बुधवार, अप्रैल 09, 2008

चाइना रेडियो की एक रिपोर्ट

लंदन में बीजिंग ओलंपिक मशाल बुझाने की कोशिशमीडिया के लिए पूरी तरह नहीं खुले किसी देश का सूचना-प्रवाह सत्य से कितना दूर हो सकता है, उसकी मिसाल चाइना रेडियो इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट में देखा जा सकता है, जिसे हिंदी श्रोताओं/पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया.

मैंने सुना था कि चीनी मीडिया या तो अपनी मर्ज़ी से या सरकारी दबाव में अपने लोगों को आधी-अधूरी या बनी-बनाई ख़बरें देता है. लेकिन भारतवासियों और हिंदीभाषियों के लिए सफेद झूठ प्रसारित करने का कोई मतलब समझ में नहीं आता. क्योंकि भारत में मीडिया के क्षेत्र में खुलापन कई मामलों में तो पश्चिमी देशों से भी ज़्यादा है.

चाइना रेडियो इंटरनेशनल की ख़बर लंदन में ओलंपिक मशाल दौड़ के बारे में है. सब को पता है कि लंदन में 50 किलोमीटर के पूरे रास्ते में मशाल दौड़ को तिब्बत समर्थक और चीन विरोधी प्रदर्शनकारियों का सामना करना पड़ा. क़रीब 35 प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया गया. मशाल छीनने और उसे अग्निशामक से बुझाने की कोशिशों की तस्वीरें दुनिया भर ने देखीं. मशाल थामने के लिए चीनी राजदूत को तयशुदा स्थान से दूर चाइना-टाउन जाना पड़ा. लेकिन ये देखिए ओलंपिक मशाल दौड़ के लंदन चरण के बारे में चाइना रेडियो की रिपोर्ट, सब कुछ कितना व्यवधानरहित और आनंदमय रहा! (कृपया मज़े के लिए पढ़ें.)-

2008-04-07 16:16:49
पेइचिंग ओलिंपिक मशाल रिले लंदन में संपन्न हुई

6 मार्च को 2008 पेइचिंग ओलिंपिक की मशाल रिले ब्रिटेन की राजधानी लंदन में चली , उसी दिन लंदन में बड़ी बर्फबारी पड़ी , विशाल जमीन पर सफेद चादर सा बिछा हुआ , जान पड़ता था कि पूरा शहर एक सफेद दुनिया में आच्छादित था , मौसम ठंडा था , लेकिन ओलिंपिक मशाल के स्वागत में लंदन निवासियों और ब्रिटेन में रह रहे चीनी मूल के लोगों और प्रवासी चीनियों का उत्साह बहुत ऊंचा था ।

ओलिंपिक मशाल रिले 6 मार्च के सुबह सफेद बर्फों से ढके लंदन में हुई । लंदन के उत्तरी भाग में स्थित वेम्बली स्टेडियम के पास आरेना चौक पर रंगबिरंगे झंडे हवा में लहरा रहे थे , बैंड की ध्वनि आकाश में गूंज उठी और चौक पर हजार से अधिक लोग एकत्र हुए , उन में से सपरिवार आए लोग बहुत अधिक थे । सुबह दस बज कर तीस मिनट पर मशाल वेम्बली स्टेडियम में प्रज्ज्वलित किया गया और उस के स्वागत में इकट्ठी भीड़ में हर्षोल्लास गूंज उठा , जो आरेना चौक तक सुनाई पड़ा था। अपने तीन बच्चों को ले कर मशाल रिले देखने आए लंदन निवाली श्री अर्वांद बाटेल और उन के बच्चे हाथों में चीनी राष्ट झंडे , ब्रिटिश राष्ट्र झंडे और ओलिंपिक पताकाएं थामे हर्षोल्लास कर रहे थे । उन्हों ने कहाः

हम स्टेडियम के निकटस्थ स्थान पर है । आज की गतिविधि उत्साहजनक है , मुझे इस प्रकार के संगीत बहुत पसंद है ।

सुश्री काटिए.पोल मशाल रिले के अपने पास से गुजरते देख कर बहुत प्रफुल्लित हुई , वह स्थानीय चीनियों द्वारा प्रस्तुत रंगीन फीता नृत्य से बरबस आकर्षित हुई । उन्हों ने कहाः

यह नृत्य बेहद सुन्दर है । मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि रंगीन फीतों से इस किस्म का मनोहर नृत्य पेश किया जा सकता है । यह नृत्य बहुत मोहक है । मुझे बड़ी खुशी हुई कि मशाल रिले यहां से गुजर कर लंदन और अन्य स्थानों को चली जाएगी ।

उसी दिन की मशाल रिले गतिविधि के लिए लंदन के उन सभी स्थलों , जहां मशाल रिले पहुंचेगी , ने अनेक प्रकार के रंगबिरंगे जश्न आयोजित किए । आरेना चौक पर जाकोब .माट्वीजसन ने लाल सफेद रंगों की धारीदार नृत्य पोशाक पहना था और उन के हाथों में अग्नि का प्रतीक वाला पकाता था । वे अपने सहपाठियों के साथ रंगमंच पर कार्यक्रम पेश करने की प्रतीक्षा में थे । उन्हों ने संवाददाता से कहा कि वह लंदन के एक मिडिल स्कूल का छात्र है ।

