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सोमवार, मई 14, 2007

ड्रेनपाइप में होटल

द पार्क होटल, ऑतेनशाइम, ऑस्ट्रियाकोई ज़रूरी नहीं कि विवादों से ही कला को मान्यता मिलती हो. यदि कलाकार व्यावहारिक और उपयोगी कृतियाँ बनाए तो न सिर्फ़ उसकी दुनिया भर में चर्चा होती है, बल्कि उसकी तारीफ़ भी होती है.

चर्चा और सराहना का ये शुभ-संयोग ऑस्ट्रिया के आंद्रियास स्ट्रॉस के नाम भी आया है. स्ट्रॉस कला की शिक्षा ले रहे हैं. यूरोप के अधिकांश छात्रों की तरह ही उन्हें भी बैकपैकिंग या कम पैसे ख़र्च करते हुए लंबी-लंबी पर्यटन यात्राएँ करने का शौक है. और इन यात्राओं के दौरान उन्हें सस्ते होटलों की गंदगी का अनुभव हुआ. स्ट्रॉस ने अपनी पहली प्रमुख कलाकृति में अपने इसी अनुभव की रचनात्मक भड़ास निकाली. और जन्म हुआ, एक बहुत ही साफ़-सुथरे 'होटल' का.

इस होटल में अभी मात्र तीन कमरे हैं. तीनों कमरे Ottensheim शहर में डैन्यूब के किनारे एक पार्क में रखे हुए हैं. जी हाँ रखे हुए हैं...क्योंकि ये कोई आम कमरे नहीं, बल्कि शहरों के नाले में प्रयुक्त कंक्रीट की पाइप के परिवर्तित रूप हैं.

तीन कमरों या यूनिटों की इस व्यवस्था को नाम दिया गया है- Das Park Hotel या 'द पार्क होटल'. कंक्रीट की ड्रेनपाइप में डबल-बेड लगाया गया है. दो मीटर व्यास वाली पाइप में अच्छी-ख़ासी जगह है. इसलिए इसमें एक छोटे स्टोरेज-स्पेस या अलमारी की व्यवस्था भी संभव हो सकी है. इसमें एक लैम्प है, एक खिड़की है और मोबाइल फ़ोन, आइपॉड आदि को चार्ज करने के लिए एक प्लग-प्वाइंट भी है.

ड्रेनपाइप का...माफ़ कीजिए... कमरे का दरवाज़ा, इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था से खुलता है. मतलब कमरा छोड़ कर आप पास के सार्वजनिक शौचालय या रेस्तराँ तक गए तो आपकी चीज़ें पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी. क्योंकि आपके द्वारा रिज़र्व किए गए समय में कमरे को खोलने का यूनिक़-कोड सिर्फ़ आपके पास होगा.

ड्रेनपाइप में रहने का स्वप्निल अनुभव...और कहीं ये तो नहीं सोच रहे कि रात में आप सो रहे हों और शरारती तत्व ड्रेनपाइप को लुढ़का कर डैन्यूब में गिरा दे! नहीं जनाब, ऐसा संभव नहीं दिखता. एक तो ऑस्ट्रिया के इस शहर में लुच्चे-लफंगों का आतंक नहीं, और दूसरे किसी ने शरारत करने की ठानी भी तो कम-से-कम क्रेन की व्यवस्था तो करनी ही होगी...क्योंकि हर ड्रेनपाइप नौ टन वज़नी है!

यदि पार्क जैसे सार्वजनिक स्थल में संपूर्ण निजता का लुत्फ़ उठाना चाहते हैं, तो देर किस बात की. जल्दी से www.dasparkhotel.net पर जा कर अपना कमरा रिज़र्व कराएँ. कितना ख़र्च आएगा? ये सवाल तो पूछिए भी मत. स्ट्रॉस साहब की यह अनूठी कला-परियोजना Pay As You Wish की व्यवस्था से चलती है. यानि जाको रही भावना जैसी. मतलब जितना आर्थिक सहयोग उचित लगे करें.

ऑस्ट्रिया के स्वप्नदर्शी कला छात्र आंद्रियास स्ट्रॉस के, उन्हीं के शब्दों में, 'a new kind of hospitality-tool in public Space' में आपका स्वागत है!

रविवार, अगस्त 27, 2006

आया ज़माना 'उत्पभोक्ता' का

प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे नित नए विकास के कारण प्रोड्यूसर(उत्पादक) और कंज़्यूमर(उपभोक्ता) का मेल हो रहा है, और जन्म हो रहा है 'प्रोज़्यूमर' का. प्रोज़्यूमर जिसे हिंदी में 'उत्पभोक्ता' कहा जा सकता है. यह सिद्धांत एल्विन टोफ़लर का है.

एल्विन टोफ़लर 77 साल के भविष्यद्रष्टा हैं. कोई ज्योतिषी नहीं बल्कि बिल्कुल शाब्दिक अर्थों में 'भविष्यद्रष्टा' हैं. भविष्य की परिकल्पना करने को उन्होंने अपना पेशा बना रखा है. अपनी पत्नी हेइडि के साथ मिल कर वह भविष्य की दुनिया और समाज के बारे में कई किताबें लिख चुके हैं. अभी हाल ही में उनकी नई किताब आई है- रिवोल्युशनरि वेल्थ. इससे पहले की उनकी किताबों में 'फ़्यूचर शॉक' और 'द थर्ड वेव' बहुत ज़्यादा चर्चित रही हैं.

पिछले सप्ताह फ़ाइनेंशियल टाइम्स अख़बार ने उनका विस्तृत साक्षात्कार छापा है. इस साक्षात्कार में टोफ़लर ने भविष्य के समाज की भविष्यवाणी करते हुए प्रोज़्यूमर या उत्पभोक्ता के युग के आगमन की बात की है. उत्पभोक्ता का उदाहरण देते हुए वह बुज़ुर्गों की बढ़ती हुई आबादी की बात करते हैं- "वो दिन दूर नहीं जब दुनिया में साठ साल से ज़्यादा उम्र के लोगों की आबादी एक अरब को पार कर जाएगी. वे नई प्रौद्योगिकी प्रदत्त उपकरणों के ज़रिए अपनी बीमारी का पता करने से लेकर नैनोटेक्नोलॉजि आधारित उपचार तक, वो सब काम कर रहे होंगे जो कि आज एक डॉक्टर का काम माना जाता है. इससे 'हेल्थ-सेक्टर' के कामकाज़ का तरीक़ा पूरी तरह बदल जाएगा." टोफ़लर अपने इस उदाहरण को और ज़्यादा फैलाते हुए बताते हैं कि धनरहित अर्थव्यवस्था वाला बुज़ुर्गों का समाज भविष्य में चिकित्सा प्रौद्योगिकी के बाज़ार को बहुत तेज़ी से आगे बढ़ाएगा, और इस क्रम में कुछ लोग भारी मात्रा में पैसा बनाएँगे.

एल्विन टोफ़लर कहते हैं कि प्रोज़्यूमिंग या उत्पभोग कई मामलों में आउटसोर्सिंग को नया अर्थ देता है. इस प्रकार की आउटसोर्सिंग में काम सस्ते दर पर भारत या फ़िलिपींस की कोई कंपनी नहीं करा रही होती है, बल्कि उपभोक्ता ख़ुद मुफ़्त में काम कर रहा होता है. इस प्रक्रिया के उदाहरण में वो बैंक टेलर काउंटरों की जगह एटीएम मशीनों के इस्तेमाल के चलन का उल्लेख करते हैं.

