शुक्रवार, जुलाई 11, 2008

स्वास्थ्यवर्द्धक ब्लॉगिंग

अब से सवा तीन साल पहले जब मैंने ख़ुद का एक ब्लॉग बनाया तो उस समय मेरे लिए इस उद्यम के मुख्य उद्देश्य थे- विभिन्न विषयों पर अपनी राय सामने रखना, तथा उपयोगी/रोचक जानकारियों को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाना. ये सपने में भी नहीं सोचा था कि ब्लॉगिंग के मेरे शौक़ का स्वास्थ्य से भी कोई सीधा संबंध है. इसलिए प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका 'साइंटिफ़िक अमेरिकन' में पिछले दिनों जब पढ़ा कि ब्लॉगिंग स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, तो सहज विश्वास नहीं हुआ.

पत्रिका के न्यूरोबॉयोलॉजी खंड में The Healthy Type शीर्षक से छपे लेख की पहली ही पंक्ति कहती है- ब्लॉगिंग के चल निकलने का कारण शायद स्वचिकित्सा है. इसके अनुसार वैज्ञानिकों और लेखकों को विचारों-भावों की अभिव्यक्ति के उपचारी प्रभावों की जानकारी तो बहुत पहले से ही रही है, लेकिन अब जाकर पता चला है कि ये प्रक्रिया तनाव तो घटाती ही है, इसके फ़िज़ियॉल्जिकल फ़ायदे भी हैं. अनुसंधानों से पता चला है कि अपनी भावनाओं को ब्लॉगिंग जैसे माध्यम के ज़रिए व्यक्त करने से यादाश्त सुधरती है, नींद बेहतर आती है, प्रतिरक्षण कोशिकाएँ ज़्यादा सक्रिय रहती हैं, एड्स के मरीज़ों में HIV वायरस की मात्रा कम होती है और यहाँ तक कि ऑपरेशन के बाद घाव भरने की प्रक्रिया में भी तेज़ी आती है.

'साइंटिफ़िक अमेरिकन' का लेख मेडिकल जर्नल 'Oncologist' में छपे एक शोध पर आधारित है. ये शोध कैंसर के रोगियों पर किया गया था. इसमें पाया गया कि उपचार से पहले लेखन के ज़रिए ख़ुद को अभिव्यक्त करते रहे कैंसर रोगी, उपचार के बाद उन रोगियों से मानसिक और शारीरिक दोनों ही तरह से बेहतर स्थिति में थे जो कि ऐसी रचना प्रक्रिया से दूर थे.

अब ब्लॉगों की संख्या में लगातार होती वृद्धि को देखते हुए वैज्ञानिकों ने लेखन के ज़रिए विचारों की अभिव्यक्ति के स्वास्थ्यकारी प्रभावों को तंत्रिका विज्ञान के ज़रिए समझने की कोशिश शुरू की है. हार्वर्ड विश्वविद्यालय और मैसच्यूसेट जेनरल हॉस्पिटल की न्यूरोसाइंटिस्ट एलिस फ़्लैहर्टि का मानना है कि ब्लॉगिंग के स्वास्थ्यकारी असर के अध्ययन की शुरुआत पीड़ा संबंधी प्लेसीबो सिद्धांत से की जा सकती है. प्लेसीबो यानि मरीज़ को दी गई झूठी दवा जिसमें असल दवाई नाम मात्र की भी नहीं होती. प्लेसीबो सिर्फ़ मरीज़ पर सकारात्मक मानसिक असर के लिए दी जाती है, क्योंकि उसे लगता है कि उसका इलाज चल रहा है.

फ़्लैहर्टि का कहना है एक सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य दर्द से जुड़े तरह-तरह के ऐसे व्यवहारों से संबद्ध है, जो कि संतुष्टि प्राप्ति में प्लेसीबो की भूमिका निभाते हैं. तनावपूर्ण अनुभवों के बारे में ब्लॉगिंग करना इसका एक उदाहरण माना जा सकता है.

तंत्रिकाविज्ञानी फ़्लैहर्टि ने हाइपरग्रैफ़िया(लिखने की बेलगाम चाहत) और राइटर्स ब्लॉक(कुछ नया लिखने या अधूरी रचना को पूरा करने की मानसिक दशा नहीं बना पाना) जैसी स्थितियों का अध्ययन किया है. उन्होंने कुछ बीमारियों के मॉडल पर भी इन चीज़ों को समझने की कोशिश की है. उदाहरण के लिए सनकी लोगों की बात करें तो उनके बकबक करने के पीछे मस्तिष्क के बीचोंबीच स्थित तंत्रिका प्रणाली Limbic System की किसी तरह की अतिसक्रियता का कारण हो सकता है. दरअसल मस्तिष्क का यह हिस्सा हर तरह की ललक के लिए ज़िम्मेवार होता है. अब चाहे वो खाने की ललक हो, सेक्स की या फिर समस्याओं के समाधान की. फ़्लैहर्टि का कहना है कि ब्लॉगिंग में भी मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम की कोई भूमिका हो सकती है. उनका कहना है कि ब्लॉगिंग मस्तिष्क में डोपामीन स्राव बढ़ाने का कारण भी हो सकता है, जैसा कि संगीत सुनने, दौड़ने या कलाकृतियों को निहारने के दौरान होता है.