हम रंगमंच पर प्रोग्राम पेश करेंगे । जब मशाल पहुंचा , तो हमारा एक भाग चक्कर लगाए गोलाकार दिखाएंगे और दूसरा भाग रंगीन झंडे फहराएंगे ।

प्रोग्राम पेश करने वाले स्कूली छात्र दल के नेता ब्रेंट सामुदायिक बस्ती से आई सुश्री क्लारी. सालंडी है । उन्हों ने कहाः

आज बहुत से नौजवान यहां आए हैं । उन्हों ने खुद प्रोग्राम के लिए पोशाक बनाये है । वे पेइचिंग ओलिंपिक मशाल के ब्रिटेन में आने का जोशीला स्वागत करते हैं । उन का यह प्रोग्राम शांति वाहक कबूतरे की आकृति में है , जिस का अर्थ ओलिंपिक भावना शांति है । प्रोग्राम का यह हिस्सा लहराती पवित्र अग्नि का द्योतक है । मैं बहुत भावविभोर हूं, यह एक महान घड़ी है । मैं समझती हूं कि ओलिंपिक मशाल की अग्नि विश्व के सभी देशों के एकता के सूत्र में बांध देगी और खेल समारोह के जरिए लोगों को और बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित करेगी , यह ओलिंपिक द्वारा प्रवर्तित मुख्य विषय है ।

मशाल रिले के लंदन में चलने के समय ब्रिटेन में रह रहे चीनी मूल के लोग और प्रवासी चीनी सब से अधिक प्रभावित हुए । जब मशाल रिले लंदन की चाइना टाउन में खड़े चीनी तौरण तक पहुंची , तो वहां इंजतार में खड़े चीनियों में जोरदार उमंग और उत्साह की लहर दौड़ने लगी । लाल रंग की लाइट , सड़क के दोनों किनारों पर फहराती रंगीन झंडियां , घूम रहे स्वर्णिम ड्रैगन व सिंह नाच और प्यारे प्यारे पेइचिंग ओलिंपिक के पांच शुभंकर यहां के खुशगवार वातावरण को चार गुना बढ़ा गए। लंदन के चीनी व्यापारी संघ के अध्यक्ष श्री तङ चुथिंग ने कहाः

हम पिछले अनेक महीनों से तैयारी कर रहे हैं । देखो , वहां के कंडीलों और रंगीन ध्वजों को देखो , ओलिंपिक के पांच शुभंकर भी आ पहुंचेंगे , हम ड्रैगन व सिंह नाच भी नाचेंगे । और वे चीनी राष्ट्र झंडे , ओलिंपिक ध्वज और ब्रिटिश राष्ट्र झंडे सभी हम ने तैयार कर रखे हुए हैं ।

चीनी मूल की युवती सुश्री कामेन वु सिंह नाच दल की सदस्या है । उस ने अपने सहपाठियों के साथ सिंह नाच नाचते हुए ब्रिटेन स्थित चीनी राजदूत सुश्री फु श्यन और उन के हाथ में थामे मशाल को चाइना टाउन के अंतिम छोर तक पहुंचाया । कामेन .वु ने कहा कि यद्यपि उन की चीनी भाषा अच्छी नहीं है, तथापि वह पेइचिंग ओलिंपक मशाल के साथ निकट संपर्क के इस मौके को बहुत मूल्यवान समझती है । उस ने कहाः

हम ने इस बार की गतिविधि के लिए दो महीनों तक तैयारी की है , हम हर हफ्ते तीन दिन अभ्यास करते थे । मैं बहुत प्रभावित हुई हूं , मैं समझती हूं कि मेरी यह कोशिश मूल्यवान है । आम स्थिति में हमें ओलिंपिक मशाल के इतने नजदीक पहुंचने का मौका नहीं मिलता है ।

लंदन की सड़कों पर बहुत से लोग मशाल रिले के साथ एक स्थल से दूसरे स्थल तक दौड़ने चले जाते थे । उन में से लंदन युनिवर्सिटी के छात्र , अखिल ब्रिटिश चीनी छात्र मित्रता संघ के अध्यक्ष श्री ये हाईथाओ भी हैं । उन की नजर में 6 मार्च की यह हिमपात शुभसूचक है । उन का कहना हैः

आज सुबह बड़ी बर्फबारी हुई , यह बड़ी खुशी की बात है । क्योंकि यह बर्फबारी इस साल के ओलिंपिक की सफलता का शुभसूचक है । यों मौसम ठंडा है , किन्तु लोगों के दिल में गर्मी भरी हुई है । ओलिंपिक एक शानदार खेल समारोह है , वह मातृभूमि का शानदार जश्न है , जिस से मातृभूमि की प्रतिष्ठा और उपलब्धि अभिव्यक्त हुई है।