अर्थव्यवस्था के भावी स्वरूप की चर्चा करते हुए टोफ़लर एक चौंकाने वाली घोषणा करते हैं- 'प्रोज़्यूमर युग में धन का एक बड़ा स्रोत का धरती से 12,000 मील ऊपर टिका हुआ है'. वह कहते हैं- "ग्लोबल पोज़ीशनिंग उपग्रह आज मोबाइल फ़ोन से लेकर एटीएम मशीनों तक अनेक प्रक्रियाओं में 'टाइम और डाटा स्ट्रीम' को परस्पर संतुलित रखने के लिए ज़िम्मेदार हैं. एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल के भी केंद्र में जीपीएस ही है. मौसम की सटीक भविष्यवाणी के ज़रिए उपग्रह कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए भी ज़िम्मेदार हैं." ऐसे में जब टोफ़लर कहते हैं कि 'Wealth today is created everywhere(globalisation), nowhere(cyberspace) and out there(outer space)', तो उनकी बात में दम लगता है.

'मास्टर थिंकर' माने जाने वाले टोफ़लर के अनुसार आर्थिक व्यवस्था के विविध रूप सामने आते जाने का प्रभाव हमारे व्यक्तिगत जीवन पर भी पड़ रहा है. वह कहते हैं, "परिवार ख़त्म नहीं होगा, लेकिन पारिवारिक व्यवस्था के नए रूपों का उदय ज़रूर होगा. समलैंगिकों की शादी को स्वीकृति मिलती जा रही है. अकेली माताओं, अविवाहित युगलों, बिना बाल-बच्चे वाले विवाहित जोड़ों और कई-कई शादियाँ कर चुके माता-पिता हर समाज में देखे जा रहे हैं. एक साथी के साथ ज़िंदगी गुजारने का चलन भले ही ख़त्म नहीं हो, लेकिन एकाधिक साथियों के साथ संबंध को व्यापक स्वीकृति मिलने लगेगी."

टोफ़लर का कहना है कि कामकाज़ में मानकीकरण की ज़रूरत कम होते जाने के साथ ही ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग अपनी इच्छा के अनुसार(customised time में) काम करेंगे. उत्पभोक्ता नौकरी या करियर के बज़ाय 'creative piece work' में लगे रहेंगे. ज़्यादा-से ज़्यादा कामकाज़ कारखाने या दफ़्तर के बज़ाय घर में होगा.

इतने परिवर्तन से समाज में उथलपुथल नहीं मच जाएगी क्योंकि हर समाज में एक बड़ी संख्या यथास्थितिवादियों की होती है? इस सवाल के जवाब में टोफ़लर का कहना है कि पूरी दुनिया में जगह-जगह wave conflict या 'धारा संघर्ष' शुरू हो जाएगा. इस संबंध में वो पिछले दिनों मेक्सिको में हुए चुनाव का ज़िक्र करते हैं जहाँ दो पक्षों के बीच लगभग 50-50 प्रतिशत मत बँटे. पहले पक्ष के साथ थे 'पहली धारा' के दक्षिणी हिस्से के किसान और 'दूसरी धारा' के शहरी श्रमिक संघ, जबकि दूसरे पक्ष में थे 'तीसरी धारा' के उत्तरी हिस्से के संपन्न लोग जिन्हें क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग संधि नाफ़्टा और भूमंडलीकरण का ज़्यादा फ़ायदा मिला है. टोफ़लर की मानें तो चीन, ब्राज़ील और कई अन्य देशों में भी इस तरह के शक्ति परीक्षण की आशंका बढ़ गई है.

अमरीका में विभिन्न संस्थाओं और संस्थानों को वो पुराने और नए के बीच clash of speeds या 'गति के संघर्ष' में फंस गया मानते हैं. टोफ़लर के अनुसार यदि कल्पना करें कि अमरीकी व्यवसाय जगत 100 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रहा है, तो भविष्य के लिए युवाओं को तैयार करने की ज़िम्मेदारी उठाने वाले शिक्षण संस्थान मात्र 10 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से आगे बढ़ रहे हैं. निराश स्वर में उन्होंने कहा- "इस क़दर 'डिसिन्क्रोनाइज़ेशन' के रहते आप एक सफल अर्थव्यवस्था नहीं पा सकते." जापान को भी वह इसी कसौटी पर पिछड़ता जा रहा मानते हैं. अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बात करें तो 'प्रीमाडर्न इस्लाम' और 'पोस्टमाडर्न उपभोक्ताओं' के बीच टोफ़लर को इसी तरह का डिसिन्क्रोनाइज़ेशन दिखता है.

'फ़ाइनेंशियल टाइम्स' के इंटरव्यू के अंतिम हिस्से में टोफ़लर से पूछा गया कि उनकी भविष्यवाणियाँ ग़लत भी साबित हुई हैं, तो उन्होंने ईमानदारी से कई ग़लत निकली भविष्यवाणियों की चर्चा की- "हमने मानव और पशु क्लोनिंग की 1970 के दशक में चर्चा करते हुए कहा था कि 1980 के दशक के मध्य तक ये आम वास्तविकता बन जाएगी. हमने विज्ञान की धीमी गति को नज़रअंदाज़ कर दिया था. इस संबंध में हमने नैतिक सवालों की बात की थी, लेकिन हमने विज्ञान-विरोधी ईसाई दक्षिणपंथियों की ताक़त का अंदाज़ा नहीं लगाया था,...इसी तरह काग़ज़रहित ऑफ़िस की हमारी भविष्यवाणी भी अब तक वास्तविकता नहीं बन पाई है."

शुक्रवार, अगस्त 18, 2006

राष्ट्रपति अहमदीनेजाद का ब्लॉग

पश्चिमी दुनिया में एक उजड्ड किस्म के व्यक्ति के रूप में देखे जाने वाले ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने इसी हफ़्ते अपना ब्लॉग www.ahmadinejad.ir शुरू कर तथाकथित संभ्रांत और हाईटेक राजनेताओं को चौंका दिया है.

आपको याद होगा कि इससे पहले ईरान के ही पूर्व उपराष्ट्रपति मुल्ला मोहम्मद अली अबताही के लोकप्रिय ब्लॉग से पश्चिमी दुनिया को झटका लगा था. तब प्रतिष्ठित विज्ञान जर्नल 'न्यू साइंटिस्ट' में हाईटेक मुल्ला अबताही का दो पन्ने का इंटरव्यू छापा गया था.

मुल्ला अबताही फ़ारसी के साथ-साथ अंग्रेज़ी में भी लिखते हैं, जबकि राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के ब्लॉग को फ़ारसी के अलावा अंग्रेज़ी, फ़्रेंच और अरबी भाषा में भी डाला गया है. ज़ाहिर है अहमदीनेजाद अपनी जनता के साथ-साथ दुनिया भर के लोगों से भी सीधा संवाद करना चाहते हैं.

अपने ब्लॉग की पहली प्रविष्टि को राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने आत्मपरिचय पर केंद्रित रखा है. ख़ास कर, उन्होंने अपनी निर्धन और अविशिष्ट पृष्ठभूमि का ज़िक्र किया है. अहमदीनेजाद अपने लेख की शुरूआत में ईरान के तत्कालीन शाह मोहम्मद रज़ा के भ्रष्ट शासन का ज़िक्र करते हैं-

During the era that nobility was a prestige and living in a city was perfection, I was born in a poor family in a remote village of Garmsar-approximately 90 kilometer east of Tehran. I was born fifteen years after Iran was invaded by foreign forces- in August of 1940- and the time that another puppet, named mohammad Reza – the son of Reza Mirpange- was set as a monarch in Iran. Since the extinct shah -Mohammad Reza- was supposed to take and enter Iran into western civilization slavishly, so many schemes were implemented that Iran becomes another market for the western ceremonial goods without any progress in the scientific field.

अपने पिता की तारीफ़ करते हुए ईरानी राष्ट्रपति ने लिखा है-

My family was also suffered in the village as others. After my birth -the fourth one in the family- my family was under more pressures. My father had finished 6 grade of elementary school. He was a hard-bitten toiler blacksmith, a pious man who regularly participated in different religious programs. Even though never the dazzling look of the world was appealing to him, but the pressure of the life caused that he decided to migrate to Tehran when I was one year old. We chose to live in south central part of Tehran where is called Pamenar.

