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गुरुवार, अप्रैल 30, 2009

स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियों के ख़तरे


स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियाँ कितनी ख़तरनाक होती हैं, इसका अहसास किसी परिजन या मित्र से ये सुनने पर होता है कि अमुक दवाई, फलाँ साइड-इफ़ेक्ट के कारण बिल्कुल नहीं लेनी चाहिए. किसी दवाई के सर्वविदित या लगभग शत-प्रतिशत सेवनकर्ताओं में होने वाले साइड-इफ़ेक्ट(जैसे कफ़-सिरप पीने के बाद आप नींद महसूस कर सकते हैं) के बारे में दावा किया जा रहा हो तो बात समझी जा सकती है, लेकिन किसी दवाई की पैकिंग पर छपी चेतावनी या फिर डिब्बे के भीतर रखे पर्चे पर छपी बातों के आधार पर कोई ठोस राय बना लेना थोड़ा अटपटा लगता है. ऐसे लोग सुनना नहीं चाहते कि किसी दवा विशेष का कोई साइड-इफ़ेक्ट संभव है लाखों में से एक सेवनकर्ता को झेलना पड़ता हो, या हो सकता है मात्र क़ानूनी झमेलों से बचने के लिए कुछ चेतावनियाँ लिखी गई हों.

इसी मुद्दे पर इस हफ़्ते 'फ़ाइनेंशियल टाइम्स' के पत्रिका खंड में छपा आलेख विचारणीय है. इसका शीर्षक है- 'आख़िर क्यों स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियाँ नुक़सानदेह हो सकती हैं?' लेख की शुरुआत ही कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में 25 साल पहले हुए एक अध्ययन की चर्चा से होती है. इस अध्ययन के लिए कुछ वोलंटियर चाहिए थे. इस वास्ते दिए गए विज्ञापन में साफ़ किया गया कि ये मस्तिष्क पर बिजली के प्रभाव से जुड़ा अध्ययन है, जिसमें भाग लेने वालों के सिर पर इलेक्ट्रोड लगा कर उसमें विद्युत प्रवाहित की जाएगी. विज्ञापन में साफ़-साफ़ ये चेतावनी भी दी गई कि अध्ययन में भाग लेने वालों को गंभीर सिरदर्द का सामना करना पड़ सकता है.

स्पष्ट चेतावनी के बाद भी शोधकर्ताओं को ये देख कर ख़ुशी हुई कि कुल 34 छात्र अध्ययन का हिस्सा बनने के लिए सामने आए. अध्ययन की समाप्ति के बाद उनमें से दो तिहाई छात्रों ने सिरदर्द की शिकायत की. हालाँकि सच्चाई ये थी कि उनमें से किसी के सिर पर लगे इलेक्ट्रोडों में बिजली प्रवाहित नहीं की गई थी. दरअसल ये मस्तिष्क पर बिजली के प्रभाव के बारे में अध्ययन था ही नहीं. अध्ययन इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए था कि क्या बीमारी की सोच मात्र ही किसी स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बना सकती है? ज़ाहिर है अध्ययन में इसका जवाब 'हाँ' के रूप में सामने आया.

वैज्ञानिकों की भाषा में स्वस्थ व्यक्तियों को अस्वस्थता का भान कराने वाले इस प्रभाव को नोसीबो प्रभाव कहते हैं. Nocebo यानि Placebo का उलट शब्द. दोनों ही लैटिन से आए शब्द हैं, हालाँकि प्लेसीबो जहाँ बहुत पहले से हमारे बीच है वहीं नोसीबो कुछ साल पहले ही चिकित्सा के पेशे से बाहर प्रचलन में आया है. प्लेसीबो का शाब्दिक अर्थ है- 'मैं ख़ुश करूँगा', जबकि नोसीबो का- 'मैं नुक़सान करूँगा'.

प्लेसीबो नए उपचारों, नई दवाओं को परखने के लिए काम में आता है. किसी अध्ययन में कुछ वोलंटियर को सचमुच की दवा दी जाती है, जबकि कुछ को दवारहित गोली या प्लेसीबो. जिन्हें प्लेसीबो दी जाती हैं उन्हें यही बताया जाता है कि अध्ययन में शामिल सभी लोगों को सचमुच की दवा दी जा रही है. बाद में विशेषज्ञ इन दोनों उपसमूहों का अध्ययन कर वास्तविक दवा के असल प्रभाव और साइड-इफ़ेक्ट्स का आकलन कर पाते हैं. (पश्चिम के चिकित्सकों का एक समूह संपूर्ण होम्योपैथी को प्लेसीबो प्रभाव मात्र मानता है.) दूसरी ओर यदि नोसीबो सिद्धांत की व्याख्या एक पंक्ति में की जाए तो वो कुछ इस तरह की होगी- 'बीमार होने की सोचो, बीमार बनो.'

नोसीबो प्रभाव हमारे बीच इतना व्याप्त है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ ये मानने लगे हैं कि खाद्य-पदार्थों से जुड़ी एलर्जी, मोटापा, पीठ का दर्द, थकान और विद्युत-संवेदनशीलता(जैसे-मोबाइल पर देर तक बातें करने के दौरान मस्तिष्क पर विद्युतीय क्षेत्र के कथित असर से सिरदर्द) जैसी इक्कीसवीं सदी की कई चर्चित बीमारियों का काफ़ी कुछ श्रेय इसको देते है. दवाइयों के साथ आने वाली चेतावनियों के साथ-साथ नोसीबो प्रभाव को फैलाने में बीमारी विशेष के ख़तरों के बारे में चलाए जाने वाले जागरुकता अभियानों तथा अपने उत्पाद बेचने के लिए दवा कंपनियाँ द्वारा बनाए जाने वाले डर के माहौल का भी पूरा योगदान होता है. इस समय कई देशों में फैल चुके स्वाइन फ़्लू का ही उदाहरण लें तो ग़ौर करने वाली बात है कि सरकारें अपने नागरिकों को कितना प्रोएक्टिव होकर ऐहतियाती उपायों की घुट्टी पिला रही हैं(सार्वजनिक स्थलों पर जाने से बचें, दरवाज़े का हैंडल छूने के बाद हाथ को धोएँ आदि), या सर्जिकल-मास्क बनाने वाली कंपनियाँ किस तरह अपने उत्पाद को फ़्लू से बचने के कारगर उपाय के रूप में बाज़ार में ठेले जा रही हैं(हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मुखावरण फ़्लू वायरस फैलाने से आपको भले ही कुछ हद तक रोक लें, वायरस के आप तक पहुँचने में अवरोध नहीं बन सकेंगे).

