शनिवार, मार्च 28, 2009

बड़ी संख्याओं की बड़ी दुनिया

बड़ी संख्याओं की अपनी ही एक बड़ी दुनिया है. इस दुनिया में मिलियन, बिलियन और ट्रिलियन जैसी भारी-भरकम संख्याओं की चर्चा होती है. पहले मिलियन-बिलियन से ऊपर की संख्याएँ आम समाचारों में कभी-कभार ही दिखती थीं, लेकिन हाल के दिनों में ट्रिलियन या खरब वाले आंकड़े मीडिया में रोज़ाना दिखने लगे हैं. कारण है पूरी दुनिया ख़ास कर पश्चिमी देशों को अपनी चपेट में ले चुका वित्तीय संकट. एक उदाहरण- 'अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वित्तीय संस्थाओं को संभालने के लिए एक ट्रिलियन डॉलर की अतिरिक्त व्यवस्था करने की घोषणा की.'

बड़ी संख्याओं को बड़ा बनाता है शून्य या ज़ीरो. किसी संख्या में जितने ज़्यादा शून्य, उतना ही उसका वज़न. हालाँकि इसका अपवाद ज़िम्बाब्वे में देखा जा सकता है. ज़िम्बाब्वे के डॉलर में पिछले कुछ महीनों के दौरान नियमित रूप से अतिरिक्त शून्य जुड़ता रहा, लेकिन नोट की क़ीमत फिर भी घटती ही गई क्योंकि मुद्रास्फीति की दर भयानक रूप से तेज़ रही. इस साल के शुरू में ज़िम्बाब्वे में डॉलर की एक करेंसी में 1 के आगे 11 शून्य लगाए गए थे, यानि- 100,000,000,000.

पिछले दिनों ऑक्सफ़ार्ड विश्वविद्यालय के गणितज्ञ Marcus Du Sautoy का एक लेख ब्रितानी अख़बार गार्डियन में छपा, जिसमें बड़े अंकों पर बड़ी रोचक जानकारी दी गई है. प्रस्तुत है एक अंश-

0 (शून्य)-

अंकों की दुनिया में काफ़ी देर से शामिल किया गया था शून्य को. सातवीं सदी में भारतीय गणितज्ञों द्वारा प्रचलन में लाए जाने तक शून्य को अंक तक का दर्जा नहीं दिया गया था. (भारत को 1 से 9 तक के अंकों के संकेतों का भी जनक माना जाता है जिनके ज़रिए तमाम संख्याएँ बनती हैं. इस व्यवस्था को अरबी-हिंदू अंक प्रणाली कहा जाता है.) शून्य को यूरोप लाया इतालवी गणितज्ञ फ़िबोनाचि ने 12वीं सदी में. शुरू में शून्य को इटली में संदेह के साथ देखा गया और 1299 में फ़्लोरेंस की सरकार ने इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था.

जहाँ तक भारत की बात है तो संस्कृत के प्राचीन शास्त्रों से पता चलता है कि शुरू से ही भारत में गणना और बड़ी संख्याओं के प्रति रुझान रहा है. ललितविस्तार नामक ग्रंथ के एक आख्यान में बताया गया है कि कैसे एक बार गौतम बुद्ध को 1 से लेकर 421 शून्य वाली संख्या तक को गिनाने के लिए कहा गया था.

10 (दस)-

गणना के लिए 10 अंकों वाले आधार के उपयोग के पीछे बुनियादी कारण है हमारे हाथों में 10 अंगुलियों का होना. लेकिन इसके बाद भी सभी सभ्यताओं को 10 के आधार पर गणना करना रास नहीं आया. प्राचीन बेबिलोनिया में 60 के आधार पर गणना का चलन था. उसकी छाप आज तक नहीं मिटी है. जैसे- 60 सेकेंड, 60 मिनट, वृत के 360 डिग्री आदि.

1,000,000 (एक मिलियन/दस लाख)-

इस संख्या तक आकर साफ़ पता चल जाता है कि अरबी-हिंदू अंक प्रणाली कितनी ज़्यादा व्यवस्थित और प्रभावशाली है. प्राचीन रोमन गणितज्ञ बड़ी होती जाती संख्याओं को अलग-अलग अक्षरों से दर्शाते थे- 100 के लिए C, 500 के लिए D, 1000 के लिए M आदि. (एक मिलियन सेकेंड बराबर क़रीब साढ़े ग्यारह दिन!)

1,000,000,000 (एक बिलियन/एक अरब)-

ब्रिटेन में पहले इस संख्या को 1000 मिलियन कहा जाता था, जबकि एक अरब एक-मिलियन-मिलियन (1 के आगे 12 शून्य) को कहा जाता था. लेकिन अमरीकी अंक प्रणाली से समानता के दबाव के चलते 1974 में सरकार ने फ़ैसला किया कि आगे से सरकारी आंकड़ों में 1 के आगे 9 शून्य लगाने से बने अंक को ही बिलियन कहा जाएगा.

बिलियन में 9 या 12 शून्यों के भ्रम के पीछे फ़्रांस का हाथ माना जाता है. सन 1480 में फ़्रांस ने बिलियन के लिए 1 के आगे 12 शून्यों की व्यवस्था की, जिसे बाद में ब्रिटेन ने भी अपना लिया. लेकिन 17वीं सदी में आकर फ़्रांस ने बिलियन से 3 शून्य हटा दिए यानि मात्र 9 शून्य ही रखे, जिसे अमरीका ने अपनाया. लेकिन 1948 में फ़्रांस ने फिर से अपनी पुरानी व्यवस्था को अपना लिया. (गणना के इस अलग-अलग तरीके को 'लाँग स्केल- शॉर्ट स्केल' के विवाद के रूप में जाना जाता है.)

1,000,000,000,000 (एक ट्रिलियन/दस खरब)-

बिलियन के भ्रम के बाद ट्रिलियन का भ्रम तो बनना ही था.(दरअसल मिलियन से आगे हर बड़ी संख्या को लेकर एकाधिक नामावली प्रचलन में हैं.) लेकिन बुरा मानें या भला, गिनती का अमरीकी तरीका स्टैंडर्ड बनता जा रहा है और अमरीका में 1000 बिलियन से एक ट्रिलियन बनता है. यानि भारतीय अंक प्रणाली में 10 खरब.(एक ट्रिलियन सेकेंड का मतलब हुआ 31,709 साल.)

1,000,000,000,000,000 (एक क़्वाड्रिलियन/एक पद्म)-

गणितज्ञ इस संख्या को 10 पर पॉवर 15 के रूप में जानते हैं. दस के पॉवर के रूप में आई संख्या एक के बाद आने वाले शून्य को दर्शाती है. जैसे- 10 पर पॉवर 2 का मतलब हुआ 1 के आगे दो शून्य, यानि 100.

अमरीका और ब्रिटेन में जिसे क़्वाड्रिलियन कहा जाता है उसे यूरोप बिलिआर्ड के नाम से भी जानता है. वित्तीय संसार की बात करें तो डेरिवेटिव नाम इन्स्ट्रुमेंट की कुल मात्रा आधा क़्वाड्रिलियन डॉलर बताई जाती है ,यानि पूरे विश्व के वार्षिक उत्पाद के दस गुना के बराबर. शायद इसीलिए कुछ विश्लेषक डेरिवेटिव बाज़ार को कभी भी फट सकने वाला टाईम बम बताते हैं.