अमरीकी पिट्ठू शाह रज़ा के प्रति अपनी घृणा और अयातुल्ला ख़ुमैनी के प्रति अपने आदर भाव को अहमदीनेजाद से खुल कर व्यक्त किया है-

My father used to buy newspaper all the time. I remember one day, when I was in first grade, by looking through a newspaper – with the help of the adults in our house- I read the news of the capitulation passage by the shah’s so called “parliament.” Even though I did not understand the meaning of that issue at that time, but due to the protests and the objections of the religious schools of thoughts with the leadership of Imam Khomeini -Almighty God bless his soul- and the relentless reaction of the extinct shah, I realized that Mohammad Reza attempted to add another page to his vicious case history which was the humiliation and indignity of the Iranian people versus Americans. That was the year that the extinct shah slaughtered many followers of Imam Khomeini.

राष्ट्रपति अहमदीनेजाद इस बात को भी रेखांकित करना नहीं भूलते कि वह शुरू से ही पढ़ाई-लिखाई में तेज रहे हैं. हालाँकि स्कूल के दिनों में घर की ख़स्ताहाल आर्थिक हालत के चलते उन्हें नौकरी भी करनी पड़ती थी. अहमदीनेजाद गर्व से ज़िक्र करते हैं कि विश्विद्यालय की प्रवेश परीक्षा में कैसे उन्होंने चार लाख प्रतियोगियों में उन्होंने 132वाँ स्थान पाया था-

I was a distinguished student. From that time, I was interested and attached to teaching. I used to teach my friends and others in their houses. The last year of my high school, I prepared myself for university admission test-conquer. And later on that year, I took the test. Although I had nose bleeding during the test, but I became 132nd student among over 400 thousand participants. I was admitted for civil engineering major in one of the technical universities in Tehran. That was three years before the revolution. Even though the revolution was taking place and I was involved in certain activities against the illegitimate regime of the monarch in Iran-the mercenary & puppet of U.S. & Britain- but I was aware of my education and did not give it up.

राष्ट्रपति अहमदीनेजाद का ब्लॉग चार भाषाओं में होने के अलावा इंटरएक्टिव भी है. आप उनके पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया लिख सकते हैं. उनके पोस्ट पर प्रतिक्रिया के अलावा आप राष्ट्रपति से सीधा सवाल पूछना चाहते हैं तो उसकी भी व्यवस्था है.

अहमदीनेजाद के ब्लॉग पर पाठकों के लिए एक सवाल भी है- क्या आपको लगता है कि लेबनान पर हमला कर अमरीका और इसराइल का उद्देश्य एक और विश्व युद्ध शुरू करने का है? इसके उत्तर में 'हाँ' या 'नहीं' पर क्लिक करना है. और आज की तिथि में ढाई लाख से ज़्यादा वोट पड़ने के बाद 56 प्रतिशत की राय है- नहीं.

राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने अपने ब्लॉग की पहली प्रविष्टि बड़ी लिखी है, यानि क़रीब 2300 शब्दों की. आत्मकथात्मक है इसलिए भावनाओं को शब्दों की सीमा में बाँधने की मुश्किलों को समझा जा सकता है. हालाँकि उन्होंने आश्वस्त किया है कि आगे से प्रविष्टियाँ छोटी हुआ करेंगी.

हो सकता है ईरान के हाई-प्रोफ़ाइल नेताओं के मुक्त जनसंचार की आधुनिकतम विधा वेबलॉग या ब्लॉग अपनाने पर कुछ लोगों को आश्चर्य हो, लेकिन मुझे तो लगता है कि एक बार फिर कंप्यूटिंग अपने जन्मस्थान की ओर लौट रहा है. भले ही कुछ लोगों को लगता हो कि कंप्यूटिंग की शुरूआत महाशक्तिमान अमरीका ने की है, लेकिन इतिहास की सतह को थोड़ा-सा खुरचने मात्र से ही इस दावे की पोल खुल जाती है. किसे नहीं पता कि कंप्यूटिंग की जान है- 0 (शून्य या ज़ीरो). शून्य की खोज हुई भारत में, और इस खोज को पश्चिमी जगत तक पहुँचाया प्राचीन मध्य-पूर्व के विद्वानों ने अपने अरबी-फ़ारसी साहित्य के ज़रिए. सीधी-सी बात है, शून्य के बग़ैर कंप्यूटिंग और कंप्यूटर का अस्तित्व नहीं होता.

मंगलवार, अगस्त 08, 2006

अच्छा हुआ कोलंबस भारत नहीं पहुँचा

कोलंबसये जाना माना तथ्य है कि महान नाविक क्रिस्टोफ़र कोलंबस भारत और पूर्वी एशियाई देशों के लिए सीधा समुद्री रास्ता खोजने के नाम पर कैरीबियन द्वीपों के रास्ते अमरीका तक पहुँचा था.

कोलंबस का इस बात पर पक्का यक़ीन था कि धरती गोल है, लेकिन तब मौज़ूद अपूर्ण भौगोलिक सूचनाओं के आधार पर कोलंबस को ये ग़लतफ़हमी हो गई थी कि यूरोप से पश्चिम की ओर समुद्री यात्रा करते हुए महान पूर्वी सभ्यताओं तक पहुँचने में बहुत ज़्यादा दूरी नहीं तय करनी पड़ेगी.

कोलंबस अपनी यात्रा के लिए पहले पुर्तगाल के शासक की शरण में गया, लेकिन पुर्तगालियों को एक तो कोलंबस की दलीलों में ज़्यादा दम नहीं दिखा, और दूसरा पुर्तगाली ख़ुद अफ़्रीकी महाद्वीप का चक्कर लगाते हुए भारत पहुँचने की योजना में लगे हुए थे. लंबे समय तक चली बातचीत के बाद अंतत: स्पेन के शासकों ने कोलंबस की यात्रा में पैसा लगाने की हामी भरी.

वो तो अच्छा हुआ कोलंबस भारत पहुँचने से रह गया, वरना स्पेन के शासकों के साथ उसके क़रार के अनुसार वो भारत या कम-से-कम भारत के किसी इलाक़े का गवर्नर या वॉयसराय तो ज़रूर ही होता. ऐसा होने पर भारतीय आबादी को कोलंबस के कुशासन और उसकी क्रूरता का उसी प्रकार सामना करना पड़ता जैसा कि कैरीबियन जनता को करना पड़ा.

स्पेन में मिले पाँच सदी पहले के एक दस्तावेज़ में महान नाविक कोलंबस के चरित्र के काले पक्ष को विस्तार से उजागर किया गया है. दस्तावेज़ में कोलंबस पर चलाए गए मुक़दमे का विवरण है. इसमें बताया गया है कि इंडीज़(कोलंबस ने कैरीबियन द्वीपों को भारत का हिस्सा मानते हुए यही नाम दिया था) का गवर्नर और वॉयसराय रहने के दौरान महान नाविक कोलंबस क्रूरता की सीमाओं का लाँघ गया था. कोलंबस के तानाशाही शासन में दी जाने वाली सज़ाओं में शामिल थे: लोगों के नाक-कान कटवा देना, औरतों को सरेआम नंगा घुमाना और लोगों को ग़ुलामों के रूप में बेचना.

जिस दस्तावेज़ में कोलंबस की तानाशाही का सबूत मिला है वो दरअसल कोलंबस पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच-रिपोर्ट है. स्पेन के राजा फ़र्डिनांड और रानी इसाबेला के आदेश पर यह जाँच फ़्रांसिस्को डि बोबादिला ने की थी जो कि पद से हटाए गए कोलंबस की जगह इंडीज़ का गवर्नर बना. बोबादिला की जाँच-रिपोर्ट स्पेनी शहर वलादोलिद के पुरालेखागार में धूल फाँक रही थी. पिछले साल एक इतिहासकार की नज़र इस 48 पेजी दस्तावेज़ पर पड़ी, और अब 2006 में इसे सार्वजनिक किया जा सका, जो कि कोलंबस की 500वीं बरसी का साल है. कोलंबस का 1506 में एक धनी किंतु बदनाम व्यक्ति के रूप में निधन हो गया था.

