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गुरुवार, मार्च 08, 2007

बचा जा सकता है इस प्राकृतिक आपदा से

एस्टेरॉयड की टक्कर, चित्र कल्पना- नासाअमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने यह कह कर चौंका दिया है कि धरती को नुक़सान पहुँचाने में सक्षम अंतरिक्षीय पिंडों का समय रहते पता लगाने की क़ाबिलियत तो उसके पास है, लेकिन इस काम के लिए ज़रूरी धन उसके पास नहीं है. नासा की यह परेशानी वाशिंग्टन में Planetary Defense Conference में प्रस्तुत एक रिपोर्ट में सामने आई है. सौर मंडल में अपनी कक्षाओं में घूमते या भटकते हुए धरती के पास आ सकने वाले ऐसे पिंडों(धूमकेतु भी शामिल) को वैज्ञानिकों ने Near-Earth Objects या 'निओ' नाम दिया है.

धरती को 20 हज़ार से ज़्यादा अंतरिक्षीय पिंडों से ख़तरा बताया जाता है. अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी का कहना है कि वर्ष 2020 तक वह इनमें से कम से कम 90 प्रतिशत का पता लगाने में सक्षम है, लेकिन इसके लिए ज़रूरी एक अरब डॉलर की राशि की व्यवस्था कर पाना उसके लिए संभव नहीं है. (मालूम रहे कि अमरीका इराक़ में इतना धन हर पखवाड़े ख़र्च कर रहा है.)

अंतरराष्ट्रीय खगोलविदों को सबसे ज़्यादा डर एपोफ़िस नामक उल्का पिंड को लेकर है. करीब 400 मीटर आकार के इस एस्टेरॉयड के 2036 में धरती के पास होने की गणना की गई है. इसके धरती से टकराने की आशंका 45,000 में एक मानी जा रही है. यदि मौजूदा अनुमानों के मुताबिक यह किसी आबादी वाले इलाक़े पर नहीं, बल्कि प्रशांत महासागर में गिरता है तो भी इससे होने वाले नुक़सान की कल्पना नहीं की जा सकती. बहुत कम विनाश हुआ तो भी प्रशांत महासागर से जुड़े कई देश तबाह हो जाएँगे, और सुनामी के चलते अमरीका के पश्चिमी तट पर मौत का तांडव होगा.

इस सप्ताह वाशिंग्टन में हुए सम्मेलन में जिन बातों पर विचार किया गया उनमें प्रमुख थे- किस आकार के निओ पिंडों को धरती के लिए वास्तविक ख़तरा माना जाए, धरती से भिड़ने को तत्पर अंतरिक्षीय पिंडों से किन उपायों से पार पाया जा सकता है और यदि ऐसी कोई टक्कर टालने से भी नहीं टल रही हो तो लोगों को ख़तरे की पूरी जानकारी दी जाए या नहीं!

धरती से टक्कर लेने को तैयार दिख रहे किसी अंतरिक्षीय पिंड से निपटने के जिन तरीक़ों की चर्चा अक्सर की जाती हैं, वे हैं- मिसाइल प्रहार से पिंड को नष्ट कर देना; उसके क़रीब परमाणु बम फोड़ कर उसकी राह बदल देना; धरती तक पहुँचने से बरसों पहले पिंड के ऊपर एक विशालकाय यान उतार कर उसे राह से भटकाने का प्रयास करना; या उस पर शक्तिशाली लेज़र बीम डाल कर उसकी कक्षा बदलने की कोशिश करना.

टक्कर मारने का विकल्प सबसे आसान, लेकिन सबसे ख़तरनाक है क्योंकि टक्कर के बाद पिंड के टुकड़े भी धरती की दिशा में बढ़ते रह सकते हैं. या टक्कर धरती से ज़्यादा दूर नहीं हुई तो अतिरिक्त ऊर्जा का प्रवाह धरती तक पहुँच कर नुक़सान कर सकते हैं. एस्टेरॉयड को दूर ठेलने का उपाय सबसे भरोसेमंद माना जाता है, बशर्ते संभावित टक्कर से कम से कम एक दशक पहले ये प्रयास शुरू कर दिया जाए.