10 पर पॉवर 100 (एक गूगोल)-

इस नंबर का नामकरण 1938 में एक नौ वर्षीय बच्चे मिल्टन सिरोटा ने किया. उसके चाचा ने उसे 1 के आगे 100 शून्य लगाने के बाद बनी संख्या का नाम रखने को कहा था. इंटरनेट सर्च इंजन गूगल का नाम भी इसी संख्या से लिया गया है.

316470269330...66697152511-

ये अब तक ज्ञात सबसे बड़ी अभाज्य संख्या है. एक महाकंप्यूटर की सहायता से ढूंढी गई इस संख्या में 1 करोड़ 30 लाख अंक हैं. पिछले साल अगस्त में मिली इस संख्या को लिखने के लिए 30 मील लंबा पेज चाहिए. अगर कोई इसके हर अंक को बोल कर पढ़ना चाहे तो उसे दो महीने लगेंगे. एक करोड़ से ज़्यादा अंकों वाली अभाज्य संख्या की खोज पर एक लाख डॉलर का इनाम घोषित था. इसी कड़ी में अगला इनाम है डेढ़ करोड़ डॉलर का 10 करोड़ से ज़्यादा अंकों वाली अभाज्य संख्या की खोज पर.

यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड सदियों पहले बता गए हैं कि चाहे जितने अंकों तक की कल्पना करो, उतने अंकों की अभाज्य संख्या का अस्तित्व है.

एक ज़िलियन-

अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़े किसी बच्चे से वृहतम संख्या की बात करें तो शायद वो एक ज़िलियन की बात करे. लेकिन ज़िलियन दरअसल कोई संख्या विशेष नहीं है. शब्दकोशों में आ चुके इस शब्द का मतलब है अनंत अंकों वाली कोई महासंख्या. ये शब्द अमरीकी लेखक डैमन रुनयन की कल्पना की उपज है.

इनफ़िनिटी या अनंत-

किसी बहुत ही होशियार बच्चे से वृहतम संभव संख्या के बारे में सवाल करें तो शायद उसका जवाब हो- इनफ़िनिटी. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक इनफ़िनिटी को अगम या अबूझ के तौर पर देखा जाता था, लेकिन 1874 में Georg Cantor नामक गणितज्ञ ने साबित किया कि इनफ़िनिटी कई प्रकार के हो सकते हैं- कुछ छोटे, कुछ बड़े. यहाँ तक कि उसने इनफ़िनिटी-इनिफ़िनिटी के बीच जोड़-घटाव और गुना-भाग को भी संभव बताया. इस खोजबीन की क़ीमत भी उसे ही चुकानी पड़ी. उसने ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा जर्मनी की एक मानसिक आरोग्यशाला में बिताया.

शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009

वैलेंटाइन्स डे का बढ़ता विरोध

मैं न तो दिलजला हूँ, और न ही बजरंग दल या तालेबान जैसे गुटों से मुझे कोई सहानुभूति है. हाँ, 14 फ़रवरी को जिस तरह बाज़ारवाद नंगा होकर नाचता है, उसे देख कर थोड़ी चिढ़ ज़रूर होती है. ऐसे में बाज़ारवाद का मंगलगान करने में सबसे आगे रहने वाले अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल में वैलेंटाइन्स डे के विरोध पर एक लेख पा कर हार्दिक प्रसन्नता हुई. इसमें बताया गया है कि अमरीका में क्रिसमस के बाज़ारीकरण से चिढ़ने वालों की भी बड़ी संख्या है, लेकिन बाज़ारवाद के जिस उत्सव के ख़िलाफ व्यवस्थित तरीक़े से एक आंदोलन खड़ा होता दिखता है, वो है- वैलेंटाइन्स डे.

अमरीकी लेखिका जेनिफ़र ग्राहम के इस लेख के ज़रिए ही जब ई-कार्ड के थोक भंडार अमेरिकन ग्रीटिंग्स की वेबसाइट पर गया तो वहाँ एन्टी-वैलेंटाइन्स-डे या एन्टी-वैल कार्ड की भारी मौजूदगी को देख कर सुखद आश्चर्य हुआ.(वैसे, ये भी बाज़ारवाद का ही कमाल है!)

वॉल स्ट्रीट जर्नल के लेख में दिए गए आँकड़ों की बात करें तो भारी आर्थिक मंदी में जकड़े होने के बाद भी अमरीकी इस वैलेंटाइन्स डे के मौक़े पर 14 अरब डॉलर ख़र्च कर रहे हैं. ये कोई आम अटकलबाज़ी नहीं है, बल्कि नेशनल रिटेल फ़ेडरेशन का अनुमान है. यह राशि मुख्यत: कार्डों, फूलों और उपहारों पर और रेस्तराँ में ख़र्च की जा रही है. क्रिसमस के बाद साल में सबसे ज़्यादा कार्ड वैलेंटाइन्स डे(बहुतों के लिए एन्टी-वैल डे) पर ही बिकते हैं. जबकि फूलों की बिक्री के हिसाब से तो पहले नंबर पर वैलेंटाइन्स डे ही है.

लेखिका जेनिफ़र के शब्दों में ही कहें तो वैलेंटाइन्स डे अस्पष्टता से परिभाषित एक ऐसा दिन है जब (क्यूपिड के)तीर की नोक पर लोग अपने अंतर्मन में बसी भावनओं को व्यक्त करने के लिए बाध्य किए जाते हैं. बहुतों को तो असल के अभाव में बनावटी भावनाओं का प्रदर्शन करना पड़ता है. इसीलिए आश्चर्य नहीं कि बहुत से लोग इस दिन को FAD या Forced Affection Day कहते हैं.

वैलेंटाइन्स डे का विरोध करने वालों में कई वर्ग के लोग शामिल हैं, जिनमें प्रमुख हैं- अविवाहित लोग जिन्हें रोमाँस पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिया जाना पसंद नहीं, अभिभावकों का वर्ग जो कि वैलेंटाइन्स डे पर बच्चों द्वारा किए जाने वाले ख़र्च से परेशान रहते हैं और आनंदपूर्वक समय बिता रहे वैसे विवाहित/अविवाहित युगल जिन्हें प्रेम का प्रदर्शन करने की बाध्यता बिल्कुल रास नहीं आती.

इस वैलेंटाइन्स डे विरोधी गुट का लाभ उठाने के लिए भी करोड़ों डॉलर का बाज़ार तैयार हो चुका है. एन्टी-वैल कार्डों की चर्चा पहले ही हो चुकी है. हर अमरीकी शहर में कम-से-कम ऐसा एक रेस्तराँ या बार ज़रूर है जहाँ 14 फ़रवरी को 'क्यूपिड-इज़-स्टूपिड' टाइप थीम पार्टी रखी जाती हैं.

कई जगह मौक़े का फ़ायदा उठाने में आगे रहने वाले फ़िटनेस सेंटर या व्यायामशालाओं में एन्टी-वैल मुक्केबाज़ी सेशन रखा जाता है. इस दौरान वहाँ संबंध-विच्छेद के तनाव से पार पाने के गुर सिखाए जाते हैं. एक तरीका है अपने छूट चुके प्रेमी/प्रेमिका की तस्वीर पर घूंसे बरसाना. इसी तरह ऊन बनाने वाली एक कंपनी जिमी बीन्स वूल ने तो फ़रवरी का महीना एन्टी-वैल युवतियों को समर्पित करते हुए लाल या गुलाबी रंग की जगह पूरे महीने सिर्फ़ नीले रंग के ऊन को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है.