बोबादिला की जाँच-रिपोर्ट का अध्ययन करने वाले दो इतिहासकारों के अनुसार इसमें इंडीज़ में सात साल के शासन के दौरान कोलंबस और उसके भाइयों की करतूतों का ख़ुलासा है. कैरीबियन द्वीपों, ख़ास कर मौज़ूदा डोमिनिकन गणतंत्र वाले इलाक़े, से आने वाली अत्याचार की ख़बरों ने स्पेन के शासकों को बाध्य किया कि वो कोलंबस को वापस बुलाएँ. कोलंबस को बेड़ियों में जकड़ कर स्पेन लाया गया. उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा चला जिसके लिए बोबादिला ने 23 गवाहों से सबूत जुटाए. कोलंबस की पदवी छीन ली गई, हालाँकि उसे कोई कड़ी सज़ा नहीं दी गई.

ये सब जानने के बाद यही लगता है कि चलो अच्छा हुआ जो कोलंबस भारत तक नहीं पहुँचा.

सोमवार, जुलाई 24, 2006

ब्रितानी साम्राज्य की ख़ूनी विरासत

आधुनिक इतिहास में जितना विवादास्पद अध्याय ब्रितानी साम्राज्य का है, उतना और कुछ नहीं. ब्रितानी साम्राज्य की अच्छाइयों और बुराइयों की लंबी सूची लिए लोग आपको पूरी दुनिया में मिल जाएँगे. इस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा विवाद या बहस ब्रिटेन और भारत में देखने को मिलती है.

नियल फ़र्गुसनब्रिटेन के एक अत्यंत ही प्रतिभाशाली इतिहासकार हैं- प्रोफ़ेसर नियल फ़र्गुसन. मात्र 42 साल के हैं, यानि इतनी उम्र जब आमतौर पर इतिहासकारों के दूध के दाँत टूटते हैं. फ़र्गुसन के लेखन पर दुनिया भर में बहस छिड़ जाती है. वो ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे. लेकिन जब ब्रिटेन में उतना भाव नहीं मिला तो अटलांटिक पार का रुख़ किया और अमरीका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में जा टिके. वहाँ इतिहास के प्रोफ़ेसर हैं, हालाँकि अब भी किसी न किसी रूप में ऑक्सफ़ोर्ड से भी नाता जोड़ रखा है. स्टैनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से भी रिश्ता है.

अब नियल फ़र्गुसन की ताज़ा किताब द वार ऑफ़ द वर्ल्ड चर्चा में है. इसे लेकर उन्होंने चैनल4 के लिए एक धांसू डॉक्यूमेंट्री भी बना डाली है. प्रोफ़ेसर फ़र्गुसन ने अपनी ताज़ा किताब में इस बात को जम कर उछाला है कि पिछली सदी मानव इतिहास की सबसे ख़ूनी सदी थी. इस बात पर किसी को ज़्यादा आपत्ति भी नहीं. लेकिन अनेक लोगों को फ़र्गुसन की किताब में ब्रितानी साम्राज्य की तारीफ़ किए जाने पर आपत्ति है.

ब्रितानी साम्राज्य के बारे में फ़र्गुसन से बिल्कुल विपरीत मान्यता रखने वाले ब्रिटेन के ही एक इतिहासकार हैं- रिचर्ड गॉट. रिचर्ड गॉटवो ब्रितानी साम्राज्य का प्रतिरोध करने वालों को केंद्र में रख कर एक किताब लिख रहे हैं. अभी पिछले दिनों उन्होंने गार्डियन अख़बार में एक लेख में ब्रितानी साम्राज्य की ख़ूनी विरासत की चर्चा की. रिचर्ड गॉट का कहते हैं कि दुनिया में अनेकों मौज़ूदा संघर्ष उन क्षेत्रों में हो रहे हैं जो पहले ब्रितानी साम्राज्य का हिस्सा थे, और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद थके और लुटे-पिटे साम्राज्यवादियों ने जहाँ से निकलने में अपनी भलाई समझी थी. उन इलाकों में से अधिकांश आज दुनिया में हिंसा और अस्थिरता के स्रोत माने जाते हैं.

ये रही ब्रितानी साम्राज्य की ख़ूनी विरासत की एक संक्षिप्त सूची:

1. फ़लस्तीनी क्षेत्र- एक ब्रितानी उपनिवेश जिसे उसने मात्र 30 वर्षों के शासन के बाद 1947 में छोड़ दिया. अपने अधिकतर उपनिवेशों की तरह यहाँ भी अंग्रेज़ों ने यूरोपीय लोगों को लाकर बसाया. दुर्भाग्य से बाहर लाकर थोपे गए लोगों के पास इतना समय नहीं था कि वे स्थानीय लोगों पर पूरी तरह काबू पा सकें(जैसा कि ऑस्ट्रेलिया के मामले में हुआ था), क्योंकि उस दौरान ब्रितानी साम्राज्य का सूरज अस्ताचलगामी हो चुका था. ऑस्ट्रेलिया के स्थानीय लोगों यानि आदिवासियों के विपरीत फ़लस्तीनियों ने साम्राज्यवादियों द्वारा लाकर पटके गए यहूदियों का प्रतिरोध पहले दिन से ही शुरू कर दिया. अरब जगत के समर्थन और अपनी धार्मिक परंपराओं से ली गई प्रेरणा के बल पर उनका प्रतिरोध लगातार चलता रहा, और आगे भी जारी रहेगा.

2. सियरालियोन- अपनी नीति के अनुरूप ब्रितानी साम्राज्यवादियों ने यहाँ भी बाहर से लाकर लोगों को बसाया. बाहर से लाए गए लोग थे तो अश्वेत ही, लेकिन मुख्य तौर पर ईसाई. दूसरी ओर जब ये सब हो रहा था सियरालियोन के स्थानीय लोग इस्लाम के प्रभाव में पूरी तरह आ चुके थे. सियरालियोन में ब्रितानी शासकों का ज़ोरदार प्रतिरोध हुआ. और अब स्थानीय लोगों और बाहर से लाकर बसाई गई आबादी के बीच संघर्ष रह-रह कर गृहयुद्ध का रूप ले लेता है.

3. अन्य अफ़्रीकी देश- दक्षिणी अफ़्रीका, ज़िम्बाब्वे और कीनिया में भी बाहर से लाकर बसाए गए लोगों और स्थानीय आबादी के बीच मनमुटाव बना हुआ है. हालाँकि इन देशों में बसाए गए लोग अब रक्षात्मक मुद्रा में आने को मज़बूर हो चुके हैं.

4. श्रीलंका और फ़िजी- इन दो देशों में अंग्रेज़ों ने अलग तरह का खेल खेला. यहाँ भारत से मज़दूर बना कर लाए गए लोगों को स्थानीय आबादी पर थोपा गया. हालाँकि ब्रितानी साम्राज्यवादी भारत से लोगों को अपने बगानों में काम कराने के लिए लाए थे, लेकिन उपनिवेश के ख़ात्मे के बाद स्थानीय आबादी और भारत से लाए गए लोगों के बीच जो मनमुटाव शुरू हुआ, वो आज भी बहुत तल्ख़ है. श्रीलंका में सैंकड़ो लोग हर साल इस ख़ूनी विरासत की भेंट चढ़ते हैं.

5. उत्तरी आयरलैंड- ब्रिटेन का हिस्सा बने उत्तरी आयरलैंड में स्थानीय कैथोलिक आबादी पर प्रोटेस्टेंट ईसाइयों को थोपा गया. कोई आश्चर्य नहीं कि आधुनिक आतंकवाद का जन्म वहीं उत्तरी आयरलैंड में ही हुआ.