लेकिन उपचारी लेखन के पीछे के तंत्रिका-तंत्र संबंधी राज़ को खोलने का दावा करना अभी जल्दबाज़ी होगी. दरअसल लेखन कार्य से पहले और उसके बाद मस्तिष्क की अलग-अलग अवस्थाओं का चित्रण ही संभव नहीं हो पाया है. ऐसा इसलिए क्योंकि मस्तिष्क के जिन हिस्सों की इसमें भूमिका होती है, वो सिर में बहुत भीतर हैं. हाँ, एमआरआई चित्रण के ज़रिए इतना ज़रूर मालूम पड़ा है कि लेखन से पहले, लेखन करते समय और उसके बाद, दिमाग़ की छवियाँ अलग-अलग होती हैं. लेकिन इन अलग-अलग छवियों को बार-बार हूबहू दोहराते हुए देखा जाना मुश्किल है. और, जब तक ऐसे दोहरावों को रिकॉर्ड नहीं किया जाता, इस मामले में सटीक अध्ययन संभव नहीं हो सकेगा.

ऐसे में वैज्ञानिकों के पास ठोस परिणाम पाने के लिए दो उपाय रह जाते हैं, जिन पर काम करने पर विचार किया जा रहा है. पहला उपाय है लेखन के ज़रिए भावनाओं की अभिव्यक्ति को लेकर समुदाय केंद्रित व्यापक अध्ययन. दूसरा उपाय है ऐसे लेखन और जैविक परिवर्तनों(जैसे नींद) के बीच संबंधों की पहचान.

ब्लॉगिंग के फ़ायदों के तंत्रिका-तंत्र संबंधी आधार की स्पष्ट पहचान भले ही अभी नहीं हो पाई हो, लेकिन कैंसर जैसी बीमारियों से जूझ रहे रोगियों पर इसके सकारात्मक असर पर लोगों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है. शायद इसी लिए Oncologist में छपे शोध से जुड़ी अग्रणी वैज्ञानिक नैन्सी मॉर्गन ने कैंसर रोगियों के उपचार के बाद की देखभाल के कार्यक्रमों में ब्लॉगिंग को भी शामिल करने का फ़ैसला किया है.

गुरुवार, जून 12, 2008

निम चिम्पस्की की करूण कथा

निम चिम्पस्कीबन्दरों पर पंकज अवधिया जी का रोचक शोध पढ़ने के तुरंत बाद एक चिंपांज़ी पर हुए दुखद शोध के बारे में पढ़ने का मौक़ा मिला.

ये कहानी है निम चिम्पस्की नामक चिंपांज़ी की. मशहूर भाषाविद नोम चोम्स्की के नाम पर उसे ये पहचान दी गई थी.

बात है 1973 की, जब अमरीका में कोलंबिया विश्वविद्यालय में वानरभाषा पर एक अभूतपूर्व प्रयोग करने का फ़ैसला किया गया. इस प्रयोग को 'प्रोजेक्ट निम' नाम दिया गया, और प्रयोग में शामिल चिंपांज़ी को निम चिम्पस्की नाम देना तय किया गया. दरअसल मनोविज्ञानी प्रोफ़ेसर हर्बर्ट टेरेस नोम चोम्स्की के एक मशहूर सिद्धांत को ग़लत साबित करके दिखाना चाहते थे. चोम्स्की का मानना है कि हमारी भाषाएँ मानव मस्तिष्क में केंद्रित कुछ विशेष नियमों से बंधी होती हैं, इसलिए ये मनुष्य मात्र के लिए ही संभव हैं. वानर जाति में मनुष्यों जैसा भाषा ज्ञान होने की संभावना को चोम्स्की सिरे से ख़ारिज करते हैं. अधिकांश वैज्ञानिकों की राय भी यही है कि दो जीव प्रजातियों के बीच भाषाई संबंध की बात कपोल कल्पना है, न कि अनुसंधान का विषय.

लेकिन प्रोफ़ेसर टेरेस चिंपांज़ी को मूक-बधिर समुदाय की भाषा अमेरिकन साइन लैंग्वेज सिखा कर न सिर्फ़ चोम्स्की को ग़लत साबित करना चाहते थे, बल्कि इस मान्यता के ख़िलाफ़ भी सबूत जुटाना चाहते थे कि मनुष्य और जानवरों के बीच मुख्य अंतर का आधार भाषा ही है.

ओकलाहोमा के Institute for Primate Studies की एक 18 वर्षीय मादा चिंपांज़ीं के एक दुधमुंहें बच्चे को इस प्रयोग के लिए चुना गया. उसे निम चिम्पस्की नाम देकर प्रोफ़ेसर टेरेस की शिष्या रही स्टेफ़नी लाफ़ार्ज नामक महिला को सौंप दिया गया. स्टेफ़नी ओकलाहोमा से चिम्पस्की को अपने घर न्यूयॉर्क ले आई.

स्टेफ़नी, उसके पति और उसकी 12 वर्षीय बेटी के साथ चिम्पस्की पलने लगा. कुछ महीनों के भीतर वह एक शरारती बच्चा साबित होने लगा. डाँटने और पिटाई करने से भी जब चिम्पस्की की शरारत नहीं रुकती, तो सिर्फ़ एक उपाय हमेशा काम करता. चिम्पस्की को किसी कमरे में अकेला छोड़ कर सारे लोग बाहर निकल जाते. इस तरह बहिष्कार किए जाने पर उसे होश आ जाता कि शायद वह कुछ ग़लत कर रहा होगा, और वह शरारत करना बंद कर देता. जल्दी ही उसने साइन लैंग्वेज में 'सॉरी' कहना सीख लिया.

वैसे स्टेफ़नी ने जब चिम्पस्की को विधिवत प्रशिक्षण देना शुरू किया तो उसे साइन लैंग्वेज में पहला शब्द सिखाया- पीना. इस शब्द को सिखाने में मात्र दो सप्ताह लगे. दो महीने के भीतर चिम्पस्की के शब्दकोश में 'लाओ', 'ऊपर', 'मिठाई' और 'ज़्यादा' जैसे कई शब्द जुड़ गए.

