रविवार, मई 31, 2009

ग्लोबल वार्मिंग का मुक़ाबला सफ़ेदी पोत के

स्टीफ़न चूग्लोबल वार्मिंग की समस्या से पार पाने के लिए तरह-तरह के ऊपाय बताए जाते हैं, जैसे- जैव ईंधन का कम प्रयोग, जल विद्युत और नाभिकीय ऊर्जा को बढ़ावा, सस्ते और टिकाऊ सौर-पैनलों का विकास आदि-आदि. लेकिन अमरीका के ऊर्जा मंत्री डॉ. स्टीफ़न चू ने ग्लोबल वार्मिंग को कम करने का जो रास्ता सुझाया है वो सबसे रोचक है. चू साहब का कहना है कि लोग अपने घर की छतों को सफ़ेद रंग से रंग दें, और शहरों के फ़ुटपाथों को हल्के रंग का बना दिया जाए तो ग्लोबल वार्मिंग में पर्याप्त कमी की जा सकती है.

स्टीफ़न चू कोई जॉर्ज बुश टाइप बुद्धिजीवी नहीं हैं, बल्कि वे एक जाने-माने वैज्ञानिक हैं. उनके नाम 1997 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी है. इसलिए उनकी बातों को दुनिया ओबामा प्रशासन की नीति के साथ-साथ गंभीर वैज्ञानिक विचार के तौर पर भी लेती है.

छतों पर सफ़ेदी पोतने का चू का सुझाव पिछले हफ़्ते लंदन में आया जहाँ वे जलवायु परिवर्तन की समस्या पर 20 नोबेल विजेता वैज्ञानिकों की बैठक से पहले मीडिया को संबोधित कर रहे थे.

डॉ. चू का कहना है कि छतों और फ़ुटपाथों को सफ़ेद या हल्के रंग का रूप देने से ऊर्जा का संरक्षण होने के साथ-साथ एक बड़े क्षेत्र से सूर्य के प्रकाश को सीधे परावर्तित करना संभव होगा.

अपनी बात को विस्तार देते हुए चू ने कहा, "यदि कोई भवन वातानुकूलित है तो उसकी छत पर सफ़ेदी करने के बाद ये पहले से कहीं ज़्यादा ठंडा हो सकेगा. यानि उस भवन में 10 से 15 प्रतिशत कम बिजली की ज़रूरत होगी."

"इसी तरह छतों-फ़ुटपाथों पर सफ़ेदी पोत कर आप धरती की परावर्तक सतह का स्वरूप बदल सकते हैं. इसे ज़्यादा परावर्तक बना सकते हैं. ताकि सूर्य का प्रकाश नीचे आए और तुरंत वापस अंतरिक्ष में जाए. धरती पर ग्रीनहाउस की स्थिति में योगदान दिए बिना."

अमरीकी ऊर्जा मंत्री ने आगे कहा, "आपको अभी हँसी आ रही हो, लेकिन यदि आप सारे मकानों की छतों पर सफ़ेदी पोत दें, और यदि सारे फ़ुटपाथों को भी काले के बजाय कंक्रीट टाइप रंग का बना दें, और ऐसा एकरूपता से करें...तो ऐसे में कार्बन उत्सर्जन में इतनी कमी हो सकेगी जितनी कि दुनिया की सारी कारें 11 वर्षों की अवधि में उत्सर्जित करती हैं. ऐसे समझें कि मानो 11 साल तक एक भी कार न चली हो."

डॉ. स्टीफ़न चू सफ़ेदी के दायरे को छतों और फ़ुटपाथों से भी आगे बढ़ा कर कारों को भी उसके भीतर लाना चाहते हैं. उनका कहना है- "यदि सभी कारों को सफ़ेद या हल्के रंगों में रंग दिया जाए तो अच्छा-ख़ासा पैसा बचाया जा सकता है क्योंकि तब उनकी एयरकंडीशनिंग की डाउनसाइज़िंग हो सकेगी. इससे एयरकंडीशनिंग ज़्यादा असरदार भी हो जाएगी, और ऊर्जा का अपेक्षाकृत कम उपयोग करना पड़ेगा."

चू साहब अपनी इस तरक़ीब को 'जियोइंजीनियरिंग' का एक बढ़िया उदाहरण बताते हैं. हालाँकि इस बात का जवाब उनके पास नहीं है कि चारों ओर सफ़ेद-सफ़ेद ही दिखने से मानव सौंदर्य बोध का क्या होगा! इसके अलावा सपाट छतों की तो कोई बात नहीं, लेकिन जहाँ तक यूरोप की बात है तो वहाँ के छप्परनुमा छतों के रंग-रूप को लेकर कई देशों में स्थानीय नियम-क़ानूनों में प्रावधान बने हुए है. अधिकांश स्थानीय निकाय उन छतों की सफ़ेदी की इजाज़त नहीं देते जो कि राह चलते नज़र आती हों.