इतना ही नहीं पेटीशन्सऑनलाइन नामक वेबसाइट पर किसी ने वैलेंटाइन्स डे का आयोजन बंद कराने के लिए एक याचिका भी डाल दी है, जिसका शीर्षक है- End Valentine's Day. हालाँकि इस लेख को लिखे जाने तक 68 लोगों ने ही याचिका पर हस्ताक्षर किए थे.

शनिवार, जनवरी 31, 2009

उपग्रहीय चित्रों का बेवज़ह डर

पिछले दिनों अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के शपथ-ग्रहण समारोह के समय की उपग्रहीय तस्वीर सार्वजनिक की गई. इसमें जहाँ वाशिंग्टन डीसी के राजपथ पर उमड़े जनसैलाब का विहंगम दृश्य चकित करने वाला लगता है. वहीं यदि कोई चाहे तो चित्र से उसे सुरक्षा व्यवस्था का भी अंदाज़ा लग सकता है. मसलन छोटे आकार में यहाँ प्रस्तुत उस तस्वीर में देखा जा सकता है कि कैपिटल बिल्डिंग के ठीक पीछे किस पोज़ीशन में एक हेलीकॉप्टर तैयार खड़ा है.

चित्र साभार जिओआईयह विहंगम दृश्य जिस बड़ी तस्वीर का हिस्सा है उसे जिओआई नामक कंपनी ने ओबामा के शपथ ग्रहण करने के कुछ घंटों बाद जारी किया था. कंपनी अपने ग्राहकों को 50 सेंटीमीटर तक की स्पष्टता वाले उपग्रहीय चित्र उपलब्ध कराती है.

जिओआई की वेबसाइट पर वाशिंग्टन डीसी की ही नहीं, बल्कि अमरीका के अधिकतर बड़े स्टेडियमों, विश्वविद्यालयों, बाँधों के साथ-साथ सैनिक-असैनिक हवाईअड्डों की भी तस्वीरें मिल जाती हैं. अमरीका के अलावा दुनिया के अन्य हिस्सों की रोचक तस्वीरें भी उपलब्ध हैं. कुछ साल-दो साल पुरानी तस्वीरें, तो कुछ बस हफ़्ते-महीने भर पुरानी. जिओआई ने पिछले साल नवंबर में सोमालिया के तट पर बंधकों के क़ब्ज़े में खड़े सुपर टैंकर सीरियस स्टार का काफ़ी स्पष्ट चित्र जारी किया था.

जिओआई की तरह की ही एक और कंपनी है- डिजिटल ग्लोब. दोनों कंपनियाँ 'गूगल अर्थ' जैसे वेबटूल के साथ-साथ तमाम तरह के उपयोगों के लिए उपग्रहीय चित्र उपलब्ध कराती हैं. इनमें से हर एक की मौजूदा क्षमता प्रतिदिन औसत 10 लाख वर्गकिलोमीटर ज़मीन को स्कैन करने की है.

गूगल अर्थ को लेकर रह-रह कर विवाद उठता रहता है. भारत में ये विवाद कुछ ज़्यादा ही होता है. कुछ साल पहले राष्ट्रपति भवन की तस्वीर गूगल अर्थ पर पहली बार देखे जाने के बाद भारत में बहस छिड़ गई थी कि आतंकवादी उस चित्र विशेष का इस्तेमाल हमले की योजना बनाने के लिए कर सकते हैं. मुंबई पर हुए हमले में शामिल चरमपंथियों के गूगल अर्थ की सहायता लेने की बात सामने आने के बाद तो इस वेबटूल को लेकर डर का माहौल बनाने की ज़ोरदार कोशिशें की गईं. जबकि आतंकवादियों ने इस वेबटूल के अलावा जीपीएस और ब्लैकबेरी जैसे कई हाईटेक उपकरणों का भी इस्तेमाल किया था. तो क्या इन उपकरणों पर भी रोक न लगा दी जाए! गूगल अर्थ पर निशाना साधने वालों ने ये सोचने की ज़रूरत नहीं समझी कि यदि कुछ साल पुरानी तस्वीरें दिखाने वाले गूगल अर्थ पर रोक लगा दी भी जाए, तो जिओआई और डिजिटल ग्लोब जैसी कंपनियों का क्या करेंगे जिनका मुख्य धंधा है- ताज़ा उपग्रहीय तस्वीरें बेचना?

आतंकवादियों और अपराधियों के डर से विज्ञान प्रदत्त सुविधाओं पर रोक लगाना समस्या का स्थायी समाधान हो ही नहीं सकता है. याद कीजिए उस समय को जब 'फ़ोटो खींचना मना है' वाले निषेधात्मक बोर्ड का कोई मतलब होता था. पहले कॉम्पैक्ट कैमरे ने उक्त बोर्ड पर लिखी चेतावनी की गंभीरता को कम किया, फिर डिजिटल कैमरे ने उसे और हल्का बनाया, अंतत: मोबाइल फ़ोनों में लगे कैमरे ने उसे बिल्कुल ही अप्रासंगिक बना दिया.

उपग्रहीय चित्रों पर प्रतिबंध की कोशिशें तो अभी ही लगभग बेअसर है, इसलिए आने वाले दिनों में ऐसी कोशिशों का बिल्कुल अप्रासंगिक होना तय है. आँकड़े भी यही कहते हैं- पिछले दशक में दुनिया की तस्वीरें खींचने के लिए सात निजी उपग्रह छोड़े गए, अगले 10 वर्षों में ऐसे 30 उपग्रह छोड़े जाने हैं. इसके अलावा विभिन्न देशों के जासूसी उपग्रहों की संख्या भी तो लगातार बढ़ती जा रही है.

ये सच है कि हर सार्वजनिक सुविधा या औजार में सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों तरह की संभावनाएँ होती हैं. अधिकतर मामलों में सदुपयोग की संभावनाएँ, दुरुपयोग की संभावनाओं से कई-कई गुना ज़्यादा होती हैं. इसलिए उन पर रोक नहीं लगाई जा सकती है.

टेलीफ़ोन के आविष्कार के समय से ही अपराधी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं- योजनाएँ बनाने में भी, और लोगों को धमकाने या फ़िरौती माँगने में भी. इंटरनेट की सहायता से धोखाधड़ी और जालसाज़ी विश्वव्यापी स्तर पर की जा रही है- नाइजीरिया में बैठा जालसाज़ लॉटरी का सब्ज़बाग दिखा कर भारत के लोगों को ठग रहा है! लेकिन अपराध में इस्तेमाल के आधार पर फ़ोन या इंटरनेट पर रोक की कल्पना भी की जा सकती है?

इंटरनेट पहले-पहल जब विश्वविद्यालयों और विज्ञान संस्थानों से निकल कर आमलोगों के घरों में आया, तो तमाम तरह की आशंकाओं में एक ये भी शामिल थी कि बम और अन्य विस्फोटक अत्यंत सुलभ हो जाएँगे क्योंकि इंटरनेट पर उन्हें बनाने के तरीके आसानी से उपलब्ध हैं. आगे चल कर ये आशंका निराधार निकली. हमेशा से ही आबादी का अत्यंत छोटा अंश अपराधी प्रवृति का रहा है, विस्फोटक बनाने की जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध होने के बाद भी वही स्थिति है.