इस तरह 'प्रोजेक्ट निम' चल निकला. मीडिया में चिम्पस्की की चर्चा होने लगी. न्यूयॉर्क पत्रिका के कवर पर तस्वीर छपने के बाद तो उसे सब जानने लगे. 'टॉकिंग चिम्प' चिम्पस्की को टीवी शो में आमंत्रित किया जाने लगा, जहाँ वह सेट पर उछलकूद करने के साथ-साथ साइन लैंग्वेज के ज़रिए प्रस्तुतकर्ता से पानी की माँग कर सबको हतप्रभ कर देता.

साइन लैंग्वेज प्रशिक्षणअपने प्रयोग में हो रही प्रगति से प्रोफ़ेसर टेरेस इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने प्रशिक्षण का स्तर और सघन करने का फ़ैसला किया. इसके लिए चिम्पस्की को स्टेफ़नी के घर से निकाल कर कोलंबिया विश्वविद्यालय के विज्ञान विभाग के एक विशेष कक्ष में रखा गया. उसके लिए एक कठोर शिक्षक कैरोल स्टीवार्ट को नियुक्त किया गया. पहले ही अवसर में स्टीवार्ट ने चिम्पस्की के मस्ती के दिन ख़त्म कर दिए. उसे छोटी सी बेंच पर बिठा कर रखा जाता. चिम्पस्की से उम्मीद की जाने लगी कि वो अपना कोट हैंगर पर टांगे. खों-खों करने, काटने या मस्ती के मूड में आने पर सज़ा के तौर पर उसे चार फ़ुट के खिड़कीरहित बक्से में डाल दिया जाता.

ये सब बातें जब चिम्पस्की की पहली शिक्षिका स्टेफ़नी को पता चलीं तो उसने अपना विरोध जताया. उसने कहा कि चिम्पस्की अपने को मनुष्यों के साथ जोड़ कर देखता है, इसलिए उसके साथ जानवर जैसा व्यवहार करना कतई ठीक नहीं है. दरअसल एक बार चिम्पस्की को मनुष्यों और चिंपाज़िंयों की कुछ तस्वीरें देख कर उसे दो समूहों में बाँटने को कहा गया था. उनमें से एक तस्वीर ख़ुद उसकी भी थी. चिम्पस्की ने इस काम को कर दिखाया, लेकिन अपनी तस्वीर मनुष्यों के बीच रखी.

जब स्टीवार्ट के कड़क प्रशिक्षण का ज़्यादा उत्साहजनक परिणाम नहीं निकला, तो उसे परियोजना से बाहर कर दिया गया. अब चिम्पस्की को एक 21 कमरों वाली बड़ी हवेली में स्थानांतरित कर दिया गया. हडसन नदी के किनारे बनी इस हवेली में चिम्पस्की की ज़िंदगी थोड़ी आसान हो गई. नए प्रशिक्षक भी उसके साथ बढ़िया से पेश आते थे. लेकिन माँ(पहली प्रशिक्षक स्टेफ़नी) की कमी उसे यहाँ भी महसूस होती. इस कारण वह चिड़चिड़ा भी हो गया. इसके बाद भी उसने 100 शब्द सीख लिए, जिनके ज़रिए वह हज़ारों तरह के विचार व्यक्त कर लेता था. लेकिन साथ ही वह आसपास मौजूद लोगों को कभी-कभी काट भी खाता. चिम्पस्की ने हद तब पार कर ली जब उसने अपने एक प्रशिक्षक के चेहरे को बुरी तरह नोंच डाला. यही वो वक़्त था जब प्रोफ़ेसर टेरेस ने चिम्पस्की को वापस चिंपांज़ियों के बीच ओकलाहोमा भेजने का फ़ैसला किया. उनका कहना था कि अध्ययन के लिए ज़रूरी आंकड़े वैसे भी जुटाए जा चुके हैं.

वर्षों तक चिम्पस्की लोगों के बीच रहा था. उसकी किसी अन्य चिंपांज़ी से मुलाक़ात तक नहीं हो पाई थी. इसलिए जब उसे चिंपाज़ियों के बाड़े में भेज दिया गया, तो वहाँ वह लोगों से संवाद करने के लिए तरसता. न सिर्फ़ उसकी ज़रूरत को नज़रअंदाज़ किया गया, बल्कि उल्टे उसे चिंपांज़ियों के साथ संवाद करने की ट्रेनिंग दी जाने लगी. इसी दौरान इस ओकलाहामा स्थित इंस्टीट्यूट पर वित्तीय संकट आ गया. इसके निदेशक का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था. ऐसे में उन्होंने चोरी-चुपके चिम्पस्की समेत 20 चिंपांज़ियों को चिकित्सा अनुसंधान प्रयोगशाला Laboratory of Experimental Medicine and Surgery in Primates को बेच दिया. न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की इस प्रयोगशाला में चिम्पस्की पर हेपटाइटिस से जुड़ा एक अध्ययन किया जाना था. यहाँ चिम्पस्की को बुरी परिस्थितियों में रखा जा रहा था. बाक़ी चिम्पांज़ियों के साथ ही उसे पिंजड़े में बंद रखा जाता. प्रयोगशाला के एक सहायक ने ग़ौर किया कि वहाँ न सिर्फ़ चिम्पस्की बल्कि उसके प्रभाव में अन्य चिंपांज़ी में साइन लैंग्वेज में पानी, सिगरेट आदि की माँग कर रहे होते थे. शायद ज़रूरत के तौर पर नहीं, बल्कि हताशा में.