6. भारत- द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद के काल में साम्राज्यवादियों ने जिस हड़बड़ी में भारत को विभाजित करते हुए छोड़ा. विलायती शासकों ने ये भी नहीं सोचा कि जिस उपमहाद्वीप को दो शताब्दियों तक एकजुट रखने का श्रेय उन्हें दिया जाता हो, उसे सांप्रदायिक आधार पर बाँटते हुए भागना कितना उचित था. इतनी हड़बड़ी थी कि कश्मीर पर कोई सर्वमान्य फ़ैसला करने की भी ज़रूरत नहीं समझी गई. भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे पर कितना संदेह करते हैं, और कश्मीर का नासूर भारत की कितनी ऊर्जा खींचता है, बयान करने की ज़रूरत नहीं.

7. साइप्रस- भारत की तरह ही ब्रितानी साम्राज्यवादियों ने साइप्रस को भी बुरी तरह दो हिस्सों में बाँट दिया. दोनों हिस्सों की आबादी एक-दूसरे पर कभी भरोसा नहीं कर सकी. शर्मनाक रूप से ब्रिटेन अब भी साइप्रस में दो संप्रभु सैनिक अड्डे बनाए हुए हैं, विभाजित साइप्रस पर निगरानी रखने के लिए.

8. नाइजीरिया और सोमालिया- अंग्रेज़ साम्राज्यवादियों ने नाइजीरिया को अपनी ज़रूरतों के हिसाब से कृत्रिम रूप से एक राष्ट्र का रूप दिया, जबकि सोमालिया को अपनी सुविधा के लिए पहले उपनिवेश बनाया और बाद में अपनी ज़रूरतों के अनुरूप ही उसे उसके हाल पर छोड़ा. दोनों देशों के भीतर आबादी के बीच स्पष्ट विभाजन और परस्पर घृणा देखी जा सकती है.

9. इराक़- इराक़ ब्रितानी साम्राज्य में शामिल होने वाला अंतिम क्षेत्र था, और साम्राज्य की पकड़ से बाहर होने वाला पहला देश. इराक़ से ब्रितानी सैनिक अड्डे 1950 के दशक में जाकर हटाए गए. आज इराक़ में अघोषित गृहयुद्ध चल रहा है, और विडंबना देखिए कि बसरा वाले इलाक़े में सुरक्षा स्थापित करने का ज़िम्मा ब्रिटेन के हाथों में है.

10. अफ़ग़ानिस्तान- ब्रितानी साम्राज्य के दिनों में कहने को तो अफ़ग़ानिस्तान स्वतंत्र रहा, लेकिन असल में उस पर साम्राज्यवादियों की पूरी पकड़ रही. अंग्रेज़ों ने अफ़ग़ानों से तीन ख़ूनी युद्ध लड़े. चौथे युद्ध के लिए एक बार फिर ब्रितानी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में हैं, और लगता नहीं कि पिछले तीन मौक़ों के विपरीत उन्हें इस बार जीत नसीब होगी.

शनिवार, जून 17, 2006

पहले अरबपति व्यवसायी, अब संतुष्ट किसान

स्टर्लिगोफ़इस बार एक और सच्ची कहानी जो धन और धन के बल पर हासिल झूठी प्रतिष्ठा को सुख-शांति छीन लेने वाला मायाजाल साबित करती है.

यह कहानी है गेरमान स्टर्लिगोफ़ की. पिछले कुछ महीनों से स्टर्लिगोफ़ की कहानी मीडिया, ख़ास कर रूसी मीडिया में आ रही थी. लेकिन अब लंदन से प्रकाशित संडे टाइम्स में छपने के बाद दुनिया भर में इसे चर्चा मिली है.

गेरमान स्टर्लिगोफ़ को रूस का पहला अरबपति माना जाता है. जब गोर्बाच्येव की नीतियों के चलते सोवियत संघ का विखंडन हुआ और रूस में कम्युनिस्ट नियंत्रण का अंत हुआ, तो अफ़रातफ़री और लूट-खसोट के उस माहौल में निर्धन पृष्ठभूमि वाले स्टर्लिगोफ़ ने देश का पहला कमॉडिटीज़ एक्सचेंज शुरू किया. इस उद्यम ने 24 साल की उम्र में ही उन्हें एक अरबपति बना दिया.

जल्दी ही स्टर्लिगोफ़ की कंपनी के दफ़्तर न्यूयॉर्क और लंदन में भी खुल गए. स्टर्लिगोफ़ अपने परिवार के साथ रूसी राजधानी मॉस्को के सबसे महंगे इलाक़े में चार मंज़िले बंगले में रहने लगे. उनके पास महंगी कारों का काफ़िला था, स्वयं के दो जेट विमान थे. मॉस्को में किसी के पास इतना पैसा हो और वह खुलेआम घूम सके ऐसा तो संभव ही नहीं. स्टर्लिगोफ़ को भी कुख़्यात रूसी माफ़िया ने अपना निशाना बनाया और मोटी रकम की माँग लगातार आने लगी. ऐसे में स्टर्लिगोफ़ ने पैसे देकर रूसी सुरक्षा बल के 60 कमांडो सैनिकों को अपनी सुरक्षा का भार सौंपा.

स्टर्लिगोफ़ ने देश का राष्ट्रपति बनने का भी प्रयास किया और व्लादिमीर पुतिन के ख़िलाफ़ चुनावपूर्व प्रचार अभियान में करोड़ों रूबल ख़र्च भी किए. हालाँकि उनके नामांकन को तकनीकी आधार पर रद्द कर दिया गया, और पुतिन को टक्कर देने की हसरत उनके दिल में ही रह गई. बाद में उन्होंने रूस के साइबेरियाई भाग के एक प्रांत का गवर्नर बनने की भी नाकाम कोशिश की.

आज स्टर्लिगोफ़ 39 साल के हैं और मॉस्को से 100 मील दूर एक निर्जन स्थान पर रहते हैं. तीन बेडरूम वाले उनके लकड़ी के घर में न बिजली है और न गैस आपूर्ति. यहाँ तक की खेत के बीचोंबीच पेड़ों के झुरमुट के बीच बने उनके घर तक पहुँचने के लिए सड़क तक नहीं है. पत्नी एलेना और पाँच बच्चों के साथ निकटतम पड़ोसी से सात मील दूर रह रहे स्टर्लिगोफ़ किसान की ज़िंदगी अपना कर बहुत ख़ुश हैं.

छात्र जीवन में कॉलेज की पढ़ाई छोड़ एक फ़ैक्ट्री में काम करने को मजबूर होने वाले स्टर्लिगोफ़ ने कहा, "जब साम्यवाद का अंत हुआ, मैं पैसा बनाना चाहता था. इतना पैसा जितना की बनाया जाना संभव हो."

उन्होंने कहा, "जब मैंने करोड़ों की रकम बना ली तो मुझे महसूस हुआ कि मॉस्को में धनपतियों का जीवन ग़ुलामी वाला है. दिन का हर मिनट तनावपूर्ण सौदेबाज़ी में या फ़ालतू की बैठकों में लग जाता था. ऐसी ज़िंदगी का कोई मतलब नहीं था."

स्टर्लिगोफ़ ने आगे कहा, "हम सोने के पिंजड़े में रह रहे थे. मैं अपने बच्चों को उस अनैतिक ज़िंदगी से दूर पालना चाहता हूँ. मैंने उस बनावटी ज़िंदगी से सदा के लिए मुँह मोड़ लिया है क्योंकि मैं चाहता हूँ कि मेरे बच्चे जीवन के सच्चे मूल्यों को जानें."

आज शहरी यहाँ तक कि गाँव के शोरगुल से भी दूर रह रहे स्टर्लिगोफ़ परिवार ने ख़ुद को जानबूझकर बाहरी दुनिया से काट रखा है. उनके घर में टेलीफ़ोन, टेलीविज़न, यहाँ तक कि रेडियो तक नहीं है. वह अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते. पास के गाँव के शिक्षक बच्चों को पढ़ाने घर पर आते हैं. ऑर्थोडॉक्स ईसाई स्टर्लिगोफ़ स्वयं अपने बच्चों को धार्मिक शिक्षा भी देते हैं.