अपराधियों ने हर काल में नवीनतम जानकारियों का इस्तेमाल किया है, इसलिए ज़ाहिर है आगे भी करते रहेंगे. अच्छी बात ये है कि अपराधियों के हाथों इस्तेमाल की आशंका में विज्ञान ने पहले कभी रास्ता नहीं बदला है. इसलिए आगे भी विज्ञान अपनी राह बढ़ता ही रहेगा, चाहे कितना भी डर फैलाया जाये.

मंगलवार, दिसंबर 30, 2008

आया नैनोफ़ोबिया का दौर

शुक्राणु को अंडाणु की ओर ले जाते चिकित्सकीय नैनोरोबो का एक कल्पनाचित्रविज्ञान में आस्था रखने वालों की यदि दुनिया में कमी नहीं है, तो विज्ञान के अनपेक्षित प्रभावों को लेकर डरने वालों की भी बहुत बड़ी संख्या है. ब्रह्मांड की आरंभिक अवस्था जैसी स्थिति पैदा करने वाली महामशीन Large Hadron Collider में कुछ ख़राबी आने के कारण जहाँ उसके कथित प्रलयंकारी प्रभावों को लेकर चिंताओं का दौर थमा हुआ है, वहीं नैनो तकनीक के कथित गंभीर दुष्प्रभावों को लेकर जैसे चेतावनियों की बाढ़ आ गई है.

नैनो तकनीक क्या है?

नैनो शब्द का इसके मूल ग्रीक भाषा में मतलब होता है- वामन या छोटे आकार का. नैनो तकनीक का क्षेत्र विज्ञान या इंजीनियरिंग का वो अंग है जिसमें परमाणु और अणु के पैमाने पर काम होता है. इसके तहत जिस आकार की चीज़ों या पदार्थों का निर्माण होता है, उनसे छोटे आकार में निर्माण संभव नहीं है. नैनो तकनीक के तहत बने उत्पाद मूलत: 0.1 से लेकर 100 नैनोमीटर आकार के होते हैं. यहाँ ये उल्लेखनीय है कि एक नैनोमीटर एक मीटर के अरबवें हिस्से के बराबर होता है.

इस आकार को समझने के लिए इस बात पर ग़ौर करना होगा कि अधिकांश परमाणु 0.1 से 0.2 नैनोमीटर आकार के होते हैं. डीएनए की लड़ी 2 नैनोमीटर चौड़ी होती है. एक लाल रक्त कोशिका का व्यास 7000 नैनोमीटर का होता है, जबकि हमारे सिर के बाल की औसत मोटाई 80,000 नैनोमीटर होती है.

नैनोमीटर और सेंटीमीटर के बीच के अंतर को हमारे पदचिन्ह और अटलांटिक महासागर के आकारों में अंतर से की जा सकती है.

सूक्ष्म आकार की चीज़ों की प्रकृति अलग क्यों होती है?

जैविक जगत की मूल क्रियाएँ नैनोमीटर के स्तर पर ही होती हैं. यदि आप एक मीटर के अरबवें भाग के पैमाने पर देखें तो सामान्य लगने वाले पदार्थ भी आश्चर्यजनक नए प्रभाव दिखाने लगते हैं. किसी पदार्थ से बनी किसी सूक्ष्म वस्तु की भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ, उसी पदार्थ से बनी किसी बड़ी चीज़ के मुक़ाबले बिल्कुल अलग हो सकती है. नैनो पैमाने पर सूक्ष्माकार दिया जाए तो किसी पदार्थ की मज़बूती, चिपकने और सोखने जैसी क्षमताएँ कई गुणा बढ़ सकती है. इसलिए वैज्ञानिक नैनो तकनीक का इस्तेमाल कर नई-नई चीज़ें बनाने में जुट गए हैं.

उदाहरण के लिए सोने-चाँदी के जेवरात इसलिए बनाए जाते हैं कि दोनों तत्व अपेक्षाकृत अक्रियक होते हैं यानि उनकी चमक और प्रकृति लंबे समय तक जस की तस बनी रहती है. वहीं नैनो पैमाने पर सोने और चाँदी के कण-समूह विशेष गुण प्रदर्शित करते हैं. नैनो स्तर पर सोने के 8 या 22 परमाणुओं का समूह जहाँ किसी उत्प्रेरक के समान सक्रिय रहता है, वहीं 7 या 20 परमाणुओं का समूह अक्रिय पदार्थ की तरह व्यवहार करता है. इसी तरह चाँदी के नैनो-कण बैक्टेरियारोधी गुण प्रदर्शित करते हैं, इसलिए घाव भरने की आधुनिक दवाओं में उनका खुल कर उपयोग किया जाने लगा है. नैनो स्तर पर रवाकृत किए गए धातुओं की बात करें तो उनमें सामान्य प्रकार की तुलना में कहीं ज़्यादा मज़बूती और लचीलापन होता है.

क्या कारण है नैनो पदार्थों के इस क़दर अलग व्यवहार का?

इसके पीछे मुख्य रूप से दो कारण माने जाते हैं. पहली बात ये कि नैनो-कणों में घनत्व के अनुपात में सतह का आकार अपेक्षाकृत बड़ा होता है जो इन्हें ज़्यादा सक्रिय बनाता है. दूसरी बात ये कि अमूमन 100 नैनोमीटर से छोटे आकार के पदार्थों पर क़्वांटम प्रभाव बढ़ जाता है जो इनके प्रकाशीय, इलेक्ट्रॉनिक और चुंबकीय प्रभावों में व्यापक रद्दोबदल कर डालता है.

हालाँकि इसका मतलब ये नहीं है कि सूक्ष्म जगत में प्रकृति के अलग नियम चलते हैं. इससे मात्र ये साबित होता है कि छोटों की दुनिया में प्रकृति के नियम अलग तरह से लागू होते हैं. उदाहरण के लिए यदि एक इलेक्ट्रॉन को एक नैनोमीटर व्यास के तार से गुजारा जाए तो इलेक्ट्रॉन की गतिविधियाँ बुरी तरह नियंत्रित हो जाएँगी जिसके चलते वहाँ वोल्टेज और सुचालकता के संबंध नए तरह से परिभाषित होने लगेंगे.

आम उपयोग की किन चीज़ों या उपकरणों में इस समय नैनो तकनीक का उपयोग किया जा रहा है?

वर्ष 2006 तक दुनिया भर में 1600 नैनो पदार्थों का पेटेन्ट कराया जा चुका था और अमरीका के Project on Emerging Nanotechnologies के अनुमानों के अनुसार इस समय दुनिया भर में कम से कम 600 उत्पाद ऐसे हैं जिनमें नैनो पदार्थों का उपयोग किया जाता है. इसी साल वैज्ञानिकों ने मैग्नीज़ ऑक्साइड के नैनो तार की सहायता से एक ऐसा कागज़ तैयार किया है जो पानी पर फैले तेल को पूरा का पूरा सोख लेता है, वो भी एक बूँद पानी सोखे बिना. इससे मिलते-जुलते तरीक़े से किसी भी कपड़े को शत-प्रतिशत वॉटरप्रूफ़ बनाया जा सकता है.