लेकिन इन उपायों को आजमाने के लिए ज़रूरी है कि समय रहते सभी ख़तरनाक निओ पिंडों का पता लगाया जाए. वैज्ञानिकों का मानना है कि 40 मीटर आकार तक के पिंड धरती के वायुमंडल को पार करते-करते ही स्वाहा हो जाते हैं. इससे बड़े पिंड को वायुमंडल नहीं रोक पाएगा. एक किलोमीटर आकार तक के निओ पिंड टक्कर वाले इलाक़े में कहर बरपा सकते हैं. इससे भी बड़े पिंड की टक्कर का प्रत्यक्ष या परोक्ष असर पूरी धरती पर पड़ेगा. और वैज्ञानिकों की ही मानें तो एक किलोमीटर से बड़े आकार के 1100 निओ पिंडों का अस्तित्व तो ज़रूर ही होगा.

नासा के ताज़ा आंकड़ों की बात करें तो फ़रवरी महीने के अंत तक कुल 4566 निओ पिंड खोजे जा चुके थे, जिनमें से 705 का आकार एक किलोमीटर से बड़ा है. खोजे गए निओ पिंडों में से 847 को ख़तरनाक एस्टेरॉयड के रूप में चिन्हित किया गया है.

धरती को संभावित विनाश(डायनोसोर किसी एस्टेरॉयड के धरती से टकराने के कारण ही विलुप्त हुए) से बचाने के लिए पहला काम है सारे निओ पिंडों का पता लगाना. ख़ुशी की बात है कि संयुक्तराष्ट्र ने इस मामले में पहल कर दी है. इसी साल मई में स्ट्रॉसबर्ग में एक सम्मेलन में एस्टेरॉयड के धरती से टक्कर की आशंका के मुद्दे पर एक अंतरराष्ट्रीय संधि की रूपरेखा तय की जाएगी. आशा है, सम्मेलन में नासा के धनाभाव के बहाने पर भी विचार किया जाएगा.

शनिवार, अक्टूबर 22, 2005

एपोफ़िस और तोरिनो पैमाना


अभी कश्मीर में भयानक भूकंप आया और एक बार फिर आम लोगों की ज़ुबान पर रिक्टर पैमाने का नाम चढ़ गया. कोई मुज़फ़्फ़राबाद के पास केंद्रित इस भूकंप को रिक्टर पैमाने पर 7.6 बता रहा था तो कोई 7.8 या और ज़्यादा.

इसी तरह अमरीका में तबाही मचाने वाले कैटरीना तूफ़ान ने जनसामान्य को फिर से याद दिलाया कि तूफ़ानों की एक से पाँच तक की कैटगरी के क्या मायने होते हैं.

लेकिन हमें नहीं लगता प्राकृतिक आपदा के एक और अहम पैमाने 'तोरिनो' की आमलोगों को ज़्यादा जानकारी है. जानकारी हो भी कैसे, क्योंकि इस पैमाने से जुड़ी कोई तबाही अभी हमें देखने को जो नहीं मिली है. भगवान न करे ऐसा कभी हो क्योंकि ऐसी तबाही में हज़ारों या लाखों में नहीं, बल्कि करोड़ों की संख्या में लोगों के मरने की आशंका होगी. और एक महाटक्कर से होने वाली इस तबाही के कारण पर्यावरण में होने वाला बदलाव भी बाद के वर्षों में करोड़ों अन्य लोगों की मौत का सीधा कारण बनेगा.

तोरिनो पैमाना है क्या बला? पहले तो ये बता दूँ कि तोरिनो नाम इटली के मशहूर शहर तूरिन से लिया गया है जिसे पश्चिमोत्तर इटली में तोरिनो नाम से ही जाना जाता है.(आपको आश्चर्य होगा कि इटली में मिलान को मिलानो, रोम को रोमा, फ़्लोरेंस को फ़िरेंज़ी और वेनिस को वेनित्सिया नाम से जाना जाता है.) तोरिनो से जुड़ी एक और रोचक बात यह है कि भारत की कांग्रेस पार्टी की भाग्य-विधाता पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विधवा सोनिया का ताल्लुक इसी शहर से है.

