रविवार, दिसंबर 30, 2007

ख़ुशहाली का विज्ञान

वर्षांत के अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने का एक अलग ही सुख है. इस सुखद अनुभव के दौरान कई बार कुछ ऐसे लेख भी मिल जाते हैं, जो कि ज़िंदगी को बेहतर बनाने की क्षमता रखते हैं. मुझे ऐसा ही एक लेख पढ़ने को मिला है जिसका लेखक 'ख़ुशी के प्रोफ़ेसर' के नाम से प्रसिद्ध एक विद्वान है. मेरा आशय हार्वर्ड विश्वविद्यालय के Positive Psychology के प्रोफ़ेसर ताल बेन-शहर से है.

लंदन से प्रकाशित अख़बार गार्डियन ने प्रोफ़ेसर बेन-शहर का एक लेख छापा है जिसका शीर्षक है- "आनंद का अनुभव करो. मैं बताता हूँ कैसे..."

अपने लेख में ख़ुशी के प्रोफ़ेसर ने नए साल की शुरुआत के अवसर पर अपने विशेष लेख में वर्ष 2008 को अपने लिए बेहतर बनाने के चार सरल उपाय बताए हैं. प्रो. बेन-शहर बताते हैं कि आमतौर पर हमारी पीढ़ी पिछली पीढ़ियों से ज़्यादा धनी है, लेकिन हम ज़्यादा ख़ुशहाल नहीं हैं. यदि हम पहले से ज़्यादा धनी हैं, तो फिर हम ख़ुश क्यों नहीं हैं? कोई संदेह नहीं कि ख़ुशहाली धन से नहीं आती, न ही प्रतिष्ठा या स्टेटस से. तो फिर 2008 को पिछले वर्ष से ज़्यादा ख़ुशहाल कैसे बनाया जाए?

सकारात्मक मनोविज्ञान के विशेषज्ञों ने इन सवालों का जवाब गहन अनुसंधानों के ज़रिए ढूंढने की कोशिश की है. प्रो. बेन-शहर का कहना है कि इन अनुसंधानों में चार मुख्य विचार उभर कर सामने आए:-

1. मानव बने रहें-

हमारी संस्कृति में पीड़ा से जुड़ी भावनाओं को नकारात्मक मानने की प्रवृत्ति रही है. इसलिए हममें से बहुतों को लगता है कि चिंता, दुख, उदासी, डर या ईर्ष्या के अनुभव का मतलब है आपके अंदर कुछ कमी का होना. जबकि सच्चाई इसके उलट है. दो ही प्रकार के व्यक्ति पीड़ा से जुड़ी भावनाओं से बच सकते हैं- मनोरोगी और मृत व्यक्ति.

यदि हम चिंता, उदासी या डर जैसी भावनाओं से बचने की कोशिश करते हैं, ख़ुद को मानव बने रहने नहीं देते हैं, तो इसका नुक़सान हमें ही उठाना पड़ता है. क्योंकि इन भावनाओं से बचने की कोशिश में ये और ज़ोर मारती हैं, हमें पहले से ज़्यादा बुरा लगता है. दरअसल भावनाओं के तमाम प्रकार मानव प्रकृति का अभिन्न हिस्सा हैं, जैसे गुरुत्वाकर्षण हमारे ब्रह्मांड का अभिन्न हिस्सा है. एक परिपूर्ण स्वस्थ जीवन जीने के लिए ज़रूरी है कि हम अन्य नैसर्गिक चीज़ों की तरह ही अपनी तमाम भावनाओं को भी स्वीकार करें. अगर आप मानवता को पूर्णता से स्वीकार करना सीख सकें, तो आने वाला साल ही नहीं, बल्कि जीवन का हर वर्ष बेहतर ही होता जाएगा.