नैनो कार्बनअमरीकी सरकार के National Nanotechnology Initiative द्वारा तैयार सूची के अनुसार आप इन जगहों पर नैनो तकनीक का इस्तेमाल पा सकते हैं- कंप्यूटर हार्ड ड्राइव, कार के पुर्ज़े और कैटलिक्टिक कन्वर्टर, खरोंचमुक्त पेंट और कोटिंग, सूरज के हानिकारक किरणों से बचाने वाले लोशन और लिपस्टिक, टिकाऊ टेनिस बॉल और हल्के लेकिन मज़बूत टेनिस रैक़ेट, धातुओं को काटने वाले औजार, जीवाणुरोधी चिकित्सकीय पट्टी, संवेदनशील उपकरणों की एंटीस्टैटिक पैकेजिंग, अपने काँच की स्वत: सफाई वाली करने वाली खिड़कियाँ, धब्बारोधी कपड़े आदि.

नैनो तकनीक से क्या कुछ संभव हो सकता है?

अनंत संभावनाएँ हैं. वर्ष 1986 में ही के. एरिक ड्रेक्सलर नामक अमरीकी वैज्ञानिक ने अपनी प्रकृति ख़ुद तैयार करने में सक्षम नैनो आकार के रोबोट की परिकल्पना की थी जो कि उनके अनुसार समाज के बहुत सारे काम करने में सक्षम होंगे. इतना ही नहीं नैनोरोबोट मनुष्य के शरीर की मरम्मत भीतर से कर उसे दीर्घायु बना सकेंगे. ऐसे रोबोट वायुमंडल से प्रदूषणकारी तत्वों की सफाई उनके उत्सर्जन के तुरंत बाद करने में सक्षम होंगे.

ख़ैर, ये तो हुई बहुत बाद की भविष्यवाणी जिनमें से कुछ आज 20 साल बाद भी कोरी कल्पना मात्र दिख रही हैं. लेकिन ये तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि निकट भविष्य में नैनो तकनीक से कंप्यूटिंग, चिकित्सा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों के अलावा पर्यावरण और सैन्य क्षेत्र में भी काफ़ी कुछ नया देखने को मिलेगा. यदि चिकित्सा क्षेत्र की ही बात करें तो ऐसे छोटे उपचारी स्मार्ट-बम बनाए जा चुके हैं जो कैंसरयुक्त कोशिकाओं तक सीधे दवा पहुँचाएँगे. दरअसल ह्यूस्टन के राइस विश्वविद्यालय में नैनोबुलेट के ज़रिए ऐसी कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने का सफल प्रयोग किया जा चुका है, जिनका कि ऑपरेशन संभव नहीं था. निकट भविष्य में मानव शरीर की धमनियों में गश्त लगाने वाले नैनो उपकरण बनने की भी पूरी संभावना बताई जा रही है जो संक्रमणों का मुक़ाबला करेंगे और रोगों की सूचना जुटाएँगे. पर्यावरणीय वैज्ञानिक भूमिगत जलस्रोतों को ज़हरीले प्रदूषकों से मुक्त करने के अलावा ज़्यादा समर्थ सौर-पैनल बनाने में नैनो तकनीक का प्रयोग पहले से ही कर रहे हैं.

नैनो तकनीक को लेकर इतना डर क्यों?

ये बिल्कुल स्पष्ट है कि सूक्ष्म आकार के किसी पदार्थ का व्यवहार समान स्रोत वाले किसी बड़े आकार के पदार्थ से बिल्कुल ही अलग होता है. लेकिन नैनो पदार्थों के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभावों के बारे में विस्तृत अध्ययन अभी नहीं हुआ है. हालाँकि पिछले दिनों छिटपुट अध्ययन ज़रूर हुए हैं. उदाहरण के लिए हाल ही में हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि वाहनों के धुएँ के साथ निकलने वाले अतिसूक्ष्म आकार के रासायनिक कण हृदय रोगों के कारकों में शामिल हैं.

इस बात के कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं कि धूप से त्वचा की सुरक्षा करने वाले क्रीम में जिन नैनो-कणों का उपयोग किया जाता है वे नुक़सानदेह हैं, लेकिन उनसे स्वास्थ्य को कोई नुक़सान नहीं होगा इस बारे में भी निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है.

कई संस्थाओं ने कृत्रिम नैनोकण युक्त पदार्थों के बहिष्कार का आहवान किया है, मानो प्राकृतिक रूप से निर्मित नैनो-कणों के ग़ैरनुक़सानदेह होने की गारंटी हो, जबकि ऐसी कोई बात नहीं है. उदाहरण के लिए कोयला, लकड़ी आदि को जलाते समय धुएँ के साथ जो कालिख या राख उड़ती है वो भी वास्तव में कार्बन से बने नैनो कण ही हैं, जो कि स्वास्थ्य के लिए बहुत ही नुक़सानदेह हैं और जिनसे हर कोई बचना चाहता है.

ब्रिटेन के Royal Commission on Environmental Pollution की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि नैनो तकनीक से बने उत्पाद स्वास्थ्य संबंधी ख़तरों की पड़ताल किए बिना बाजार में ठेले जा रहे हैं. ब्रिटेन में ही उपभोक्ता अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था 'व्हिच?' ने पिछले महीने जब सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली 67 कंपनियों से पूछा कि क्या वे अपने उत्पादों में नैनो पदार्थों का इस्तेमाल करती हैं, तो मात्र 17 कंपनियों ने जवाब दिया जिनमें से 8 ने हामी भरी.

दरअसल इन उत्पादों के निर्माताओं का बहाना ये है कि इनके द्वारा प्रयुक्त नैनो पदार्थों में से अधिकतर सिल्वर और कार्बन जैसे रासायनिक पदार्थों के ज़रिए बनते हैं, और आमतौर पर सुरक्षित स्रोत माने जाते हैं. लेकिन नैनोमीटर जितने सूक्ष्म पैमाने पर इन उत्पादों का मनुष्यों, पशुओं और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसकी क़ायदे से पड़ताल किसी ने नहीं कराई है.

किस तरह के नैनो उत्पादों को लेकर विशेष चिंताएँ हैं?

अभी जिन उत्पादों को लेकर ख़ास चिंताएँ हैं वे हैं- नैनोसिल्वर और कार्बन नैनोट्यूब. नैनोसिल्वर एक जीवाणुरोधी पदार्थ है जो मोजे, जाँघिए और टीशर्ट जैसे कपड़ों में दुर्गंध पैदा करने वाले जीवाणुओं के विकास पर रोक लगाती है. जबकि कार्बन नैनोट्यूब से बने कपड़ों को डाई करने की ज़रूरत नहीं होती है, क्योंकि नैनोफ़ाइबर की मोटाई से उसका रंग निर्धारित किया जाता है जोकि कार्बन रेशों के परावर्तक गुणों से संभव होता है.

नैनोफ़ाइबरआलोचकों का कहना है कि नैनोसिल्वर किसी ब्लीच से भी दुगुने अनुपात में जीवाणुओं को मारता है. ज़ाहिर है इससे उपयोगी जीवाणु भी बड़ी संख्या में मारे जाते होंगे. नैनोसिल्वर वाले कपड़ों की धुलाई के बाद जो पानी नालों के ज़रिए जल स्रोतों में जाता है उसके दुष्प्रभावों का सिर्फ़ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है. जबकि नैनोफ़ाइबर से फेफड़ों के उसी तरह के रोग होने की आशंका जताई जा रही है जैसा कि एस्बेस्टस के रेशों के कारण होते हैं.