मशाल रिले के जोशीले वातावरण से ब्रिटिश पक्ष के कर्मचारी भी प्रभावित हुए । मशाल रिले के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के काम में तैनात सुश्री मारिया. आर्मस्ट्रांग ने कहा कि मौसम ठंडा है , पर वह सभी लोगों की भांति बहुत उत्साहित हुई है ।

आज इतने ज्यादा लोग एकत्र हुए हैं , बड़ी खुशी है कि इतने ज्यादा मुस्कराते चेहरे देखे । मौसम सर्द है , लेकिन ओलिंपिक मशाल रिले की कार्यवाही बहुत उम्दा है । मैं पेइचिंग ओलिंपिक देखने के आतुर हूं । मैं और मेरे सहकर्मी सभी आज यहां काम मिलने पर प्रसन्न हुए हैं ।

लंदन में मशाल रिले 50 किलोमीटर लम्बे रास्ते से गुजरी , जो मौजूदा रिले में सब से लम्बी है। रिले ग्रेट ब्रिटेन संग्रहालय , लंदन टावर पुल , चाइना टाउन और बिग बेन क्लॉक आदि दर्शनीय स्थलों से गुजरी । लंदन की मशाल रिले विशिष्ट ऊंचे दर्जे की है । जब मशाल रिले डाउनिंग स्ट्रेट नम्बर 10 पहुंची , उस के स्वागत में ब्रिटिश प्रधान मंत्री गोर्डुन ब्रोन खुद द्वार पर आए और रिले के अंतिम स्थल पर आयोजित समारोह में राजकुमारी आन्ने भी उपस्थित हुई ।

मशाल रिले जब लंदन के पूर्वी भाग में स्थित ग्रीनविच के प्रायद्वीप चौक पर पहुंची , तो वहां अग्नि कुंड को प्रज्ज्वलित करने की रस्म आयोजित हुई । इस के उपरांत मशाल रिले लंदन की गतिविधि समाप्त कर आगे के पड़ाव यानी फ्रांस के पैरिस शांति का संदेश पहुंचाने चली जाएगी ।

पेइचिंग ओलिंपिक मशाल रिले लंदन में अपनी कार्यवाही संपन्न करके 7 मार्च को फ्रांस के शहर पेरिस पहुंची । 7 तारीख को पेरिस के प्रतीकात्मक वास्तु निर्माण यानी एफेर टावर के नीचे से रिले की शुरूआत होगी । इस भव्य रस्म के स्वागत में फ्रांस के पूर्व प्रधान मंत्री , सीनेटर श्री जेन.पिएर . राफिरिन ने 6 तारीख को विशेष कर एफेर टावर के नीचे चीनी संवाददाताओं को इंटरव्यू दिया और कहा कि उन्हें बड़ी खुशी हुई है कि ओलिंपिक पेइचिंग में आयोजित होगा । उन्हों ने कहाः

हालांकि पेरिस को 2012 ओलिंपिक के आयोजन का अवसर नहीं मिला , लेकिन मुझे बड़ी खुशी हुई है कि ओलिंपिक चीन में भी होगा । विश्व के सभी देशों को औलिंपिक आयोजित करने का अधिकार है । चीनी जनता को भी ओलिंपिक का आयोजन करने का अधिकार है । 2008 पेइचिंग ओलिंपिक निश्चय ही चीनी व विश्व युवा का शानदार खेल समारोह होगा । ओलिंपिक का आयोजन चीन द्वारा खुलेपन की नीति लागू करने की अभिव्यक्ति है , साथ ही ओलिंपिक भावना की व्यापकता का महत्व व्यक्त होगा ।


ये रहा रिपोर्ट का- असल लिंक.

चाइना रेडियो इंटरनेशनल ने ल्हासा में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एकतरफ़ा रिपोर्टों का एक विशेष पन्ना भी तैयार किया है. नज़र डालने पर पता चलेगा कि राज्यनियंत्रित मीडिया सच्चाई से कितने कोस दूर होता है.

लंदन के बाद पेरिस में भी हंगामा होने के बाद चाइना रेडियो का स्वर थोड़ा बदला, लेकिन फिर भी सच्चाई से कोसों दूर. बाद की रिपोर्टों में 'पवित्र अग्नि' के पथ में बाधा डालने के लिए प्रदर्शनकारियों को लानत दी गई है.

रविवार, मार्च 30, 2008

एक बुशल गेहूँ, एक बुशल टमाटर

बुशल टोकरीख़बरों की दुनिया में घूमते हुए कई ऐसी चीज़ें सामने आती हैं, जिन्हें विस्तार से जानने की या तो ज़रूरत नहीं होती या फिर ज़रूरत होने पर भी उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता है. इकाइयों या यूनिट्स के मामले में भी ऐसा ही होता है. लेकिन आम प्रचलन में ऐसी कई इकाइयाँ हैं जिनके बारे में जिज्ञासा रखने पर बड़ी ही रोचक जानकारियाँ मिलती हैं. कुछ महीनों पहले मेरी नज़र से ऐसी एक इकाई गुजरी थी- तोरिनो. इसके बारे में विस्तार से जानने का अनुभव रोमाँचक रहा था.