2. जीवन को सरल बनाएँ-

नोबेल पुरस्कार विजेता मनोविज्ञानी डैनियल कैनेमन और उनके सहयोगियों ने दिन-प्रतिदन की ज़िंदगी में विभिन्न कामों के असर का अध्ययन किया. उन्होंने जीवन के विभिन्न क्षेत्र की महिलाओं को बीते हुए एक दिन के कार्यकलापों की सूची तैयार करने को कहा. उनसे ये भी लिखने को कहा गया कि वो अलग-अलग कार्यकलापों के दौरान कैसा अनुभव करती हैं. कई दिनों तक ये प्रयोग चलाया गया. महिलाओं ने खाने, काम करने, बच्चे संभालने, यात्रा करने, परिवार से अंतरंग संबंधों आदि की बातें दर्ज कीं. इस अध्ययन में सबसे चौंकाने वाला परिणाम ये था कि आम तौर पर महिलाओं ने अपने बच्चों के साथ बिताए समय के दौरान ज़्यादा आनंद का अनुभव नहीं किया.

इसमें कोई शक नहीं कि महिलाएँ अपने बच्चों को बहुत-बहुत प्यार करती हैं. शायद इतना ज़्यादा प्यार, जितना दुनिया में किसी और चीज़ से नहीं. लेकिन फिर भी छोटी-छोटी बातों, छोटे-छोटे कार्यों के कारण ही ज़िंदगी इतनी जटिल हो जाती है, समय का इतना अभाव रहता है, कि हम आनंददायक कार्यों में भी आनंद नहीं महसूस कर पाते हैं.

आइए इस तथ्य को थोड़ा और आसान बनाते हैं. आपसे आपकी पसंद के दो गाने बताने को कहा जाता है. एक-एक कर दोनों गाने आपको सुनाए जाते हैं और 1 से 10 अंक के बीच उन्हें रेट करने को कहा जाता है. पूरी संभावना है कि आप अपनी पहली पसंद को 10/10 की रेटिंग देंगे, और पसंद नंबर दो को भी 10 नहीं तो 9 या कम-से-कम 8 की रेटिंग ज़रूर ही देंगे. अब दोनों गाने एक साथ बजाए जाते हैं और आपको रेटिंग करने को कहा जाता है...पूरी संभावना है कि आप 10 में 2 या 3 से ज़्यादा नहीं दें.

आपके इर्दगिर्द अच्छी चीज़ों की प्रचूरता हो सकती है, लेकिन जब ख़ुशियों की बात आती है तो अक्सर थोड़े ही में ज़्यादा का अहसास होता है. समय का दबाव अवसाद का एक बड़ा कारण है. हम कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा क्रियाकलापों को अंज़ाम देने की कोशिश करते हैं....और इस प्रक्रिया में हम ख़ुशियों के मौक़े यों ही गँवा देते हैं. चाहे वह काम की ख़ुशी हो, घूमने-फिरने की, संगीत की, नैसर्गिक छटा देखने की, अपने जीवनसाथी या फिर अपने बच्चों के साथ होने की ख़ुशी.

3. नियमित रूप से व्यायाम करें-

न जाने कितने ही अध्ययनों से ये बात ज़ाहिर हो चुकी है कि शारीरिक कसरत का फ़ायदा मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखता है. व्यायाम करने से आप प्रफ़ुल्लित रह सकते हैं. तो क्या व्यायाम करना अवसादरोधी दवा का काम करता है? बेहतर है इसका जवाब इस तरह दिया जाए कि व्यायाम नहीं करना अवसाद का कारण होता है.

व्यायाम करना हमारी ज़रूरत है, और यदि हम इस ज़रूरत को पूरा नहीं करते हैं, तो हमें ही इसकी क़ीमत चुकानी होती है. मानव शरीर अक्रिय बने रहने के लिए, दिन भर कंप्यूटर या टीवी के सामने बैठे रहने के लिए नहीं बना है. विकास के क्रम में मानव शरीर दौड़ कर हिरण का शिकार करने के लिए तैयार हुआ है, या फिर भाग कर भूखे शेर से अपनी जान बचाने के लिए. जो व्यायाम नहीं करते, वो एक महत्वपूर्ण शारीरिक ज़रूरत को अपूर्ण रखते हैं.

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मनोचिकित्सा के प्रोफ़ेसर जॉन रैटे बताते हैं कि व्यायाम से हमारे तंत्रिका तंत्र में norepinephrine, serotonin और dopamine का रिसाव होता है, जोकि दवाओं की तरह हैं. हाँ, ये सही है कि व्यायाम को रामबाण औषधि के तौर पर नहीं लिया जा सकता, और कई बार दवाएँ ज़रूरी भी होती हैं. लेकिन अनेक मामलों में व्यायाम, दवाओं से ज़्यादा असरदार होता है. इसलिए क्यों नहीं इस प्राकृतिक चिकित्सा का फ़ायदा उठायें! व्यायाम के सकारात्मक प्रभावों में आप बढ़े आत्मविश्वास, सक्रिय मस्तिष्क, दीर्घायु, बेहतर नींद, बेहतर सेक्स और शरीर के ज़्यादा प्रभावी प्रतिरक्षण तंत्र को भी गिनें.

4. सकारात्मक पक्ष पर ध्यान दें-

ख़ुशियाँ न सिर्फ़ हमारे जीवन से जुड़ी घटनाओं पर निर्भर करती हैं, बल्कि उन घटनाओं को हम किस तरह लेते हैं उस पर भी बहुत कुछ आधारित होता है. तभी जहाँ ज़िंदगी में सब कुछ हासिल करके भी बहुत लोग नाख़ुश रहते हैं, वहीं बहुत कम पर जीने वाले भी ख़ुशहाल ज़िंदगी बिता रहे होते हैं. हमारी ख़ुशियाँ सिर्फ़ इस बात पर निर्भर नहीं करती हैं कि हमारे पास क्या-क्या है, बल्कि इस बात का भी काफ़ी महत्व होता है कि किसी के पास जो कुछ भी है, वह उसकी कितनी क़द्र करता है.

ख़ुशी की राह में एक बड़ी बाधा इस बात से आती है कि हम जीवन की अच्छी बातों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लेते हैं. कभी-कभी ही ऐसा होता है कि हम अपने अच्छे स्वास्थ्य, अच्छे दोस्तों, अच्छे भोजन को लेकर बहुत ज़्यादा उत्साहित रहते हों. जब बुरा वक़्त आता है, तभी हमें महसूस होता है कि अच्छा वक़्त वास्तव में ईश्वर के आशीर्वाद की तरह होता है. बीमार पड़ने के बाद ही पता चलता है कि कितने भाग्यशाली थे जब तंदरुस्त थे. लेकिन एक बार बीमारी गई नहीं कि हमें फिर अच्छे स्वास्थ्य के आनंद की अनुभूति करने का समय नहीं मिलने लगता है.

तो क्या अच्छे वक़्त की अच्छी अनुभूति हासिल करने के लिए हमें बुरे वक़्त का इंतज़ार करना चाहिए? निसंदेह नहीं. तो क्यों न हम जीवन की अच्छी-अच्छी चीज़ों को लेकर आनंद का अनुभव करने की आदत डाल लें. अच्छे स्वास्थ्य, अच्छे खानपान, अच्छे दोस्तों-परिजनों को लेकर यदि हम आनंदित रहने लगें, तो फिर इन अच्छी बातों को गंभीरता से नहीं लेने की बुरी आदत ख़ुद ही छूट जाएगी.

यदि हम कृतज्ञता को अपनी आदतों में शुमार कर लें, तो हमें आनंदित होने के लिए किसी विशेष अवसर का इंतज़ार नहीं रहेगा...नए साल का भी नहीं. यदि हम आँखें खोल कर देखें तो हमारे इर्दगिर्द की चमत्कारिक दुनिया में हर चीज़ अनूठी लगेगी...हर चीज़, हर बात स्मृतियों में संजोने लायक़ मालूम पड़ेगी, क़ाबिलेतारीफ़ लगेगी...आनंद विभोर होने के अवसर बहुतायत में मिलेंगे.

नववर्ष मंगलमय हो!

रविवार, दिसंबर 16, 2007

गूगल नॉल या गूगलपीडिया


अंतत: गूगल ने अपनी विकिपीडिया शुरू करने की घोषणा कर ही दी. गूगल विकिपीडिया को नॉल(Knol) नाम दिया गया है. नॉल यानि नॉलेज का गूगलावतार!

जैसा कि गूगल की इससे पहले की बड़ी परियोजनाओं या टेकओवर के बारे में होता आया है, नॉल के बारे में भी ख़बर हल्के से लीक की गई. गूगल के एक इंजीनियर यूडि मैनबर ने पिछले हफ़्ते The Official Google Blog पर इस परियोजना की जानकारी सार्वजनिक की.

मैनबर ने नॉल शब्द को नॉलेज की इकाई के रूप में परिभाषित किया है. आइए देखें नॉल परियोजना के बारे में वे और क्या-क्या कहते हैं, ख़ुद मैनबर के ही शब्दों में:

'दुनिया में लाखों लोगों के पास उपयोगी ज्ञान है, जिसका फ़ायदा अरबों लोग उठा सकते हैं. अधिकांश लोग अपने ज्ञान को सिर्फ़ इसलिए बाँट नहीं पाते हैं क्योंकि उनके पास इसका कोई सरल तरीका नहीं है. हमें ऐसा ज़रिया ढूंढने के लिए कहा गया जिसके ज़रिए लोग अपना ज्ञान बाँट सकें. यही हमारा मुख्य उद्देश्य है.'

'हमारा लक्ष्य है किसी ख़ास विषय का ज्ञान रखने वाले व्यक्ति को उस विषय पर एक आधिकारिक आलेख लिखने के लिए प्रेरित करना.'

'नॉल परियोजना के पीछे एक प्रमुख विचार लेखक के नाम को रेखांकित करने का भी है. किताबों के कवर पर ही लेखक का नाम होता है, सामयिक लेखों के साथ लेखक का नाम जाता है और विज्ञान लेखों के साथ तो अनिवार्य रूप लेखक का नाम छपता है. लेकिन वेब का विकास कुछ इस तरह हुआ है कि लेखकों के नाम को प्रमुखता देने का प्रचलन स्थापित नहीं हो पाया. हमें लगता है कि लेखक का नाम देने से लोगों को वेब सामग्री के बेहतर उपयोग में मदद मिलेगी.'

'गूगल लेखन, संपादन आदि के लिए आसान टूल्स उपलब्ध कराएगा. ये नॉल की मुफ्त होस्टिंग की भी व्यवस्था करेगा. आप सिर्फ़ लिखें भर, बाक़ी काम हम करेंगे.'

'किसी विषय विशेष पर नॉल की भूमिका वैसे बुनियादी लेख की होगी, जो कि उस विषय की जानकारी पहली बार ढूंढ रहा कोई व्यक्ति पढ़ना चाहता हो.'

'गूगल नॉल लेखों पर किसी तरह का संपादकीय नियंत्रण नहीं रखेगा, न ही किसी नॉल विशेष की तरफ़दारी करेगा. तमाम संपादकीय नियंत्रण और ज़िम्मेदारी ख़ुद लेखक की होगी. लेखक अपनी साख दाँव पर लगाएगा.'

'हम ये अपेक्षा नहीं करते कि सभी लेख उच्च स्तर के होंग. लेकिन जब एक ही विषय पर अलग-अलग नॉल गूगल सर्च में दिखेंगे तो उनकी रैंकिंग गुणवत्ता के हिसाब से होगी. वेब पेज की रैंकिंग का हमारा अच्छा अनुभव है, और हमें पूरा विश्वास है कि हम इस चुनौतीपूर्ण काम को भी ढंग से संभाल सकेंगे.'

ज़ाहिर है, यदि गूगल उपरोक्त बातों को कार्यान्वित कर पाएगा तो एक बिल्कुल ही नए तरह की विकिपीडिया तैयार हो सकेगी. गूगल नॉल में विकिपीडिया जैसा 'संपादन युद्ध' देखने को नहीं मिलेगा, क्योंकि इसमें सामूहिक संपादन की व्यवस्था नहीं होगी.

गूगल नॉल एक अन्य मामले में विकिपीडिया से बिल्कुल अलग होगा. चूँकि गूगल का बिज़नेस मॉडल वेबजाल के हर पन्ने पर विज्ञापन डालने की कोशिशों को बढ़ावा देता है. इसलिए गूगल नॉल के पन्नों पर भी विज्ञापन डालने की भी गुंज़ाइश होगी. हालाँकि अभी गूगल का कहना है कि विज्ञापन उन्हीं नॉल पन्नों पर होंगे जिसका लेखक इसके लिए ख़ुद हामी भरेगा. नॉल के विज्ञापनों से होने वाली आय का एक हिस्सा लेखक को मिलेगा. (कहने की ज़रूरत नहीं कि इस आय का बड़ा हिस्सा गूगल के पास रहेगा!)

सीमित स्तर पर गूगल की नॉल परियोजना शुरू हो चुकी है. और अगले कुछ महीनों में इसे सबके के लिए खोल दिया जाएगा.

गुरुवार, नवंबर 29, 2007

निद्रा विचार

हम सोते क्यों हैं? लॉस एंजिल्स में दुनिया की पहली नींद प्रयोगशाला की स्थापना के 80 साल बीत जाने और सो रहे लोगों के मस्तिष्क के हरसंभव परीक्षण के बाद भी इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है.

सोना और सपने देखना मानव शरीर के बड़े रहस्यों में शामिल हैं. नींद जीवन के लिए ज़रूरी है, लेकिन ये अब भी एक अबूझ पहेली बनी हुई है.

नींद के कारण ही जीवन का एक बड़ा हिस्सा निठल्ला बीतता है. हम अपनी ज़िंदगी का एक तिहाई हिस्सा सोते हुए गुजार देते हैं. कल्पना कीजिए यदि नींद की ज़रूरत बिल्कुल नहीं होती,...तब एक औसत ज़िंदगी में 25 से 30 वर्षों के बराबर अतिरिक्त समय कामकाज़ के लिए उपलब्ध होता.

अधिकांश लोगों को लगता है कि उन्हें पूरी नींद मयस्सर नहीं होती. इनमें वैसे लोग भी शामिल हैं जिनके पास आलीशान घर और आरामदायक गद्दे हैं. नींद पूरी नहीं होने की शिकायत इतनी आम है कि डॉक्टरों ने नींद के बारे में अत्यधिक चिंता करने को ही बीमारी की श्रेणी में डाल दिया है. डॉक्टरों की मानें तो नींद का सबसे बड़ा शत्रु है नींद पूरी नहीं होने की चिंता.

किसी एक रात पूरी नींद नहीं मिलना कोई चिंता की बात नहीं होनी चाहिए, क्योंकि अधिकांश व्यक्ति अधूरी नींद की भरपाई अगले दिन कर लेता है. लेकिन लगातार अनिद्रा की बात निश्चय ही चिंताजनक है. लगातार दो दिन बिना सोए बिताने का अनुभव याद करें, तो इस बात का भलीभाँति अहसास हो जाएगा कि नींद कितनी ज़रूरी है.

न्यूयॉर्क के डिस्क जॉकी पीटर ट्रिप ने जनवरी 1959 में पोलियो उपचार के अनुसंधान के वास्ते धन जुटाने के लिए बिना सोए ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताने की कोशिश की. ट्रिप 201 घंटे तक नींद को धत्ता बताने में सफल रहा. लेकिन इस दौरान उसकी दशा विक्षिप्तों जैसी हो गई. इतने समय तक सोए बिना रहने के बाद भी वो जीवित तो रहा, लेकिन इस प्रयोग के बाद उसके चाल-चलन, बात-व्यवहार में हमेशा के लिए बदलाव आ गया. वह बाक़ी जीवन में बड़ा ही चिड़चिड़े स्वभाव वाला और असामान्य मनोदशा वाला व्यक्ति साबित हुआ. ट्रिप के रिकॉर्ड को 1964 में तोड़ा रैन्डी गार्डनर नामक एक व्यक्ति ने लगातार 11 दिन जग कर. गार्डनर भी जीवन भर चिड़चिड़ेपन का शिकार रहा.