ट्रैक्टर, घोड़ा और मशीनगन

खेती के साथ-साथ गाय, सूअर और मुर्गी पालन करने वाले स्टर्लिगोफ़ परिवार के पास एक ट्रैक्टर है, एक घोड़ा है और एक मशीनगन है.

स्टर्लिगोफ़ और एलेनाशायद मशीनगन का नाम आने पर आप चौंकें. इस बारे में स्टर्लिगोफ़ का कहना है कि मॉस्को स्थित अपना महलनुमा मकान बेचने के बाद मिले पैसे से जब उन्होंने गाँव में एक बढ़िया आरामदेह फ़ार्महाउस बनाया तो पड़ोस के गाँव के कुछ शरारती तत्वों ने एक रात उसे जला कर राख में बदल दिया. स्टर्लिगोफ़ के अनुसार धनपतियों से रूसी किसानों की घृणा के कारण हमला किया गया होगा. अब एक पिस्टल तो हमेशा स्टर्लिगोफ़ के साथ रहता है और घर में एक मशीनगन ताकि आइंदा किसी हमले से निपटा जा सके. घर में सुरक्षा की एक और व्यवस्था भी है- स्टर्लिगोफ़ की सबसे बड़ी संतान 15 वर्षीया बेटी पलगया ने भी तीर-कमान के प्रयोग में कुशलता हासिल कर ली है.

एक समय 2500 लोगों को अपनी कंपनियों में नौकरी देने वाले स्टर्लिगोफ़ के खेत में उनके परिवार के अलावा तीन नौकर काम करते हैं. स्टर्लिगोफ़ ने अपना रहन-सहन बदलने से पहले अपनी पत्नी एलेना की राय नहीं ली, लेकिन नए माहौल से एलेना को कोई शिकायत नहीं है. वह कहती हैं कि वह स्टर्लिगोफ़ की पत्नी हैं, ये अलग बात है कि पहले वह व्यवसायी थे और अब एक किसान. एलेना को एकमात्र शिकायत घर में गर्म पानी की आपूर्ति नहीं होने को लेकर है.

स्टर्लिगोफ़ ने अपनी ज़िंदगी को अब गंभीरता से लेना शुरू किया है या नहीं, इस पर भले ही विवाद हो. लेकिन उन्होंने अपने बिज़नेस को कभी गंभीरता से नहीं लिया. स्टर्लिगोफ़ ने अपने कमॉडिटीज़ एक्सचेंज को अपने प्यारे कुत्ते एलिसा के नाम पर शुरू किया था. एक्सचेंज के कई विज्ञापनों में उन्होंने एलिसा से काम भी लिया. इससे पहले और बाद में भी उन्होंने कई अटपटे लेकिन मुनाफ़े वाले धंधे चलाए. स्टर्लिगोफ़ ने मॉस्को में सार्वजनिक स्थलों और स्टेशनों पर संगीत या कला के ज़रिए पैसा माँगने वाले कलाकारों की एक कोऑपरेटिव बनाई थी. इसी तरह उन्होंने ताबूत बनाने की एक कंपनी भी चलाई.

उनकी ताबूत कंपनी के विज्ञापनों ने रूसी समाज को हिला दिया था. देखिए कुछ नमूने- 'हमारे ताबूत में समाने के लिए आपको कसरत करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.' 'ताज़ा लकड़ी से बने सुगंधित ताबूत.' 'सारे रास्ते हमारी ओर आते हैं.' 'यह आपका ताबूत है, इसे आपका इंतज़ार है.'

स्टर्लिगोफ़ के पैसे कहाँ गए? इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं क्योंकि स्टर्लिगोफ़ ख़ुद पैसे और धन-संपत्ति के बारे में बात करने में दिलचस्पी नहीं लेते. सुनी-सुनाई बातों को मानें तो एक उत्तर है- राष्ट्रपति और गवर्नर बनने की तैयारी में उन्होंने पानी की तरह पैसे बहाए और कर्ज़ के चंगुल में फंस गए. एक और जवाब है- उन्हीं के कुछ कर्मचारियों ने घोटाला कर उन्हें कर्ज़ में डूबने पर मज़बूर कर दिया.

रविवार, मई 21, 2006

अमरीकी स्तंभकार, भारत में असरदार

कहने की ज़रूरत नहीं कि जनसंचार के मौजूदा युग में समाचार का महत्व विचार से कहीं ज़्यादा है. दरअसल सूचना के अधिकार के तमाम नारों के बावजूद सत्ता प्रतिष्ठान और व्यापार जगत के लोग कड़वे सच को आमजनों से दूर रखने की कोशिश करते हैं. ऐसी स्थिति में तथ्यों को ढूँढ निकालने वाले पत्रकारों की नायकों जैसी इज़्ज़त होना स्वाभाविक ही है.

लेकिन समाज पर असर की बात करें तो एक खोजी पत्रकार इस मामले में किसी स्तंभकार से मीलों पीछे छूट जाता है. असल में आज अबाध गति से सूचना प्रवाह हो रहा है, और ऐसे में तथ्यों को सही संदर्भ में रखने वाले समाचार विश्लेषकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो उठी है. एक प्रभावशाली स्तंभकार न सिर्फ़ किसी व्यक्ति या घटना से जुड़े तथ्यों की बारीकी से पड़ताल करता है, बल्कि उसे आमजनों की समझ में आने लायक भाषा में पेश भी करता है. हर स्तंभकार के विश्लेषण में उसकी अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं और पूर्वाग्रहों की छाप देखी जा सकती है. लेकिन किसी स्तंभकार या समाचार विश्लेषक की स्वीकार्यता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि वो व्यापक महत्व के मुद्दों को किस नज़रिये से देखता है और उसका विश्लेषण कितने अकाट्य तर्कों से लैस है.

विश्व जनमत को ढालने में स्तंभकारों की भूमिका का बखान करते हुए फ़ाइनेंशियल टाइम्स अख़बार ने प्रभावशाली स्तंभकारों(कुछ रेडियो-टीवी प्रसारक भी शामिल) की एक अंतरराष्ट्रीय सूची प्रकाशित की है. इस सूची में सबसे चौंकाने वाली बात भारत से जुड़ी है. अख़बार लिखता है कि भारत भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के लिहाज से एक अनूठा देश है, और यहाँ सही मायने में राष्ट्रव्यापी प्रभाव वाले किसी स्तंभकार का अस्तित्व संभव नहीं दिखता. फ़ाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार हिंदुस्तान टाइम्स के प्रेमशंकर झा, इंडियन एक्सप्रेस के शेखर गुप्ता और एशियन एज के एमजे अकबर के स्तंभ भले ही पढ़े जाते हों, लेकिन भारतीय आभिजात्य वर्ग में इस समय न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तंभकार थॉमस फ़्रीडमैन की तूती बोलती है. भारत के कई अख़बार तीन बार पुलित्ज़र पुरस्कार जीत चुके फ़्रीडमैन के न्यूयॉर्क टाइम्स के लेखों को पुनर्प्रकाशित करते हैं.

फ़्रीडमैन को भविष्य में विश्च मंच पर भारत से ढेर सारी उम्मीदें हैं. इस बारे में उन्होंने अपनी हालिया किताब द वर्ल्ड इज़ फ़्लैट में विस्तार से प्रकाश डाला है. वह भारत को सहिष्णुता और स्थायित्व की मिसाल के रूप में प्रस्तुत करते हैं. इन दिनों भारत के बारे में ज़्यादातर अच्छी बातें ही लिखने वाले फ़्रीडमैन कहते हैं, "मुझे पक्षपाती कह लें, लेकिन मेरे दिल में ऐसे देश के लिए विशेष जगह है जहाँ सौ करोड़ लोग हों, सौ से ज़्यादा भाषाएँ हों, अनेक धर्मों का प्रचलन हो और जहाँ नियमित रूप से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जाते हों." फ़ाइनेंशियल टाइम्स ने फ़्रीडमैन का ज़िक्र अमरीका-भारत निकट संबंधों के प्रभावपूर्ण पैरोकार के रूप में भी किया है.