नैनो-चिकित्सा की बात करें तो नॉर्थ कैरोलाइना विश्वविद्यालय के एक विशेषज्ञ ने आगाह किया है कि शरीर के भीतर अपना काम करने के बाद नष्ट नहीं होने वाले और भीतर ही बने रहने वाले नैनो पदार्थ अंगों की नाकामी का कारण बन सकते हैं.

कैसे बनते हैं नैनो पदार्थ?

पारंपरिक तरीक़ों से नैनो पदार्थ या औजार तैयार करना आसान नहीं है. इन्हें बनाने के लिए आमतौर पर दो तरीक़े अपनाए जाते हैं. पहला तरीक़ा बॉटम-अप का है यानि सूक्ष्तम इकाई से शुरुआत की जाती है. कई मामलों में एक-एक परमाणु से शुरुआत की जाती है. टाइटेनियम डाइऑक्साइड और आइरन ऑक्साइड जैसे कम जटिल नैनो पदार्थ रासायनिक प्रक्रिया के ज़रिए बनाए जाते हैं. जबकि कार्बन नैनोट्यूब या 60 परमाणुओं वाले गेंद जैसे यौगिकों को स्वत: आकार ग्रहण के लिए बाह्य दशाएँ मुहैया कराई जाती हैं.

दूसरे टॉप-डाउन तरीक़े में किसी पदार्थ के एक बड़े टुकड़े शुरुआत की जाती है उन्हें काटते-छीलते हुए सूक्ष्म आकार दिया जाता है. सिलिकॉन चिप्स और सर्किट बोर्ड आदि बनाने में यह प्रक्रिया अपनाई जाती है. ये भी कोई आसान प्रक्रिया नहीं मानी जाती है.

रविवार, नवंबर 23, 2008

अत्यंत जटिल है जलदस्यु समस्या

ग्राफ़िक्स सौजन्य सीबीएसजलदस्यु समस्या सोमालिया के पास ही क्यों?
इसके दो प्रमुख कारण हैं- पहला सोमालिया में किसी प्रभावी सरकार का नहीं होना, और दूसरा सोमालिया से लगे समुद्र से होकर होने वाला विशद समुद्री व्यापार.

पहले कारण की बात करें तो पिछले दो दशकों से सोमालिया में सरकार नाम की कोई चीज़ नहीं है. सोमालिया के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग गुटों या गिरोहों के प्रभाव में हैं. अभी सोमालिया की जिस अंतरिम सरकार या Transitional Federal Government (TFG) को संयुक्तराष्ट्र संघ की मान्यता मिली हुई है, वो सच कहें तो राजधानी मोगादिशू पर भी पूरा नियंत्रण करने में नाकाम रही है. TFG को अमरीका की शह पर पड़ोसी देश इथियोपिया की सैनिक मदद मिली हुई है, लेकिन उसके बाद भी वह Union of Islamic Courts का सामना करने में सक्षम नहीं है. चरमपंथियों, मुल्लों और कुछ बड़े व्यवसायिओं के गुट Islamic Courts ने देश के बड़े भाग पर नियंत्रण कर रखा है. इससे अलग हुए एक अतिचरमपंथी धड़े अल-शबाब का भी देश के कुछ हिस्सों पर प्रभावी नियंत्रण है. लेकिन सोमालिया के कई बड़े हिस्से ऐसे हैं जो कि इन तीनों गुटों के नियंत्रण से भी बाहर हैं. इन हिस्सों में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला क़ानून चलता है जो कि करोड़ों डॉलर की नकदी और भारी-भरकरम असलहों से लैस समुद्री लुटेरों के लिए आदर्श स्थिति बनाता है.

बात करें दूसरे कारण की तो अराजक स्थिति वाले सोमालिया से लगते अदन की खाड़ी से होकर दुनिया का 8 प्रतिशत व्यापार होता है. सिर्फ़ तेल की बात करें तो दुनिया के तेल व्यापार का आठवाँ हिस्सा अदन की खाड़ी से होकर गुजरता है. इस आँकड़े में पूर्वी अफ़्रीकी तट से होकर गुजरने वाले मालवाहकों और तेल टैंकरों को भी शामिल कर लें, तो सोमाली समुद्री लुटेरों के पास लूटमार और अगवा करने के असीमित अवसर हैं.

इसके अलावा एक तीसरा महत्वपूर्ण कारण भी है- गृहयुद्ध में फंसे सोमालिया में न तो हथियारों की कमी है, और न ही जान हथेली लेकर चलने वाले लड़ाकों की. पारंपरिक रूप से समुद्र में मछली मार कर आजीविका चलाने वाले सोमाली कबीलों में बड़ी संख्या में ऐसे युवक भी हैं जो कि विकसित देशों के मछुआरों के अपने परंपरागत इलाक़े में नियमित अतिक्रमण के कारण बेरोज़गार हो गए हैं. स्थानीय समुद्र के बारे में पीढ़ियों से संग्रहित पारंपरिक जानकारियों और ख़ुद के अनुभव के कारण ऐसे युवक लुटेरों के किसी गिरोह के लिए ज्ञानेन्द्रियों का काम करते हैं.

लुटेरे बड़े-बड़े पोतों पर आसानी से क़ब्ज़ा कैसे कर लेते हैं?
दरअसल बड़े असैनिक पोतों पर क़ब्ज़ा करना बड़ा ही आसान होता है. उदाहरण के लिए सोमाली जलदस्युओं ने जिस सबसे बड़े पोत पर क़ब्ज़ा किया है वो सउदी अरब का सुपर-टैंकर सीरियस स्टार है. ऐसे सुपर-टैंकर VLCC या Very Large Crude Carriers की श्रेणी में आते हैं. आकार की बात करें तो ये एक विमानवाही पोत से तीन गुना बड़े आकार के होते हैं. लेकिन जब किसी VLCC पर पर्याप्त मात्रा में तेल लदा हो तो उसका डेक पानी से मात्र साढ़े तीन से चार मीटर ऊपर होता है. तेल से लदा एक सुपर-टैंकर बमुश्किल 15 से 20 नॉट प्रति घंटे की रफ़्तार से चलता है, लेकिन लुटेरों की स्पीडबोट इससे कहीं तेज़ी से चलती हैं. ऐसे में 10-20 हथियारबंद लुटेरे बिना किसी समस्या के महापोत के डेक पर पहुँच कर 20-25 की संख्या में मौजूद निहत्थे जहाज़कर्मियों को अपने क़ब्ज़े में लेकर जहाज़ को अगवा कर लेते हैं.

लुटेरों के काम करने के तरीक़े के बारे में कुछ बताएँ?
अभी तक आमतौर पर यही माना जाता है कि लुटेरे किसी ख़ास जहाज़ को निशाना बनाने के बजाय जो हाथ लग गया उसी को अगवा कर लेने की नीति पर चलते हैं. लेकिन अब विशेषज्ञों का मानना है कि सोमाली गिरोहों ने दुबई और जिबूति जैसे मुख्य बंदरगाहों पर अपने जासूस लगा रखे हैं जो उन्हें मालदार लक्ष्यों के बारे में सारी ज़रूरी जानकारी(क्या लदा है, कितने लोग हैं, क्या टाइमिंग है...आदि) अग्रिम मुहैय्या करा देते हैं. इसके अलावा किसी जहाज़ की राह पर इंटरनेट के ज़रिए नज़र रखना या जहाज़ विशेष की स्थिति की जानकारी ट्रांसमीट करने वाले AIS (automatic identification system)के संदेश को पकड़ना भी बिल्कुल आसान हो गया है.

