गार्ड के नाम पर आप एक ख़ास भाला लिए सैनिक को देखते हैं. इसमें भाले के फ़लक के नीच कुल्हाड़ी का फ़लक भी जुड़ा होता है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि सदियों पुराने ढर्रे पर चल रहे स्विस गार्ड की अपनी वेबसाइट भी है. (वैटिकन की वेबसाइट पर इस सेना को 'स्विस गार्ड' कहा गया है, लेकिन इनकी अपनी वेबसाइट पर 'स्विस गार्ड्स'.)

स्विस गार्ड के मौज़ूदा कमांडर एल्मर थियोडोर मैडर की मानें तो आज वैटिकन का एक भी सैनिक ऐसा नहीं है जिसने नौकरी के दौरान कभी बंदूक चलानी पड़ी हो. पिछले दिनों न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान उन्होंने कहा, "हमारे सैनिक 'मिर्ची स्प्रे' से लैस होते हैं. लेकिन आठ वर्षों के अपने सेवा काल के दौरान मुझे सिर्फ़ एक बार सुनने को मिला कि किसी सैनिक को इस स्प्रे का इस्तेमाल करने की ज़रूरत पड़ी."

पोप की विदेश यात्राओं में कुछ बहुत ही अनुभवी स्विस गार्ड उनके साथ होते हैं, लेकिन सादे कपड़ों में ही. पोप की सुरक्षा की ज़िम्मेवारी ज़ाहिर है मेज़बान देशों पर होती है, लेकिन ऐसे में भी स्विस गार्ड की उपयोगिता है. कमांडर मैडर इस बारे में कहते हैं, "हमें ये पता होता है कि कब कहा जाए कि 'पोप थक गए हैं इसलिए उन्हें आराम दिया जाए', या फिर वो हाथ मिलाना चाहते हैं या नहीं."

वैटिकन की सेना को किसी से ख़तरा नहीं दिखता, लेकिन कई बारे अपनों से भी ख़तरा हो जाता है. अभी कुछ ही साल पहले 1998 में सेना के कमांडर और उनकी पत्नी की हत्या एक स्विस गार्ड ने ही कर दी. बाद में हत्यारे गार्ड ने आत्महत्या कर ली. (वैटिकन की सेना के जवान को सेवा काल के दौरान शादी करने की मनाही है, लेकिन एक अधिकारी ब्याह रचा सकता है.)

हर साल 25 से 30 पुराने गार्ड रिटायर होते हैं और उनकी जगह रंगरूटों की भर्ती की जाती है. इस साल 6 मई को स्विस गार्ड के रंगरूटों की खेप को शपथ दिलाई जाएगी, यानि एक मध्युगीन रोचक परंपरा को जीवंत बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम!

गुरुवार, मार्च 16, 2006

कमज़ोर पड़ रही है अमरीकी पकड़

प्रख्यात विचारक नोम चोम्स्की का मानना है कि दुनिया (ख़ास कर लैटिन अमरीकी और एशियाई देश) अंतत: अमरीकी प्रभाव से मुक्त होने की राह पर है.

चोम्स्की मूलत: एक भाषाविद हैं. उनके भाषा की उत्पत्ति और व्याकरण संबंधी कार्यों का फ़ायदा मनोविज्ञान और कंप्यूटर विज्ञान के क्षेत्र में भी उठाया जा रहा है. हालाँकि मैसेच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में भाषा विज्ञान के प्रोफ़ेसर चोम्स्की की ख्याति एक समाजवादी विचारक, युद्ध विरोधी और अमरीकी नीतियों के मुखर विरोधी के रूप में ज़्यादा है.

गार्डियन में छपे चोम्स्की के संक्षिप्त लेख की मानें तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अमरीका की सबसे बड़ी चिंता रही है यूरोप और एशिया का आत्मनिर्भरता की ओर क़दम बढ़ाना. अमरीका की यह चिंता हाल के दिनों में और बढ़ गई है क्योंकि एक त्रिध्रुवीय व्यवस्था का आकार लेना जारी है. उभर रहे ये तीन ध्रुव हैं- यूरोप, उत्तर अमरीका और एशिया.

चोम्स्की कहते हैं कि बात इतने पर ही थमी नहीं है बल्कि अमरीका की चिंता को और बढ़ा रहा है दिन-प्रतिदिन लैटिन अमरीकी देशों का भी आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ना. आज एक ओर अमरीका मध्य-पूर्व में पूरी तरह उलझा पड़ा है, वहीं एशिया और लैटिन अमरीका के देश लगातार परस्पर क़रीब आ रहे हैं.

चोम्स्की कहते हैं कि वर्तमान में अमरीका के लिए एक बहुत ही बड़ी चिंता का सबब है एशिया और लैटिन अमरीका के भीतर चल रहा क्षेत्रीय एकजुटता का प्रयास. और इस नए भौगोलिक समीकरण के बीच में है ऊर्जा यानि तेल.

बात एशिया से शुरू करें तो अमरीका को सर्वाधिक सिरदर्द दे रहा है चीन. उसने जता दिया है कि वह कोई यूरोप नहीं कि अमरीकी ठसक स्वीकार कर ले. अमरीका की मज़बूरी है कि वह चीन से खुला टकराव मोल नहीं ले सकता क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था चाहे-अनचाहे ड्रैगन राष्ट्र पर बुरी तरह आश्रित हो गई है. इसके अलावा चीन का वित्तीय रिज़र्व मात्रा में जापान के रिज़र्व के बराबर पहुँच चुका है, इसे देखते हुए भी अमरीका उससे सीधे पंगा लेने की नहीं सोच सकता.

ख़ैर, बात हो रही थी क्षेत्रीय एकजुटता और इस प्रक्रिया में तेल की भूमिका की. इसी साल जनवरी में सउदी अरब के शाह ने चीन की यात्रा कर द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को नई दिशा देने वाले समझौते किए. इसमें तेल, प्राकृतिक गैस और निवेश के क्षेत्रों में संबंधों को प्रगाढ़ करने वाले उपाय शामिल हैं. याद रखें कि मध्यपूर्व में अमरीका का सबसे क़रीबी रहा है सउदी अरब. जहाँ तक ईरान की बात है तो पहले से ही उसके तेल उत्पादन का सबसे बड़ा हिस्सा चीन को जा रहा है, बदले में उसे चीन से लड़ाई के साजोसामान मिल रहे हैं.

चोम्स्की के अनुसार एशिया के एक और बड़े देश भारत के पास भी विकल्प हैं- या तो वह अमरीका से प्रगाढ़ता बढ़ाए, या फिर पूर्वी एशियाई देशों के संगठन आसियान से जिनके मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों से निकट संबंध लगातार मज़बूत होते जा रहे हैं. यहाँ जनवरी में भारत और चीन के बीच हुए समझौते का ज़िक्र करना ज़रूरी होगा. इस समझौते के बाद न सिर्फ़ दोनों देश प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ा रहे हैं बल्कि दोनों ने तेल और गैस की खोज और उत्पादन के क्षेत्र में भी हाथ मिला लिए हैं. यह समझौता तेल और प्राकृतिक गैस के अंतरराष्ट्रीय सेक्टर का चेहरा बदल कर रख सकता है. चोम्स्की मानते हैं कि नए बनते समीकरणों को देखते हुए बुश का भारत जाना और उसे अपने साथ रखने के लिए परमाणु सहयोग और अन्य तरह की साझेदारी का चारा डालना आश्चर्यजनक नहीं है.

लैटिन अमरीका में क्षेत्रीय एकजुटता के बारे में चोम्स्की लिखते हैं कि वेनेज़ुएला से अर्जेंटीना तक वामपंथी रूझान वाली सरकारें सत्ता में आ चुकी हैं. इन देशों, ख़ास कर बोलीविया और इक्वाडोर, में मूल निवासी बहुत ज़्यादा प्रभावी हो गए हैं और उनकी माँग है कि तेल और गैस सेक्टर में दूसरे देशों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दखल बिल्कुल नहीं हो. लैटिन अमरीकी देश एक मज़बूत क्षेत्रीय आर्थिक ब्लॉक के विकास की दिशा में भी क़दम बढ़ाते जा रहे हैं, ताकि अमरीकी प्रभाव वाले अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर निर्भरता कम हो. इस संबंध में चोम्स्की वेनेज़ुएला-अर्जेंटीना और बोलीविया-वेनेज़ुएला के साथ-साथ क्यूबा-वेनेज़ुएला निकट संबंधों का भी ज़िक्र करते हैं.

जहाँ तक एशिया से लैटिन अमरीका के बढ़ते संबंधों की बात है तो इस क्षेत्र के सबसे बड़े तेल उत्पादक वेनेज़ुएला ने चीन के साथ बहुत ही प्रगाढ़ता विकसित कर ली है. वेनेज़ुएला ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में तेल चीन को बेचना चाहता है ताकि खुली शत्रुता रखने वाले अमरीका पर उसकी निर्भरता कम हो सके. (यहाँ चोम्स्की के लेख में विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत और ब्राज़ील की प्रभावपूर्ण एकजुटता की बात भी जोड़ी जा सकती है.)

गुरुवार, मार्च 09, 2006

वर्तमान में महिलाएँ

साल का एक दिन महिलाओं के नाम किया गया है. ये दिन है आठ मार्च का. इस बार भी महिला दिवस पर नारी के प्रति सहानुभूति भरे लेख छपे, भाषणबाज़ी हुई और वायदे किए गए.

आइए देखें आज आँकड़ों में महिलाओं की क्या स्थिति है-

दुनिया की निजी मिल्कियत वाली ज़मीन का मात्र एक प्रतिशत महिलाओं के नाम है.

प्रति मिनट एक महिला बच्चे को जन्म देते समय भगवान को प्यारी हो जाती है.

निरक्षर बालिगों में से 67 प्रतिशत महिलाएँ हैं.

ग़रीबी में जी रही 120 करोड़ की आबादी का 70 प्रतिशत महिलाएँ हैं.

दुनिया के 80 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों में 65 प्रतिशत महिलाएँ हैं.

संयुक्त राष्ट्र के 191 सदस्य राष्ट्रों में से मात्र 12 की कमान महिलाओं के हाथों में है.(सोनिया गांधी को नहीं गिना गया है.)

दस में से एक फ़िल्म का ही निर्देशन कोई महिला करती है.

नारी स्वतंत्रता का नारा लगाने वाले यूरोपीय संघ की प्रमुख कंपनियों में मात्र तीन प्रतिशत की कमान महिलाओं के हाथों में है.


(स्रोत:महिला दिवस पर प्रकाशित विभिन्न लेख)