बहुत से लोग ये सामान्य-सी बात स्वीकार करने को तैयार नहीं कि कई अस्थाई शारीरिक लक्षण किसी स्वस्थ व्यक्ति की ज़िंदगी का आम हिस्सा होते हैं. मसलन सिरदर्द आते-जाते रहते हैं. किसी रात नींद नहीं आती है, तो किसी दिन आँखें खोले रखना मुश्किल होता है. कभी हम हल्के-फुल्के मूड में होते हैं, तो कभी मिज़ाज ख़राब होता है. इन अनुभवों पर हम ज़्यादा ध्यान नहीं देते, बशर्ते तबीयत ख़राब होने के लक्षण ढूंढने की सनक न चढ़ी हो. परंतु किसी को अपनी तबीयत ठीक होने पर संदेह हुआ नहीं कि वह रात में नींद नहीं आने को अनिद्रा रोग, थकान को कमज़ोरी और ख़राब मूड को अवसाद का नाम देने को बिल्कुल तैयार मिलेगा! एक बार किसी बीमारी की चपेट में आने का झूठा यक़ीन होते ही तरह-तरह की चिंताएँ भी घेर लेती हैं. और ये तो माना हुआ तथ्य है कि अतिशय चिंता(भले ही बेमतलब की क्यों न हो)उच्च रक्तचाप और कमज़ोर प्रतिरक्षण प्रणाली के प्रमुख कारणों में से है.

मंगलवार, दिसंबर 30, 2008

आया नैनोफ़ोबिया का दौर

शुक्राणु को अंडाणु की ओर ले जाते चिकित्सकीय नैनोरोबो का एक कल्पनाचित्रविज्ञान में आस्था रखने वालों की यदि दुनिया में कमी नहीं है, तो विज्ञान के अनपेक्षित प्रभावों को लेकर डरने वालों की भी बहुत बड़ी संख्या है. ब्रह्मांड की आरंभिक अवस्था जैसी स्थिति पैदा करने वाली महामशीन Large Hadron Collider में कुछ ख़राबी आने के कारण जहाँ उसके कथित प्रलयंकारी प्रभावों को लेकर चिंताओं का दौर थमा हुआ है, वहीं नैनो तकनीक के कथित गंभीर दुष्प्रभावों को लेकर जैसे चेतावनियों की बाढ़ आ गई है.

नैनो तकनीक क्या है?

नैनो शब्द का इसके मूल ग्रीक भाषा में मतलब होता है- वामन या छोटे आकार का. नैनो तकनीक का क्षेत्र विज्ञान या इंजीनियरिंग का वो अंग है जिसमें परमाणु और अणु के पैमाने पर काम होता है. इसके तहत जिस आकार की चीज़ों या पदार्थों का निर्माण होता है, उनसे छोटे आकार में निर्माण संभव नहीं है. नैनो तकनीक के तहत बने उत्पाद मूलत: 0.1 से लेकर 100 नैनोमीटर आकार के होते हैं. यहाँ ये उल्लेखनीय है कि एक नैनोमीटर एक मीटर के अरबवें हिस्से के बराबर होता है.

इस आकार को समझने के लिए इस बात पर ग़ौर करना होगा कि अधिकांश परमाणु 0.1 से 0.2 नैनोमीटर आकार के होते हैं. डीएनए की लड़ी 2 नैनोमीटर चौड़ी होती है. एक लाल रक्त कोशिका का व्यास 7000 नैनोमीटर का होता है, जबकि हमारे सिर के बाल की औसत मोटाई 80,000 नैनोमीटर होती है.

नैनोमीटर और सेंटीमीटर के बीच के अंतर को हमारे पदचिन्ह और अटलांटिक महासागर के आकारों में अंतर से की जा सकती है.

सूक्ष्म आकार की चीज़ों की प्रकृति अलग क्यों होती है?

जैविक जगत की मूल क्रियाएँ नैनोमीटर के स्तर पर ही होती हैं. यदि आप एक मीटर के अरबवें भाग के पैमाने पर देखें तो सामान्य लगने वाले पदार्थ भी आश्चर्यजनक नए प्रभाव दिखाने लगते हैं. किसी पदार्थ से बनी किसी सूक्ष्म वस्तु की भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ, उसी पदार्थ से बनी किसी बड़ी चीज़ के मुक़ाबले बिल्कुल अलग हो सकती है. नैनो पैमाने पर सूक्ष्माकार दिया जाए तो किसी पदार्थ की मज़बूती, चिपकने और सोखने जैसी क्षमताएँ कई गुणा बढ़ सकती है. इसलिए वैज्ञानिक नैनो तकनीक का इस्तेमाल कर नई-नई चीज़ें बनाने में जुट गए हैं.

उदाहरण के लिए सोने-चाँदी के जेवरात इसलिए बनाए जाते हैं कि दोनों तत्व अपेक्षाकृत अक्रियक होते हैं यानि उनकी चमक और प्रकृति लंबे समय तक जस की तस बनी रहती है. वहीं नैनो पैमाने पर सोने और चाँदी के कण-समूह विशेष गुण प्रदर्शित करते हैं. नैनो स्तर पर सोने के 8 या 22 परमाणुओं का समूह जहाँ किसी उत्प्रेरक के समान सक्रिय रहता है, वहीं 7 या 20 परमाणुओं का समूह अक्रिय पदार्थ की तरह व्यवहार करता है. इसी तरह चाँदी के नैनो-कण बैक्टेरियारोधी गुण प्रदर्शित करते हैं, इसलिए घाव भरने की आधुनिक दवाओं में उनका खुल कर उपयोग किया जाने लगा है. नैनो स्तर पर रवाकृत किए गए धातुओं की बात करें तो उनमें सामान्य प्रकार की तुलना में कहीं ज़्यादा मज़बूती और लचीलापन होता है.

क्या कारण है नैनो पदार्थों के इस क़दर अलग व्यवहार का?

इसके पीछे मुख्य रूप से दो कारण माने जाते हैं. पहली बात ये कि नैनो-कणों में घनत्व के अनुपात में सतह का आकार अपेक्षाकृत बड़ा होता है जो इन्हें ज़्यादा सक्रिय बनाता है. दूसरी बात ये कि अमूमन 100 नैनोमीटर से छोटे आकार के पदार्थों पर क़्वांटम प्रभाव बढ़ जाता है जो इनके प्रकाशीय, इलेक्ट्रॉनिक और चुंबकीय प्रभावों में व्यापक रद्दोबदल कर डालता है.