ये ख़बर बाहर आते ही राष्ट्रीय स्तर पर विरोध शुरू हो गया. अख़बारों और टीवी चैनलों ने एक चिंपांज़ी के मानवीकरण की कोशिश करने और बाद में उसे चिकित्सीय प्रयोग के लिए त्याग देने की नैतिकता पर बहस शुरू कर दी. इस बीच प्रोफ़ेसर टेरेस अपने अध्ययन की रिपोर्ट जारी कर चुके थे, जिसमें उन्होंने अपने शुरुआती विचार से बिल्कुल उल्टा जाते हुए कहा कि चिंपांज़ी मनुष्यों की भाषा नहीं समझ सकते. अपने 'प्रोजेक्ट निम' को नाकाम बताते हुए उन्होंने कहा कि चिम्पस्की जैसे चिंपांज़ी सिर्फ़ नकल भर कर पाते हैं, संवाद करने का नाटक कर वैज्ञानिकों को मूर्ख बनाते हैं. प्रोफ़ेसर टेरेस के इस तरह पलटी मारने से पूरा अमरीका हतप्रभ रह गया.

लेकिन प्रोफ़ेसर टेरेस ने भी न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में चिम्पस्की को जानवरों के जैसा रखे जाने पर हो रहे विरोध में बढ़-चढ़ कर भाग लिया. इस दौरान एक वकील ने चिम्पस्की के समर्थन में अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की घोषणा की. चौतरफ़ा दबाव की रणनीति काम आई और महीने भर के भीतर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय ने चिम्पस्की को छोड़ने का फ़ैसला किया. संयोग से उस पर किसी तरह के प्रयोग अभी शुरू नहीं किए गए थे.

अंतत: पशु अधिकारवादी लेखक क्लीवलैंड एमोरि ने चिम्पस्की को ख़रीद कर टेक्सस स्थित अपने पशु अभ्यारण्य में डाल दिया. लेकिन वहाँ भी उसे ज़्यादातर पिंजरे में ही रखा जाता. एमोरि ने अपने अभ्यारण्य में साइन लैंग्वेज जानने वाले किसी कर्मचारी की व्यवस्था नहीं की थी. इसलिए चिम्पस्की वहाँ भी लोगों से संवाद करने के लिए तरसता ही रहा. उसके अकेलेपन पर तरस खाकर एमोरि ने एक मादा चिंपाज़ी सैली को उसके पिंजरे में डाल दिया. इसका ज़्यादा असर नहीं हुआ, लेकिन एमोरि के लिए चिम्पस्की को सैली के साथ खेलते देखना सुखद था.

जब कभी चिम्पस्की को पिंजरे से निकलने का मौक़ा हाथ लगता, वह अभ्यारण्य के मैनेजर के आवास में जा धमकता. वहाँ फ़्रिज से खाने-पीने का सामान निकालता. टकटकी लगा कर टीवी देखता. ज़ाहिर है उसे मनुष्यों का साथ अभी भी पसंद था. चिम्पस्की को रोज़ मन बहलाने के लिए सचित्र किताबें-पत्रिकाएँ दी जाती थीं. अधिकतर किताबों-पत्रिकाओं को वह खेल-खेल में फाड़ डालता था. अपवाद थी सिर्फ़ दो किताबें- एक थी साइन लैंग्वेज सिखाने वाली किताब, और दूसरी 1980 में प्रकाशित उसके फ़ोटो-एलबम जैसी किताब The Story of Nim:The Chimp Who Learned Language.

एक दिन चिम्पस्की की पहली प्रशिक्षक स्टेफ़नी वहाँ उससे मिलने पहुँची. वह एमोरि की हिदायतों के बावजूद पिंजरे के भीतर जा पहुँची. चिम्पस्की ने कुछ देर अपनी माँ समान स्टेफ़नी को घूर कर देखा, फिर उसे ज़मीन पर गिरा दिया और घसीट कर पिंजरे के एक कोने में लगा दिया. वह ख़ुद दरवाज़ा छेंक कर खड़ा हो गया मानो वह स्टेफ़नी को भागने नहीं देगा. स्टेफ़नी को चोट ज़रूर लगी लेकिन उसका कहना था कि चूंकि उसने आरंभ में अपनाने के बाद चिम्पस्की का परित्याग किया है, इसलिए वह उसके ग़ुस्से को समझ सकती है.

सैली का 1997 में बीमार होने के बाद निधन हो जाने के बाद चिम्पस्की एक बार फिर अकेला पड़ गया. अंतत: उसकी भी 10 मार्च 2000 को दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई. वह अभी 20 साल और जी सकता था. लेकिन शायद मानव की तरह पलने और जानवर जैसा बर्ताव सहने ने उसकी ज़िंदगी छोटी कर दी!

(निम चिम्पस्की की करुण कथा पिछले दिनों Nim Chimpsky: The Chimp Who Would Be Human के रूप में प्रकाशित हुई है.)

सोमवार, जून 09, 2008

राज़ खोलो, पहचान गुप्त रहेगी

स्मार्ट बमअमरीका का GPS-निर्देशित स्मार्ट बम किस हद तक सटीक निशाना साधता है? इसके निशाने से कितना दूर तक छिटकने के आसार होते हैं? ये सारी सूचनाएँ इंटरनेट पर उपलब्ध हैं. पेंटागन के खुलेपन के कारण नहीं, बल्कि विकिलीक्स के सौजन्य से. वर्ष 2002 के इस दस्तावेज़ को सार्वजनिक किए जाने के बाद से यों तो अमरीका ने स्मार्ट बम या Joint Direct Attack Munition के डिज़ायन में कुछ बदलाव किए हैं, लेकिन विकिलीक्स के सौजन्य से ही हमें पता चल पाया कि दो दशकों में अमरीकी आयुध भंडार में आए इस सबसे महत्वपूर्ण बम के 2.8 मीटर तक निशाना चूकने की बात ग़लत थी, क्योंकि ये परीक्षण स्थिति का आँकड़ा था. वास्तविक युद्ध में ये 7.8 मीटर तक छिटक सकता है.