मान लीजिए दुनिया भर की सरकारें ज़्यादातर छतों की सफ़ेदी पर सहमत हो भी जाती हैं तो क्या ये सचमुच में ग्लोबल वार्मिंग की समस्या का प्रभावी समाधान है? आप ख़ुद विचार करें, यदि आपको बता दिया जाए कि धरती की सतह का मात्र डेढ़ प्रतिशत शहरों और महानगरों के रूप में है.

यहाँ ये उल्लेखनीय है कि ऊर्जा मंत्री के रूप में स्टीफ़न चू के कई फ़ैसलों की पर्यावरणवादियों ने जलवायु को नुक़सान पहुँचाने वाला बताते हुए आलोचना की है. इन फ़ैसलों में अमरीका में नए कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों के निर्माण पर रोकटोक हटाना, हाइड्रोजन ईंधन चालित वाहनों के विकास के लिए सरकारी फ़ंडिंग में कटौती, परमाणु कचरा भंडारण की एक योजना के लिए फ़ंडिंग ख़त्म करना आदि. चू का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने का सबसे प्रभावी और आसान तरीक़ा है- ऊर्जा दक्षता. भवनों के बेहतर डिज़ायन और छतों-फ़ुटपाथों की पुताई इसी ऊर्जा दक्षता के अंतर्गत आते हैं.

गुरुवार, अप्रैल 30, 2009

स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियों के ख़तरे


स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियाँ कितनी ख़तरनाक होती हैं, इसका अहसास किसी परिजन या मित्र से ये सुनने पर होता है कि अमुक दवाई, फलाँ साइड-इफ़ेक्ट के कारण बिल्कुल नहीं लेनी चाहिए. किसी दवाई के सर्वविदित या लगभग शत-प्रतिशत सेवनकर्ताओं में होने वाले साइड-इफ़ेक्ट(जैसे कफ़-सिरप पीने के बाद आप नींद महसूस कर सकते हैं) के बारे में दावा किया जा रहा हो तो बात समझी जा सकती है, लेकिन किसी दवाई की पैकिंग पर छपी चेतावनी या फिर डिब्बे के भीतर रखे पर्चे पर छपी बातों के आधार पर कोई ठोस राय बना लेना थोड़ा अटपटा लगता है. ऐसे लोग सुनना नहीं चाहते कि किसी दवा विशेष का कोई साइड-इफ़ेक्ट संभव है लाखों में से एक सेवनकर्ता को झेलना पड़ता हो, या हो सकता है मात्र क़ानूनी झमेलों से बचने के लिए कुछ चेतावनियाँ लिखी गई हों.

इसी मुद्दे पर इस हफ़्ते 'फ़ाइनेंशियल टाइम्स' के पत्रिका खंड में छपा आलेख विचारणीय है. इसका शीर्षक है- 'आख़िर क्यों स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियाँ नुक़सानदेह हो सकती हैं?' लेख की शुरुआत ही कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में 25 साल पहले हुए एक अध्ययन की चर्चा से होती है. इस अध्ययन के लिए कुछ वोलंटियर चाहिए थे. इस वास्ते दिए गए विज्ञापन में साफ़ किया गया कि ये मस्तिष्क पर बिजली के प्रभाव से जुड़ा अध्ययन है, जिसमें भाग लेने वालों के सिर पर इलेक्ट्रोड लगा कर उसमें विद्युत प्रवाहित की जाएगी. विज्ञापन में साफ़-साफ़ ये चेतावनी भी दी गई कि अध्ययन में भाग लेने वालों को गंभीर सिरदर्द का सामना करना पड़ सकता है.

स्पष्ट चेतावनी के बाद भी शोधकर्ताओं को ये देख कर ख़ुशी हुई कि कुल 34 छात्र अध्ययन का हिस्सा बनने के लिए सामने आए. अध्ययन की समाप्ति के बाद उनमें से दो तिहाई छात्रों ने सिरदर्द की शिकायत की. हालाँकि सच्चाई ये थी कि उनमें से किसी के सिर पर लगे इलेक्ट्रोडों में बिजली प्रवाहित नहीं की गई थी. दरअसल ये मस्तिष्क पर बिजली के प्रभाव के बारे में अध्ययन था ही नहीं. अध्ययन इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए था कि क्या बीमारी की सोच मात्र ही किसी स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बना सकती है? ज़ाहिर है अध्ययन में इसका जवाब 'हाँ' के रूप में सामने आया.