हालाँकि इसका मतलब ये नहीं है कि सूक्ष्म जगत में प्रकृति के अलग नियम चलते हैं. इससे मात्र ये साबित होता है कि छोटों की दुनिया में प्रकृति के नियम अलग तरह से लागू होते हैं. उदाहरण के लिए यदि एक इलेक्ट्रॉन को एक नैनोमीटर व्यास के तार से गुजारा जाए तो इलेक्ट्रॉन की गतिविधियाँ बुरी तरह नियंत्रित हो जाएँगी जिसके चलते वहाँ वोल्टेज और सुचालकता के संबंध नए तरह से परिभाषित होने लगेंगे.

आम उपयोग की किन चीज़ों या उपकरणों में इस समय नैनो तकनीक का उपयोग किया जा रहा है?

वर्ष 2006 तक दुनिया भर में 1600 नैनो पदार्थों का पेटेन्ट कराया जा चुका था और अमरीका के Project on Emerging Nanotechnologies के अनुमानों के अनुसार इस समय दुनिया भर में कम से कम 600 उत्पाद ऐसे हैं जिनमें नैनो पदार्थों का उपयोग किया जाता है. इसी साल वैज्ञानिकों ने मैग्नीज़ ऑक्साइड के नैनो तार की सहायता से एक ऐसा कागज़ तैयार किया है जो पानी पर फैले तेल को पूरा का पूरा सोख लेता है, वो भी एक बूँद पानी सोखे बिना. इससे मिलते-जुलते तरीक़े से किसी भी कपड़े को शत-प्रतिशत वॉटरप्रूफ़ बनाया जा सकता है.

नैनो कार्बनअमरीकी सरकार के National Nanotechnology Initiative द्वारा तैयार सूची के अनुसार आप इन जगहों पर नैनो तकनीक का इस्तेमाल पा सकते हैं- कंप्यूटर हार्ड ड्राइव, कार के पुर्ज़े और कैटलिक्टिक कन्वर्टर, खरोंचमुक्त पेंट और कोटिंग, सूरज के हानिकारक किरणों से बचाने वाले लोशन और लिपस्टिक, टिकाऊ टेनिस बॉल और हल्के लेकिन मज़बूत टेनिस रैक़ेट, धातुओं को काटने वाले औजार, जीवाणुरोधी चिकित्सकीय पट्टी, संवेदनशील उपकरणों की एंटीस्टैटिक पैकेजिंग, अपने काँच की स्वत: सफाई वाली करने वाली खिड़कियाँ, धब्बारोधी कपड़े आदि.

नैनो तकनीक से क्या कुछ संभव हो सकता है?

अनंत संभावनाएँ हैं. वर्ष 1986 में ही के. एरिक ड्रेक्सलर नामक अमरीकी वैज्ञानिक ने अपनी प्रकृति ख़ुद तैयार करने में सक्षम नैनो आकार के रोबोट की परिकल्पना की थी जो कि उनके अनुसार समाज के बहुत सारे काम करने में सक्षम होंगे. इतना ही नहीं नैनोरोबोट मनुष्य के शरीर की मरम्मत भीतर से कर उसे दीर्घायु बना सकेंगे. ऐसे रोबोट वायुमंडल से प्रदूषणकारी तत्वों की सफाई उनके उत्सर्जन के तुरंत बाद करने में सक्षम होंगे.

ख़ैर, ये तो हुई बहुत बाद की भविष्यवाणी जिनमें से कुछ आज 20 साल बाद भी कोरी कल्पना मात्र दिख रही हैं. लेकिन ये तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि निकट भविष्य में नैनो तकनीक से कंप्यूटिंग, चिकित्सा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों के अलावा पर्यावरण और सैन्य क्षेत्र में भी काफ़ी कुछ नया देखने को मिलेगा. यदि चिकित्सा क्षेत्र की ही बात करें तो ऐसे छोटे उपचारी स्मार्ट-बम बनाए जा चुके हैं जो कैंसरयुक्त कोशिकाओं तक सीधे दवा पहुँचाएँगे. दरअसल ह्यूस्टन के राइस विश्वविद्यालय में नैनोबुलेट के ज़रिए ऐसी कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने का सफल प्रयोग किया जा चुका है, जिनका कि ऑपरेशन संभव नहीं था. निकट भविष्य में मानव शरीर की धमनियों में गश्त लगाने वाले नैनो उपकरण बनने की भी पूरी संभावना बताई जा रही है जो संक्रमणों का मुक़ाबला करेंगे और रोगों की सूचना जुटाएँगे. पर्यावरणीय वैज्ञानिक भूमिगत जलस्रोतों को ज़हरीले प्रदूषकों से मुक्त करने के अलावा ज़्यादा समर्थ सौर-पैनल बनाने में नैनो तकनीक का प्रयोग पहले से ही कर रहे हैं.

नैनो तकनीक को लेकर इतना डर क्यों?

ये बिल्कुल स्पष्ट है कि सूक्ष्म आकार के किसी पदार्थ का व्यवहार समान स्रोत वाले किसी बड़े आकार के पदार्थ से बिल्कुल ही अलग होता है. लेकिन नैनो पदार्थों के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभावों के बारे में विस्तृत अध्ययन अभी नहीं हुआ है. हालाँकि पिछले दिनों छिटपुट अध्ययन ज़रूर हुए हैं. उदाहरण के लिए हाल ही में हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि वाहनों के धुएँ के साथ निकलने वाले अतिसूक्ष्म आकार के रासायनिक कण हृदय रोगों के कारकों में शामिल हैं.

इस बात के कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं कि धूप से त्वचा की सुरक्षा करने वाले क्रीम में जिन नैनो-कणों का उपयोग किया जाता है वे नुक़सानदेह हैं, लेकिन उनसे स्वास्थ्य को कोई नुक़सान नहीं होगा इस बारे में भी निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है.

कई संस्थाओं ने कृत्रिम नैनोकण युक्त पदार्थों के बहिष्कार का आहवान किया है, मानो प्राकृतिक रूप से निर्मित नैनो-कणों के ग़ैरनुक़सानदेह होने की गारंटी हो, जबकि ऐसी कोई बात नहीं है. उदाहरण के लिए कोयला, लकड़ी आदि को जलाते समय धुएँ के साथ जो कालिख या राख उड़ती है वो भी वास्तव में कार्बन से बने नैनो कण ही हैं, जो कि स्वास्थ्य के लिए बहुत ही नुक़सानदेह हैं और जिनसे हर कोई बचना चाहता है.