मुझे विकिलीक्स के बारे में पहली बार साल भर पहले ख़बरों की दुनिया में विचरण करते वक़्त पता चला था, लेकिन इसके काम करने के तरीके के बारे में आसान शब्दों में ढंग की जानकारी अब जा कर मिली है, विज्ञान पत्रिका न्यू साइन्टिस्ट के ज़रिए.

ख़ुशी की बात है कि साल भर से कुछ ज़्यादा समय मात्र काम करके विकिलीक्स ने 2008 Economist Index on Censorship Freedom of Expression award हासिल कर दिखाया है. हाल के दिनों में इसने हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम का डिज़ायन सार्वजनिक किया है, साथ ही ये भी बताया कि ब्रिटेन ने कैसे परमाणु हथियार क्षमता का जुगाड़ किया. इसने तिब्बत में पिछले दिनों हुए प्रदर्शन को दबाने के लिए किए चीन के शक्ति-प्रदर्शन के सैंकड़ो दिल दहला देने वाले चित्र और वीडियो क्लिप्स भी उपलब्ध कराए हैं.

बमुश्किल डेढ़ साल पुरानी इस वेबसाइट को चलाने वालों ने अमरीका सरकार, चीन सरकार, पूर्व कीनियाई राष्ट्रपति, सबसे बड़े निजी स्विस बैंक, रूसी कंपनियों, सिंटोलोजी-कैथोलिक-मॉरमन चर्चों आदि के क़ानूनी-ग़ैरक़ानूनी हमलों का सफलतापूर्वक सामना किया है.

विकिलीक्स से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें

-विकिलीक्स के के पहले ही पन्ने पर आमंत्रण और आश्वासन इन शब्दों में दिया गया है- Have documents the world needs to see? We protect you and get your disclosure out to the world.

-विकिलीक्स को किस तरह के गोपनीय दस्तावेज़ों की ज़रूरत है ये एक पंक्ति में स्पष्ट किया गया है- Wikileaks accepts classified, censored or otherwise restricted material of political, diplomatic or ethical significance.

-इसके ठीक बाद एक और पंक्ति में स्पष्ट किया गया है कि विकिलीक्स को किस तरह की जानकारी नहीं चाहिए- Wikileaks does not accept rumour, opinion or other kinds of first hand reporting or material that is already publicly available.

-विकिलीक्स को सार्वजनिक किए जाने योग्य गुप्त दस्तावेज़/रिकॉर्डिंग भोजपुरी और हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं में भी भेजे जा सकते हैं.

गोपनीयता प्याज़ की परतों के सहारे

विकिलीक्स को मिलने वाले दस्तावेज़ों की परख दुनिया भर में फैले इसके स्वयंसेवक करते हैं. ये लोग या तो जानेमाने वक़ील हैं, या फिर मान्यता प्राप्त पत्रकार. गोपनीयता मुहैया कराने के सच्चे भरोसे के कारण विकिलीक्स को हाल के महीनों में इतनी बड़ी संख्या में दस्तावेज़ प्राप्त हुए हैं, कि उनको शीघ्रता से परखने के लिए स्वयंसेवक कम पड़ गए हैं.

दस्तावेज़ लीक करने वालों को गोपनीयता मुहैया कराने का बड़ा ही सरल आधार है, उनके वेब कनेक्शन के IP address को ज़ाहिर नहीं होने देना. ये काम करता है The Onion Router या टोर नामक एक नेटवर्क. टोर विकिलीक्स को भेजे गए दस्तावेज़ को हज़ारों सर्वरों के एक नेटवर्क के ज़रिए रूट करता है. दस्तावेज़ इन सर्वरों में एक से दूसरे में अनियोजित तरीके से कई बार स्थानांतरित होने के बाद अंतत: विकिलीक्स के इनबॉक्स में पहुँचता है.

दरअसल विकिलीक्स के स्वयंसेवक टोर का क्लाइंट सॉफ़्टवेयर अपने कंप्यूटर पर डाउनलोड कर उसे एक ओनियन प्रॉक्सि में बदल देते हैं. जब कोई गुप्त दस्तावेज़ी संदेश भेजता है तो टोर इसे तीन बार प्याज़ की परतों जैसा इनक्रिप्ट करता है. तीनों परतों के लिए अलग-अलग कुंज़ी देकर उन्हें अनियोजित तरीके से अचानक चुने गए टोर नेटवर्क के तीन प्रॉक्सि सर्वरों को भेज दिया जाता है. इनमें से एक सर्वर पहली परत को डिक्रिप्ट करके चुने गए दूसरे सर्वर को बढ़ा देता है. दूसरा सर्वर एक और परत को डिक्रिप्ट करता है. और अंतत: तीसरे सर्वर से पूरी तरह डिक्रिप्टेड संदेश बाहर आता है. और, आमतौर पर यही लगता है कि संदेश का स्रोत ये तीसरा सर्वर ही है, जबकि असलियत कुछ और है!

इस तरह उछलकूद मचाते हुए गंतव्य तक पहुँचे संदेश का स्रोत का पता हर देश की सुरक्षा एजेंसियों के बूते से बाहर की बात है. अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के पास इसकी क्षमता ज़रूर है, लेकिन इसके लिए उसे सही समय पर सही सर्वर को लक्ष्य करना पड़ेगा. यानि सिद्धांत: संभव, लेकिन व्यावहारिक तौर पर लगभग असंभव काम! कंप्यूटर सुरक्षा विशेषज्ञ Bruce Schnier इसे एक सरल उदाहरण से समझाते हैं, "कल्पना करें लोगों से भरे एक बड़े कमरे की. कमरे में मौजूद लोगों में से अनेक एक-दूसरे को लिफ़ाफ़े सौंप रहे हैं. भला कैसे पता लगाएँगे कि कौन-सा लिफ़ाफ़ा शुरूआत में किसके हाथ में था?"