पिछले दिनों गेहूँ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती क़ीमत के बारे में एक ख़बर पढ़-सुन रहा था. पता चला कि पश्चिमी देशों में उत्पादक के स्तर पर गेहूँ के व्यापार में किलोग्राम या क्विंटल या टन नहीं बल्कि बुशल(Bushel) नामक इकाई प्रयुक्त की जाती है. (ठीक उसी तरह जैसे तेल के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लीटर-किलोलीटर नहीं बल्कि गैलन-बैरल का इस्तेमाल होता है.) सच कहें तो न सिर्फ़ गेहूँ बल्कि बाक़ी खाद्यान्नों, फलों आदि के लिए भी बुशल का ही उपयोग किया जाता है. बुशल दरअसल एक निश्चित आकार की टोकरी होती है(अमरीका में 64 पाइंट, जबकि ब्रिटेन में 8 गैलन आयतन के बराबर) जिसे किसी सूखे कृषि उत्पाद से भर कर उस उत्पाद की एक व्यापारिक इकाई तय की जाती है. मतलब हर उत्पाद के लिए एक बुशल का मतलब अलग-अलग होगा. उदाहरण के लिए अमरीका में एक बुशल गेहूँ या सोयाबीन का वज़न 60 पाउंड निश्चित किया गया है, जबकि एक बुशल में 48 पाउंड सेब और 53 पाउंड टमाटर आते हैं.

टीईयू

इसी तरह साइंटिफ़िक अमेरिकन के अप्रैल 2008 अंक में परमाणु तस्करी के ख़तरों के बारे में एक लेख पढ़ते हुए बार-बार TEU नामक इकाई सामने आई. ये दरअसल ग्लोबलाइज़ेशन को आसान बनाने वाली एक प्रमुख चीज़ कंटेनर से जुड़ी हुई है. जैसा कि सर्वविदित है, आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ैरपेट्रोलियम पदार्थों का ज़्यादातर व्यापार कंटेनरों में होता है. लेकिन व्यापार बढ़ने के साथ-साथ कंटेनर भी अलग-अलग आकार में आने लगे हैं. लेकिन हिसाब-क़िताब की सहूलियत के चलते इस मामले में भी एक मानक तय किया गया है- TEU या Twenty-foot Equivalent Unit. यानि सबसे ज़्यादा प्रचलित 20 फ़ुट लंबे कंटेनर को मानक माना गया है. साइंटिफ़िक अमेरिकन के लेख से ही उदाहरण लें तो वर्ष 2007 में दुनिया भर में जहाज़ों के ज़रिए लगभग 30 करोड़ TEUs ढोए गए. और यदि एक व्यस्त बंदरगाह की बात करें तो न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी बंदरगाह पर प्रतिदिन औसत 10 हज़ार TEUs की आमद होती है.

यूटीसी/जीएमटी

यूनिटों की बात को आगे बढ़ाएँ तो अंतरराष्ट्रीय मानक समय को UTC(Universal Time Coordinated या Coordinated Universal Time) कहा जाने लगा है. हालाँकि गणना के तरीके की महीनियों पर नहीं जाएँ तो UTC और GMT(Greenwich Mean Time) के बीच व्यावहारिक स्तर पर कोई अंतर नहीं है. दिलचस्प बात ये है कि यूटीसी की देखरेख पेरिस से होती है, जबकि जीएमटी को लंदन स्थित ग्रीनिच से सँभाला जाता है.

सेंटीग्रेड/सेल्सियस

इसी तरह तापमान की सर्वमान्य इकाई को 'डिग्री सेंटीग्रेड' की जगह 'सेल्सियस' कहा जाने लगा है. बारीकियों पर ध्यान नहीं दें तो व्यावहारिक तौर पर दोनों हैं लगभग एक समान ही. इकाई के रूप में 'सेंटीग्रेड' के 'ग्रेड' का सौवाँ हिस्सा होने का भ्रम बनता है, जबकि 'ग्रेड' तो कोण की इकाई होती है. सेल्सियस इकाई की व्यवस्था के ज़रिए तापमानों को लेकर व्यापक शोध करने वाले Anders Celsius नामक स्वीडिश वैज्ञानिक को सम्मानित भी किया गया है. ध्यान रहे कि अधिकतर बड़े मीडिया संस्थानों ने सेल्सियस से पहले 'डिग्री' शब्द लगाने की बाध्यता ख़त्म कर दी है.

मंगलवार, मार्च 11, 2008

एक भूगर्भशास्त्री का मोबाइल फ़ोन

मोबाइल फ़ोनों का चलन इतना व्यापक हो गया है कि आधुनिकता से दूर माने जाने वाले किसी इलाक़े में भी कुछ लोग ऐसे ज़रूर मिल जाते हैं जो संचार के इस क्रांतिकारी साधन को भलीभाँति जानते हैं. लेकिन स्टेटस-सिंबल के रूप में महँगे और दसियों अतिरिक्त सुविधाओं से लैस मोबाइल फ़ोन लेकर चलने वालों में से भी कुछ ही को पता होता है कि आख़िर यह बेतार-यंत्र काम कैसे करता है. जानने की कोई ज़रूरत भी नहीं है.