ब्रिटेन के Royal Commission on Environmental Pollution की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि नैनो तकनीक से बने उत्पाद स्वास्थ्य संबंधी ख़तरों की पड़ताल किए बिना बाजार में ठेले जा रहे हैं. ब्रिटेन में ही उपभोक्ता अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था 'व्हिच?' ने पिछले महीने जब सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली 67 कंपनियों से पूछा कि क्या वे अपने उत्पादों में नैनो पदार्थों का इस्तेमाल करती हैं, तो मात्र 17 कंपनियों ने जवाब दिया जिनमें से 8 ने हामी भरी.

दरअसल इन उत्पादों के निर्माताओं का बहाना ये है कि इनके द्वारा प्रयुक्त नैनो पदार्थों में से अधिकतर सिल्वर और कार्बन जैसे रासायनिक पदार्थों के ज़रिए बनते हैं, और आमतौर पर सुरक्षित स्रोत माने जाते हैं. लेकिन नैनोमीटर जितने सूक्ष्म पैमाने पर इन उत्पादों का मनुष्यों, पशुओं और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसकी क़ायदे से पड़ताल किसी ने नहीं कराई है.

किस तरह के नैनो उत्पादों को लेकर विशेष चिंताएँ हैं?

अभी जिन उत्पादों को लेकर ख़ास चिंताएँ हैं वे हैं- नैनोसिल्वर और कार्बन नैनोट्यूब. नैनोसिल्वर एक जीवाणुरोधी पदार्थ है जो मोजे, जाँघिए और टीशर्ट जैसे कपड़ों में दुर्गंध पैदा करने वाले जीवाणुओं के विकास पर रोक लगाती है. जबकि कार्बन नैनोट्यूब से बने कपड़ों को डाई करने की ज़रूरत नहीं होती है, क्योंकि नैनोफ़ाइबर की मोटाई से उसका रंग निर्धारित किया जाता है जोकि कार्बन रेशों के परावर्तक गुणों से संभव होता है.

नैनोफ़ाइबरआलोचकों का कहना है कि नैनोसिल्वर किसी ब्लीच से भी दुगुने अनुपात में जीवाणुओं को मारता है. ज़ाहिर है इससे उपयोगी जीवाणु भी बड़ी संख्या में मारे जाते होंगे. नैनोसिल्वर वाले कपड़ों की धुलाई के बाद जो पानी नालों के ज़रिए जल स्रोतों में जाता है उसके दुष्प्रभावों का सिर्फ़ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है. जबकि नैनोफ़ाइबर से फेफड़ों के उसी तरह के रोग होने की आशंका जताई जा रही है जैसा कि एस्बेस्टस के रेशों के कारण होते हैं.

नैनो-चिकित्सा की बात करें तो नॉर्थ कैरोलाइना विश्वविद्यालय के एक विशेषज्ञ ने आगाह किया है कि शरीर के भीतर अपना काम करने के बाद नष्ट नहीं होने वाले और भीतर ही बने रहने वाले नैनो पदार्थ अंगों की नाकामी का कारण बन सकते हैं.

कैसे बनते हैं नैनो पदार्थ?

पारंपरिक तरीक़ों से नैनो पदार्थ या औजार तैयार करना आसान नहीं है. इन्हें बनाने के लिए आमतौर पर दो तरीक़े अपनाए जाते हैं. पहला तरीक़ा बॉटम-अप का है यानि सूक्ष्तम इकाई से शुरुआत की जाती है. कई मामलों में एक-एक परमाणु से शुरुआत की जाती है. टाइटेनियम डाइऑक्साइड और आइरन ऑक्साइड जैसे कम जटिल नैनो पदार्थ रासायनिक प्रक्रिया के ज़रिए बनाए जाते हैं. जबकि कार्बन नैनोट्यूब या 60 परमाणुओं वाले गेंद जैसे यौगिकों को स्वत: आकार ग्रहण के लिए बाह्य दशाएँ मुहैया कराई जाती हैं.

दूसरे टॉप-डाउन तरीक़े में किसी पदार्थ के एक बड़े टुकड़े शुरुआत की जाती है उन्हें काटते-छीलते हुए सूक्ष्म आकार दिया जाता है. सिलिकॉन चिप्स और सर्किट बोर्ड आदि बनाने में यह प्रक्रिया अपनाई जाती है. ये भी कोई आसान प्रक्रिया नहीं मानी जाती है.

शुक्रवार, जुलाई 11, 2008

स्वास्थ्यवर्द्धक ब्लॉगिंग

अब से सवा तीन साल पहले जब मैंने ख़ुद का एक ब्लॉग बनाया तो उस समय मेरे लिए इस उद्यम के मुख्य उद्देश्य थे- विभिन्न विषयों पर अपनी राय सामने रखना, तथा उपयोगी/रोचक जानकारियों को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाना. ये सपने में भी नहीं सोचा था कि ब्लॉगिंग के मेरे शौक़ का स्वास्थ्य से भी कोई सीधा संबंध है. इसलिए प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका 'साइंटिफ़िक अमेरिकन' में पिछले दिनों जब पढ़ा कि ब्लॉगिंग स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, तो सहज विश्वास नहीं हुआ.

पत्रिका के न्यूरोबॉयोलॉजी खंड में The Healthy Type शीर्षक से छपे लेख की पहली ही पंक्ति कहती है- ब्लॉगिंग के चल निकलने का कारण शायद स्वचिकित्सा है. इसके अनुसार वैज्ञानिकों और लेखकों को विचारों-भावों की अभिव्यक्ति के उपचारी प्रभावों की जानकारी तो बहुत पहले से ही रही है, लेकिन अब जाकर पता चला है कि ये प्रक्रिया तनाव तो घटाती ही है, इसके फ़िज़ियॉल्जिकल फ़ायदे भी हैं. अनुसंधानों से पता चला है कि अपनी भावनाओं को ब्लॉगिंग जैसे माध्यम के ज़रिए व्यक्त करने से यादाश्त सुधरती है, नींद बेहतर आती है, प्रतिरक्षण कोशिकाएँ ज़्यादा सक्रिय रहती हैं, एड्स के मरीज़ों में HIV वायरस की मात्रा कम होती है और यहाँ तक कि ऑपरेशन के बाद घाव भरने की प्रक्रिया में भी तेज़ी आती है.