नींद पर The Independent अख़बार में छपे एक विस्तृत लेख में कई बड़ी-बड़ी दुर्घटनाओं का कारण अनिद्रा को बताया गया है. इनमें चेर्नोबिल परमाणु रिएक्टर दुर्घटना और चैलेंजर स्पेस शटल दुर्घटना शामिल हैं. बड़ी-बड़ी दुर्घटनाओं की छोड़ भी दें तो अधिकतर सड़क दुर्घटनाओं का कारण, चालक के पूरी नींद नहीं लेने को माना जाता है.

नींद के पीछे भले ही ज़िंदगी का एक तिहाई हिस्सा 'बर्बाद' होता हो, लेकिन नींद के जिस हिस्से में सपने आते हों उसे बहुत ही क्रियाशील माना जाता है. पॉल मैकार्टनी ने दावा किया था कि उन्हें बीटल्स के हिट गाने 'येस्टर्डे' का आइडिया एक सपने से जगने के दौरान आया था. रॉबर्ट लुई स्टीवेन्सन ने एक बार कहा था कि डॉ. जेकल और मिस्टर हाइड की कहानी सोते हुए उनके दिमाग़ में आई थी. इसी तरह दिमित्री मेंडिलीव ने दावा किया था कि तत्वों की आवर्त सारणी का विचार तब उनके दिमाग़ में आया था, जब वे अपने डेस्क पर झपकी ले रहे थे.

आज हम 24/7 समाज में रहते हैं, जहाँ हमारी नींद शरीर की जैविक घड़ी से नहीं, बल्कि अलार्म घड़ी से, कृत्रिम प्रकाश से और क्षणिक उत्तेजना देने वाले रसायनों से निर्धारित होती है. इस समाज के एक बड़े वर्ग के लिए हर दिन छह से आठ घंटे की नींद एक ऐसी बात है, जिसका सपना मात्र ही देखा जा सकता है.

रविवार, अक्टूबर 07, 2007

क्या विज्ञान दुनिया को बचा सकता है?

धरती मातादुनिया में कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कई संधियाँ हो चुकी हैं. निजी कंपनियाँ भी ग्लोबल वार्मिंग के ख़िलाफ़ नई-नई घोषणाएँ कर रही हैं. ज़िम्मेदार लोग निजी कारों की बजाय ज़्यादा-से-ज़्यादा सार्वजनिक परिवहन का उपयोग कर, और कम-से-कम हवाई यात्राएँ कर अपना 'कार्बन फ़ुटप्रिंट' छोटा करने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन दुनिया भर में बड़ी संख्या में ऐसे वैज्ञानिक हैं, जो मानते हैं कि मात्र जीवन के रंग-ढंग बदलकर पर्यावरण को हुए नुक़सान की भरपाई नहीं की जा सकती. क्योंकि दशकों की बेफ़िक्री ने जलवायु परिवर्तन की समस्या को बहुत ही जटिल और गंभीर बना दिया है. वैज्ञानिकों की इस जमात का दृढ़ विश्वास है कि जलवायु में कार्बन डाइऑक्साइड की लगातार बढ़ती मात्रा पर विज्ञान के ज़रिए ही रोक लगाई जा सकती है. इस तरह के वैज्ञानिक उपायों को जियो-इंजीनियरिंग (Geo-engineering) का नाम दिया गया है.

संडे ऑब्जर्वर ने उन छह जियो-इंजीनियरिंग उपायों का आकलन किया है, जो कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार पर रोक लगा सकते हैं. आइए इन उपायों पर एक नज़र डालें-