तो, तोरिनो में 1999 में खगोल भौतिकशास्त्रियों की एक बैठक हुई एस्टेरॉयड या उल्का-पिंडों और पुच्छल तारों के ख़तरे पर विचार के लिए.(एस्टेरॉयड मंगल और बृहस्पति के बीच लाखों की संख्या में मौजूद पत्थर और धातु के उन पिंडों को कहा जाता है जो कि एक ग्रह के समान ही सूर्य का चक्कर लगा रहे हैं. क्या पता किसी बड़े ग्रह से ही टूट कर बिखरे हों. इनमें से कुछ तो 1,000 किलोमीटर व्यास के हैं तो अनेक साधारण कंकड़-पत्थर जितने बड़े.)

पुच्छल तारों और एस्टेरॉयड के अपनी कक्षा से भटक कर धरती की ओर आने का ख़तरा हमेशा से बना रहा है. इस ख़तरे को हॉलीवुड ने बढ़ा-चढ़ाकर डीप इम्पैक्ट जैसी फ़िल्मों के ज़रिए बेचा भी है. हाल के इतिहास में तो ऐसी किसी टक्कर का ज़िक्र नहीं है, लेकिन माना जाता है कि ऐसी ही टक्करों से धरती के कई बड़ी झीलें बनी हैं और ऐसी ही किसी बड़ी टक्कर ने डायनोसोरों का काम तमाम किया होगा.

तो भैया, तोरिनो के सम्मेलन में एमआईट के वैज्ञानिक रिचर्ड बिन्ज़ेल द्वारा कुछ साल पहले प्रतिपादित पैमाने को स्वीकार कर लिया गया और उसे तोरिनो पैमाने के नाम से जाना जाने लगा. जहाँ तक एस्टेरॉयड के ख़तरे की बात है तो 1994 में ऐसी किसी टक्कर में मारे जाने की आशंका को किसी भयावह भूकंप के ख़तरे से ज़्यादा प्रबल बताया गया यानि 20 हज़ार में एक. लेकिन चार साल बाद अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने ऐसे सारे संभावित ख़तरों की गिनती की. नासा ने बताया कि कोई 700 एस्टेरॉयड ऐसे हैं जो कभी न कभी धरती का रुख़ कर सकते हैं. ऐसे में एस्टेरॉयड की टक्कर से मरने की आशंका घट कर 2,00,000 में एक कर दी गई. हालाँकि इस तरह की वैज्ञानिक गणनाओं पर पूरी तरह भरोसा भी नहीं किया जा सकता.

ख़ैर, दिसंबर 2004 में वैज्ञानिकों ने पाया कि 400 मीटर आकार का एक उल्का-पिंड वर्ष 2029 में धरती से टकरा सकता है. इस एस्टेरॉयड को विनाश के ग्रीक देवता एपोफ़िस का नाम दिया गया. और तोरिनो पैमाने पर इसे नंबर दिया गया 4. विश्वास करें कि किसी भी उल्का-पिंड को ख़तरे की दृष्टि से दिया गया यह सबसे बड़ा नंबर है. हालाँकि हाल के महीनों में ज़्यादा सही गणना का दावा करते हुए कहा गया है कि शायद एपोफ़िस धरती के बगल से गुजर जाए. लेकिन बेफ़िक्र होने की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि वैज्ञानिकों को मालूम नहीं कि 2029 में धरती के पास गुजरते वक़्त धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति एपोफ़िस की कक्षा और गति पर क्या असर करेगी. और भगवान न करे, कुछ गड़बड़ हुआ तो एपोफ़िस 2035-36 में एक बार फिर धरती माता को टक्कर देने की स्थिति में होगा.

भगवान बचाए. शुभ-शुभ!

चलते-चलते प्रस्तुत हैं 'गूगल अर्थ' के सौजन्य से दो अंतरराष्ट्रीय सामरिक ठिकानों के चित्र. (चित्र भारतीय सनसनी मीडिया के लिए हैं, न कि चरमपंथियों के लिए)-

पेंटागन, वाशिंग्टन, डीसी


बकिंघम पैलेस, लंदन