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गुरुवार, अप्रैल 26, 2007

'जापानी नौसेना' के बदलते अंदाज़

जापानी नौसैनिक
द्वितीय विश्व युद्ध में पराजित होने के बाद अमरीका के निर्देश पर जापान का जो संविधान रचा गया था उसमें सशस्त्र सेना की कोई जगह नहीं है. सशस्त्र सेनाओं की जगह जापान का आत्मरक्षा बल या सेल्फ़ डिफ़ेंस फ़ोर्स (SDF) है. इसकी सशस्त्र सेनाओं की तरह ही थल, जल और वायु की तीन शाखाएँ हैं. यानि आधिकारिक रूप से जापान की कोई नौसेना भी नहीं है, और उसके समुद्री बल का नाम है- MSDF या Maritime Self-Defence Force.

दरअसल 1947 में जापान का जो संविधान रचा गया, या अमरीका ने उसके लिए जो संविधान तैयार किया, उस पर द्वितीय विश्व युद्ध के उन दिनों के छाया स्पष्ट दिखती है जब जापानी सैनिक चीन समेत पूर्वी एशिया और प्रशांतीय क्षेत्र के देशों को रौंद रहे थे. उसके ख़ौफ़ से ब्रितानी साम्राज्यवादी भी थरथरा रहे थे. इसलिए अंतत: एटम बम की मार के साथ हुई जापान की पराजय के बाद विजयी ताक़तों की सलाह पर अमरीका ने उसके संविधान में 'अनुच्छेद 9' नामक ऐसा पेंच डाल दिया कि वह कभी दोबारा हमला नहीं कर सके. बदले में अमरीका ने उसकी सुरक्षा की पूरी ज़िम्मेवारी अपने कंधों पर लेने का काम भी किया.

जापानी संविधान के नौवें अनुच्छेद में दोटूक शब्दों में लिखा गया है कि 'जापानी जनता हमेशा के लिए राष्ट्र के युद्ध करने के संप्रभु अधिकार, और अंतरराष्ट्रीय विवादों को ताक़त के ज़ोर पर हल करने की धमकी का त्याग करती है...जापान जल, थल और वायु सेना के साथ-साथ युद्ध का कारक बनने वाले किसी भी बल को धारण नहीं करेगा.'

जापानी संविधान के इस नौवें अनुच्छेद को 'शांति अनुच्छेद' के नाम से जाना जाता है. और, विश्ववास नहीं होता कि संविधान लागू होने के कई साल बाद तक जापान का कोई अपना सशस्त्र बल नहीं था. लेकिन 1950 के दशक के शुरू में अमरीका को लगने लगा कि निहत्था जापान कोई अच्छी बात नहीं है. दरअसल तब शीतयुद्ध शुरू हो चुका था, और सोवियत साम्यवाद दुनिया भर में पसरने लगा था. ऐसे ही माहौल में जापान में अमरीकी प्रशासन के कमांडर जनरल डगलस मैकआर्थर ने वहाँ एक सशस्त्र National Police Reserve के गठन का आदेश दिया. और, यही NPR आगे चल कर Self-Defence Forces के रूप में विकसित हुआ.

जैसा कि इस लेख के शुरू में ज़िक्र किया गया है, जापान की सुरक्षा की पूरी गारंटी अमरीका ने उठा रखी है. अमरीका-जापान सुरक्षा संधि के तहत जापान में क़रीब 40 हज़ार अमरीकी सैनिक तैनात हैं. इसी के साथ अमरीका ने जापान के ऊपर घोषित तौर पर आणविक सुरक्षा छतरी भी तान रखी है.

इसलिए एसडीएफ़ के गठन पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, ख़ास कर पूर्वी एशिया के देशों की चिंता स्वभाविक ही थी. लेकिन तब अमरीका ने जापान की वकालत करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को समझाया कि SDF के गठन से जापानी संविधान का कोई उल्लंघन नहीं होता क्योंकि इसका एकमात्र उद्देश्य रक्षात्मक है.