'साइंटिफ़िक अमेरिकन' का लेख मेडिकल जर्नल 'Oncologist' में छपे एक शोध पर आधारित है. ये शोध कैंसर के रोगियों पर किया गया था. इसमें पाया गया कि उपचार से पहले लेखन के ज़रिए ख़ुद को अभिव्यक्त करते रहे कैंसर रोगी, उपचार के बाद उन रोगियों से मानसिक और शारीरिक दोनों ही तरह से बेहतर स्थिति में थे जो कि ऐसी रचना प्रक्रिया से दूर थे.

अब ब्लॉगों की संख्या में लगातार होती वृद्धि को देखते हुए वैज्ञानिकों ने लेखन के ज़रिए विचारों की अभिव्यक्ति के स्वास्थ्यकारी प्रभावों को तंत्रिका विज्ञान के ज़रिए समझने की कोशिश शुरू की है. हार्वर्ड विश्वविद्यालय और मैसच्यूसेट जेनरल हॉस्पिटल की न्यूरोसाइंटिस्ट एलिस फ़्लैहर्टि का मानना है कि ब्लॉगिंग के स्वास्थ्यकारी असर के अध्ययन की शुरुआत पीड़ा संबंधी प्लेसीबो सिद्धांत से की जा सकती है. प्लेसीबो यानि मरीज़ को दी गई झूठी दवा जिसमें असल दवाई नाम मात्र की भी नहीं होती. प्लेसीबो सिर्फ़ मरीज़ पर सकारात्मक मानसिक असर के लिए दी जाती है, क्योंकि उसे लगता है कि उसका इलाज चल रहा है.

फ़्लैहर्टि का कहना है एक सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य दर्द से जुड़े तरह-तरह के ऐसे व्यवहारों से संबद्ध है, जो कि संतुष्टि प्राप्ति में प्लेसीबो की भूमिका निभाते हैं. तनावपूर्ण अनुभवों के बारे में ब्लॉगिंग करना इसका एक उदाहरण माना जा सकता है.

तंत्रिकाविज्ञानी फ़्लैहर्टि ने हाइपरग्रैफ़िया(लिखने की बेलगाम चाहत) और राइटर्स ब्लॉक(कुछ नया लिखने या अधूरी रचना को पूरा करने की मानसिक दशा नहीं बना पाना) जैसी स्थितियों का अध्ययन किया है. उन्होंने कुछ बीमारियों के मॉडल पर भी इन चीज़ों को समझने की कोशिश की है. उदाहरण के लिए सनकी लोगों की बात करें तो उनके बकबक करने के पीछे मस्तिष्क के बीचोंबीच स्थित तंत्रिका प्रणाली Limbic System की किसी तरह की अतिसक्रियता का कारण हो सकता है. दरअसल मस्तिष्क का यह हिस्सा हर तरह की ललक के लिए ज़िम्मेवार होता है. अब चाहे वो खाने की ललक हो, सेक्स की या फिर समस्याओं के समाधान की. फ़्लैहर्टि का कहना है कि ब्लॉगिंग में भी मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम की कोई भूमिका हो सकती है. उनका कहना है कि ब्लॉगिंग मस्तिष्क में डोपामीन स्राव बढ़ाने का कारण भी हो सकता है, जैसा कि संगीत सुनने, दौड़ने या कलाकृतियों को निहारने के दौरान होता है.

लेकिन उपचारी लेखन के पीछे के तंत्रिका-तंत्र संबंधी राज़ को खोलने का दावा करना अभी जल्दबाज़ी होगी. दरअसल लेखन कार्य से पहले और उसके बाद मस्तिष्क की अलग-अलग अवस्थाओं का चित्रण ही संभव नहीं हो पाया है. ऐसा इसलिए क्योंकि मस्तिष्क के जिन हिस्सों की इसमें भूमिका होती है, वो सिर में बहुत भीतर हैं. हाँ, एमआरआई चित्रण के ज़रिए इतना ज़रूर मालूम पड़ा है कि लेखन से पहले, लेखन करते समय और उसके बाद, दिमाग़ की छवियाँ अलग-अलग होती हैं. लेकिन इन अलग-अलग छवियों को बार-बार हूबहू दोहराते हुए देखा जाना मुश्किल है. और, जब तक ऐसे दोहरावों को रिकॉर्ड नहीं किया जाता, इस मामले में सटीक अध्ययन संभव नहीं हो सकेगा.

ऐसे में वैज्ञानिकों के पास ठोस परिणाम पाने के लिए दो उपाय रह जाते हैं, जिन पर काम करने पर विचार किया जा रहा है. पहला उपाय है लेखन के ज़रिए भावनाओं की अभिव्यक्ति को लेकर समुदाय केंद्रित व्यापक अध्ययन. दूसरा उपाय है ऐसे लेखन और जैविक परिवर्तनों(जैसे नींद) के बीच संबंधों की पहचान.

ब्लॉगिंग के फ़ायदों के तंत्रिका-तंत्र संबंधी आधार की स्पष्ट पहचान भले ही अभी नहीं हो पाई हो, लेकिन कैंसर जैसी बीमारियों से जूझ रहे रोगियों पर इसके सकारात्मक असर पर लोगों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है. शायद इसी लिए Oncologist में छपे शोध से जुड़ी अग्रणी वैज्ञानिक नैन्सी मॉर्गन ने कैंसर रोगियों के उपचार के बाद की देखभाल के कार्यक्रमों में ब्लॉगिंग को भी शामिल करने का फ़ैसला किया है.

मंगलवार, फ़रवरी 27, 2007

बीमारी हमारी, और फ़ायदा तुम्हारा?

विश्व स्वास्थ्य संगठन और बहुराष्ट्रीय दवा निर्माता कंपनियों से सफलतापूर्वक पंगा लेकर इंडोनेशिया ने एक ऐसा रास्ता तैयार किया है, जिस पर चल कर भारत समेत तमाम विकासशील देश फ़ायदा उठा सकते हैं.

इंडोनेशिया की इस सफल लड़ाई की जड़ में है बर्ड फ़्लू की बीमारी. चिड़ियों के ज़रिए फैलने वाली ऐसी बीमारी, जिसके मानवीय महामारी का रूप लेने की आशंका लगातार बनी हुई है. सर्वाधिक डर यूरोपीय देशों को है, हालाँकि इस बीमारी की चपेट में आकर मनुष्यों के मरने की लगभग सभी घटनाएँ अभी पूर्वी एशियाई देशों तक ही सीमित रही हैं.