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के एक शोध दल ने कुछ टोर प्रॉक्सि सर्वरों की पहचान कर दिखाने का दावा किया है. लेकिन उनके शोध में भी गुप्त संदेश का पता नहीं चल पाया, सिर्फ़ टोर क्लाइंट सॉफ़्टवेयर का उपयोग करने वाले की पहचान भर हो पाई है. यानि विकिलीक्स पर दस्तावेज़ लीक करने के लिए किसी को दोषी साबित करना अभी तक लगभग असंभव ही है.

विचित्र किंतु सत्य

अमरीकी ख़ुफ़िया सैनिक सूचनाओं को बड़ी मात्रा में परोसने वाला विकिलीक्स जिस टोर तकनीक पर आश्रित है, उसका विकास वाशिंग्टन डीसी स्थित अमरीकी नौसैनिक अनुसंधान प्रयोगशाला(NRL) में किया गया था. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि अमरीकी रक्षा मंत्रालय इस नेटवर्क में किसी भी तरह घुसपैठ कर सकता है. विकिलीक्स के प्रवक्ता Julian Assange ने इस तथ्य को इन शब्दों में कहा है, "इंटरनेट की तरह ही, टोर उन लोगों के हाथ से बाहर निकल चुका है, जो कभी इसके निर्माण में शामिल रहे होंगे."

किसी एक देश में क़ानूनी पेंच में फंसाए जाने का तोड़ भी विकिलीक्स ने पहले से ही निकाल रखा है. विकिलीक्स.ऑर्ग के अनेक मिरर साइट्स हैं जिन्हें बेल्जियम, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया, क्रिसमस आइलैंड और कैलीफ़ोर्निया समेत कई देशों में रखा गया है. यानि किसी एक देश में विकिलीक्स वेबसाइट को बंद करने के लिए क़ानूनी कार्रवाई करेंगे, फिर भी वेबसाइट पूरी तरह बंद नहीं होगी. ये बात हाल ही में एक स्विस बैंक को समझ में आ गई जब उसने विकिलीक्स के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करने की पहल की. ख़ास कर स्वीडन और बेल्जियम के कड़े सेंसरशिप-विरोधी क़ानूनों का बख़ूबी लाभ उठाया है विकिलीक्स ने.

आलोचना और उसका जवाब

विकिलीक्स किसी सरकार या संस्था के प्रति जवाबदेह नहीं है, इसलिए सामरिक महत्व की गोपनीय सूचनाएँ लीक करने के इस प्लेटफ़ॉर्म को लेकर कुछ हलकों में असहजता देखी जा सकती है. इनमें से अमरीकी संस्था Federation of American Scientists(एफ़एसए) भी है जो ख़ुद अपनी Project on Government Secrecy के तहत गोपनीय दस्तावेज़ लीक करती है. एफ़एसए के एक प्रवक्ता Steven Aftergood विकिलीक्स को गोपनीय सूचनाएँ लीक करने की प्राचीन कला को एक पेशेवर रूप देने का श्रेय देते हैं, साथ ही शिकायत भी करते हैं कि विकिलीक्स क़ानून के दायरे बाहर रह कर काम करता है और इसलिए आगे चल कर यह सुरक्षा के लिए ख़तरा बन सकता है.

इस पर विकिलीक्स के प्रवक्ता का जवाब है, "जब सरकार लोगों को प्रताड़ित करना और लोगों को मौत के घाट उतारना बंद कर देगी, जब बड़ी-बड़ी कंपनियाँ क़ानूनी प्रावधानों का दुरुपयोग करना छोड़ देंगी, तब शायद ये पूछने का समय का होगा कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थक जवाबदेह हैं."

गुरुवार, मई 29, 2008

नाम के पीछे क्या है? (3)

गतांक से आगे...

Lego- खिलौनों के रूप में प्लास्टिक की ईंटें और अन्य तरह के ब्लॉक बनाने वाली इस कंपनी का नाम डेनिश भाषा के मुहावरे leg godt से आया है, जिसका मतलब होता है Play Well. वैसे लैटिन में Lego का मतलब होता है I Construct जो कि इसके उत्पादों के चरित्र को ज़ाहिर करता है.

Mercedes Benz- इस जर्मन कंपनी की स्थापना Gottlieb Daimler और Karl Benz ने की थी. कंपनी के नाम का पहला हिस्सा ऑस्ट्रिया के व्यवसायी Emill Jellinek की कृपा से आया है. Jellinek ने 1898 में Daimler और Benz की कंपनी में बनी कारों को बेचना शुरू किया. उसने 1900 में कंपनी में एक नए ईंजन के विकास के लिए निवेश किया. ईंजन को Mercedes-Benz नाम दिया गया. दरअसल Jellinek की बेटी का नाम Mercedes था. कार रेसों में छद्म नाम से भाग लेते समय वह अपने लिए भी Mercedes नाम ही चुनता था.

Microsoft- दरअसल Bill Gates अपनी कंपनी के लिए एक ऐसा नाम चाहते थे जो कि microcomputer sofware के उनके उत्पाद का द्योतक हो. इस तरह Micro-soft नाम अस्तित्व में आया. बात में इस नाम से हाइफ़न गिरा दिया गया.