वैज्ञानिकों की भाषा में स्वस्थ व्यक्तियों को अस्वस्थता का भान कराने वाले इस प्रभाव को नोसीबो प्रभाव कहते हैं. Nocebo यानि Placebo का उलट शब्द. दोनों ही लैटिन से आए शब्द हैं, हालाँकि प्लेसीबो जहाँ बहुत पहले से हमारे बीच है वहीं नोसीबो कुछ साल पहले ही चिकित्सा के पेशे से बाहर प्रचलन में आया है. प्लेसीबो का शाब्दिक अर्थ है- 'मैं ख़ुश करूँगा', जबकि नोसीबो का- 'मैं नुक़सान करूँगा'.

प्लेसीबो नए उपचारों, नई दवाओं को परखने के लिए काम में आता है. किसी अध्ययन में कुछ वोलंटियर को सचमुच की दवा दी जाती है, जबकि कुछ को दवारहित गोली या प्लेसीबो. जिन्हें प्लेसीबो दी जाती हैं उन्हें यही बताया जाता है कि अध्ययन में शामिल सभी लोगों को सचमुच की दवा दी जा रही है. बाद में विशेषज्ञ इन दोनों उपसमूहों का अध्ययन कर वास्तविक दवा के असल प्रभाव और साइड-इफ़ेक्ट्स का आकलन कर पाते हैं. (पश्चिम के चिकित्सकों का एक समूह संपूर्ण होम्योपैथी को प्लेसीबो प्रभाव मात्र मानता है.) दूसरी ओर यदि नोसीबो सिद्धांत की व्याख्या एक पंक्ति में की जाए तो वो कुछ इस तरह की होगी- 'बीमार होने की सोचो, बीमार बनो.'

नोसीबो प्रभाव हमारे बीच इतना व्याप्त है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ ये मानने लगे हैं कि खाद्य-पदार्थों से जुड़ी एलर्जी, मोटापा, पीठ का दर्द, थकान और विद्युत-संवेदनशीलता(जैसे-मोबाइल पर देर तक बातें करने के दौरान मस्तिष्क पर विद्युतीय क्षेत्र के कथित असर से सिरदर्द) जैसी इक्कीसवीं सदी की कई चर्चित बीमारियों का काफ़ी कुछ श्रेय इसको देते है. दवाइयों के साथ आने वाली चेतावनियों के साथ-साथ नोसीबो प्रभाव को फैलाने में बीमारी विशेष के ख़तरों के बारे में चलाए जाने वाले जागरुकता अभियानों तथा अपने उत्पाद बेचने के लिए दवा कंपनियाँ द्वारा बनाए जाने वाले डर के माहौल का भी पूरा योगदान होता है. इस समय कई देशों में फैल चुके स्वाइन फ़्लू का ही उदाहरण लें तो ग़ौर करने वाली बात है कि सरकारें अपने नागरिकों को कितना प्रोएक्टिव होकर ऐहतियाती उपायों की घुट्टी पिला रही हैं(सार्वजनिक स्थलों पर जाने से बचें, दरवाज़े का हैंडल छूने के बाद हाथ को धोएँ आदि), या सर्जिकल-मास्क बनाने वाली कंपनियाँ किस तरह अपने उत्पाद को फ़्लू से बचने के कारगर उपाय के रूप में बाज़ार में ठेले जा रही हैं(हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मुखावरण फ़्लू वायरस फैलाने से आपको भले ही कुछ हद तक रोक लें, वायरस के आप तक पहुँचने में अवरोध नहीं बन सकेंगे).

बहुत से लोग ये सामान्य-सी बात स्वीकार करने को तैयार नहीं कि कई अस्थाई शारीरिक लक्षण किसी स्वस्थ व्यक्ति की ज़िंदगी का आम हिस्सा होते हैं. मसलन सिरदर्द आते-जाते रहते हैं. किसी रात नींद नहीं आती है, तो किसी दिन आँखें खोले रखना मुश्किल होता है. कभी हम हल्के-फुल्के मूड में होते हैं, तो कभी मिज़ाज ख़राब होता है. इन अनुभवों पर हम ज़्यादा ध्यान नहीं देते, बशर्ते तबीयत ख़राब होने के लक्षण ढूंढने की सनक न चढ़ी हो. परंतु किसी को अपनी तबीयत ठीक होने पर संदेह हुआ नहीं कि वह रात में नींद नहीं आने को अनिद्रा रोग, थकान को कमज़ोरी और ख़राब मूड को अवसाद का नाम देने को बिल्कुल तैयार मिलेगा! एक बार किसी बीमारी की चपेट में आने का झूठा यक़ीन होते ही तरह-तरह की चिंताएँ भी घेर लेती हैं. और ये तो माना हुआ तथ्य है कि अतिशय चिंता(भले ही बेमतलब की क्यों न हो)उच्च रक्तचाप और कमज़ोर प्रतिरक्षण प्रणाली के प्रमुख कारणों में से है.