1. समुद्री पम्प-

ब्रिटेन के दो प्रसिद्ध वैज्ञानिकों, क्रिस रैप्ली और जेम्स लवलॉक को पूरा विश्वास है कि समुद्र में बड़ी संख्या में पाइप डाल कर कार्बन डाइऑक्साइड की बड़ी मात्रा को वायुमंडल से अलग किया जा सकता है. उनका कहना है कि पानी के भीतर खड़ा किए गए इन पाइपों से पंप का काम लेते हुए समुद्र की गहराई के ठंडे पानी को सतह तक लाएगा. चूँकि ठंडे पानी में गर्म पानी के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा जीवन पाया जाता है, इसलिए समुद्र के गर्म सतह वाले हिस्सों में अपेक्षाकृत ठंडे पानी को ऊपर ला कर जीवन के ज़्यादा प्रकारों को वायुमंडल के संपर्क में लाया जा सकेगा. ऐसी जीव और पौध प्रजातियाँ बड़ी मात्रा में वायुमंडल के कार्बन डाइऑक्साइड को सोख सकेगी. अपनी उम्र पूरी होने के बाद ये नीचे समुद्र की तलहटी से जा लगेंगी, और इस तरह इनके साथ ही बड़ी मात्रा में कार्बन भी अनंत काल के लिए वायुमंडल से दूर चला जाएगा.

वैज्ञानिक इस उपाय की सफलता की संभावना को 3/5 आँकते हैं. और इसके विरोधियों का कहना है कि इस तरह समुद्र में बड़ी संख्या में पाइपें खड़ी करने से व्हेल और डॉलफ़िन जैसी जीव प्रजातियों को बहुत नुक़सान पहुँचेगा.

2. गंधकीय चादर-

बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों के बाद पूरी धरती का तापमान कम हो जाता है. उदाहरण के लिए 1991 में फ़िलिपींस में माउंट पिनातुबो के फटने के बाद पूरी दुनिया के तापमान में 0.6 प्रतिशत की गिरावट आई थी. वैज्ञानिकों ने ज्वालामुखी विस्फोट से वायुमंडल के मध्यवर्ती हिस्से स्ट्रैटोस्फेअर मे एक करोड़ टन गंधक रसायन के आने को तापमान में गिरावट का कारण बताया. ऐसे में ओज़ोन लेयर पर अपने काम के कारण 1995 में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले वैज्ञानिक पॉल क्रूटज़ेन की तरफ़ से सुझाव आया कि क्यों नहीं माउंट पिनातुबो के उदाहरण को अपनाया जाए! प्रोफ़ेसर क्रूटज़ेन का कहना है कि वायुमंडल में गंधक की एक चादर तैयार कर धरती की सतह पर पहुँचने वाली सूर्य की किरणों की मात्रा को कम किया जा सकेगा. उनका कहना है कि रॉकेटों के ज़रिए स्ट्रैटोस्फेअर में क़रीब दस लाख टन गंधक रसायन पहुँचा कर धरती को ठंडा किया जा सकेगा.

वैज्ञानिक इस उपाय की सफलता की संभावना को 1/5 मानते हैं. इसके विरोधियों का कहना है वायुमंडल में इतनी ज़्यादा मात्रा में गंधक रसायन डालने से अम्लीय वर्षा बढ़ सकती है, और इस उपाय से ओज़ोन सतह को भी नुक़सान पहुँच सकता है.

3. अंतरिक्षीय दर्पण-

सूर्य की विकिरण धरती को गर्म करती है और यहाँ जीवन को संभव बनाती है. लेकिन जैसे-जैसे धरती गर्म होती जा रही है, धरती पर पहुँचने वाली सौर विकिरण की मात्रा को कम करने की आवश्यकता बढ़ती जा रही है. कैलिफ़ोर्निया की लॉरेंस लाइवमोर राष्ट्रीय प्रयोगशाला के भौतिकविद लॉवेल वुड का मानना है कि वायुमंडल में अत्यंत पतले अल्युमिनियम धागे की जाली तान कर बड़ी मात्रा में विकिरण को परावर्तित किया जा सकता है. उनका कहना है कि एक ईंच के दस लाखवें हिस्से की मोटाई वाली अल्युमिनियम की तार की जाली एक विंडो-स्क्रीन का काम करेगी. इससे सूर्य का प्रकाश तो नहीं रुकेगा, लेकिन अवरक्त किरणें ज़रूर परावर्तित हो जाएँगी.

इस उपाय की सफलता की संभावना 1/5 मानी जाती है, और इस पर संदेह करने वालों का कहना है कि सौर विकिरण में एक प्रतिशत की भी कटौती करने के लिए कुल मिला कर छह लाख वर्गमील आकार की जाली ताननी होगी, जिस पर बहुत ही ज़्यादा लागत आएगी.