Mitsubishi- इस जापानी उद्योग समूह का नाम इसके थ्री-डायमंड लोगो को परिभाषित करता है. यह नाम Mitsu और Hishi का संयुक्ताक्षर है. किसी अन्य शब्द के साथ जुड़ने पर Hishi बदल कर bishi हो जाता है. Mitsu का मतलब है तीन, जबकि Hishi का मतलब है पानीफल सिंघाड़ा, यह शब्द जापानी भाषा में ताश के पत्ते पर बने डायमंड आकार को भी व्यक्त करता है.

Motorola- इस कंपनी का शुरुआती नाम Galvin Manufacturing Company था. इसके संस्थापकों ने कार रेडियो बनाना शुरू करने के बाद 1930 के दशक में कंपनी का नाम बदल कर Motorola कर दिया. उन दिनों अमरीका में उच्च गुणवत्ता वाले ऑडियो उत्पादों में -ola लगाने का चलन था, जैसे Rockola, Victrola आदि. इसलिए Motorola नाम sound in motion के आभास के लिए दिया गया था.

Nike- इस अमरीकी खेल उत्पाद कंपनी का नाम विजय की ग्रीक देवी के नाम पर है.

Nikon- इस जापानी कंपनी का पुराना नाम Nippon Kogaku था, जिसका मतलब हुआ Japanese Optical. ज़ाहिर है एक शब्द वाला नया नाम पुराने नाम के दो शब्दों से लिया गया .

Nissan- इसकी भी कहानी Nikon जैसी ही है. दरअसल Nissan को पहले Nippon Sangyo के नाम से जाना जाता था, यानि Japanese Industry.

Nokia- फ़िनलैंड के एक छोटे से शहर के नाम पर मोबाइल कंपनी का नाम रखा गया है. मोबाइल फ़ोन निर्माण के क्षेत्र में आने से पहले कंपनी काग़ज़ और रबर उत्पादों के क्षेत्र में थी.

Oracle- अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के Oracle कूटनाम वाले एक प्रोजेक्ट पर काम करते थे Larry Ellison, Ed Oates और Bob Miner. धन के अभाव में जब सीआईए ने प्रोजेक्ट पर काम रोक दिया, तो इन तीनों ने अपने बूते प्रोजेक्ट को पूरा करने का निश्चय किया और अपनी सॉफ़्टवेयर कंपनी को Oracle नाम दिया. कंपनी के पहले ग्राहकों में थी अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए.

Pepsi- इस पेय पदार्थ के आविष्कारक Caleb Bradham ने 1898 में इसे Pepsi-Cola नाम दिया था इसमें प्रयुक्त कोला फली, और संभवत: पेप्सिन नामक एंजाइम के नाम पर जो कि पाचन-क्रिया में सहायक होती है.

Royal Dutch Shell- इसकी शुरुआत होती है Shell Transport and Trading Company से जो कि विक्टोरिया काल में प्राकृतिक इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों को सीपियाँ और अन्य समुद्री जीवों के कवच-अवशेष बेचती थी. बाद में कंपनी को लगा कि तेल का भी बाज़ार है, और यह तेल के धंधे में उतर गई.

Saab- ये नाम स्वीडन की विमान निर्माता कंपनी Svenka Aeroplane Aktiebolaget से आया है. कंपनी ने 1949 में कार निर्माण के क्षेत्र में क़दम रखा था.

Samsung- कोरिया के इस सबसे बड़े कंपनी समूह के नाम का कोरियाई भाषा में मतलब होता है Three Stars.

Seat- ये नाम स्पेनिश भाषा में Sociedad Española de Automóviles de Turismo या Spanish Saloon Car Company का संक्षिप्त रूप है. इसकी स्थापना 1950 में बार्सिलोना में हुई थी.

Sony- जब 1945 में इस कंपनी की स्थापना हुई थी तो इसका नाम Tokyo Tsushin Kogyo K.K. या अंग्रेज़ी में Tokyo Telecommunication Engineering Corporation था.
माना जाता है कि इस नाम का लैटिन मूल Sonus है, और इसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के जापान में लोकप्रिय अभिव्यक्ति Sonny Boy से भी जोड़ कर देखा जाता है. कंपनी के संस्थापकों ने नाम चुनते वक़्त ये भी देखा कि Sony शब्द किसी भी भाषा का हूबहू हिस्सा नहीं है, यानि नाम पर उनका शतप्रतिशत स्वामित्व है.

Toyota- पहले Sakichi Toyoda ने अपनी कंपनी का नाम Toyeda रखा था. बाद में उन्होंने बेहतर उच्चारण वाला नाम ढूंढने के लिए एक प्रतियोगिता कराई, जिसके ज़रिए नया नाम सामने आया. जापानी भाषा में Toyota लिखने में कलम के आठ स्ट्रोक लगते हैं, और 8 जापान में लकी नंबर माना जाता है.

Vauxhall- कार बनाने वाली इस कंपनी का पुराना नाम Vauxhall Iron Works है. लंदन में टेम्स नदी के किनारे 1894 में इसे उस जगह स्थापित गया था जहाँ कि, कहते हैं, मध्यकालीन योद्धा Fulk le Breant का घर था, यानि Fulk's Hall. (रूस में बड़े रेल स्टेशनों को Vokzal कहा जाता है. कहते हैं कि ज़ार निकोलस प्रथम जब ब्रिटेन की यात्रा पर आए थे उनके साथ ये शब्द रूस गया. लंदन में एक संसदीय निर्वाचन क्षेत्र, एक पार्क और एक रेलवे स्टेशन को भी Vauxhall नाम दिया गया है.)

Volvo- लैटिन में इस शब्द का मतलब है I Roll. दरअसल स्वीडन की कंपनी SKF ने अपने एक बॉलबेयरिंग उत्पाद को ये नाम दिया था. बाद में SKF की मोटर निर्माण इकाई को Volvo नाम दिया गया. अब Volvo समूह कारों, बसों और ट्रकों के निर्माण के अलावा भारी मशीनरी के क्षेत्र में भी सक्रिय है.