लेकिन उसके बाद जापनी आत्मरक्षा बल का आकार और उसकी क्षमता में लगातार बढ़ोत्तरी ही होती गई है. आज जापान दुनिया की बड़ी और संपन्न सैनिक ताक़तों की पहली पंक्ति में खड़ा है. यदि बजट की बात करें तो पिछले साल जापान सरकार ने ढाई लाख थल सैनिकों, नौसैनिकों और वायुसैनिकों वाले एसडीएफ़ पर क़रीब 50 अरब डॉलर ख़र्च किए. राष्ट्रीय सेना पर इससे ज़्यादा ख़र्च सिर्फ़ दो और देश करते हैं- अमरीका और चीन.

जापानी आत्मरक्षा बल के ज़मीनी रक्षा विभाग में कोई डेढ़ लाख सैनिक हैं. उनके पास एक हज़ार अत्याधुनिक टैंक और अन्य समुन्नत साज़ोसामान हैं. इसी तरह वायु रक्षा विभाग में 373 लड़ाकू विमान के साथ क़रीब 50 हज़ार वायु सैनिक हैं. जहाँ तक जलीय रक्षा बल की बात है तो यह विभाग तुलनात्मक रूप से सर्वाधिक समृद्ध है. जापानी की जलीय रक्षा बल में कार्यरत कोई 45 हज़ार नौसैनिकों के ज़िम्मे 16 पनडुब्बियों और 53 विध्वंसक पोत समेत कुल 151 युद्धक पोत हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ये एक बहुत ही बड़ी नौसैनिक ताक़त है.

इतनी समुन्नत सेना होने के बावजूद पाँच साल पहले तक जापानी सैनिकों के बारे में कहीं कोई चर्चा नहीं होती थी, न उनकी तस्वीरें छपती थीं. संविधान की कड़ी शर्तों से बंधे जापानी आत्मरक्षा बल की पूरी ऊर्जा जापानी द्वीपों के इर्दगिर्द ही केंद्रित रही हैं.

लेकिन 11 सितंबर 2001 में न्यूयॉर्क और वाशिंग्टन में हुए हमलों के तुरंत बाद अमरीका ने जापान की सैनिक ताक़त को लेकर थोड़ी और नरमी दिखाने का संकेत दिया. आतंकवाद के ख़तरे की आड़ में जापानी संसद ने अक्तूबर 2001 में जो क़ानून पारित किया उसमें यह व्यवस्था है कि आंतकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में जापान अमरीका का साथ दे सकेगा. हालाँकि हमले की कार्रवाइयों में जापानी बलों को लगाने की इजाज़त अब भी नहीं होगी. इसके दो साल बाद एक और क़ानून पारित किया गया जिसमें जापानी बलों को इराक़ में अनाक्रमक भूमिका में तैनात करने की छूट है. और तीसरा महत्वपूर्ण क़ानून इस साल पारित किया गया है. इसमें देश की 'रक्षा एजेंसी' का नाम बदल कर 'रक्षा मंत्रालय' करने का फ़ैसला किया गया है.

कहने को तो ये क़दम सांकेतिक हो सकते हैं, लेकिन इसमें अनिष्ट की आशंका देखने वालों की संख्या कम नहीं है. ज़ाहिर है, सबसे ज़्यादा आपत्ति चीन और उत्तर कोरिया को है. क्योंकि अमरीका से छत्तीस का आंकड़ा रखने वाले ये देश अपने इलाक़े में मौजूद उसके परम-मित्र राष्ट्र जापान के बदलते तौर-तरीकों को लेकर चिंतित हैं.

कहने को तो जापान में रक्षा बजट को देश के सकल घरेलू उत्पाद के एक प्रतिशत से ज़्यादा नहीं करने का बंधन है. लेकिन यदि जापान को खुला छोड़ दिया जाए, या फिर चीन के बढ़ते प्रभुत्व की काट के नाम पर उसे अमरीका की शह मिलने लगे तो उसके अग्रणी आक्रामक ताक़त के रूप में परिवर्तित होने में दशक भर का भी समय नहीं लगेगा. और, यदि ऐसा हुआ तो अभी मलक्का जलडरमरुमध्य इलाक़े में जलदस्यु गिरोहों के ख़िलाफ़ गश्त लगाने वाले जापानी MSDF के, साम्राज्यवादी Imperial Navy में तब्दील होते क्या देर लगेगी!

शुक्रवार, दिसंबर 29, 2006

उत्पीड़न की अमरीकी शब्दावली

ग्वांतानामो बंदी शिविरआतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमरीका ने कई मान्य परंपराओं और सिद्धांतों को ताक पर रख दिया है. इनमें से एक है युद्धबंदियों और क़ैदियों के साथ मानवीय व्यवहार की सार्वभौम परंपरा.

क़ैदियों के उत्पीड़न का मामला अमरीकी अदालतों में नहीं आ पाए, इसके लिए विदेशी भूमि पर कई जेलें चलाई जा रही हैं. ग्वांतानामो जेल के बारे में तो काफ़ी कुछ सामने आ चुका है, लेकिन अमरीका संचालित अनेक गुप्त जेलों में क्या-क्या होता है, ये सिर्फ़ ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ही जानती है. इन जेलों से छूट पाए कुछ भाग्यशाली पूर्व क़ैदियों की मानें तो वहाँ अंतरराष्ट्रीय क़ायदे-क़ानूनों की कोई जगह नहीं है. क़ैदियों को प्रताड़ित किया जाता है और अमरीकी जेलरों ने इसके लिए अपनी सांकेतिक भाषा भी गढ़ रखी है. स्कॉट्स आल्मनाक 2007 नामक वार्षिक प्रकाशन में इस गुप्त भाषा के कुछ उदाहरण दिए गए हैं-

FUTILITY MUSIC
क़ैदियों के कमरे में लगातार घंटों तक तेज़ आवाज़ में ऐसा संगीत बजाना जो कि उनके लिए अबूझ हो. ख़ास कर वैसे गीतों को चुना जाता है जिनमें हिंसा, हमला आदि की बात हो. लगातार एक ही गीत को अनेक बार बजाने का भी तरीक़ा अपनाया जाता है. संगीत के अलावा जानवरों की आवाज़, डरावनी आवाज़, बच्चों के रोने की आवाज़ आदि का भी इस्तेमाल किया जाता है.

THE BLACK ROOM
बिना खिड़की या रोशनदान वाला कमरा जिसकी दीवारें काली होती हैं. यहाँ क़ैदियों की कुटाई की जाती हैं, उन्हें भद्दी-भद्दी ग़ालियाँ दी जाती हैं.

FORCED GROOMING
क़ैदियों के शरीर के बाल हटा देना. ख़ास कर मुसलमानों के ख़िलाफ़ ये तरीक़ा अपनाया जाता है, जिनके लिए दाढ़ी-मूँछ का धार्मिक महत्व है.

INTERNAL NUTRITION
भूख-हड़ताल कर रहे क़ैदियों को ज़बरदस्ती खाना खिलाना.

SLEEP ADJUSTMENT
क़ैदियों की नींद के पैटर्न को तहस-नहस कर देना.

WATER BOARDING
किसी क़ैदी को पानी में एक तख़्ते पर लिटा कर छोड़ देना. बीच-बीच में तख़्ते को कुछ देर के लिए पानी के भीतर डुबोना.

WATER PITT
एक टंकी जिसमें इतना पानी भरा गया हो कि किसी क़ैदी को डूबने से बचने के लिए अपने पंजों पर उचक कर खड़ा रहना पड़े.

ATTENTION SLAP
क़ैदी को पीड़ा पहुँचाने और डराने के उद्देश्य से मारा गया झापड़.

MOCK BURIAL(FAKE EXECUTION)
क़ैदियों को झूठा एहसास दिलाना कि बस अब उसका प्राणांत होने ही वाला है.

PRIDE AND EGO DOWN
क़ैदी के स्वाभिमान को चकनाचूर करने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडे, जैसे-मुसलमान क़ैदी के आगे कुरान की तौहीन करना.

STRESS POSITIONS
क़ैदियों को घंटों तक ऐसी जगह रखना, जहाँ वो न तो ठीक से खड़े हो पाएँ, और न ही ठीक से बैठ पाएँ.

REMOVAL OF COMFORT ITEMS
क़ैदियों से वैसी चीज़ें छीन लेना जो कि उन्हें सुकून देती हों, जैसे- सिगरेट, नमाज़ पढ़ने के लिए काम आने वाली चटाई, क़ुरान आदि.

EXPLOIT PHOBIAS
क़ैदियों के मन में बसे डर को उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना. जैसे- कोई क़ैदी कुत्ते से डरता हो तो उस पर कुत्ते छोड़ना.

उल्लेखनीय है कि अमरीका War on Terrorism के तहत पकड़े गए लोगों को जिनीवा संधि के तहत युद्धबंधियों को मिलने वाली सुविधाएँ नहीं देता है. अमरीका की दलील है कि पकड़े गए लोग युद्धबंदी नहीं बल्कि Illegal Enemy Combatants हैं. जब जून 2006 में ग्वांतानामो बे बंदी शिविर के तीन क़ैदियों ने आत्महत्या कर ली तो वहाँ तैनात एक जेलर ने इसे अमरीका के ख़िलाफ़ Asymmetrical Warfare की कार्रवाई बताया था.

रविवार, नवंबर 26, 2006

पेंटागन को हिंदी से प्यार हो गया!

यूटी ऑस्टिन टॉवरइस आलेख का शीर्षक हो सकता है बहुतों को अटपटा लगे. ख़ास कर उन लोगों को जो हिंदी से प्रेम तो करते हैं, लेकिन इसकी स्वीकार्यता को लेकर चिंतित भी हैं. लेकिन विश्वास कीजिए, अमरीकी रक्षा विभाग पेंटागन को हिंदी से प्यार हो गया है.

हालाँकि इस आशय की ख़बर भारत के अंग्रेज़ीदाँ मीडिया की उपेक्षा का शिकार बन गई. कोई आश्चर्य भी नहीं, जो उन्होंने हिंदी के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते महत्व को रेखांकित करती इस ख़बर की ज़्यादा चर्चा नहीं की. गूगल करने से पता चलता है कि अमरीकी मीडिया ने इसे ख़ासा महत्व दिया.

आपको शायद याद हो कि कुछ महीने पहले अपने एक भाषण में अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अमरीकियों से अंग्रेज़ी के अलावा जिन गिनीचुनी विदेशी भाषाओं में दक्षता हासिल करने की अपील की थी, उनमें हिंदी का भी नाम था. बुश ने इस घोषणा के साथ हिंदी को 'राष्ट्रीय सुरक्षा भाषा पहल' में शामिल करने की घोषणा भी की थी.(उस समय भी भारत के अंग्रेज़ीदाँ मीडिया टीकाकारों ने बुश के इस भाषण को ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया था.)

लेकिन बुश ने वास्तव में बहुत गंभीरता से अपनी बात रखी थी. इसका प्रमाण है बुश के गृह प्रांत के विश्वविद्यालय यूनीवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस की घोषणा कि वह हिंदी(और उर्दू) भाषा के एक चार-वर्षीय कोर्स की शुरूआत करने जा रहा है. इस 'Hindi and Urdu Flagship Program' नामक विशेष कोर्स(विश्वविद्यालय में इन भाषाओं के सामान्य कोर्स चार दशकों से जारी हैं) के तहत हिंदी के छात्रों को तीन साल अमरीका में और एक साल भारत में रह कर पढ़ाई करनी होगी.

लेकिन पूरी ख़बर का मूल तत्व ये है कि यूनीवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस के इस विशेष हिंदी-उर्दू कार्यक्रम के लिए सात लाख डॉलर का पूरा बजट अमरीकी रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से आएगा. अमरीका में पेंटागन संचालित कार्यक्रमों में से एक है- राष्ट्रीय सुरक्षा शिक्षा कार्यक्रम. इस कार्यक्रम के तहत अमरीकियों को राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा की दृष्टि से अहम विदेशी भाषाओं में दक्षता प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं. (अमरीकी सरकार कहे या नहीं, उसकी इस पहल के पीछे एक उद्देश्य भारत के सुपरफ़ास्ट आर्थिक विकास का ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाना भी है.)

कहने की ज़रूरत नहीं कि भारत और पाकिस्तान दोनों के परमाणु ताक़त के रूप में स्थापित होने, और दोनों के अमरीका से निकट संबंध होने के कारण अमरीका के लिए हिंदी और उर्दू की अहमियत बहुत बढ़ जाती है. (भारत के आर्थिक ताक़त के रूप में उभरने के कारण भी सामरिक दृष्टि से हिंदी का महत्व बढ़ा है. दूसरी ओर पाकिस्तान के अल-क़ायदा का अभ्यारण्य होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से उर्दू का महत्व बढ़ा है.)

यूनीवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस ने अगले सत्र से शुरू अपने विशेष हिंदी कोर्स के प्रचार के लिए टेक्सस के विद्यालयों में हिंदी भाषा की कार्यशालाएँ लगाने की शुरुआत भी कर दी है. विशेष कोर्स का पहला सत्र भले ही दस छात्रों से शुरू किया जाएगा, लेकिन निश्चय ही यह एक अहम शुरुआत होगी.

बुधवार, जून 28, 2006

भारत, अमरीका और अपराध

सप्ताह भर से हिंदी ब्लॉग जगत में भारत और अमरीका को लेकर तीखी बहस जारी है. रीडर्स डाइजेस्ट के सर्वे के बहाने शुरू बहस ने दुर्भाग्य से देसी बनाम अमरीकावासी ब्लॉगरों के बीच नोंकझोंक का रूप ले लिया.

बहस में शामिल देसी ब्लॉगरों ने दीनहीन भाव से इतना मात्र कहना चाहा कि भारत समस्याओं से भरा है, लेकिन अमरीकी समाज में भी विसंगतियाँ होंगी. बदले में अमरीकावासी ब्लॉगरों में से कुछ ने भारत की छवि भिखमंगों, असभ्यों, बलात्कारियों के समाज के रूप में अंकित करनी चाही(भले ही अनचाहे ऐसा हुआ हो). इतना ही नहीं अमरीका को भारत के मुक़ाबले झंझटमुक्त और स्वर्गिक समाज घोषित करने की भी चेष्टा हुई(तथ्यों से ज़्यादा भावनात्मक दलीलों के सहारे).

मेरी टिप्पणियों को या तो दरकिनार किया गया या फिर उसे एक सिरे से खारिज करने का प्रयास हुआ. बहस के दौरान एक पोस्ट से टीपे सूत्रों पर कुछ घंटे लगा कर मैंने दो महान देशों(अमरीका के साथ ही भारत को भी महान कह रहा हूँ, जिनकी भावनाओं को चोट पहुँचे कृपया माफ़ करेंगे) में अपराध की स्थिति की तुलना की है.

अच्छी बात तो यह रही कि हिंदी ब्लॉग जगत में इस बहस के दौरान ही सर्वशक्तिमान एफ़बीआई ने अमरीका में अपराध के ताज़ा आँकड़े जारी कर दिए हैं. इसमें अमरीका में अपराध की शहरवार स्थिति देखी जा सकती हैं. आँकड़े आरंभिक हैं, यानि मुकम्मल तस्वीर सितंबर-अक्तूबर तक उभरेगी, लेकिन एफ़बीआई ने साफ़ कर दिया है कि दुनिया में अपराध के सबसे बड़े केंद्रों में से एक अमरीका में क़ानून-व्यवस्था की चुनौती दिनोंदिन गंभीर बनती जा रही है. एफ़बीआई ने नस्ली अपराधों की सूची अलग से देना ज़रूरी समझा है.

आँकड़ों में जाने से पहले दो दिलचस्प तथ्यों पर ग़ौर करें: अमरीका में रूस से आठ गुना ज़्यादा आपराधिक घटनाएँ होती हैं, लेकिन रूस के मुक़ाबले वहाँ जजों और मजिस्ट्रेटों की संख्या लगभग आधी है; अमरीका में प्रति हज़ार व्यक्ति में से सात जेल में बंद हैं.

भारत और अमरीका में अपराध का तुलनात्मक अध्ययन:

कुल अपराध- भारत 1.633 अमरीका 80.064 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

हत्या- भारत 0.034 अमरीका 0.042 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

बलात्कार- भारत 0.014 अमरीका 0.301 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

डाका- भारत 0.026 अमरीका 1.385 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

धोखाधड़ी- भारत 0.038 अमरीका 1.257 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

गबन- भारत 0.014 अमरीका 0.058 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

सेंधमारी- भारत 0.103 अमरीका 7.099 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

मारपीट- भारत 0.218 अमरीका 7.569 (प्रति 1,000 व्यक्ति)

क़ैदी- भारत 29 अमरीका 715 (प्रति 100,000 व्यक्ति)


आँकड़ों के स्रोत:
1. Seventh United Nations Survey of Crime Trends and Operations of Criminal Justice Systems, covering the period 1998 - 2000 (United Nations Office on Drugs and Crime, Centre for International Crime Prevention)
2. CIA World Factbook

गुरुवार, मार्च 16, 2006

कमज़ोर पड़ रही है अमरीकी पकड़

प्रख्यात विचारक नोम चोम्स्की का मानना है कि दुनिया (ख़ास कर लैटिन अमरीकी और एशियाई देश) अंतत: अमरीकी प्रभाव से मुक्त होने की राह पर है.

चोम्स्की मूलत: एक भाषाविद हैं. उनके भाषा की उत्पत्ति और व्याकरण संबंधी कार्यों का फ़ायदा मनोविज्ञान और कंप्यूटर विज्ञान के क्षेत्र में भी उठाया जा रहा है. हालाँकि मैसेच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में भाषा विज्ञान के प्रोफ़ेसर चोम्स्की की ख्याति एक समाजवादी विचारक, युद्ध विरोधी और अमरीकी नीतियों के मुखर विरोधी के रूप में ज़्यादा है.

गार्डियन में छपे चोम्स्की के संक्षिप्त लेख की मानें तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अमरीका की सबसे बड़ी चिंता रही है यूरोप और एशिया का आत्मनिर्भरता की ओर क़दम बढ़ाना. अमरीका की यह चिंता हाल के दिनों में और बढ़ गई है क्योंकि एक त्रिध्रुवीय व्यवस्था का आकार लेना जारी है. उभर रहे ये तीन ध्रुव हैं- यूरोप, उत्तर अमरीका और एशिया.

चोम्स्की कहते हैं कि बात इतने पर ही थमी नहीं है बल्कि अमरीका की चिंता को और बढ़ा रहा है दिन-प्रतिदिन लैटिन अमरीकी देशों का भी आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ना. आज एक ओर अमरीका मध्य-पूर्व में पूरी तरह उलझा पड़ा है, वहीं एशिया और लैटिन अमरीका के देश लगातार परस्पर क़रीब आ रहे हैं.

चोम्स्की कहते हैं कि वर्तमान में अमरीका के लिए एक बहुत ही बड़ी चिंता का सबब है एशिया और लैटिन अमरीका के भीतर चल रहा क्षेत्रीय एकजुटता का प्रयास. और इस नए भौगोलिक समीकरण के बीच में है ऊर्जा यानि तेल.

बात एशिया से शुरू करें तो अमरीका को सर्वाधिक सिरदर्द दे रहा है चीन. उसने जता दिया है कि वह कोई यूरोप नहीं कि अमरीकी ठसक स्वीकार कर ले. अमरीका की मज़बूरी है कि वह चीन से खुला टकराव मोल नहीं ले सकता क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था चाहे-अनचाहे ड्रैगन राष्ट्र पर बुरी तरह आश्रित हो गई है. इसके अलावा चीन का वित्तीय रिज़र्व मात्रा में जापान के रिज़र्व के बराबर पहुँच चुका है, इसे देखते हुए भी अमरीका उससे सीधे पंगा लेने की नहीं सोच सकता.

ख़ैर, बात हो रही थी क्षेत्रीय एकजुटता और इस प्रक्रिया में तेल की भूमिका की. इसी साल जनवरी में सउदी अरब के शाह ने चीन की यात्रा कर द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को नई दिशा देने वाले समझौते किए. इसमें तेल, प्राकृतिक गैस और निवेश के क्षेत्रों में संबंधों को प्रगाढ़ करने वाले उपाय शामिल हैं. याद रखें कि मध्यपूर्व में अमरीका का सबसे क़रीबी रहा है सउदी अरब. जहाँ तक ईरान की बात है तो पहले से ही उसके तेल उत्पादन का सबसे बड़ा हिस्सा चीन को जा रहा है, बदले में उसे चीन से लड़ाई के साजोसामान मिल रहे हैं.

चोम्स्की के अनुसार एशिया के एक और बड़े देश भारत के पास भी विकल्प हैं- या तो वह अमरीका से प्रगाढ़ता बढ़ाए, या फिर पूर्वी एशियाई देशों के संगठन आसियान से जिनके मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों से निकट संबंध लगातार मज़बूत होते जा रहे हैं. यहाँ जनवरी में भारत और चीन के बीच हुए समझौते का ज़िक्र करना ज़रूरी होगा. इस समझौते के बाद न सिर्फ़ दोनों देश प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ा रहे हैं बल्कि दोनों ने तेल और गैस की खोज और उत्पादन के क्षेत्र में भी हाथ मिला लिए हैं. यह समझौता तेल और प्राकृतिक गैस के अंतरराष्ट्रीय सेक्टर का चेहरा बदल कर रख सकता है. चोम्स्की मानते हैं कि नए बनते समीकरणों को देखते हुए बुश का भारत जाना और उसे अपने साथ रखने के लिए परमाणु सहयोग और अन्य तरह की साझेदारी का चारा डालना आश्चर्यजनक नहीं है.

लैटिन अमरीका में क्षेत्रीय एकजुटता के बारे में चोम्स्की लिखते हैं कि वेनेज़ुएला से अर्जेंटीना तक वामपंथी रूझान वाली सरकारें सत्ता में आ चुकी हैं. इन देशों, ख़ास कर बोलीविया और इक्वाडोर, में मूल निवासी बहुत ज़्यादा प्रभावी हो गए हैं और उनकी माँग है कि तेल और गैस सेक्टर में दूसरे देशों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दखल बिल्कुल नहीं हो. लैटिन अमरीकी देश एक मज़बूत क्षेत्रीय आर्थिक ब्लॉक के विकास की दिशा में भी क़दम बढ़ाते जा रहे हैं, ताकि अमरीकी प्रभाव वाले अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर निर्भरता कम हो. इस संबंध में चोम्स्की वेनेज़ुएला-अर्जेंटीना और बोलीविया-वेनेज़ुएला के साथ-साथ क्यूबा-वेनेज़ुएला निकट संबंधों का भी ज़िक्र करते हैं.

जहाँ तक एशिया से लैटिन अमरीका के बढ़ते संबंधों की बात है तो इस क्षेत्र के सबसे बड़े तेल उत्पादक वेनेज़ुएला ने चीन के साथ बहुत ही प्रगाढ़ता विकसित कर ली है. वेनेज़ुएला ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में तेल चीन को बेचना चाहता है ताकि खुली शत्रुता रखने वाले अमरीका पर उसकी निर्भरता कम हो सके. (यहाँ चोम्स्की के लेख में विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत और ब्राज़ील की प्रभावपूर्ण एकजुटता की बात भी जोड़ी जा सकती है.)