शनिवार, मार्च 28, 2009

बड़ी संख्याओं की बड़ी दुनिया

बड़ी संख्याओं की अपनी ही एक बड़ी दुनिया है. इस दुनिया में मिलियन, बिलियन और ट्रिलियन जैसी भारी-भरकम संख्याओं की चर्चा होती है. पहले मिलियन-बिलियन से ऊपर की संख्याएँ आम समाचारों में कभी-कभार ही दिखती थीं, लेकिन हाल के दिनों में ट्रिलियन या खरब वाले आंकड़े मीडिया में रोज़ाना दिखने लगे हैं. कारण है पूरी दुनिया ख़ास कर पश्चिमी देशों को अपनी चपेट में ले चुका वित्तीय संकट. एक उदाहरण- 'अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वित्तीय संस्थाओं को संभालने के लिए एक ट्रिलियन डॉलर की अतिरिक्त व्यवस्था करने की घोषणा की.'

बड़ी संख्याओं को बड़ा बनाता है शून्य या ज़ीरो. किसी संख्या में जितने ज़्यादा शून्य, उतना ही उसका वज़न. हालाँकि इसका अपवाद ज़िम्बाब्वे में देखा जा सकता है. ज़िम्बाब्वे के डॉलर में पिछले कुछ महीनों के दौरान नियमित रूप से अतिरिक्त शून्य जुड़ता रहा, लेकिन नोट की क़ीमत फिर भी घटती ही गई क्योंकि मुद्रास्फीति की दर भयानक रूप से तेज़ रही. इस साल के शुरू में ज़िम्बाब्वे में डॉलर की एक करेंसी में 1 के आगे 11 शून्य लगाए गए थे, यानि- 100,000,000,000.

पिछले दिनों ऑक्सफ़ार्ड विश्वविद्यालय के गणितज्ञ Marcus Du Sautoy का एक लेख ब्रितानी अख़बार गार्डियन में छपा, जिसमें बड़े अंकों पर बड़ी रोचक जानकारी दी गई है. प्रस्तुत है एक अंश-

0 (शून्य)-

अंकों की दुनिया में काफ़ी देर से शामिल किया गया था शून्य को. सातवीं सदी में भारतीय गणितज्ञों द्वारा प्रचलन में लाए जाने तक शून्य को अंक तक का दर्जा नहीं दिया गया था. (भारत को 1 से 9 तक के अंकों के संकेतों का भी जनक माना जाता है जिनके ज़रिए तमाम संख्याएँ बनती हैं. इस व्यवस्था को अरबी-हिंदू अंक प्रणाली कहा जाता है.) शून्य को यूरोप लाया इतालवी गणितज्ञ फ़िबोनाचि ने 12वीं सदी में. शुरू में शून्य को इटली में संदेह के साथ देखा गया और 1299 में फ़्लोरेंस की सरकार ने इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था.

जहाँ तक भारत की बात है तो संस्कृत के प्राचीन शास्त्रों से पता चलता है कि शुरू से ही भारत में गणना और बड़ी संख्याओं के प्रति रुझान रहा है. ललितविस्तार नामक ग्रंथ के एक आख्यान में बताया गया है कि कैसे एक बार गौतम बुद्ध को 1 से लेकर 421 शून्य वाली संख्या तक को गिनाने के लिए कहा गया था.

10 (दस)-

गणना के लिए 10 अंकों वाले आधार के उपयोग के पीछे बुनियादी कारण है हमारे हाथों में 10 अंगुलियों का होना. लेकिन इसके बाद भी सभी सभ्यताओं को 10 के आधार पर गणना करना रास नहीं आया. प्राचीन बेबिलोनिया में 60 के आधार पर गणना का चलन था. उसकी छाप आज तक नहीं मिटी है. जैसे- 60 सेकेंड, 60 मिनट, वृत के 360 डिग्री आदि.

1,000,000 (एक मिलियन/दस लाख)-

इस संख्या तक आकर साफ़ पता चल जाता है कि अरबी-हिंदू अंक प्रणाली कितनी ज़्यादा व्यवस्थित और प्रभावशाली है. प्राचीन रोमन गणितज्ञ बड़ी होती जाती संख्याओं को अलग-अलग अक्षरों से दर्शाते थे- 100 के लिए C, 500 के लिए D, 1000 के लिए M आदि. (एक मिलियन सेकेंड बराबर क़रीब साढ़े ग्यारह दिन!)