Xerox- ग्रीक भाषा में xerox का मतलब होता है dry. जब Chestor Carlson ने फ़ोटो कॉपी करने की एक नई dry-copying प्रणाली की खोज की तो उसे Xerox नाम दिया. कंपनी xerox शब्द के क्रिया के रूप में प्रयोग पर रोक लगाने की हरसंभव कोशिश करती रही है.

शनिवार, मई 24, 2008

नाम के पीछे क्या है? (2)

गतांक से आगे...

BASF- इस जर्मन रसायन कंपनी का नाम Badische Anilin und Soda Fabrik से लिया गया है. इसमें BASF के शुरूआती उत्पादों और उत्पादन स्थल का समावेश है. यानि जर्मनी के बाडेन प्रांत स्थिति एनलिन और सोडा बनाने वाली कंपनी.

BMW- Bayerische Motoren Werke यानि बावेरियन मोटर वर्क्स की स्थापना 1917 में जर्मनी के बावेरिया क्षेत्र के मुख्य नगर म्यूनिख में हुई थी. कंपनी की स्थापना मूल रूप से विमानों के इंजन के निर्माण के लिए हुई थी. शायद इसीलिए कंपनी का लोगो एक घूमता प्रोपेलर है.

Bridgestone- इस जापानी टायर निर्माता कंपनी को इसके संस्थापक Shorijo Ishibashi का नाम मिला है. दरअसल Ishibashi का जापानी भाषा में अर्थ होता है- Stone Bridge.

Canon- The Precision Optical Instruments Laboratory का नया नाम इसके द्वारा निर्मित पहले कैमरे Kwannon पर आधारित है. इसे Kannon से भी जोड़ कर देखा जाता है जो कि करुणा के बोधिसत्व का जापानी नाम है.

Casio- कंपनी के संस्थापक Kashio Tadao के नाम से बना है ये ब्रांड. टोक्यो में 1946 में स्थापित ये कंपनी कैलकुलेटरों के अलावा भी अनेक तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाती है.

Coca-Cola- ये नाम कोका की पत्तियों और कोला की फली से लिया गया है, जो कि 1885 में बाज़ार में स्वास्थ्यवर्द्धक दवाई के रूप में उतारे गए पेय पदार्थ के मूल फ़्लेवर में शामिल था.

Daewoo- कोरियाई भाषा में इसका मतलब है- Great Universe. इस उद्योग समूह को 1990 के दशक में संकट से गुजरना पड़ा. हालाँकि 1999 में दिवालिया घोषित होने के बाद भी इस उद्योग समूह की कई कंपनियाँ अभी सक्रिय हैं. वैसे अब इसकी मोटर निर्माण इकाइयाँ अमरीका के जेनरल मोटर्स और भारत के टाटा समूह के नियंत्रण में हैं.

eBay- इस ऑनलाइन बाज़ार को इसके संस्थापक Pierre Omidyar ने अपनी इंटरनेट कंसल्टेंसी Echo Bay Technology Group का नाम देने का मंसूबा बनाया था. लेकिन Echo Bay नाम एक स्वर्ण खनन कंपनी पहले ही रजिस्टर्ड करा चुकी थी.

Fiat- यह नाम Fabbrica Italiana Automobili Torino यानि Italian Automobile Factory of Turin का संक्षिप्त रूप है. सोनिया गांधी भी उत्तरी इटली के Turin शहर की हैं.

Google- ये नाम googol शब्द से बना है जो एक बहुत बड़ी संख्या होती है. 1 के आगे 100 बार शून्य लगाने से बनी संख्या. संस्थापकों का दावा था कि उनका सर्च इंजन इतनी बड़ी संख्या में सूचनाओं को खंगाल सकता है. अब तो google को प्रमुख शब्दकोशों में भी एक क्रिया के रूप में शामिल किया जा चुका है जिसका मतलब होता है गूगल सर्च इंजन की सहायता से इंटरनेट पर जानकारी जुटाना.

Hewlett-Packard- कहा जाता है कि कंपनी के संस्थापकों Bill Hewlett और David Packard ने एक सिक्का उछाल कर इस बात का फ़ैसला किया कि दोनों में से किसका नाम शुरू में आएगा.

Ikea- इस प्रमुख स्वीडिश फ़र्नीचर कंपनी का नाम इसके संस्थापक Ingvar Kamprad ने अपने नाम में अपने पैतृक घर यानि Elmtaryd नामक फ़ार्म और पास के गाँव Agunnaryd के पहले अक्षरों को मिला कर बनाया है.

Intel- संस्थापक Bob Noyce और Gordon Moore अपनी माइक्रोचिप कंपनी को Moore Noyce नाम देना चाहते थे, लेकिन एक होटल कंपनी ने पहले ही ये नाम ले रखा था. मजबूरी में Integrated Electronics के हिस्सों को जोड़ कर Intel बनाया गया.

Kodak- ये एक अनूठा ब्रांड नाम है. कैमरा कंपनी के संस्थापक जॉर्ज ईस्टमैन ने सिर्फ़ इसलिए ये नाम चुना कि ये सुनने में अच्छा लगता है. हालाँकि, अपनी माँ के साथ सलाह-मशविरा कर ये नाम चुनते वक़्त उन्होंने इस बात का विशेष ध्यान रखा कि नाम को बिगाड़ा नहीं जा सके, उसका ग़लत उच्चारण नहीं किया जा सके. ईस्टमैन ने इस बात का भी ध्यान रखा कि इसे किसी और उत्पाद, कंपनी या स्थान से नहीं जोड़ा जा सके.

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