लेकिन यदि किसी भूगर्भशास्त्री को उसके मोबाइल फ़ोन सेट के बारे में पूछें तो वो गर्व से बताएगा कि धरती की कोख से निकले कितने तत्वों की सहायता से काम करता है यह स्मार्ट यंत्र. आप भी जानिए एक भूगर्भशास्त्री के मोबाइल फ़ोन को-

1.एबीएस और पॉलिकार्बोनेट-Acrylonitrile Butadiene Styrene/Polycarbonate alloy- इस पदार्थ का उपयोग मोबाइल फ़ोन का बाहरी प्लास्टिक आवरण बनाने में होता है. एक मोबाइल फ़ोन के ABS/PC आवरण के निर्माण में लगभग दो किलोग्राम पेट्रोलियम का इस्तेमाल होता है. एबीएस की तरह ही पॉलिकार्बोनेट भी एक हल्का प्लास्टिक उत्पाद है, लेकिन कहीं ज़्यादा मज़बूत, इसलिए अपेक्षाकृत महँगा भी.

2. ताँबा- मोबाइल फ़ोन के इलेक्ट्रॉनिक सर्किट का महत्वपूर्ण अंग ताँबे का बना होता है. ताँबे की ख़ासियत है कि इसे किसी भी रूप में ढाल सकते हैं, और यह बिजली का बेहतरीन सुचालक भी है. इन्हीं दो गुणों के कारण सर्किट की बारीक संचार व्यवस्था के लिए ताँबा उपयुक्त माना जाता है. यह मानव को सबसे पहले ज्ञात धातुओं में से है. प्राचीन सभ्यताओं के ईसा पूर्व 8700 के ताम्र आभूषणों के अवशेष मिल चुके हैं. इस समय चिली दुनिया के एक तिहाई ताँबे का उत्पादन करता है.

3. काँच- पाषाण युग में पहली बार मानव ने ज्वालामुखी से निकले नैसर्गिक काँच को काटने के एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया होगा. कृत्रिम काँच बनाने की विधि मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यता में सामने आई, जब किसी ने भट्टे में पड़े रेत को काँच के मनके के रूप में परिवर्ति पाया. किसी स्तरीय मोबाइल फ़ोन के कैमरे की लेंस में उच्च कोटि के काँच का उपयोग किया जाता है, जो कि आज भी रेत में पाए जाने वाले सिलिका से ही बनाया जाता है.

4. अल्युमिनियम- इसका उपयोग भी ताँबे की ही तरह ही मोबाइल फ़ोन के इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में होता है. अल्युमिनियम भी बिजली का बढ़िया सुचालक है, लेकिन ताँबे के मुक़ाबले 65 प्रतिशत ही. इसके बावजूद चूँकि अल्युमिनियम ताँबे के मुक़ाबले बहुत हल्का और बहुत सस्ता है, इसलिए मोबाइल फ़ोनों में इसकी भी मौजूदगी होती है. धरती के गर्भ में भारी मात्रा में अल्युमिनियम है, लेकिन बॉक्साइट के रूप में. बॉक्साइट से अल्युमिनियम बनाने की विधि 1827 में खोजी जा सकी. चीन, रूस, कनाडा और अमरीका अल्युमिनियम के बड़े उत्पादकों में से हैं.

5. लोहा- मोबाइल फ़ोन के महँगे मॉडलों का बाहरी आवरण आमतौर पर स्टेनलेस स्टील का होता है, जो कि लोहा, कार्बन और क्रोमियम के मिश्रण से तैयार होता है. क़रीब 6000 साल पहले मिस्र के लोगों द्वारा लोहे का इस्तेमाल किए जाने के सबूत उपलब्ध हैं.

6. सिलिकॉन- अपने मूल रूप में सिलिकॉन मोबाइल फ़ोन के माइक्रोचिप और लिक्विड क्रिस्टल डिस्पले में प्रयुक्त होता है. जबकि इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में इसका उपयोग डाइऑक्साइड के रूप में होता है. धरती की ऊपरी सतह में सबसे ज़्यादा मात्रा में पाया जाने वाला तत्व सिलिकॉन ही है.

7. निकेल- इस धातु का उपयोग मोबाइल फ़ोन के माइक्रोफ़ोन में होता है. इसकी खोज 1751 में तब हुई जब कुपरनिकल(शैतानी ताँबा) नामक एक अयस्क से ताँबा निकालने की कोशिश हो रही थी. जब एक्सेल फ़्रेडरिक को अपने प्रयास में ताँबे की जगह एक श्वेत धातु मिला तो उसने इसे ओल्ड निक(शैतान) नाम दिया था. आज दुनिया का 30 प्रतिशत निकेल कनाडा के एक ऐसे इलाक़े से आता है जहाँ 1.85 अरब साल पहले एक बड़े उल्का-पिंड की टक्कर से धरती पिचक गई थी.