1,000,000,000 (एक बिलियन/एक अरब)-

ब्रिटेन में पहले इस संख्या को 1000 मिलियन कहा जाता था, जबकि एक अरब एक-मिलियन-मिलियन (1 के आगे 12 शून्य) को कहा जाता था. लेकिन अमरीकी अंक प्रणाली से समानता के दबाव के चलते 1974 में सरकार ने फ़ैसला किया कि आगे से सरकारी आंकड़ों में 1 के आगे 9 शून्य लगाने से बने अंक को ही बिलियन कहा जाएगा.

बिलियन में 9 या 12 शून्यों के भ्रम के पीछे फ़्रांस का हाथ माना जाता है. सन 1480 में फ़्रांस ने बिलियन के लिए 1 के आगे 12 शून्यों की व्यवस्था की, जिसे बाद में ब्रिटेन ने भी अपना लिया. लेकिन 17वीं सदी में आकर फ़्रांस ने बिलियन से 3 शून्य हटा दिए यानि मात्र 9 शून्य ही रखे, जिसे अमरीका ने अपनाया. लेकिन 1948 में फ़्रांस ने फिर से अपनी पुरानी व्यवस्था को अपना लिया. (गणना के इस अलग-अलग तरीके को 'लाँग स्केल- शॉर्ट स्केल' के विवाद के रूप में जाना जाता है.)

1,000,000,000,000 (एक ट्रिलियन/दस खरब)-

बिलियन के भ्रम के बाद ट्रिलियन का भ्रम तो बनना ही था.(दरअसल मिलियन से आगे हर बड़ी संख्या को लेकर एकाधिक नामावली प्रचलन में हैं.) लेकिन बुरा मानें या भला, गिनती का अमरीकी तरीका स्टैंडर्ड बनता जा रहा है और अमरीका में 1000 बिलियन से एक ट्रिलियन बनता है. यानि भारतीय अंक प्रणाली में 10 खरब.(एक ट्रिलियन सेकेंड का मतलब हुआ 31,709 साल.)

1,000,000,000,000,000 (एक क़्वाड्रिलियन/एक पद्म)-

गणितज्ञ इस संख्या को 10 पर पॉवर 15 के रूप में जानते हैं. दस के पॉवर के रूप में आई संख्या एक के बाद आने वाले शून्य को दर्शाती है. जैसे- 10 पर पॉवर 2 का मतलब हुआ 1 के आगे दो शून्य, यानि 100.

अमरीका और ब्रिटेन में जिसे क़्वाड्रिलियन कहा जाता है उसे यूरोप बिलिआर्ड के नाम से भी जानता है. वित्तीय संसार की बात करें तो डेरिवेटिव नाम इन्स्ट्रुमेंट की कुल मात्रा आधा क़्वाड्रिलियन डॉलर बताई जाती है ,यानि पूरे विश्व के वार्षिक उत्पाद के दस गुना के बराबर. शायद इसीलिए कुछ विश्लेषक डेरिवेटिव बाज़ार को कभी भी फट सकने वाला टाईम बम बताते हैं.

10 पर पॉवर 100 (एक गूगोल)-

इस नंबर का नामकरण 1938 में एक नौ वर्षीय बच्चे मिल्टन सिरोटा ने किया. उसके चाचा ने उसे 1 के आगे 100 शून्य लगाने के बाद बनी संख्या का नाम रखने को कहा था. इंटरनेट सर्च इंजन गूगल का नाम भी इसी संख्या से लिया गया है.

316470269330...66697152511-

ये अब तक ज्ञात सबसे बड़ी अभाज्य संख्या है. एक महाकंप्यूटर की सहायता से ढूंढी गई इस संख्या में 1 करोड़ 30 लाख अंक हैं. पिछले साल अगस्त में मिली इस संख्या को लिखने के लिए 30 मील लंबा पेज चाहिए. अगर कोई इसके हर अंक को बोल कर पढ़ना चाहे तो उसे दो महीने लगेंगे. एक करोड़ से ज़्यादा अंकों वाली अभाज्य संख्या की खोज पर एक लाख डॉलर का इनाम घोषित था. इसी कड़ी में अगला इनाम है डेढ़ करोड़ डॉलर का 10 करोड़ से ज़्यादा अंकों वाली अभाज्य संख्या की खोज पर.

यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड सदियों पहले बता गए हैं कि चाहे जितने अंकों तक की कल्पना करो, उतने अंकों की अभाज्य संख्या का अस्तित्व है.