उल्लेखनीय है कि फ़्रीडमैन भारत में सबसे ज़्यादा असरदार स्तंभकार के साथ-साथ अमरीका में प्रभावशाली स्तंभकारों की सूची में भी शामिल हैं. हालाँकि फ़ाइनेंशियल टाइम्स ने अमरीका में सबसे ज़्यादा प्रभावी स्तंभकार वाशिंग्टन पोस्ट के चार्ल्स क्रुथैमर को माना है, और फ़्रीडमैन को दूसरे नंबर पर रखा है. फ़्रीडमैन के बारे में बताया गया है कि वह मध्य-पूर्व से जुड़े विषयों पर कलम तोड़ कर लिखते हैं और ग्लोबलाइजेशन के समर्थन में तर्क देते हुए वह थकते नहीं. हालाँकि अपने लेखन में फ़्रीडमैन कई बार बहुत ही वाहियात और आत्मतुष्ट भी नज़र आते हैं. फ़्रीडमैन पर आरोप लगाया जाता है कि वह यूरोप को समझ नहीं पाए हैं और फ़्रांस की आलोचना में उनका स्वर बड़ा कर्कश हो जाता है.

मंगलवार, मार्च 28, 2006

ग़रीबी उन्मूलन का योगी फ़ार्मूला

कंप्यूटर पेशेवरों के निर्यात के ताज़ा चलन के बहुत पहले से ही आधुनिक भारत एक अन्य प्रकार के विशेषज्ञों के निर्यात के लिए पूरी दुनिया, ख़ास कर पश्चिमी जगत में जाना जाता रहा है. विशेषज्ञों का यह प्रकार है- आध्यात्मिक गुरुओं का. भारत से बाहर जाकर किसी न किसी कारण से चर्चित हुए गुरुओं में प्रमुख हैं महर्षि महेश योगी. हॉलैंड में जमे महर्षि अपनी उम्र के ढलान पर हैं, लेकिन अब भी हर दूसरे-तीसरे महीने किसी न किसी कारण सुर्खियों में आ ही जाते हैं.

पिछले दिनों उन्होंने ब्रिटेन में अपने आश्रम को बंद करने की घोषणा कर अपने हज़ारों ब्रितानी शिष्यों का दिल तोड़ा. जानना चाहेंगे क्यों? महर्षि ने ब्रितानी प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर में शैतान की छवि देखी क्योंकि वह इराक़ में हज़ारों निर्दोष लोगों की मौत का प्रमुख कारण हैं. महर्षि ने यह कहते हुए अपने चेलों से आश्रम बंद करने को कहा कि 'शैतान के देश में अच्छे काम करने का कोई मतलब नहीं.'

महर्षि महेश योगी से जुड़ी अनेक संस्थाओं में से एक है महर्षि ग्लोबल फ़ाइनेंसिंग. इस संस्था ने पिछले दिनों इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून अख़बार में कई दिनों तक बड़े-बड़े विज्ञापन देकर दुनिया से ग़रीबी का नामोनिशान मिटा देने के लिए एक योजना की घोषणा की. ग़रीबी का सत्यानाश करने के लिए इसकी सीधी-सादी योजना है- दुनिया भर में उस ज़मीन पर खेती करवाना जो अभी उपयोग में नहीं हैं.

अपने विज्ञापनों के ज़रिए महर्षि ग्लोबल फ़ाइनेंसिंग ने बाँड बेचकर 8,000 अरब यूरो जुटाने की घोषणा की. इसे नाम दिया गया है वर्ल्ड पीस बाँड. हर बाँड 50 हज़ार यूरो मूल्य का है.(आज की तिथि में एक यूरो लगभग 53.50 रुपये के बराबर है.) बाबाजी की संस्था का दावा है कि बाँड में कम से कम तीन साल के लिए निवेश करने पर हर साल 10 से 15 प्रतिशत का मुनाफ़ा पाया जा सकता है.

महर्षि महेश योगी की वित्त संस्था बाँड बेच कर जुटाई गई रकम से दो अरब हेक्टेयर ज़मीन पर ऑर्गेनिक खेती करेगी. महर्षि ग्लोबल फ़ाइनेंसिंग का कहना है कि यह ज़मीन 100 देशों में है और प्रति हेक्टेयर ज़मीन पर आर्गेनिक खेती की शुरुआत पर चार हज़ार यूरो की लागत आएगी.

वित्तीय मीडिया सेवा ब्लूमबर्ग ने महर्षि ग्लोबल फ़ाइनेंसिंग के इस उद्यम की जाँच की. ब्लूमबर्ग को इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि वर्ल्ड पीस बाँड में निवेश से हर साल 10-15 प्रतिशत मुनाफ़ा कमाने की कोई भी संभावना हो सकती है. पहली बात तो यह कि जिस भूभाग पर खेती की बात की जा रही है वो बहुत ही बड़ा है, यानि खेती की थोड़ी भी संभावना वाली दुनिया की कुल ज़मीन का आठवाँ हिस्सा. कहने की ज़रूरत नहीं कि अच्छी ज़मीन पर हर जगह पहले से ही खेती हो रही है, और महर्षि की संस्था उपयोग में नहीं लाई जा रही ज़मीन पर खेती की बात कर रही है, जो कि निश्चय ही दूसरे दर्जे की ज़मीन होगी. दूसरी बात यह कि खेती में निवेश को कभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता है क्योंकि खेती को प्रतिकूल मौसमी दशाओं और कीटजनति बीमारियों जैसे ख़तरों का हमेशा सामना करना पड़ता है. अत्यधिक बारिश, सूखा, ओलावृष्टि, गर्मी, सर्दी और न जाने कैसी-कैसी विपरीत मौसमी दशाएँ खेती को पूरी तरह चौपट करने में सक्षम होती हैं.

ब्लूमबर्ग के पत्रकार ने इस आशंका को महर्षि ग्लोबल फ़ाइनेंसिंग के कर्ताधर्ता बेंजामिन फ़ेल्डमैन के सामने पेश किया. फ़ेल्डमैन कोई स्पष्ट जवाब देने की स्थिति में नहीं थे. उन्होंने मात्र इतना कहा कि वे निर्यातोन्मुख खेती कराएँगे. उनका यह भी कहना था कि विपरीत मौसमी दशाएँ एक बार में ज़्यादा से ज़्यादा दो-एक देशों में खेती पर बुरा असर डालेगी, सभी सौ देशों में नहीं. लेकिन जब अत्यंत उपजाऊ ज़मीन पर अत्याधुनिक वैज्ञानिक तरीक़े से की जा रही खेती में भी लगातार 15 प्रतिशत रिटर्न मिलने के उदाहरण कम ही मिलते हों, तो महर्षि ग्लोबल फ़ाइनेंसिंग किस दम पर ऐसा दावा कर रही है कहना मुश्किल है.


यहाँ उल्लेखनीय यह है कि नीदरलैंड्स के अधिकारी महर्षि बाँड की बिक्री पर रोक भी नहीं लगा सकते क्योंकि वहाँ के क़ानून के हिसाब से योजना में कोई खोट नहीं है. नीदरलैंड्स के वित्तीय क़ानून कुछ ज़्यादा ही उदार हैं तभी तो महर्षि महेश योगी साढ़े तीन साल पहले राम नामक अपनी अलग मुद्रा जारी करने में सफल रहे थे.

गुरुवार, मार्च 02, 2006

एक ऑडियो, एक वीडियो

इंटरनेट पर हिंदी-उर्दू में काफ़ी ऑडियो-वीडियो मौजूद हैं. इनमें से अधिकतर आम वेब-सर्फ़र के लिए अनदेखे-अनसुने रह जाते हैं. इस सप्ताह संयोग से हमें ऐसी दो ताज़ातरीन प्रस्तुतियों के अवलोकन का मौक़ा मिला.