8. टिन- टिन की सहायता से ही प्राचीन मानव ने कांस्य युग में कदम रखा था. मोबाइल फ़ोन में इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्ज़ों को सही जगह टिका कर रखने के लिए टिन की सोल्डरिंग की जाती है. चीन और इंडोनेशिया टिन के बड़े उत्पादक हैं. माना जाता है कि अगले 40-50 वर्षों में दुनिया में टिन के ज्ञात स्रोत समाप्त हो जाएँगे.

9. लिथियम- बिग बैंग के दौरान अस्तित्व में आए कुछेक तत्वों में से एक माने जाने वाले लिथियम का उपयोग मोबाइल फ़ोन की बैटरी में इलेक्ट्रोलाइट के रूप में होता है.

10. कोबाल्ट- मोबाइल फ़ोन की बैटरी के कैथोड छोर(ऋणाग्र) में कोबाल्ट लगा होता है. विटामिन बी12 में भी इसका अंश होता है, जबकि इसके एक अन्य रूप कोबाल्ट-60 का रेडियोथेरेपी में उपयोग होता है.

11. ग्रैफ़ाइट- मोबाइल फ़ोन की लिथियम ऑयन बैटरी के एनोड छोर(धनाग्र) में इसका उपयोग होता है. ग्रैफ़ाइट को कार्बन के सर्वाधिक स्थाई रूपों में गिना जाता है. ग्रैफ़ाइट को उच्चतम स्तर का कोयला भी मान सकते हैं, लेकिन ईंधन के रूप में इसका इस्तेमाल नहीं होता क्योंकि इसमें आग लगाना लगभग असंभव है.

शुक्रवार, फ़रवरी 29, 2008

लीप वर्ष का जादू

कहते हैं तारीख़ डायरी का एक पन्ना मात्र होती है. तीन मार्च हो या नौ अप्रैल या फिर 15 नवंबर, यदि कोई तिथि किसी कारण आपकी ज़िंदगी में किसी मील के पत्थर के समान नहीं हो या किसी ख़ास याद से नहीं जुड़ी हो तो शायद ही आप उसकी नोटिस लेंगे. यानि अधिकांश तारीख़ें बिना अपना महत्व जताए आती-जाती रहती हैं. सिर्फ़ एक तारीख़ ही इसका अपवाद है- 29 फ़रवरी...हर चौथे साल कैलेंडर पर दिखने वाला एक विशेष दिन.

लीप वर्ष का अतिरिक्त दिन 29 फ़रवरी इसलिए महत्वपूर्ण है कि ये प्रकृति द्वारा...सौर मंडल और इसके नियमों के सौजन्य से आता है. ये धरती के सूर्य की परिक्रमा करने से जुड़ा हुआ है.

जैसा कि स्कूलों में शुरू से ही बताया जाता है, धरती को सूरज का एक चक्कर लगाने में 365.242 दिन लगते हैं. मतलब एक कैलेंडर वर्ष से चौथाई दिन ज़्यादा. इसीलिए हर चौथे साल कैलेंडर में एक दिन अतिरिक्त जोड़ना पड़ता है. इस बढ़े दिन वाले साल को लीप वर्ष या अधिवर्ष कहते हैं. ये अतिरिक्त दिन ग्रेगोरियन कैलेंडर में लीप वर्ष का 60वाँ दिन बनता है, यानि 29 फ़रवरी.

यदि 29 फ़रवरी की व्यवस्था नहीं हो तो हम हर साल प्रकृति के कैलेंडर से लगभग छह घंटे आगे निकल जाएँगे, यानि एक सदी में 24 दिन आगे. ऐसा होता तो मौसम को महीने से जोड़ कर रखना मुश्किल हो जाता. मसलन यदि लीप वर्ष की व्यवस्था ख़त्म कर दें तो आजकल जिसे मई-जून की सड़ी हुई गर्मी कहते हैं वैसी 'सूरज तपता धरती जलती' की स्थिति 500 साल बाद दिसंबर में आएगी.

ईसा पूर्व 46 में जूलियस सीज़र द्वारा लाए गए जूलियन कैलेंडर में लीप वर्ष की व्यवस्था की गई. उन दिनों कैलेंडर का अंतिम महीना फ़रवरी होता था, जोकि सबसे छोटा महीना भी था. इसलिए अतिरिक्त दिन फ़रवरी में जोड़ा गया. जूलियस सीज़र ने मौसम को महीने से ठीक-ठीक मिलाने की कोशिश में उस साल यानि 46BC में कुल 90 अतिरिक्त दिन भी जोड़े..यानि कुल 445 दिनों का वर्ष जिसे ख़ुद सीज़र ने 'भ्रम का अंतिम वर्ष' कहा था.

हालाँकि 42BC में पहला लीप वर्ष अपनाए जाने के बाद भी भ्रम बना रहा, जब जूलियस सीज़र के किसी अधिकारी की ग़लती के कारण हर तीसरे साल को लीप वर्ष बनाया जाने लगा. इसे 36 साल बाद ठीक किया जूलियस के उत्तराधिकारी ऑगस्टस सीज़र ने. उसने तीन लीप वर्ष बिना किसी अतिरिक्त दिन जोड़े गुजर जाने दिए और 8AD से दोबारा हर चौथे साल लीप वर्ष को नियमपूर्वक लागू करना सुनिश्चित किया.

लेकिन जूलियन कैलेंडर को लागू किए जाने के बाद भी एक कमी रह गई थी. जिसे दूर किया लुइजि गिग्लियो ने. गिग्लियो ने 1580 के आसपास ये सिद्ध किया कि प्रकृति की घड़ी के साथ पूरी तरह ताल मिला कर चलने के लिए हर चौथे वर्ष एक दिन जोड़ने की व्यवस्था में कुछ अपवाद लगाने होंगे. उसने कहा कि कोई वर्ष जो कि 4 से विभाजित होता हो, उसमें फ़रवरी 29 दिन का होगा. लेकिन यदि 4 से विभाजित साल 100 से भी विभाजित होता है तो उसमें फ़रवरी 28 दिन का ही होगा. इसके ऊपर गिग्लियो ने एक और व्यवस्था दी, वो ये कि 4 और 100 से विभाजित होने वाला साल यदि 400 से भी विभाजित होता हो तो उसे लीप वर्ष माना जाए. इसीलिए 1700, 1800 और 1900 जहाँ सामान्य वर्ष माना गया, वहीं 2000 को लीप वर्ष का सम्मान मिला.

पोप ग्रेगोरि के आदेश के बाद कैथोलिक देशों ने संशोधित जूलियन कैलेंडर या नए ग्रेगोरियन कैलेंडर को 1582 में लागू किया. नए कैलेंडर में साल का अंतिम महीना फ़रवरी नहीं, बल्कि दिसंबर निश्चित किया गया.(हालाँकि लीप वर्ष का अतिरिक्त दिन फ़रवरी के लिए ही रहने दिया गया.) उस साल नए कैलेंडर लागू करने की प्रक्रिया में 5 से 14 अक्टूबर की तारीख़ ग़ायब करनी पड़ी. इसी तरह जब 1752 में ब्रिटेन और उसके अधीनस्थ देशों ने अंतत: ग्रेगोरियन कैलेंडर अपनाया तो उन्हें उस साल 3 से 13 सितंबर की तिथियाँ हटानी पड़ीं.

लेकिन इसके बाद भी सर्वमान्य ग्रेगोरियन वर्ष अभी सौर वर्ष से 27 सेकेंड बड़ा है. मतलब कैलेंडर में कोई सुधार नहीं किया गया तो दस हज़ार साल बाद हम प्रकृति के कैलेंडर से तीन दिन आगे होंगे. यानि इससे बचने के लिए कोई 3236 साल बाद एक बार फ़रवरी को 30 दिन का बनाना पड़ सकता है.
लीप्लिंग थे मोरारजी देसाई
क़ानून में 29 फ़रवरी को लेकर बड़ी ही अज़ीबोग़रीब स्थिति है. कई देशों में ऋण से जुड़े अदालती फ़ैसलों में इसके अस्तित्व तक को नकार दिया गया है. इस दिन पैदा हुए लोगों (लीपर्स या लीपलिंग्स) ने हर साल अपना जन्मदिन मनाने के लिए एक अतिरिक्त जन्मदिन तय कर रखा होता है- आमतौर पर 28 फ़रवरी या 1 मार्च. (अपने स्वर्गीय प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भी 29 फ़रवरी को ही पैदा हुए थे.)

नौकरीपेशा लोगों को लीप वर्ष में एक अतिरिक्त दिन काम करना पड़ता है, वो भी बिना किसी अतिरिक्त वेतन के. शायद इसीलिए ब्रिटेन में नौकरीपेशा लोगों ने 29 फ़रवरी के बदले एक दिन का अतिरिक्त अवकाश घोषित करने के लिए प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर एक माँग पत्र डाला है.

ये तो हुई लीप वर्ष की बात. यानि एक ऐसा प्रयास जो सूरज के साथ क़दम मिला कर चलने की कोशिश है. लेकिन एक पचड़ा लीप सेकेंड का भी है. ये हमें प्रकृति से भी कहीं ज़्यादा सटीक 'टाईमकीपर' बनाने के दावे के साथ शुरू किया गया है. लीप सेकेंड के पचड़े पर चर्चा फिर कभी.

शुक्रवार, फ़रवरी 01, 2008

चाँद छूने के बाद (भाग-2)

चंद्रोदयइस लेख के पहले हिस्से में हमने चाँद पर क़दम रखने वाले लोगों में से सात के बारे में पढ़ा. आइए बाक़ी के पाँच मूनवॉकर के बारे में जानते हैं कि धरती से इतर किसी ज़मीन पर क़दम रखने की उपलब्धि हासिल करने के बाद उनकी ज़िंदगी कैसी रही-

8. जेम्स इरविन, अपोलो 15 (30 जुलाई 1971)
इरविन की मानें तो चाँद पर क़दम रखने के साथ ही उनका ईश्वर से साक्षात्कार हुआ था. भगवान से इस मुलाक़ात ने उनकी ज़िंदगी को बदल कर रख दिया. धरती पर वापस लौटते ही उन्होंने नासा छोड़ दिया. वे न सिर्फ़ धर्म की शरण में आ गए, बल्कि High Flight Foundation नामक एक संगठन की स्थापना भी की जो कि ईसाइयत की विभिन्न शाखाओं को साथ लेकर चलती है. इस संगठन का नेतृत्व करते हुए वो चार बार मिशन लेकर तुर्की गए Noah's Ark की खोज करने. यानि उस नौका के अवशेष ढूंढने जो कि मिथकों के अनुसार महाप्रलय के दौरान ईश्वरीय निर्देश पर तत्कालीन दुनिया के एकमात्र सदचरित्र व्यक्ति नोह और उसके परिवार तथा प्रमुख जीव प्रजातियों को बचाने के लिए बना था. इरविन को इस मिथकीय नौका को ढूँढ निकालने के अपने प्रयास में हर बार नाकामी ही मिली. इरविन का 1991 में निधन हुआ.

9. जॉन डब्ल्यू यंग, अपोलो 16 (21 अप्रैल 1972)
यंग छह बार अंतरिक्ष यात्राएँ करने वाले पहले व्यक्ति बने. ये रिकॉर्ड अभी भी उनके नाम है. चंद्रयात्रा के बाद 32 साल तक वे नासा के साथ रहे और 74 साल की उम्र में 2004 में सेवानिवृति ली. अत्यंत प्रतिभावान यंग ने नासा के 50 वर्षों के इतिहास में लगभग सभी प्रमुख परियोजनाओं में अपना योगदान दिया. उनके साथी अंतरिक्षयात्रियों की मानें तो यंग विनम्रता की प्रतिमूर्ति हैं.

10. चार्ल्स ड्यूक, अपोलो 16 (21 अप्रैल 1972)
ड्यूक को चाँद पर जा कर इतनी ख़ुशी हुई कि उन्हें वहाँ हेलमेट उतारने की इच्छा पर काबू करने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी. चंद्रयात्रा के बाद वे बोरियत का शिकार हो गए. उन्होंने नासा को छोड़ दिया और ढेर सारा पैसा बनाने का फ़ैसला किया. उन्होंने बीयर के धंधे में ख़ूब पैसा बनाया भी. लेकिन बोरियत एक बार फिर उन पर हावी हो गई, और वे दिन-रात बीयर में डूबे रहने लगे. उनकी पत्नी डॉटि को भी ड्यूक पर चंद्र की कुदृष्टि पड़ने का अहसास हुआ. उन्होंने चंद्रयात्रा के बाद ड्यूक के ग़ुस्सैल हो जाने और परिवार से दूर काम में ही मशगूल रहने की शिकायत की. इन सबके बीच डॉटि भी नशाखोरी में डूब गई. लेकिन बाद में वह ईश्वर की शरण में आ गई. इसके बाद ड्यूक ने भी बीयर का धंधा छोड़ धर्म की राह पकड़ ली. इस तरह अंतत: पति-पत्नी चंद्रमा के अभिशाप से मुक्त हुए. अब दोनों ईसाइयत का प्रचार करते हैं, लोगों को सदकर्म के लिए प्रेरित करते हैं.

11. यूजिन कर्नेन, अपोलो 17 (11 दिसंबर 1972)कर्नेन
कर्नेन चंद्रमा पर उतरने वाले ग्यारहवें लेकिन चंद्र सतह पर चलने वाले अंतिम व्यक्ति हैं. दरअसल वापसी के दौरान वे बारहवें मूनवॉकर श्मिट के बाद अपोलो चंद्र मॉड्यूल में वापस लौटे थे. कर्नेन 1975 में प्राइवेट सेक्टर में आ गए, लेकिन नासा की परियोजनाओं में योगदान देते रहे. कर्नेन मानव अंतरिक्ष मिशन के बड़े पैरोकारों में से हैं. वर्षों से वे चाँद पर दोबारा मानव मिशन भेजे जाने के साथ-साथ मंगल ग्रह पर भी मनुष्य को पहुँचाने के लिए जनमत बनाने का प्रयास करते रहे हैं.

12. हैरिसन जैक श्मिट, अपोलो 17 (11 दिसंबर 1972)
चाँद पर उतरने वाले बारहवें व्यक्ति और एकमात्र वैज्ञानिक श्मिट 1975 में नासा को छोड़ कर राजनीति में आ गए. वे 1977 में अमरीकी सीनेट के लिए चुने गए. लेकिन अगले कार्यकाल के लिए नहीं चुने जाने पर 1982 में उन्होंने राजनीति को नमस्कार कह दिया. अब उनका समय हीलियम-3 पर रिसर्च में बीतता है. माना जाता है कि चाँद पर बहुतायत में उपलब्ध हीलियम-3 भविष्य में ऊर्जा का स्वच्छ स्रोत साबित हो सकता है.