वैसे, यूरोपीय देशों के दरवाज़े पर बर्ड फ़्लू ने दस्तक ज़रूर दे दी है. इसी महीने ब्रिटेन के एक टर्की फ़ार्म में बर्ड फ़्लू का मामला पकड़ में आया. बीमारी एक फ़ार्म के पक्षियों तक ही सीमित थी, इसलिए क़रीब एक लाख साठ हज़ार टर्कियों को मार कर उसके प्रसार की आशंका आसानी से समाप्त कर दी गई.

बर्ड फ़्लू के अभी तक सामने आए रूपों में सबसे ख़तरनाक है एच5एन1 प्रकार के वायरस से फैलने वाला बर्ड फ़्लू. यह वायरस यूरोप में हंगरी, जर्मनी और ब्रिटेन तक पहुँच गया है. इसके ख़िलाफ़ एक कारगर दवाई या टीका बनाने के लिए ज़रूरी है कि एच5एन1 की उत्पत्ति और विकास का लगातार अध्ययन किया जाए.

एच5एन1 के शुरुआती नमूने इंडोनेशिया के पास हैं. जहाँ इस वायरस की चपेट में आकर कई लोग मारे भी जा चुके हैं. और, स्थापित अंतरराष्ट्रीय परंपराओं के अनुसार इंडोनेशिया इस बात के लिए बाध्य है कि वो एक ख़तरनाक बीमारी से जुड़े नमूने नियमित रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन को सौंपे. लेकिन इंडोनेशिया ने पिछले दिनों ऐसा करने से इनकार कर दिया.

इंडोनेशिया ने बर्ड फ़्लू मामले में सहयोग नहीं करने के दो प्रमुख कारण बताए. पहला कारण ये कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को सौंपे जाने के बाद बीमारी के नमूने बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों तक पहुँच जाएँगे. बीमारी के नमूनों का अध्ययन करते हुए दवा कंपनियाँ दवाइयाँ या टीके बना कर ख़ुद तो अरबों डॉलर कमाएँगीं, लेकिन इंडोनेशिया को धेला तक नहीं देंगी.

इंडोनेशिया का दूसरा तर्क ये था कि यदि बीमारी ने विश्वव्यापी महामारी का रूप लिया तो पश्चिमी दवा कंपनियाँ पहले विकसित देशों की सरकारों को दवाइयों की आपूर्ति सुनिश्चत करेंगी जहाँ उनके अधिकतर उत्पादन केंद्र स्थित हैं. दवा कंपनियों की इस प्राथमिकता की कई मिसालें पहले से ही मौजूद हैं.

विज्ञान पत्रिका 'न्यू साइंटिस्ट' के अनुसार इंडोनेशिया ने भले ही विरोध करने का फ़ैसला अब किया हो, लेकिन समस्या दशकों पुरानी है. चूँकि अन्य कई प्रकार के विषाणुओं और जीवाणुओं के समान फ़्लू वायरस भी दवाओं के ख़िलाफ़ ख़ुद को ढालने की काबिलियत रखते हैं, इसलिए हर देश प्रत्येक साल विश्व स्वास्थ्य संगठन को वायरस के नए नमूने सौंपता है ताकि टीकों को अद्यतन बनाया जा सके, अपडेट किया जा सके.

पिछले दिनों इंडोनेशिया ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को दो टूक शब्दों में कह दिया कि अनुसंधान के लिए वह फ़्लू वायरस के नए नमूने तभी सौंपेगा, जब उसे नमूनों के किसी व्यावसायिक परियोजना में उपयोग नहीं किए जाने की गारंटी दी जाती हो. साथ ही, इंडोनेशिया ने मेलबोर्न की दवा कंपनी सीएसएल के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की धमकी भी दे डाली, जिसने विश्व स्वास्थ्य संगठन को इससे पहले सौंपे गए इंडोनेशियाई नमूनों के आधार पर एक नया टीका तैयार करने की घोषणा की थी.

अब ताज़ा जानकारी ये है कि इंडोनेशिया सरकार की माँग के आगे विश्व स्वास्थ्य संगठन को झुकना पड़ा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इंडोनेशिया को उसके एच5एन1 नमूनों के आधार पर तैयार टीकों में साझेदारी दिलवाने का आश्वासन दिया है. इसके अलावा इंडोनेशिया को अपने यहाँ बर्ड फ़्लू टीका उत्पादन केंद्र बनाने में भी सहायता दी जाएगी.

इतना ही नहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पूरी दुनिया को यह समझाने के लिए इंडोनेशिया की तारीफ़ की है कि वायरस के नमूने उपलब्ध कराने वाले देशों को नए टीकों के साथ-साथ बाक़ी फ़ायदे भी मिलने चाहिए.

आशा है, 'बायोपाइरेसी' के ख़िलाफ़ इंडोनेशिया की सफल लड़ाई से अन्य विकासशील देश भी सीख ले सकेंगे. साथ ही, विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की खुली लूट पर रोक लगाने का संबल मिल सकेगा.

गुरुवार, नवंबर 16, 2006

रोमाँचकारी होगा आने वाला कल

दुनिया के ज्ञानियों-ध्यानियों की मानें तो आने वाला कल बड़ा ही रोमाँचकारी होगा. प्रतिष्ठित विज्ञान जर्नल न्यू साइंटिस्ट ने अपने प्रकाशन के 50 साल पूरे होने का जश्न भविष्य की कल्पना करते हुए एक विशेष अंक निकाल कर मनाया है. इस विशेषांक में मौजूदा वैज्ञानिक समुदाय के कुछ बड़े नामों का योगदान है, जिन्होंने पाँच दशक बाद की दुनिया की रूपरेखा खींची है.

न्यू साइंटिस्ट के स्वर्णजयंती अंक में सबसे रोमाँचक लेख इस पुराने सवाल के ऊपर है कि क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं? इस सवाल के जवाब में वैज्ञानिकों का कहना है कि अब तक धरती से परे जीवन की खोज नहीं होने पाने का साफ़ मतलब है कि जीवन बड़ा ही विरल है. लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल ही नहीं है कि ब्रह्मांड में धरती के अलावा कहीं और जीवन नहीं है.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी के फ़्रीमैन डायसन का मानना है कि एक बार हमें धरती से दूर जीवन के अस्तित्व का सबूत मिल जाए तो आगे की खोजें अपेक्षाकृत जल्दी हो सकेंगी. क्योंकि तब वैज्ञानिकों को पता रहेगा कि वो आख़िर ढूँढ क्या रहे हैं.