सोमाली समुद्री लुटेराएक बार अपना टार्गेट तय कर लेने के बाद लुटेरे किसी मच्छीमार पोत(आमतौर पर लूटा हुआ पोत) पर मछुआरों की भूमिका में अपने लक्ष्य के आसपास आते हैं. ऐसे मच्छीमार पोत पर वे अपना सारा असलहा और स्पीडबोट भी साथ लेकर चलते हैं. इसके बाद क्लाशनिकोफ़ राइफ़लों और ग्रेनेड लॉन्चरों(RPGs) से लैस लुटेरे अचानक तीन-चार स्पीड बोटों में लद कर लक्षित जहाज़ को चारों तरफ़ से घेर लेते हैं. जिस जहाज़ पर हमला किया गया उस पर लुटेरों को भगाने की कोई व्यवस्था नहीं होती है. ज़्यादा-से-ज़्यादा वे पानी की बौछार के ज़रिए लुटेरों को डेक पर आने से रोकने की नाकाम कोशिश भर ही की जाती है. दो हफ़्ते पहले एक निजी सुरक्षा कंपनी के जवानों ने पानी की बौछार के बजाय Magnetic Audio Devices के ज़रिए असहनीय शोर मचा कर कथित रूप से लुटेरों को भगाने का प्रदर्शन ज़रूर किया है, लेकिन समुद्री सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है ऐसे उपकरण लुटेरों के ख़िलाफ़ गारंटी बिल्कुल नहीं बन सकते हैं.

आँकड़ों की बात करें तो इस साल सोमाली लुटेरों ने कम-से-कम 90 जहाज़ों पर हमले किए हैं. इनमें से 39 जहाज़ों को अगवा किया गया. कुल 500 से ज़्यादा जहाज़कर्मियों को बंधक बनाया गया. फ़िरौती में मोटी रकम लेने के बाद ही जहाजों और उनके कर्मचारियों को छोड़ा गया. कीनिया के विदेश मंत्री ने कहा है कि लुटेरे इस साल 15 करोड़ डॉलर फ़िरौती में वसूल भी चुके हैं. इस समय भी सउदी सुपर-टैंकर समेत 15 जहाज़ और उनके 250 से ज़्यादा कर्मचारी लुटेरों की गिरफ़्त में फंसे हुए हैं. उल्लेखनीय है कि अभी तक एक भी बंधक को नुक़सान नहीं पहुँचाया गया है. हाँ ब्रितानी, फ़्रांसीसी और भारतीय नौसेना की कार्रवाइयों में कुछ लुटेरों के मारे जाने की ख़बरें ज़रूर प्रसारित की गई हैं.

शिपिंग कंपनियाँ अपने जहाज़ों और उस पर मौजूद कर्मचारियों की सुरक्षा की व्यवस्था क्यों नहीं करतीं?
एक तो जहाज़ और उस पर लदे माल का बीमा होने के कारण शिपिंग कंपनियों को सुरक्षा पर ध्यान देने की ज़्यादा ज़रूरत नहीं होती. उन्हें लगता है कभी-कभार एकाध मामले में फ़िरौती देनी पड़ भी गई तो क्या है! दूसरी बात ये कि शिपिंग कंपनियाँ जहाज़ों पर मील-दो मील तक नज़र रखने वाले CCTV कैमरे, हमला होते ही कंपनी मुख्यालय में ख़तरे की घंटी बजा देने वाले उपकरण या ज़्यादा-से-ज़्यादा जहाज़ के पीछे के कुछ किलोमीटर के इलाक़े पर भी नज़र रखने वाले रडार उपकरण लगवा सकते हैं. अव्वल इनसे सचमुच के मच्छीमार पोत और लुटेरों के मदर-शिप में अंतर कर पाना ही हमेशा संभव नहीं होगा, और यदि लुटेरों की गतिविधियाँ पता चल भी गईं तो उन्हें जहाज़ पर क़ब्ज़े करने से रोकना असंभव ही होगा.ग्राफ़िक्स सौजन्य बीबीसी
जहाज़ पर तैनात कर्मचारियों को हथियारबंद करने का पहले तो प्रावधान नहीं है(क्योंकि एक व्यापारिक जहाज़ अलग-अलग देशों की सीमा से होकर गुजरता है) और यदि मान लीजिए चार-पाँच सुरक्षा गार्ड तैनात कर दिए तो भी लुटेरों के मशीनगनों और रॉकेट लॉन्चरों के मुक़ाबले जब तक उन्हें तोप और हेलीकॉप्टर गनशिप जैसे साज़ोसमान नहीं दिए जाते हैं, बेचारे सुरक्षा गार्ड मुफ़्त में मारे जाएँगे!

अंतरराष्ट्रीय समुदाय मिलजुल कर कुछ क्यों नहीं करता, क्योंकि लुटेरों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी तो बाधित कर रखा है?
अंतरराष्ट्रीय समुदाय सचमुच में चिंतित है- ख़ास कर भारत, रूस, ब्रिटेन और अमरीका जैसे देशों की चिंता बहुत ज़्यादा है. या तो बड़ी मात्रा में इनका व्यापार अदन की खाड़ी से होकर चलता है, या इनके नागरिक शिपिंग के क्षेत्र में बड़ी संख्या में नौकरियों में हैं- ख़ास कर जहाज़ों पर. मुश्किल ये है कि आप सोमालिया की समुद्री सीमा में जाकर लुटेरों की मार-कुटाई करना चाहें तो सोमालिया में भले ही दशकों से सरकारविहीन अराजकता हो, अंतरराष्ट्री क़ानून किसी दूसरे देश को उसकी जलसीमा में घुस कर बेरोकटोक कार्रवाई करने की अनुमति नहीं देता. अंतत: 2 जून 2008 को पारित सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 1816 में अपने जहाज़ों या अपने व्यापार के हक़ में देशों को सोमालिया की जलसीमा में जाने की अनुमति ज़रूर दी गई है, लेकिन उसके साथ बहुत सारे किंतु-परंतु लगे हुए हैं. आप ख़ुद देखें प्रस्ताव का एक हिस्सा-
Acting under Chapter VII of the Charter of the United Nations, the Security Council,
7. Decides that for a period of six months from the date of this resolution, States cooperating with the TFG in the fight against piracy and armed robbery at sea off the coast of Somalia, for which advance notification has been provided by the TFG to the Secretary-General, may:
(a)Enter the territorial waters of Somalia for the purpose of repressing acts of piracy and armed robbery at sea, in a manner consistent with such action permitted on the high seas with respect to piracy under relevant international law; and
(b)Use, within the territorial waters of Somalia, in a manner consistent with action permitted on the high seas with respect to piracy under relevant international law, all necessary means to repress acts of piracy and armed robbery;
8. Requests that cooperating states take appropriate steps to ensure that the activities they undertake pursuant to the authorization in paragraph 7 do not have
the practical effect of denying or impairing the right of innocent passage to the ships of any third State;

इस बारे में सुरक्षा परिषद ने 7 अक्तूबर 2008 को एक और प्रस्ताव(संख्या 1836) पारित किया है, जिसमें कहा गया है- The Security Council calls upon States interested in the security of maritime activities to take part actively in the fight against piracy on the high seas off the coast of Somalia, in particular by deploying naval vessels and military aircraft, in accordance with international law, as reflected in the Convention;

लेकिन इन प्रस्तावों के बाद भी इस समस्या से पार पाना मुश्किल ही लगता है. भारत ने भले ही लुटेरों के एक मदरशिप को डुबोने सफलता हासिल की हो, लेकिन सच कहा जाए तो सोमाली लुटेरों से पार पाना अकेले भारतीय नौसेना के बूते की बात नहीं है. ऐसा विश्वास के साथ इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि अमरीका ने पहले अपने हाथ खड़े कर रखे हैं कि अकेले दम पर वह भी इस समस्या से नहीं निपट सकता है.