एक ज़िलियन-

अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़े किसी बच्चे से वृहतम संख्या की बात करें तो शायद वो एक ज़िलियन की बात करे. लेकिन ज़िलियन दरअसल कोई संख्या विशेष नहीं है. शब्दकोशों में आ चुके इस शब्द का मतलब है अनंत अंकों वाली कोई महासंख्या. ये शब्द अमरीकी लेखक डैमन रुनयन की कल्पना की उपज है.

इनफ़िनिटी या अनंत-

किसी बहुत ही होशियार बच्चे से वृहतम संभव संख्या के बारे में सवाल करें तो शायद उसका जवाब हो- इनफ़िनिटी. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक इनफ़िनिटी को अगम या अबूझ के तौर पर देखा जाता था, लेकिन 1874 में Georg Cantor नामक गणितज्ञ ने साबित किया कि इनफ़िनिटी कई प्रकार के हो सकते हैं- कुछ छोटे, कुछ बड़े. यहाँ तक कि उसने इनफ़िनिटी-इनिफ़िनिटी के बीच जोड़-घटाव और गुना-भाग को भी संभव बताया. इस खोजबीन की क़ीमत भी उसे ही चुकानी पड़ी. उसने ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा जर्मनी की एक मानसिक आरोग्यशाला में बिताया.

शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009

वैलेंटाइन्स डे का बढ़ता विरोध

मैं न तो दिलजला हूँ, और न ही बजरंग दल या तालेबान जैसे गुटों से मुझे कोई सहानुभूति है. हाँ, 14 फ़रवरी को जिस तरह बाज़ारवाद नंगा होकर नाचता है, उसे देख कर थोड़ी चिढ़ ज़रूर होती है. ऐसे में बाज़ारवाद का मंगलगान करने में सबसे आगे रहने वाले अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल में वैलेंटाइन्स डे के विरोध पर एक लेख पा कर हार्दिक प्रसन्नता हुई. इसमें बताया गया है कि अमरीका में क्रिसमस के बाज़ारीकरण से चिढ़ने वालों की भी बड़ी संख्या है, लेकिन बाज़ारवाद के जिस उत्सव के ख़िलाफ व्यवस्थित तरीक़े से एक आंदोलन खड़ा होता दिखता है, वो है- वैलेंटाइन्स डे.

अमरीकी लेखिका जेनिफ़र ग्राहम के इस लेख के ज़रिए ही जब ई-कार्ड के थोक भंडार अमेरिकन ग्रीटिंग्स की वेबसाइट पर गया तो वहाँ एन्टी-वैलेंटाइन्स-डे या एन्टी-वैल कार्ड की भारी मौजूदगी को देख कर सुखद आश्चर्य हुआ.(वैसे, ये भी बाज़ारवाद का ही कमाल है!)

वॉल स्ट्रीट जर्नल के लेख में दिए गए आँकड़ों की बात करें तो भारी आर्थिक मंदी में जकड़े होने के बाद भी अमरीकी इस वैलेंटाइन्स डे के मौक़े पर 14 अरब डॉलर ख़र्च कर रहे हैं. ये कोई आम अटकलबाज़ी नहीं है, बल्कि नेशनल रिटेल फ़ेडरेशन का अनुमान है. यह राशि मुख्यत: कार्डों, फूलों और उपहारों पर और रेस्तराँ में ख़र्च की जा रही है. क्रिसमस के बाद साल में सबसे ज़्यादा कार्ड वैलेंटाइन्स डे(बहुतों के लिए एन्टी-वैल डे) पर ही बिकते हैं. जबकि फूलों की बिक्री के हिसाब से तो पहले नंबर पर वैलेंटाइन्स डे ही है.

लेखिका जेनिफ़र के शब्दों में ही कहें तो वैलेंटाइन्स डे अस्पष्टता से परिभाषित एक ऐसा दिन है जब (क्यूपिड के)तीर की नोक पर लोग अपने अंतर्मन में बसी भावनओं को व्यक्त करने के लिए बाध्य किए जाते हैं. बहुतों को तो असल के अभाव में बनावटी भावनाओं का प्रदर्शन करना पड़ता है. इसीलिए आश्चर्य नहीं कि बहुत से लोग इस दिन को FAD या Forced Affection Day कहते हैं.

वैलेंटाइन्स डे का विरोध करने वालों में कई वर्ग के लोग शामिल हैं, जिनमें प्रमुख हैं- अविवाहित लोग जिन्हें रोमाँस पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिया जाना पसंद नहीं, अभिभावकों का वर्ग जो कि वैलेंटाइन्स डे पर बच्चों द्वारा किए जाने वाले ख़र्च से परेशान रहते हैं और आनंदपूर्वक समय बिता रहे वैसे विवाहित/अविवाहित युगल जिन्हें प्रेम का प्रदर्शन करने की बाध्यता बिल्कुल रास नहीं आती.