पहली प्रस्तुति है अपनी हिंदी भाषा में. यह एक ऑडियो इंटरव्यू है. प्रख्यात कथाकार कमलेश्वर के इस इंटरव्यू को प्रसारित किया रेडियो डॉयचे वेले की हिंदी सेवा ने. इस बेबाक इंटरव्यू में कमलेश्वर जी अपने लेखन की चर्चा तो करते ही हैं, अपने पसंदीदा लेखकों के बारे में भी बात करते हैं. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन पर बन रही फ़िल्म की पटकथा लिखने वाले कमलेश्वर जी ने बॉलीवुड से जुड़े अपने अनुभवों का भी ज़िक्र किया है. इंटरव्यू निश्चय ही सुनने योग्य है. यहाँ क्लिक तो करें.

दूसरी प्रस्तुति है अपनी परिचित भाषा उर्दू में. यह एक टॉक-शो है. पाकिस्तान के निर्वासित प्रधानमंत्री मियाँ नवाज़ शरीफ़ से की गई इस बेबाक बातचीत को बीबीसी की उर्दू सेवा ने प्रसारित किया. इसमें शरीफ़ एक जगह बताते हैं कि कैसे तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ की सूचना दी थी. देखने योग्य प्रस्तुति है. (वीडियो में बातचीत तीन मिनट के बाद शुरू होती है.)

गुरुवार, फ़रवरी 23, 2006

पहला मल्टीमीडिया पत्रकार

पत्रकारिता जगत में इतनी ज़्यादा प्रतियोगिता है कि एक औसत पत्रकार मात्र एक एक्सक्लुसिव ख़बर के लिए सारे सिद्धांतों को ताक पर रखने को तैयार बैठा रहता है. और यह सच्चाई पत्रकारिता के हर स्तर के बारे में है. मतलब भारत के एक कस्बाई पत्रकार से लेकर लंदन या न्यूयॉर्क में बैठा अंतरराष्ट्रीय स्तर का पत्रकार तक, हर कोई किसी ख़ास ख़बर के बदले अपने तथाकथित सिद्धांतों की पोटली का सौदा करने को तैयार हैं.

लेकिन इस माहौल में भी कुछ पत्रकार ऐसे हैं जिनका ज़िक्र होने पर मन में उनके प्रति सम्मान भाव जाग उठता है. निश्चय ही हर इंसान की तरह इन सच्चे पत्रकारों के भी अपने पूर्वाग्रह होंगे, अपनी पसंद-नापसंद होगी. लेकिन जिन ख़ासियतों के कारण ये कलमघिस्सूओं की जमात में अलग नज़र आते हैं, उनमें शामिल हैं- इनकी निडरता, निष्पक्षता, सम्यक भाव, व्यापक दृष्टि, सच्चाई तक पहुँचने की जिजीविषा, समाज के प्रति जवाबदेही का भाव और मानव मात्र के कल्याण की भावना.

भीड़ से अलग दिखने वाले मुट्ठी भर पत्रकारों में से एक हैं केविन साइट्स. टेलीविज़न पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़ा नाम है. अमरीका के दो बड़े टीवी नेटवर्क एनबीसी और सीएनएन के लिए दुनिया के ख़तरनाक क्षेत्रों से साहसिक रिपोर्टिंग करके नाम कमा चुके हैं. ब्लॉग जगत के लिए विशेष ख़ुशी की बात ये है कि अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में अपनी ड्यूटी के दौरान उन्होंने नियमित रूप से ब्लॉगिंग के लिए भी समय निकाला.

लेकिन आज केविन साइट्स का दुनिया भर में जिस कारण नाम है वो है उनका पत्रकारिता की एक नई विधा को अपनाना. यह है मल्टीमीडिया जर्नलिज़्म की विधा. ज़ाहिर है मल्टीमीडिया जर्नलिज़्म सबसे ज़्यादा चुनौतियों वाली पत्रकारिता है. इसमें आपको वीडियो, ऑडियो, फ़ोटो और टेक्स्ट- सब कुछ जुटाना होता है. नए ज़माने की नई विधा होने के कारण मल्टीमीडिया जर्नलिज़्म से जुड़ी कुछ अनजानी दिक्कतें भी हो सकती हैं. और जब पत्रकार केविन साइट्स हो, तो पत्रकारिता की विधा कुछ भी हो वो 'बाइ डिफ़ॉल्ट' ख़तरों के बीच से ही रिपोर्टिंग करना चाहेगा.

केविन साइट्स छह महीने पहले एक ख़तरनाक यात्रा पर निकल पड़े. इस यात्रा में उन्होंने दुनिया के उन सभी इलाक़ों से रिपोर्टिंग करने की ठानी है जो बारूद के ढेर पर माने जाते हैं, संघर्ष के केंद्र माने जाते हैं- अशांत और ख़तरनाक माने जाते हैं. साइट्स ख़ुद को 'सोजो' कहते हैं यानि 'सोलो जर्नलिस्ट', मतलब 'वन मैन आर्मी'.

अपनी साल भर की इस यात्रा का आधा पूरा कर चुके केविन साइट्स सोमालिया, ईरान, लेबनान, उगांडा, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कोंगो और सूडान से गुजर चुके हैं. अभी कश्मीर और नेपाल समेत संघर्ष के कई केंद्रों में उनको पहुँचना है. केविन साइट्स की यह यात्रा संभव हो पाई है याहू! के कारण.

याहू! का पत्रकारिता से कोई सीधा संबंध नहीं है. इतना ही नहीं चीन में कई साहसिक पत्रकारों को जेल भिजवाने में सहायक बन कर उसने साहसिक पत्रकारिता की राह में रोड़े ही अटकाए हैं. लेकिन भला हो याहू! के उन साहबों का जिन्होंने केविन साइट्स की ख़तरनाक परियोजना को हाथ में लेने का साहस किया. आज याहू! के हॉटज़ोन पर केविन की मल्टीमीडिया पत्रकारिता को पूरे प्रभाव के साथ देखा जा सकता है- मतलब दुनिया के ज्ञात संघर्ष केंद्रों से दिल को छू लेने वाली रिपोर्टें- वीडियो, ऑडियो, फ़ोटो और रिपोर्टताज के रूप में. याहू! ने केविन साइट्स की रिपोर्टिंग को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने के लिए अपने लॉस एंज्लिस स्थित मीडिया मुख्यालय में तीन प्रतिभाशाली लोगों की समर्पित टीम तैनात कर रखी है.

टीवी पत्रकारिता से इंटरनेट पत्रकारिता की ओर आने के पीछे केविन साइट्स के एक कड़वे अनुभव की भूमिका मानी जाती है. बात है नवंबर 2004 की. साइट्स इराक़ में चरमपंथियों का गढ़ माने जाने फ़लूजा शहर में थे. अमरीकी सेना के साथ, एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अमरीकी टीवी नेटवर्क एनबीसी के लिए काम करते हुए. वहाँ से उन्होंने कई स्तब्धकारी दृश्य भेजे. लेकिन एक दृश्य ने उन्हें दक्षिणपंथी अमरीकियों के ग़ुस्से का निशाना बना दिया.

दरअसल सच्चाई दिखाने की अपनी आदत से मज़बूर केविन साइट्स ने ज़ुल्म का वह दृश्य दुनिया को दिखा दिया जिसमें एक अमरीकी मरीन एक बेबस इराक़ी को मौत की नींद सुलाता है, वो भी फ़लूजा की एक मस्जिद के भीतर. साइट्स के इस निष्पक्ष और साहसिक काम के बाद साइट्स के ब्लॉग पर एक से एक घटिया संदेश आने लगे. फ़ॉक्स न्यूज़ जैसे बुश-परस्त मीडिया ने उन्हें खलनायक के रूप में पेश किया और एनबीसी नेटवर्क ने भी उनसे दूरी बनाने में अपनी भलाई समझी.


ख़ुशी की बात है तमाम आलोचनाओं के बावज़ूद केविन साइट्स निराश नहीं हुए, बल्कि उन्होंने पहले से कहीं ज़्यादा उत्साह से पत्रकारिता जारी रखने का फ़ैसला किया.