एरिज़ोना स्टेट यूनीवर्सिटी के पॉल डेवीज़ कहीं ज़्यादा आशावादी हैं. उनका कहना है कि एलियन्स को ढूँढने में रेडियो टेलीस्कोपों के ज़रिए ही सफलता मिले ये कोई ज़रूरी नहीं है. उनका कहना है कि ज़्यादातर जीव सूक्ष्म रूप में यानि जीवाणु या विषाणु के रूप में हैं. ऐसे में क्या पता बाहर का कोई सूक्ष्म जीव धरती पर हमारे ही बीच पल रहा हो!

यदि धरती से दूर जीवन का कोई रूप मिल भी गया तो वो कितना अलग होगा? नासा के क्रिस मैकके की मानें तो ये अंतर अंग्रेज़ी और चीनी भाषाओं के अंतर जितना हो सकता है.

जहाँ तक 50 साल बाद के चिकित्सा जगत की बात है तो वैज्ञानिकों का मानना है कि आज की दवाइयों को तब उसी रूप में देखा जाएगा जैसाकि अभी ओझा-गुनी के सुझाए उपचारों को देखते हैं. यूनीवर्सिटी ऑफ़ शिकागो के ब्रुस लान के अनुसार पाँच दशक बाद प्रत्यारोपण के लिए अंग किसी ज़िंदा या मुर्दा व्यक्ति से लेने की ज़रूरत नहीं होगी, बल्कि अंगों की फ़ार्मिंग की जाएगी. सूअर जैसे जंतुओं में मनुष्यों के लिए अंग उगाए जाएँगे. यानि, अंग प्रत्यारोपण की ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टर किसी व्यावसायिक अंग उत्पादन कंपनी को ऑर्डर कर मरीज़ के 'इम्युनोलॉजिकल प्रोफ़ाइल' के अनुरूप टेलरमेड अंग मँगा सकेगा.

हालाँकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि अंगों की फ़ार्मिंग के आने वाले युग में भी मस्तिष्क या दिमाग़ को कृत्रिम रूप से बनाए जाने की संभावना दूर-दूर तक नज़र नहीं आती है. मतलब, कृत्रिम दिमाग़ के नाम पर आगे भी सुपरकंप्यूटरों से काम चलाते रहिए!

चिकित्सा जगत में आने वाले दिनों में एक और बड़ी प्रगति होगी छिपकली की पूँछ की तरह मानव अंग को भी दोबारा उगाने के क्षेत्र में. फ़िलाडेल्फ़िया में वाइस्टर इंस्टीट्यूट की एलेना हेबर-कैट्ज़ की मानें तो जल्दी ही ऐसी दवाएँ आने वाली हैं जिनके ज़रिए कमज़ोर दिल अपनी मरम्मत ख़ुद कर सकेगा. उनका मानना है कि पाँच से दस साल के भीतर उँगलियों जैसे अंगों को दोबारा उगाना संभव हो सकेगा.

अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी मानव लंबी छलाँग लगाने वाला है. प्रिंसटन यूनीवर्सिटी के जे रिचर्ड गॉट के अनुसार कुछ दशकों के भीतर मानव मंगल ग्रह पर अपनी स्वपोषित कॉलोनी बसा सकेगा. उनके अनुसार इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होगा कि प्रलय या महाविभीषिका की किसी स्थिति में भी धरती से दूर मानव जीवन का अस्तित्व बना रहेगा.

यूनीवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन के रिचर्ड मिलर की मानें तो 2056 आते-आते ऐसे लोगों की बड़ी संख्या होगी जो सौ साल या उससे भी बड़ी उम्र में कामकाज़ी जीवन बिता रहे होंगे. ये चमत्कार होगा मोलेक्युलर बायोलॉजी के क्षेत्र में लगातार हो रही प्रगति के कारण.

...और अंत में एक भविष्यवाणी यूनीवर्सिटी ऑफ़ ब्रिटिश कोलंबिया के डेनियल पॉली की. इनका कहना है कि कुछ दशकों के बाद पूरी दुनिया शाकाहारी होनेवाली है. दरअसल पॉली साहब एक ऐसे यंत्र की कल्पना साकार होते देख रहे हैं, जिसके ज़रिए हम जंतुओं की भावनाओं और विचारों को जान सकेंगे, महसूस कर सकेंगे. ऐसे में किसी विचारवान जीव को मार कर खाने की अनैतिकता भला कितने लोगों को पचेगी!

सोमवार, अक्टूबर 02, 2006

सर्दी-ज़ुकाम से छुटकारा नहीं

सर्दी-ज़ुकाम से परेशानचिकित्सा विज्ञान ने इतनी ज़्यादा प्रगति कर ली है कि क्लोनिंग और डिज़ायनर बेबी की चर्चा भी बिना किसी आश्चर्य भाव के साथ की जाने लगी है. लेकिन ऐसे में क्या ये विरोधाभास नहीं है कि अभी तक सर्दी-ज़ुकाम या common cold का कोई विश्वसनीय इलाज़ नहीं खोजा जा सका है?

पहली नज़र में यही लगता है कि बड़ी दवा कंपनियाँ और चिकित्सा संस्थान एड्स, कैंसर, पार्किन्संस जैसी बीमारियों का इलाज़ ढूँढने में इतने व्यस्त हैं कि सर्दी-ज़ुकाम को किसे फ़िक्र! लेकिन नहीं, ऐसी बात नहीं है. चिकित्सा जगत में ये सर्वमान्य तथ्य है कि सर्दी-ज़ुकाम 200 से ज़्यादा प्रकार के विषाणुओं की करतूत है, यानि बहुत ही जटिल बीमारी है. ज़ाहिर है इससे पार पाने के लिए सारे ज़िम्मेवार विषाणुओं से निपटना होगा, यानि बहुत ज़्यादा संसाधन झोंकने पड़ेंगे. लेकिन ये कोई जानलेवा बीमारी तो है नहीं, तो क्यों नहीं संसाधनों को अन्य बीमारियों के उपचार ढूँढने में खपाया जाए. ऐसे में कार्डिफ़ विश्वविद्यालय के कॉमन कोल्ड सेंटर के निदेशक प्रोफ़ेसर रॉन इकल्स का कहना सही है कि जब तक मानव के पास नाक रहेगी, सर्दी-ज़ुकाम भी रहेगा!

प्रोफ़ेसर इकल्स सर्दी-ज़ुकाम की समस्या की अनदेखी से ख़ासे क्षुब्ध हैं. उनका मानना है कि इस आम बीमारी को झेलने की बहुत भारी आर्थिक क़ीमत चुकानी पड़ रही है. उन्होंने कहा, "यदि आप 75 साल की उम्र तक जीते हैं तो आपको औसत 200 बार सर्दी-ज़ुकाम अपनी चपेट में लेगा...मतलब आपकी ज़िंदगी के पूरे तीन साल छींकते-खाँसते गुजरेंगे. और यदि आप 75 साल पूरे कर चुके हैं तो इस उम्र में 85 प्रतिशत मौत श्वसन संबंधी बीमारियों से होती है...मतलब पकी उम्र में सर्दी-ज़ुकाम की चपेट में आने पर राम-नाम-सत्त होने की बहुत ज़्यादा आशंका रहती है."

तो आख़िर कैसे निपटा जा सकता है हमेशा ही आसपास रहने वाले इस ख़तरे से? प्रोफ़ेसर इकल्स भी मानते हैं कि बड़ी ही मुश्किल चुनौती है. उनके अनुसार फ़्लू के असरदार टीके बनाए जा चुके हैं क्योंकि फ़्लू के लिए ज़िम्मेवार अधिकतर विषाणुओं की चाल-ढाल एक जैसी ही होती है. लेकिन सर्दी-ज़ुकाम के लिए ज़िम्मेवार माने जाने वाले 200 से ज़्यादा विषाणुओं में से अनेक अलग-अलग तरह से व्यवहार करते हैं. इसलिए सर्दी-ज़ुकाम के ख़िलाफ़ किसी टीके के क़ामयाब होने की थोड़ी भी संभावना उसी स्थिति में होगी, जब वो इनमें से कम-से-कम 100 विषाणुओं को अप्रभावी करने में सक्षम हो. ज़ाहिर है, इस तरह का कोई भी टीका बनाना अव्यावहारिक लगता है...बनाया भी तो पता नहीं कितनी ज़्यादा लागत आएगी. ये तो हुआ सर्दी-ज़ुकाम के किसी प्रभावी टीके के निर्माण का एक पक्ष.

दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है साइट-इफ़ेक्ट्स का. कम से कम सौ तरह के विषाणुओं को बेअसर करने वाले किसी टीके के अनेक तरह के साइड-इफ़ेक्ट्स हो सकते हैं. किसी को कोई असाध्य बीमारी हो तो वह तमाम साइड-इफ़ेक्ट्स झेलने के लिए तैयार होगा, लेकिन सर्दी-ज़ुकाम के नाम पर कोई हल्का-सा भी साइड-इफ़ेक्ट्स लेने के लिए तैयार होगा...ऐसा लगता नहीं.

राइनोवायरस14अभी हाल ही में सर्दी-ज़ुकाम के आधे मामलों के लिए मुख्य तौर पर ज़िम्मेवार राइनोवायरस वर्ग के विषाणुओं को बेअसर करने वाली एक दवा बनाई गई थी. चिकित्सा जगत में ख़ुशी का माहौल था कि चलो कम से कम सर्दी-ज़ुकाम के आधे मामलों से तो निपटा जा सकेगा. लेकिन ये ख़ुशी जल्दी ही ग़ायब हो गई, जब दवा के परीक्षण के दौरान पता चला कि ये शरीर के उन रसायनों के साथ प्रतिक्रिया करती है जो कि female sex hormones को प्रभावित करते हैं. हुआ ये कि सर्दी-ज़ुकाम की इस दवा को खाने पर गर्भनिरोधक गोलियाँ ले रही एक महिला गर्भवती हो गई. ये पता चलते ही इस दवा पर काम करना बंद कर दिया गया. हो भी क्यों नहीं, सर्दी-ज़ुकाम से बचने की कोशिश में गर्भवती होना कुछ ज़्यादा ही बड़ा साइड-इफ़ेक्ट है!

माना जाता है शहरों में आबादी की सघनता, तनावपूर्ण जीवनशैली और अपौष्टिक आहार के कारण सर्दी-ज़ुकाम का प्रकोप बहुत ज़्यादा बढ़ गया है. और आजकल जिस तरह का मौसम है (यानि गर्मी अपने समापन के दिनों में है और जाड़ा दस्तक दे रहा है), उसे सर्दी-ज़ुकाम का स्वर्णिम काल कह सकते हैं. सितंबर-अक्तूबर के बाद जनवरी-फ़रवरी में भी विषाणुओं के लिए इस तरह की आदर्श अवस्था बनती है. इस तरह के दिनों में यदि सर्दी-ज़ुकाम का वायरस आपके शरीर तक पहुँच चुके हैं(जहाँ जाइएगा वहीं पाइएगा!), तो शरीर के तापमान में अचानक आई गिरावट के साथ ही आप पूरी तरह उसकी गिरफ़्त में होंगे.


अनुसंधान में पाया गया है कि तनावमुक्त और ख़ुश रहने वाले लोगों को सर्दी-ज़ुकाम की चपेट में आने की संभावना अपेक्षाकृत कम रहती है. ऐसा संभव नहीं हो तो, सर्दी-ज़ुकाम के विषाणुओं से बचने की कोशिश ज़रूर करें. अपने आसपास किसी को छींकते-खाँसते देखें तो उन्हें दूर करें या ख़ुद दूर हो जाएँ.

यदि आप ख़ुद चपेट में हैं तो छींकते-खाँसते समय मुँह को रूमाल से ढंकना कैसे भूल सकते हैं...पूरी नींद लें, विक्स लगाएँ, मसालेदार भोजन का सेवन करें, जम कर गर्म पेय और सूप पीयें...साथ ही ज़रूरत से ज़्यादा पानी पीयें. सामिष हैं तो मेरा जाँचा-परखा नुस्खा:- बकरे की टाँग का शोरबा बहुत लाभकारी रहता है.

जहाँ तक दवाओं के सेवन की बात है तो सर्दी-ज़ुकाम के दौरान बुख़ार चढ़ जाए या शरीर में दर्द हो तो ही कोई दवा लेने की सलाह दी जाती है. वरना, सर्दी-ज़ुकाम के बारे में तो मशहूर है:- दवाओं का सेवन करो तो एक सप्ताह में राहत मिल जाएगी, वरना सात दिन तक लग सकते हैं!