मौजूदा अंतरराष्ट्रीय क़ानून भारत या अमरीका की नौसेना को किसी तीसरे देश के नागरिकों को छुड़ाने के लिए किसी अन्य देश के जहाज़ पर कार्रवाई करने की अनुमति नहीं है. यहाँ तक कि यदि लुटेरे उन पर सीधे हमला नहीं कर रहे हों तो इन तीसरे पक्ष की सेनाओं को लुटेरों को मार गिराने का भी अधिकार नहीं है. सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 1816 ने भले ही सोमालिया की अंतरिम सरकार की स्वीकृति के साथ शुरुआती छह महीनों के लिए विदेशी नौसेनाओं को सोमाली जलसीमा में जाने की इजाज़त दे दी है, लेकिन सोमालिया के भीतर जाकर ज़मीनी कार्रवाई करने की अनुमति तो फिर भी नहीं दी गई है. ऐसी अनुमति मिले बिना इस समय सक्रिय सोमालिया के क़रीब 1000 समुद्री लुटेरों को पूरी तरह निष्क्रिय करना लगभग असंभव ही होगा.

एक और अनुत्तरित सवाल ये है कि यदि अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई में लुटेरे पकड़े जाते हैं तो उनका क्या किया जाएगा? क्योंकि सोमाली लुटेरों को सोमालिया की नाम भर की सरकार को सौंपा गया तो उन्हें बिना किसी मान्य न्यायिक प्रक्रिया से गुजारे सीधे मार डाले जाने की आशंका रहेगी. पकड़े गए लुटेरों के लिए अंतरराष्ट्रीय युद्धापराध न्यायालय जैसी कोई व्यवस्था भी नहीं है. न ही उनके लिए ग्वान्तानामो जैसी कोई जगह निश्चिंत की गई है. जिस देश की नौसेना सोमाली लुटेरों को समुद्र में पकड़ती है वो अपने देश के न्यायालय में भी नहीं ले जा सकता क्योंकि न तो उस देश का क़ानून इसकी इजाज़त देगा और न ही अंतरराष्ट्रीय संधियों में ऐसी कोई व्यवस्था है.

मलक्का जलडमरुमध्य और पूर्वी एशिया में जलदस्यु समस्या पर क्या क़ाबू नहीं पा लिया गया है?
हाँ, क़ाबू पा लिया गया है ऐसा कहा जा सकता है क्योंकि इस साल उस इलाक़े से इक्का-दुक्का घटनाओं की ही सूचनाएँ आई हैं. वहाँ इंडोनेशिया, सिंगापुर और मलेशिया की सरकारों ने मिलजुल कर(चीन सरकार के आशीर्वाद के साथ, क्योंकि उस मार्ग से होकर उसका खरबों डॉलर का व्यापार होता है) व्यापारिक जहाज़ों को सुरक्षा कवच मुहैय्या कराया. यहाँ जलदस्यु समस्या से प्रभावति मार्ग अपेक्षाकृत बहुत छोटा है. संकरा होने के कारण इस पर निगरानी भी आसान है. इन सबसे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि इस इलाक़े के लुटेरों के पास सोमालिया जैसा अराजक आधार शिविर भी उपलब्ध नहीं है, कि भाग कर वे वहाँ शरण ले लें. साथ ही जिन सरकारों ने इस जलमार्ग की सुरक्षा की ज़िम्मेवारी उठाई है, उनसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अक्षरश: पालन की ज़्यादा अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है.

इसकी तुलना में सोमाली लुटेरों की बात करें तो न सिर्फ़ अदन की खाड़ी, बल्कि हिंद महासागर के एक तिहाई हिस्से में वो जहाज़ों पर हमले कर चुके हैं. सउदी सुपर-टैंकर का उदाहरण ही देखें तो उस पर कीनिया तट से 450 मील दूर जाकर क़ब्ज़ा किया गया. इन लुटेरों से सीधे टकराव की नीति अपनाई गई तो डर ये है कि वे न सिर्फ़ ख़ून-ख़राबे पर उतर सकते हैं बल्कि पर्यावरणीय विभीषिका भी ला सकते हैं. कल्पना कीजिए यदि लाखों बैरल तेल से लदे सुपर-टैंकर में आग लगा दी जाती है, या सारा तेल समुद्र में बहा दिया जाता है!?

लेकिन हाथ-पर-हाथ धरे बैठा भी तो नहीं जा सकता?
इस समस्या का दीर्घावधि का एकमात्र समाधान है सोमालिया में एक मज़बूत सरकार की स्थापना. उदाहरण के लिए दो साल पहले जब वहाँ इस्लामी कोर्ट्स ने शासन पर पकड़ मज़बूत की थी तो जलदस्यु गिरोह बहुत दिनों तक सुसुप्तावस्था में जाने पर मजबूर हो गए थे. मुश्किल ये है कि सोमालिया में एक मज़बूत सरकार स्थापित करने के ईमानदार अंतरराष्ट्रीय प्रयास आज शुरू किए जाएँ, तो सार्थक परिणाम मिलने में पाँच से दस साल तक लग सकते हैं.

तब तक एक अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक गश्ती दस्ता बनाया जा सकता है, जिसकी बात अब खुल कर की भी जाने लगी है. ऐसा होने तक फ़ारस की खाड़ी और हिंद महासागर में सक्रिय नौसेनाओं वाले देश जहाजों को समूह में अदन की खाड़ी से पार कराने की ज़िम्मेवारी बारी-बारी से उठाएँ, जैसा कि पिछले दिनों रूस ने किया है.

इसके अतिरिक्त अदन की खाड़ी के दूसरे किनारे के देश यमन की भी मदद करने की ज़रूरत होगी. अभी जलदस्युओं से खदबदाते अपने 1100 मील लंबे तट पर पेट्रोलिंग के लिए उसके पास मात्र नौ गश्ती जहाज़ हैं.

एक तात्कालिक विकल्प की घोषणा की है सबसे बड़ी शिपिंग कंपनियों में से एक एपी-मोलर-मेर्स्क ने. उसने कहा है कि अदन की खाड़ी में स्थिति सुधरने तक वह अपने बड़े जहाज़ों को अफ़्रीका का चक्कर लगा कर आगे की यात्रा पर भेजेगा. लेकिन यहाँ याद रहे कि अफ़्रीकी महाद्वीप का चक्कर काट कर माल यूरोप या अमरीका पहुँचाने में 10 से 14 दिन की देरी होगी. और हर दिन की यात्रा पर शिपिंग कंपनियों को 30 से 40 हज़ार डॉलर का अतिरिक्त ख़र्चा उठाना पड़ेगा. ज़ाहिर है इस अतिरिक्त परेशानी और ख़र्चे का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर और अंतत: उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा!