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शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009

वैलेंटाइन्स डे का बढ़ता विरोध

मैं न तो दिलजला हूँ, और न ही बजरंग दल या तालेबान जैसे गुटों से मुझे कोई सहानुभूति है. हाँ, 14 फ़रवरी को जिस तरह बाज़ारवाद नंगा होकर नाचता है, उसे देख कर थोड़ी चिढ़ ज़रूर होती है. ऐसे में बाज़ारवाद का मंगलगान करने में सबसे आगे रहने वाले अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल में वैलेंटाइन्स डे के विरोध पर एक लेख पा कर हार्दिक प्रसन्नता हुई. इसमें बताया गया है कि अमरीका में क्रिसमस के बाज़ारीकरण से चिढ़ने वालों की भी बड़ी संख्या है, लेकिन बाज़ारवाद के जिस उत्सव के ख़िलाफ व्यवस्थित तरीक़े से एक आंदोलन खड़ा होता दिखता है, वो है- वैलेंटाइन्स डे.

अमरीकी लेखिका जेनिफ़र ग्राहम के इस लेख के ज़रिए ही जब ई-कार्ड के थोक भंडार अमेरिकन ग्रीटिंग्स की वेबसाइट पर गया तो वहाँ एन्टी-वैलेंटाइन्स-डे या एन्टी-वैल कार्ड की भारी मौजूदगी को देख कर सुखद आश्चर्य हुआ.(वैसे, ये भी बाज़ारवाद का ही कमाल है!)

वॉल स्ट्रीट जर्नल के लेख में दिए गए आँकड़ों की बात करें तो भारी आर्थिक मंदी में जकड़े होने के बाद भी अमरीकी इस वैलेंटाइन्स डे के मौक़े पर 14 अरब डॉलर ख़र्च कर रहे हैं. ये कोई आम अटकलबाज़ी नहीं है, बल्कि नेशनल रिटेल फ़ेडरेशन का अनुमान है. यह राशि मुख्यत: कार्डों, फूलों और उपहारों पर और रेस्तराँ में ख़र्च की जा रही है. क्रिसमस के बाद साल में सबसे ज़्यादा कार्ड वैलेंटाइन्स डे(बहुतों के लिए एन्टी-वैल डे) पर ही बिकते हैं. जबकि फूलों की बिक्री के हिसाब से तो पहले नंबर पर वैलेंटाइन्स डे ही है.

लेखिका जेनिफ़र के शब्दों में ही कहें तो वैलेंटाइन्स डे अस्पष्टता से परिभाषित एक ऐसा दिन है जब (क्यूपिड के)तीर की नोक पर लोग अपने अंतर्मन में बसी भावनओं को व्यक्त करने के लिए बाध्य किए जाते हैं. बहुतों को तो असल के अभाव में बनावटी भावनाओं का प्रदर्शन करना पड़ता है. इसीलिए आश्चर्य नहीं कि बहुत से लोग इस दिन को FAD या Forced Affection Day कहते हैं.

वैलेंटाइन्स डे का विरोध करने वालों में कई वर्ग के लोग शामिल हैं, जिनमें प्रमुख हैं- अविवाहित लोग जिन्हें रोमाँस पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिया जाना पसंद नहीं, अभिभावकों का वर्ग जो कि वैलेंटाइन्स डे पर बच्चों द्वारा किए जाने वाले ख़र्च से परेशान रहते हैं और आनंदपूर्वक समय बिता रहे वैसे विवाहित/अविवाहित युगल जिन्हें प्रेम का प्रदर्शन करने की बाध्यता बिल्कुल रास नहीं आती.

इस वैलेंटाइन्स डे विरोधी गुट का लाभ उठाने के लिए भी करोड़ों डॉलर का बाज़ार तैयार हो चुका है. एन्टी-वैल कार्डों की चर्चा पहले ही हो चुकी है. हर अमरीकी शहर में कम-से-कम ऐसा एक रेस्तराँ या बार ज़रूर है जहाँ 14 फ़रवरी को 'क्यूपिड-इज़-स्टूपिड' टाइप थीम पार्टी रखी जाती हैं.

कई जगह मौक़े का फ़ायदा उठाने में आगे रहने वाले फ़िटनेस सेंटर या व्यायामशालाओं में एन्टी-वैल मुक्केबाज़ी सेशन रखा जाता है. इस दौरान वहाँ संबंध-विच्छेद के तनाव से पार पाने के गुर सिखाए जाते हैं. एक तरीका है अपने छूट चुके प्रेमी/प्रेमिका की तस्वीर पर घूंसे बरसाना. इसी तरह ऊन बनाने वाली एक कंपनी जिमी बीन्स वूल ने तो फ़रवरी का महीना एन्टी-वैल युवतियों को समर्पित करते हुए लाल या गुलाबी रंग की जगह पूरे महीने सिर्फ़ नीले रंग के ऊन को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है.

इतना ही नहीं पेटीशन्सऑनलाइन नामक वेबसाइट पर किसी ने वैलेंटाइन्स डे का आयोजन बंद कराने के लिए एक याचिका भी डाल दी है, जिसका शीर्षक है- End Valentine's Day. हालाँकि इस लेख को लिखे जाने तक 68 लोगों ने ही याचिका पर हस्ताक्षर किए थे.

रविवार, फ़रवरी 18, 2007

स्वर्णिम सूअर वर्ष

चीनी जनता और दुनिया के कोने-कोने में फैले चीनी लोग आज नए साल की शुरुआत कर रहे हैं. चंद्र कैलेंडर के हिसाब से हर चीनी वर्ष बारी-बारी से 12 जीवों में से एक का होता है. और आज से आरंभ चंद्र-वर्ष सूअर के नाम है.

सूअर के अलावा बाक़ी ग्यारह जीव हैं(क्रमवार): चूहा, बैल, बाघ, खरगोश, ड्रैगन(मिथकीय जीव), साँप, घोड़ा, भेड़, बंदर, मुर्ग़ा और कुत्ता.

यदि चीनी परंपरा के जानकारों की मानें तो ये हर बारहवें साल आने वाला सामान्य सूअर वर्ष नहीं, बल्कि विशेष स्वर्णिम सूअर वर्ष है जो 60 साल में आता है.

सूअर चीनी परंपरा में धन और संपन्नता से जुड़ा जीव है. चीनी समाज में अधिकतर लोग ये मानते हैं कि सूअर वर्ष हर परिवार के लिए किसी न किसी रूप में ख़ुशियाँ लेकर आता है.

सूअर वर्ष में पैदा हुए बच्चों को भाग्यशाली माना जाता है. ऐसे बच्चे आमतौर पर ईमानदार, सभ्य, मेहनती और भरोसेमंद होते हैं. माना जाता है कि ये बच्चे हमेशा दूसरों का प्यार पाते हैं. लोग उनकी मदद करने से कभी पीछे नहीं हटते. सूअर वर्ष में जन्मे बच्चे ख़ुश रहते हैं, ज़िंदगी में नाम कमाते हैं.

सूअर वर्ष में पैदा हुए बच्चों की ख़ासियत को देखते हुए अस्पतालों में विशेष तैयारियाँ की जा रही हैं. अधिकतर अस्पतालों में जच्चा-बच्चा वॉर्ड का या तो विस्तार किया जा रहा है, या फिर अतिरिक्त बेड की व्यवस्था की जा रही है.

अधिकारियों का अनुमान है कि अकेले राजधानी बीजिंग में इस साल 1,70,000 बच्चे पैदा होंगे. जो कि बीते साल की तुलना में 50,000 ज़्यादा है.

याद रहे कि चीन में अब भी एक बच्चा की नीति लागू है. हालाँकि हांगकांग में इसे उतनी सख़्ती से लागू नहीं किया जाता. वहाँ चीनी मुख्य भूमि के मुक़ाबले बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था भी है. इस तथ्य के मद्देनज़र हांगकांग प्रशासन को डर है कि इस साल 'गोल्डन पिग बेबी' की चाहत लिए भारी संख्या में महिलाएँ मुख्य भूमि से हांगकांग का रुख़ कर सकती हैं. और ऐसा हुआ तो हांगकांग का स्वास्थ्य तंत्र चरमरा जाएगा.

इस आशंका को देखते हुए हांगकांग प्रशासन ने इस महीने से एक नया क़ानून लागू किया है. इसके तहत मुख्य भूमि से हांगकांग आने वाली किसी गर्भवती महिला को ये सबूत देना पड़ेगा कि उसने पहले से ही अस्पताल में अपनी सीट बुक करा रखी है. यदि कोई महिला गर्भावस्था के सातवें महीने में पहुँच चुकी है, लेकिन उसने किसी अस्पताल के जच्चा-बच्चा वार्ड में सीट नहीं बुक कराया है, तो उसे हांगकांग की ज़मीन पर पाँव नहीं रखने दिया जाएगा.(ये है 'एक देश, दो व्यवस्था' की नीति का कमाल.)

चीनियों के लिए सूअर का वर्ष बहुत ही बढ़िया होता है, लेकिन बाक़ी दुनिया पर इसका क्या प्रभाव रहेगा? भविष्यवक्ताओं की मानें तो इस सवाल का जवाब उतना अच्छा नहीं है. अनेक भविष्यवक्ता मानते हैं कि ये साल बड़ा ही उतार-चढ़ाव वाला होगा, दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्राकृतिक आपदाएँ आएँगी, संघर्षों का विस्तार होगा.

चीनी मान्यता के अनुसार चंद्र कैलेंडर के हर साल पर ब्रह्मांड के अस्तित्व के आधारभूत पंचतत्वों(धातु, जल, लकड़ी, अग्नि और मिट्टी) में से कुछ का विशेष असर होता है.

सूअर के साल पर पंचतत्वों में से दो; अग्नि और जल का असर है. और, कुछ भविष्यवक्ताओं के अनुसार यही चिंता की बात है. पानी पर आग; यानि चीनी शास्त्रों के अनुसार संघर्षों और युद्धों का संकेत.

चलते-चलते एक ऐसा तथ्य जो कि सूअर के वर्ष के भयानक असर का एक बढ़िया उदाहरण माना जा सकता है: लाखों मौतों का ज़रिया बनने वाली एके-47 राइफ़ल का आविष्कार एक सूअर वर्ष में ही हुआ था! ...ग़ौर करें कि इस समय पाँच करोड़ से ज़्यादा एके राइफ़लें प्रचलन में हैं.

मंगलवार, फ़रवरी 13, 2007

काव्य महिमा-2

ग्रीनिचमैरियन मूर ने 1935 की 'पोएट्री' नामक रचना में कविता के बारे में कहा है- "मैं भी इसे नापसंद करती हूँ. और भी कई चीज़ें हैं जो इससे कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं." ...लेकिन इसी कृति में आगे वह कविता के जादू का बयान इन शब्दों में करती हैं- "हालाँकि, पूर्ण निरादर के साथ इसे पढ़ कर, आख़िरकार आप इसमें पाते हैं, एक धरातल यथार्थ का."

...एमिलि डिकिन्सन को कविता मे बेशुमार संभावनाएँ नज़र आती हैं--गद्य से कहीं ज़्यादा. इसी तरह चेस्लाफ़ मियोस का मानना है कि कविता ही वो चीज़ है जिसके सहारे हमें शून्यता से लड़ाई करनी है. उनके अनुसार कविता जीवन के बारे में, और जीवन के लिए है.

...कविताएँ कठिन नहीं होतीं? उतनी तो नहीं ही, हम जितने कठिन हैं. हमारी जटिल ज़िंदगी अधिकांश कविताओं के मुक़ाबले काफ़ी कठिन है. हम अपने लिए तो कठिन हैं ही, दूसरों के लिए भी आसान नहीं. कविताएँ सरलीकरण से बचती हैं. अच्छी कविताएँ कभी-कभार ही दोटूक बातें करती हैं. दरअसल, वे चाहती हैं कि अपने बारे में आपकी क्या सोच है, ये ख़ुद आप तलाश करें.

क्या कविताएँ ग़ैरजिम्मेदार नहीं हैं? सोलोन के अनुसार कवि जम कर झूठ परोसते हैं. लेकिन पिकासो की मानें तो कला एक झूठ है जो हमें सत्य का अनुभव कराती है. दरअसल, कविता की सच्चाइयाँ अंतर्मुखी होती हैं. वे भावनाओं की, कल्पनाओं की सच्चाइयाँ होती हैं. और, कविता की ज़िम्मेदारियाँ भी अंतर्मुखी होती हैं. कवि को अपनी संवेदनाओं के प्रति वफ़ादार रहना चाहिए. बनावटी भावों को व्यक्त करना कल्पनाशीलता के ख़िलाफ़ पाप है.

कविताएँ पढ़ने के बारे में भी सच बिल्कुल यही है. सच्चाई और ज़िम्मेदारी से कविताएँ पढ़ना आपके अंतर्मन को मज़बूती देता है. कविता एकाग्रचितता की कला है, न सिर्फ़ कवियों के लिए, बल्कि पाठकों के दृष्टिकोण से भी. कविताएँ उन बातों पर आपका ध्यान लगाती हैं, जो कि आपके अंतर्मन के अनुरूप हैं.

कॉलरिज ने पाठकों को चार वर्गों में बाँटा है: सबसे अच्छा वर्ग कोहिनूरों का, जो पढ़ कर ख़ुद लाभान्वित होते हैं और दूसरों को भी लाभान्वित करते हैं; दूसरा वर्ग रेत-घड़ियों का, जो पढ़ा हुआ याद नहीं रखते, पढ़ कर सिर्फ़ समय गुजारते हैं; तीसरा वर्ग छलनी का, जिन्हें पढ़े हुए में से छना हुआ कचरा भर याद रह जाता है; और चौथा वर्ग है स्पंज का, जो पढ़ा हुआ सब कुछ वापस कर देते हैं, लेकिन थोड़ी गंदगी के साथ.

लेकिन, हमलोगों में से सभी पाठकों के रूप में विकसित हो सकते हैं. जैसा कि इलियट ने कहा है- कविता क्या है, हम उसे पढ़ कर ही जान पाते हैं. पढ़ना शुरू करके ही आप अपना पढ़ाकू तंत्र विकसित कर सकते हैं, अपनी क्षमता का विस्तार कर सकते हैं...तब तक, जब तक कि पढ़ी जा रही कविताएँ आपको अपनी ख़ुद की सृजनात्मकता से नहीं जोड़ दे.

पढ़ने की क्रिया रचनात्मक प्रक्रिया में सहायक होती है. यदि आप एक अच्छी कविता के सामने अपनी पूरी असलियत में प्रस्तुत हों, तो वह आपके और दुनिया के बारे में आपकी समझ को विस्तार प्रदान कर सकेगी. ऐसे काल में जबकि शरीर, बाज़ार, उपभोग को लेकर आसक्ति इतनी ज़्यादा है, छह पंक्तियों की एक शाब्दिक रचना आपको अपनी ज़िंदगी देखने का अवसर दे सकती है, नया अनुभव प्रदान कर सकती है.

कविता यथार्थ का जो धरातल मुहैय्या कराती है, वो ख़ुद आप में है.

(ब्रितानी साहित्यकार रुथ पैडेल के लेख Turn Over a New Leaf का सार)

काव्य महिमा-1

ग्रीनिचशेली ने 1821 में लिखा था- Poets are the unacknowledged legislators of the world. दरअसल, काव्य की ताक़त में शेली को पूरा यक़ीन था. उनके लिए कविता, राजनीतिक दर्शन, और अवैध सत्ता-प्रतिष्ठान से सीधे संघर्ष में परस्पर कोई विरोधाभास नहीं था. उनका मानना था कि कला का क्रांति और उत्पीड़न के बीच के संघर्ष से अटूट संबंध है.

कविता कोई मरहम या भावनात्मक मालिश या फिर भाषाई एरोमाथेरेपी नहीं है. न ही यह कोई ब्लूप्रिंट, या इन्सट्रक्शन मैनुअल या विज्ञापन-पट है. वैसे भी सार्वभौम काव्य जैसी कोई चीज़ नहीं होती, बल्कि मात्र समकालीन इतिहास से जुड़ी कविताएँ और काव्यत्मकता होती हैं. ...कविताएँ उतनी ही शुद्ध और सरल हो सकती हैं, जितना कि मानव इतिहास.

...कविता को अनेकों बार ख़ारिज़ किया जा चुका है: ये आम-जनता के लिए नहीं है, ये रेलवे स्टेशन के बुक-स्टॉल पर या सुपरमार्केटों में नहीं बिक पाती है; ये औसत बुद्धि के लिए बहुत कठिन है; ये बहुत ही आभिजात्य है, लेकिन सोदेबी की नीलामी में धनपति इसके लिए बोली नहीं लगाते; संक्षेप में कहें तो इसकी पूछ नहीं है. इसे कविता की मुक्त-बाज़ार आलोचना कह सकते हैं.

वास्तव में इन विचारों के बीच एक अजीब तरह का संबंध है: मानव पीड़ा के परिप्रेक्ष्य में कविता या तो अपर्याप्त या अनैतिक है, या फिर ये मुनाफ़ा नहीं दे सकती, इसलिए बेकार है. जिस तरह देखें, कवियों को शर्मशार होने या बोरिया-बिस्तर समेटने की सलाह दी जाती है. लेकिन वास्तव में देखें तो, पूरी दुनिया में, काव्यात्मक भाषा का रक्ताधान शरीर और आत्मा को साथ रख सकता है, रख रहा है.

कविता की आलोचना के दौरान हमारे भौतिक जीवन की दिन-प्रतिदिन की अवस्थाओं के बारे में नहीं के बराबर कहा जाता है: कि कैसे ये हमारी भावनाओं, सहज मानवीय प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करती हैं- कैसे हम हवा में धुएँ की आकृति की झलक पाते हैं, दुकान के शो-बॉक्स में जूते की जोड़ी को या नुक्कड़ पर खड़े लोगों को देखते हैं, कैसे हम छत पर हो रही बारिश या ऊपर के कमरे में रेडियो पर बज रहे संगीत को सुनते हैं, कैसे हम एक पड़ोसी या अनजान आदमी से नज़रें मिलाते या चुराते हैं. मानें या नहीं, इनका हमारे दृष्टिकोण पर असर पड़ता है. अनेकों कविताएँ, काव्य पर लिखे गए अनेक निबंधों के समान ही, ऐसे लिखी गई हैं मानो इस तरह के दबाव नहीं रहे हों. लेकिन इससे इनका अस्तित्व ही ज़ाहिर होता है.

जब कविता हमारे कंधे पर अपना हाथ रखती है, तो हम भाव विभोर हो उठते हैं. हमारे सामने कल्पना के द्वार खुल जाते हैं, इस कथन को झुठलाते हुए कि 'कोई विकल्प नहीं है.'

सच है कि कोई कविता इसके पीछे की चेतना के समान ही गंभीर या उथली, सतही या दूरदृष्टि वाली, पूर्वानुमान लगाने वाली या नए ज़माने से पिछड़ती हो सकती है. व्याकरण और वाक्य-विन्यास, आवाज़ों, छवियों को कौन आगे बढ़ा रहा है- क्या यह शब्दवाद, रूढ़िवाद या व्यावसायिकता का लघुरूप है- एक बौनी भाषा है? या फिर ये विभेद में समरूपता से ऊर्जा लेने वाले रूपालंकार की ताक़त है? कविता में हमें उसकी याद दिलाने की क्षमता है, जिसे देखने की मनाही है. एक विस्मृत भविष्य; अभी तक अनिर्मित स्थल जिसकी नींव स्वामित्व या बेदखली नहीं, महिलाओं, परित्यक्तों और जनजातियों की अधीनता नहीं, बल्कि स्वतंत्रता को निरंतर परिभाषित किया जाना हो. इस मौजूदा भविष्य को बार-बार ख़ारिज़ किया गया है, लेकिन अभी भी यह दृष्टि सीमा में है. दुनिया भर में इसके रास्ते नए सिरे से खोजे जा रहे हैं, बनाए जा रहे हैं.

कविता में हमेशा वैसा कुछ रहा है जो कि समझा नहीं जा सकेगा, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, जो कि हमारे उत्कट अवधान, हमारे महत्वपूर्ण सिद्धांतों, देर रात तक चलने वाली हमारी बहसों से बच निकलता है. कवि एमेरिको फ़ेरारी के शब्दों में कहें तो 'वो अव्यक्त हमेशा से रहा है, संभवतया जहाँ, कविता और संसार के बीच जीवंत संबंध का केंद्रक होता है.'

(अमरीकी साहित्यकार Adrienne Rich के लेख 'Legislators of the World' का सार)

रविवार, अगस्त 27, 2006

आया ज़माना 'उत्पभोक्ता' का

प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे नित नए विकास के कारण प्रोड्यूसर(उत्पादक) और कंज़्यूमर(उपभोक्ता) का मेल हो रहा है, और जन्म हो रहा है 'प्रोज़्यूमर' का. प्रोज़्यूमर जिसे हिंदी में 'उत्पभोक्ता' कहा जा सकता है. यह सिद्धांत एल्विन टोफ़लर का है.

एल्विन टोफ़लर 77 साल के भविष्यद्रष्टा हैं. कोई ज्योतिषी नहीं बल्कि बिल्कुल शाब्दिक अर्थों में 'भविष्यद्रष्टा' हैं. भविष्य की परिकल्पना करने को उन्होंने अपना पेशा बना रखा है. अपनी पत्नी हेइडि के साथ मिल कर वह भविष्य की दुनिया और समाज के बारे में कई किताबें लिख चुके हैं. अभी हाल ही में उनकी नई किताब आई है- रिवोल्युशनरि वेल्थ. इससे पहले की उनकी किताबों में 'फ़्यूचर शॉक' और 'द थर्ड वेव' बहुत ज़्यादा चर्चित रही हैं.

पिछले सप्ताह फ़ाइनेंशियल टाइम्स अख़बार ने उनका विस्तृत साक्षात्कार छापा है. इस साक्षात्कार में टोफ़लर ने भविष्य के समाज की भविष्यवाणी करते हुए प्रोज़्यूमर या उत्पभोक्ता के युग के आगमन की बात की है. उत्पभोक्ता का उदाहरण देते हुए वह बुज़ुर्गों की बढ़ती हुई आबादी की बात करते हैं- "वो दिन दूर नहीं जब दुनिया में साठ साल से ज़्यादा उम्र के लोगों की आबादी एक अरब को पार कर जाएगी. वे नई प्रौद्योगिकी प्रदत्त उपकरणों के ज़रिए अपनी बीमारी का पता करने से लेकर नैनोटेक्नोलॉजि आधारित उपचार तक, वो सब काम कर रहे होंगे जो कि आज एक डॉक्टर का काम माना जाता है. इससे 'हेल्थ-सेक्टर' के कामकाज़ का तरीक़ा पूरी तरह बदल जाएगा." टोफ़लर अपने इस उदाहरण को और ज़्यादा फैलाते हुए बताते हैं कि धनरहित अर्थव्यवस्था वाला बुज़ुर्गों का समाज भविष्य में चिकित्सा प्रौद्योगिकी के बाज़ार को बहुत तेज़ी से आगे बढ़ाएगा, और इस क्रम में कुछ लोग भारी मात्रा में पैसा बनाएँगे.

एल्विन टोफ़लर कहते हैं कि प्रोज़्यूमिंग या उत्पभोग कई मामलों में आउटसोर्सिंग को नया अर्थ देता है. इस प्रकार की आउटसोर्सिंग में काम सस्ते दर पर भारत या फ़िलिपींस की कोई कंपनी नहीं करा रही होती है, बल्कि उपभोक्ता ख़ुद मुफ़्त में काम कर रहा होता है. इस प्रक्रिया के उदाहरण में वो बैंक टेलर काउंटरों की जगह एटीएम मशीनों के इस्तेमाल के चलन का उल्लेख करते हैं.

अर्थव्यवस्था के भावी स्वरूप की चर्चा करते हुए टोफ़लर एक चौंकाने वाली घोषणा करते हैं- 'प्रोज़्यूमर युग में धन का एक बड़ा स्रोत का धरती से 12,000 मील ऊपर टिका हुआ है'. वह कहते हैं- "ग्लोबल पोज़ीशनिंग उपग्रह आज मोबाइल फ़ोन से लेकर एटीएम मशीनों तक अनेक प्रक्रियाओं में 'टाइम और डाटा स्ट्रीम' को परस्पर संतुलित रखने के लिए ज़िम्मेदार हैं. एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल के भी केंद्र में जीपीएस ही है. मौसम की सटीक भविष्यवाणी के ज़रिए उपग्रह कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए भी ज़िम्मेदार हैं." ऐसे में जब टोफ़लर कहते हैं कि 'Wealth today is created everywhere(globalisation), nowhere(cyberspace) and out there(outer space)', तो उनकी बात में दम लगता है.

'मास्टर थिंकर' माने जाने वाले टोफ़लर के अनुसार आर्थिक व्यवस्था के विविध रूप सामने आते जाने का प्रभाव हमारे व्यक्तिगत जीवन पर भी पड़ रहा है. वह कहते हैं, "परिवार ख़त्म नहीं होगा, लेकिन पारिवारिक व्यवस्था के नए रूपों का उदय ज़रूर होगा. समलैंगिकों की शादी को स्वीकृति मिलती जा रही है. अकेली माताओं, अविवाहित युगलों, बिना बाल-बच्चे वाले विवाहित जोड़ों और कई-कई शादियाँ कर चुके माता-पिता हर समाज में देखे जा रहे हैं. एक साथी के साथ ज़िंदगी गुजारने का चलन भले ही ख़त्म नहीं हो, लेकिन एकाधिक साथियों के साथ संबंध को व्यापक स्वीकृति मिलने लगेगी."

टोफ़लर का कहना है कि कामकाज़ में मानकीकरण की ज़रूरत कम होते जाने के साथ ही ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग अपनी इच्छा के अनुसार(customised time में) काम करेंगे. उत्पभोक्ता नौकरी या करियर के बज़ाय 'creative piece work' में लगे रहेंगे. ज़्यादा-से ज़्यादा कामकाज़ कारखाने या दफ़्तर के बज़ाय घर में होगा.

इतने परिवर्तन से समाज में उथलपुथल नहीं मच जाएगी क्योंकि हर समाज में एक बड़ी संख्या यथास्थितिवादियों की होती है? इस सवाल के जवाब में टोफ़लर का कहना है कि पूरी दुनिया में जगह-जगह wave conflict या 'धारा संघर्ष' शुरू हो जाएगा. इस संबंध में वो पिछले दिनों मेक्सिको में हुए चुनाव का ज़िक्र करते हैं जहाँ दो पक्षों के बीच लगभग 50-50 प्रतिशत मत बँटे. पहले पक्ष के साथ थे 'पहली धारा' के दक्षिणी हिस्से के किसान और 'दूसरी धारा' के शहरी श्रमिक संघ, जबकि दूसरे पक्ष में थे 'तीसरी धारा' के उत्तरी हिस्से के संपन्न लोग जिन्हें क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग संधि नाफ़्टा और भूमंडलीकरण का ज़्यादा फ़ायदा मिला है. टोफ़लर की मानें तो चीन, ब्राज़ील और कई अन्य देशों में भी इस तरह के शक्ति परीक्षण की आशंका बढ़ गई है.

अमरीका में विभिन्न संस्थाओं और संस्थानों को वो पुराने और नए के बीच clash of speeds या 'गति के संघर्ष' में फंस गया मानते हैं. टोफ़लर के अनुसार यदि कल्पना करें कि अमरीकी व्यवसाय जगत 100 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रहा है, तो भविष्य के लिए युवाओं को तैयार करने की ज़िम्मेदारी उठाने वाले शिक्षण संस्थान मात्र 10 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से आगे बढ़ रहे हैं. निराश स्वर में उन्होंने कहा- "इस क़दर 'डिसिन्क्रोनाइज़ेशन' के रहते आप एक सफल अर्थव्यवस्था नहीं पा सकते." जापान को भी वह इसी कसौटी पर पिछड़ता जा रहा मानते हैं. अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बात करें तो 'प्रीमाडर्न इस्लाम' और 'पोस्टमाडर्न उपभोक्ताओं' के बीच टोफ़लर को इसी तरह का डिसिन्क्रोनाइज़ेशन दिखता है.

'फ़ाइनेंशियल टाइम्स' के इंटरव्यू के अंतिम हिस्से में टोफ़लर से पूछा गया कि उनकी भविष्यवाणियाँ ग़लत भी साबित हुई हैं, तो उन्होंने ईमानदारी से कई ग़लत निकली भविष्यवाणियों की चर्चा की- "हमने मानव और पशु क्लोनिंग की 1970 के दशक में चर्चा करते हुए कहा था कि 1980 के दशक के मध्य तक ये आम वास्तविकता बन जाएगी. हमने विज्ञान की धीमी गति को नज़रअंदाज़ कर दिया था. इस संबंध में हमने नैतिक सवालों की बात की थी, लेकिन हमने विज्ञान-विरोधी ईसाई दक्षिणपंथियों की ताक़त का अंदाज़ा नहीं लगाया था,...इसी तरह काग़ज़रहित ऑफ़िस की हमारी भविष्यवाणी भी अब तक वास्तविकता नहीं बन पाई है."

सोमवार, जुलाई 24, 2006

ब्रितानी साम्राज्य की ख़ूनी विरासत

आधुनिक इतिहास में जितना विवादास्पद अध्याय ब्रितानी साम्राज्य का है, उतना और कुछ नहीं. ब्रितानी साम्राज्य की अच्छाइयों और बुराइयों की लंबी सूची लिए लोग आपको पूरी दुनिया में मिल जाएँगे. इस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा विवाद या बहस ब्रिटेन और भारत में देखने को मिलती है.

नियल फ़र्गुसनब्रिटेन के एक अत्यंत ही प्रतिभाशाली इतिहासकार हैं- प्रोफ़ेसर नियल फ़र्गुसन. मात्र 42 साल के हैं, यानि इतनी उम्र जब आमतौर पर इतिहासकारों के दूध के दाँत टूटते हैं. फ़र्गुसन के लेखन पर दुनिया भर में बहस छिड़ जाती है. वो ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे. लेकिन जब ब्रिटेन में उतना भाव नहीं मिला तो अटलांटिक पार का रुख़ किया और अमरीका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में जा टिके. वहाँ इतिहास के प्रोफ़ेसर हैं, हालाँकि अब भी किसी न किसी रूप में ऑक्सफ़ोर्ड से भी नाता जोड़ रखा है. स्टैनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से भी रिश्ता है.

अब नियल फ़र्गुसन की ताज़ा किताब द वार ऑफ़ द वर्ल्ड चर्चा में है. इसे लेकर उन्होंने चैनल4 के लिए एक धांसू डॉक्यूमेंट्री भी बना डाली है. प्रोफ़ेसर फ़र्गुसन ने अपनी ताज़ा किताब में इस बात को जम कर उछाला है कि पिछली सदी मानव इतिहास की सबसे ख़ूनी सदी थी. इस बात पर किसी को ज़्यादा आपत्ति भी नहीं. लेकिन अनेक लोगों को फ़र्गुसन की किताब में ब्रितानी साम्राज्य की तारीफ़ किए जाने पर आपत्ति है.

ब्रितानी साम्राज्य के बारे में फ़र्गुसन से बिल्कुल विपरीत मान्यता रखने वाले ब्रिटेन के ही एक इतिहासकार हैं- रिचर्ड गॉट. रिचर्ड गॉटवो ब्रितानी साम्राज्य का प्रतिरोध करने वालों को केंद्र में रख कर एक किताब लिख रहे हैं. अभी पिछले दिनों उन्होंने गार्डियन अख़बार में एक लेख में ब्रितानी साम्राज्य की ख़ूनी विरासत की चर्चा की. रिचर्ड गॉट का कहते हैं कि दुनिया में अनेकों मौज़ूदा संघर्ष उन क्षेत्रों में हो रहे हैं जो पहले ब्रितानी साम्राज्य का हिस्सा थे, और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद थके और लुटे-पिटे साम्राज्यवादियों ने जहाँ से निकलने में अपनी भलाई समझी थी. उन इलाकों में से अधिकांश आज दुनिया में हिंसा और अस्थिरता के स्रोत माने जाते हैं.

ये रही ब्रितानी साम्राज्य की ख़ूनी विरासत की एक संक्षिप्त सूची:

1. फ़लस्तीनी क्षेत्र- एक ब्रितानी उपनिवेश जिसे उसने मात्र 30 वर्षों के शासन के बाद 1947 में छोड़ दिया. अपने अधिकतर उपनिवेशों की तरह यहाँ भी अंग्रेज़ों ने यूरोपीय लोगों को लाकर बसाया. दुर्भाग्य से बाहर लाकर थोपे गए लोगों के पास इतना समय नहीं था कि वे स्थानीय लोगों पर पूरी तरह काबू पा सकें(जैसा कि ऑस्ट्रेलिया के मामले में हुआ था), क्योंकि उस दौरान ब्रितानी साम्राज्य का सूरज अस्ताचलगामी हो चुका था. ऑस्ट्रेलिया के स्थानीय लोगों यानि आदिवासियों के विपरीत फ़लस्तीनियों ने साम्राज्यवादियों द्वारा लाकर पटके गए यहूदियों का प्रतिरोध पहले दिन से ही शुरू कर दिया. अरब जगत के समर्थन और अपनी धार्मिक परंपराओं से ली गई प्रेरणा के बल पर उनका प्रतिरोध लगातार चलता रहा, और आगे भी जारी रहेगा.

2. सियरालियोन- अपनी नीति के अनुरूप ब्रितानी साम्राज्यवादियों ने यहाँ भी बाहर से लाकर लोगों को बसाया. बाहर से लाए गए लोग थे तो अश्वेत ही, लेकिन मुख्य तौर पर ईसाई. दूसरी ओर जब ये सब हो रहा था सियरालियोन के स्थानीय लोग इस्लाम के प्रभाव में पूरी तरह आ चुके थे. सियरालियोन में ब्रितानी शासकों का ज़ोरदार प्रतिरोध हुआ. और अब स्थानीय लोगों और बाहर से लाकर बसाई गई आबादी के बीच संघर्ष रह-रह कर गृहयुद्ध का रूप ले लेता है.

3. अन्य अफ़्रीकी देश- दक्षिणी अफ़्रीका, ज़िम्बाब्वे और कीनिया में भी बाहर से लाकर बसाए गए लोगों और स्थानीय आबादी के बीच मनमुटाव बना हुआ है. हालाँकि इन देशों में बसाए गए लोग अब रक्षात्मक मुद्रा में आने को मज़बूर हो चुके हैं.

4. श्रीलंका और फ़िजी- इन दो देशों में अंग्रेज़ों ने अलग तरह का खेल खेला. यहाँ भारत से मज़दूर बना कर लाए गए लोगों को स्थानीय आबादी पर थोपा गया. हालाँकि ब्रितानी साम्राज्यवादी भारत से लोगों को अपने बगानों में काम कराने के लिए लाए थे, लेकिन उपनिवेश के ख़ात्मे के बाद स्थानीय आबादी और भारत से लाए गए लोगों के बीच जो मनमुटाव शुरू हुआ, वो आज भी बहुत तल्ख़ है. श्रीलंका में सैंकड़ो लोग हर साल इस ख़ूनी विरासत की भेंट चढ़ते हैं.

5. उत्तरी आयरलैंड- ब्रिटेन का हिस्सा बने उत्तरी आयरलैंड में स्थानीय कैथोलिक आबादी पर प्रोटेस्टेंट ईसाइयों को थोपा गया. कोई आश्चर्य नहीं कि आधुनिक आतंकवाद का जन्म वहीं उत्तरी आयरलैंड में ही हुआ.

6. भारत- द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद के काल में साम्राज्यवादियों ने जिस हड़बड़ी में भारत को विभाजित करते हुए छोड़ा. विलायती शासकों ने ये भी नहीं सोचा कि जिस उपमहाद्वीप को दो शताब्दियों तक एकजुट रखने का श्रेय उन्हें दिया जाता हो, उसे सांप्रदायिक आधार पर बाँटते हुए भागना कितना उचित था. इतनी हड़बड़ी थी कि कश्मीर पर कोई सर्वमान्य फ़ैसला करने की भी ज़रूरत नहीं समझी गई. भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे पर कितना संदेह करते हैं, और कश्मीर का नासूर भारत की कितनी ऊर्जा खींचता है, बयान करने की ज़रूरत नहीं.

7. साइप्रस- भारत की तरह ही ब्रितानी साम्राज्यवादियों ने साइप्रस को भी बुरी तरह दो हिस्सों में बाँट दिया. दोनों हिस्सों की आबादी एक-दूसरे पर कभी भरोसा नहीं कर सकी. शर्मनाक रूप से ब्रिटेन अब भी साइप्रस में दो संप्रभु सैनिक अड्डे बनाए हुए हैं, विभाजित साइप्रस पर निगरानी रखने के लिए.

8. नाइजीरिया और सोमालिया- अंग्रेज़ साम्राज्यवादियों ने नाइजीरिया को अपनी ज़रूरतों के हिसाब से कृत्रिम रूप से एक राष्ट्र का रूप दिया, जबकि सोमालिया को अपनी सुविधा के लिए पहले उपनिवेश बनाया और बाद में अपनी ज़रूरतों के अनुरूप ही उसे उसके हाल पर छोड़ा. दोनों देशों के भीतर आबादी के बीच स्पष्ट विभाजन और परस्पर घृणा देखी जा सकती है.

9. इराक़- इराक़ ब्रितानी साम्राज्य में शामिल होने वाला अंतिम क्षेत्र था, और साम्राज्य की पकड़ से बाहर होने वाला पहला देश. इराक़ से ब्रितानी सैनिक अड्डे 1950 के दशक में जाकर हटाए गए. आज इराक़ में अघोषित गृहयुद्ध चल रहा है, और विडंबना देखिए कि बसरा वाले इलाक़े में सुरक्षा स्थापित करने का ज़िम्मा ब्रिटेन के हाथों में है.

10. अफ़ग़ानिस्तान- ब्रितानी साम्राज्य के दिनों में कहने को तो अफ़ग़ानिस्तान स्वतंत्र रहा, लेकिन असल में उस पर साम्राज्यवादियों की पूरी पकड़ रही. अंग्रेज़ों ने अफ़ग़ानों से तीन ख़ूनी युद्ध लड़े. चौथे युद्ध के लिए एक बार फिर ब्रितानी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में हैं, और लगता नहीं कि पिछले तीन मौक़ों के विपरीत उन्हें इस बार जीत नसीब होगी.