इस वैलेंटाइन्स डे विरोधी गुट का लाभ उठाने के लिए भी करोड़ों डॉलर का बाज़ार तैयार हो चुका है. एन्टी-वैल कार्डों की चर्चा पहले ही हो चुकी है. हर अमरीकी शहर में कम-से-कम ऐसा एक रेस्तराँ या बार ज़रूर है जहाँ 14 फ़रवरी को 'क्यूपिड-इज़-स्टूपिड' टाइप थीम पार्टी रखी जाती हैं.

कई जगह मौक़े का फ़ायदा उठाने में आगे रहने वाले फ़िटनेस सेंटर या व्यायामशालाओं में एन्टी-वैल मुक्केबाज़ी सेशन रखा जाता है. इस दौरान वहाँ संबंध-विच्छेद के तनाव से पार पाने के गुर सिखाए जाते हैं. एक तरीका है अपने छूट चुके प्रेमी/प्रेमिका की तस्वीर पर घूंसे बरसाना. इसी तरह ऊन बनाने वाली एक कंपनी जिमी बीन्स वूल ने तो फ़रवरी का महीना एन्टी-वैल युवतियों को समर्पित करते हुए लाल या गुलाबी रंग की जगह पूरे महीने सिर्फ़ नीले रंग के ऊन को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है.

इतना ही नहीं पेटीशन्सऑनलाइन नामक वेबसाइट पर किसी ने वैलेंटाइन्स डे का आयोजन बंद कराने के लिए एक याचिका भी डाल दी है, जिसका शीर्षक है- End Valentine's Day. हालाँकि इस लेख को लिखे जाने तक 68 लोगों ने ही याचिका पर हस्ताक्षर किए थे.

शनिवार, जनवरी 31, 2009

उपग्रहीय चित्रों का बेवज़ह डर

पिछले दिनों अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के शपथ-ग्रहण समारोह के समय की उपग्रहीय तस्वीर सार्वजनिक की गई. इसमें जहाँ वाशिंग्टन डीसी के राजपथ पर उमड़े जनसैलाब का विहंगम दृश्य चकित करने वाला लगता है. वहीं यदि कोई चाहे तो चित्र से उसे सुरक्षा व्यवस्था का भी अंदाज़ा लग सकता है. मसलन छोटे आकार में यहाँ प्रस्तुत उस तस्वीर में देखा जा सकता है कि कैपिटल बिल्डिंग के ठीक पीछे किस पोज़ीशन में एक हेलीकॉप्टर तैयार खड़ा है.

चित्र साभार जिओआईयह विहंगम दृश्य जिस बड़ी तस्वीर का हिस्सा है उसे जिओआई नामक कंपनी ने ओबामा के शपथ ग्रहण करने के कुछ घंटों बाद जारी किया था. कंपनी अपने ग्राहकों को 50 सेंटीमीटर तक की स्पष्टता वाले उपग्रहीय चित्र उपलब्ध कराती है.

जिओआई की वेबसाइट पर वाशिंग्टन डीसी की ही नहीं, बल्कि अमरीका के अधिकतर बड़े स्टेडियमों, विश्वविद्यालयों, बाँधों के साथ-साथ सैनिक-असैनिक हवाईअड्डों की भी तस्वीरें मिल जाती हैं. अमरीका के अलावा दुनिया के अन्य हिस्सों की रोचक तस्वीरें भी उपलब्ध हैं. कुछ साल-दो साल पुरानी तस्वीरें, तो कुछ बस हफ़्ते-महीने भर पुरानी. जिओआई ने पिछले साल नवंबर में सोमालिया के तट पर बंधकों के क़ब्ज़े में खड़े सुपर टैंकर सीरियस स्टार का काफ़ी स्पष्ट चित्र जारी किया था.

जिओआई की तरह की ही एक और कंपनी है- डिजिटल ग्लोब. दोनों कंपनियाँ 'गूगल अर्थ' जैसे वेबटूल के साथ-साथ तमाम तरह के उपयोगों के लिए उपग्रहीय चित्र उपलब्ध कराती हैं. इनमें से हर एक की मौजूदा क्षमता प्रतिदिन औसत 10 लाख वर्गकिलोमीटर ज़मीन को स्कैन करने की है.

गूगल अर्थ को लेकर रह-रह कर विवाद उठता रहता है. भारत में ये विवाद कुछ ज़्यादा ही होता है. कुछ साल पहले राष्ट्रपति भवन की तस्वीर गूगल अर्थ पर पहली बार देखे जाने के बाद भारत में बहस छिड़ गई थी कि आतंकवादी उस चित्र विशेष का इस्तेमाल हमले की योजना बनाने के लिए कर सकते हैं. मुंबई पर हुए हमले में शामिल चरमपंथियों के गूगल अर्थ की सहायता लेने की बात सामने आने के बाद तो इस वेबटूल को लेकर डर का माहौल बनाने की ज़ोरदार कोशिशें की गईं. जबकि आतंकवादियों ने इस वेबटूल के अलावा जीपीएस और ब्लैकबेरी जैसे कई हाईटेक उपकरणों का भी इस्तेमाल किया था. तो क्या इन उपकरणों पर भी रोक न लगा दी जाए! गूगल अर्थ पर निशाना साधने वालों ने ये सोचने की ज़रूरत नहीं समझी कि यदि कुछ साल पुरानी तस्वीरें दिखाने वाले गूगल अर्थ पर रोक लगा दी भी जाए, तो जिओआई और डिजिटल ग्लोब जैसी कंपनियों का क्या करेंगे जिनका मुख्य धंधा है- ताज़ा उपग्रहीय तस्वीरें बेचना?

आतंकवादियों और अपराधियों के डर से विज्ञान प्रदत्त सुविधाओं पर रोक लगाना समस्या का स्थायी समाधान हो ही नहीं सकता है. याद कीजिए उस समय को जब 'फ़ोटो खींचना मना है' वाले निषेधात्मक बोर्ड का कोई मतलब होता था. पहले कॉम्पैक्ट कैमरे ने उक्त बोर्ड पर लिखी चेतावनी की गंभीरता को कम किया, फिर डिजिटल कैमरे ने उसे और हल्का बनाया, अंतत: मोबाइल फ़ोनों में लगे कैमरे ने उसे बिल्कुल ही अप्रासंगिक बना दिया.

उपग्रहीय चित्रों पर प्रतिबंध की कोशिशें तो अभी ही लगभग बेअसर है, इसलिए आने वाले दिनों में ऐसी कोशिशों का बिल्कुल अप्रासंगिक होना तय है. आँकड़े भी यही कहते हैं- पिछले दशक में दुनिया की तस्वीरें खींचने के लिए सात निजी उपग्रह छोड़े गए, अगले 10 वर्षों में ऐसे 30 उपग्रह छोड़े जाने हैं. इसके अलावा विभिन्न देशों के जासूसी उपग्रहों की संख्या भी तो लगातार बढ़ती जा रही है.

ये सच है कि हर सार्वजनिक सुविधा या औजार में सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों तरह की संभावनाएँ होती हैं. अधिकतर मामलों में सदुपयोग की संभावनाएँ, दुरुपयोग की संभावनाओं से कई-कई गुना ज़्यादा होती हैं. इसलिए उन पर रोक नहीं लगाई जा सकती है.

टेलीफ़ोन के आविष्कार के समय से ही अपराधी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं- योजनाएँ बनाने में भी, और लोगों को धमकाने या फ़िरौती माँगने में भी. इंटरनेट की सहायता से धोखाधड़ी और जालसाज़ी विश्वव्यापी स्तर पर की जा रही है- नाइजीरिया में बैठा जालसाज़ लॉटरी का सब्ज़बाग दिखा कर भारत के लोगों को ठग रहा है! लेकिन अपराध में इस्तेमाल के आधार पर फ़ोन या इंटरनेट पर रोक की कल्पना भी की जा सकती है?

इंटरनेट पहले-पहल जब विश्वविद्यालयों और विज्ञान संस्थानों से निकल कर आमलोगों के घरों में आया, तो तमाम तरह की आशंकाओं में एक ये भी शामिल थी कि बम और अन्य विस्फोटक अत्यंत सुलभ हो जाएँगे क्योंकि इंटरनेट पर उन्हें बनाने के तरीके आसानी से उपलब्ध हैं. आगे चल कर ये आशंका निराधार निकली. हमेशा से ही आबादी का अत्यंत छोटा अंश अपराधी प्रवृति का रहा है, विस्फोटक बनाने की जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध होने के बाद भी वही स्थिति है.

अपराधियों ने हर काल में नवीनतम जानकारियों का इस्तेमाल किया है, इसलिए ज़ाहिर है आगे भी करते रहेंगे. अच्छी बात ये है कि अपराधियों के हाथों इस्तेमाल की आशंका में विज्ञान ने पहले कभी रास्ता नहीं बदला है. इसलिए आगे भी विज्ञान अपनी राह बढ़ता ही रहेगा, चाहे कितना भी डर फैलाया जाये.