4. मेघ आवरण-

कोलोराडो के राष्ट्रीय वायुमंडलीय अनुसंधान केंद्र के जॉन लैथम और एडिनबरा विश्वविद्यालय के स्टीफ़न साल्टर का कहना है कि बादलों की मात्रा में चार प्रतिशत की वृद्धि कर धरती पर सौर विकिरण की मात्रा में पर्याप्त कमी लाई जा सकती है. इन दोनों महानुभावों का कहना है कि 'क्लाउड सीडिंग' की 'सीवॉटर स्प्रे' प्रक्रिया के ज़रिए कृत्रिम रूप से बादलों का आवरण तैयार करना आसान है, और इस पर अपेक्षाकृत बहुत कम ख़र्च आएगा.

इस उपाय की सफलता की संभावना 2/5 बताई जाती है, और इसके विरोधियों का कहना है कि बड़ी मात्रा में कृत्रिम बादल पैदा करने से मौसम का पैटर्न गड़बड़ा सकता है.

5. कृत्रिम पेड़-

कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम करने के लिए पेड़ लगाने का तरीका बहुत ही लोकप्रिय है, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक विशेष प्रकार के कृत्रिम पेड़ लगा कर कहीं ज़्यादा कार्बन वायुमंडल से बाहर करने का उपाय खोजा है. इस उपाय का प्रतिपादन सबसे पहले कोलंबिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक क्लाउस लैकनर ने किया. विशेष रसायनों से निर्मित ये पेड़ न बढ़ेंगे, न फलेंगे, न फूलेंगे...लेकिन लैकनर का दावा है कि उनके द्वारा विकसित प्रत्येक कृत्रिम पेड़ वायुमंडल से प्रतिवर्ष 90 हज़ार टन कार्बन डाइऑक्साइड सोख सकेगा. यानि कार्बन डाइऑक्साइड सोखने (Carbon Sequestration) के मामले में कृत्रिम पेड़ एक वास्तविक पेड़ के मुक़ाबले एक हज़ार गुना ज़्यादा कारगर होगा.

वैज्ञानिक इस उपाय की सफलता की संभावना को 4/5 बताते हैं, और इसके विरोधियों का कहना है कि ऐसे पेड़ तैयार करने की प्रक्रिया में वायुमंडल को फ़ायदे की तुलना में नुक़सान ज़्यादा होगा, क्योंकि पेड़ बनाने के कारखानों में ऊर्जा की बहुत ज़्यादा खपत होगी.

6. जल पौध-

समुद्र की सतह पर उतराती सूक्ष्म पौध प्रजातियाँ(Plankton और Algae) कार्बन डाइक्साइड की भक्षक मानी जाती हैं. अपनी उम्र पूरी होने के बाद वे अपने साथ बड़ी मात्रा में कार्बन लिए समुद्र की तलहटी में जा बैठती हैं. यानि समुद्र की सतह पर शैवाल और अन्य सूक्ष्म पौध प्रजातियों की मात्रा बढ़ाओ, कार्बन डाइऑक्साइड की मात्र अपने-आप कम हो जाएगी. अमरीका के वुड्स होल समुद्र विज्ञान संस्थान में हाल ही में एक सम्मेलन में इस उपाय पर व्यापक चर्चा की गई. इस सम्मेलन में अनेक विशेषज्ञों की राय थी कि लौह उर्वरक का इस्तेमाल कर समुद्री पौध प्रजातियों की मात्रा बढ़ाना संभव है. घुलनशील लौह यौगिकों को समुद्र में डालते हुए दुनिया भर में इस उपाय से जुड़े प्रयोग शुरू भी किए जा चुके हैं.

इस उपाय की सफलता की संभावना 2/5 मानी जाती है, और इसके विरोधियों का कहना है कि इस विधि से ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड नहीं सोखा जा सकता, जबकि इससे समुद्र में अत्यंत ख़तरनाक प्रदूषण फैल सकता है.

सोमवार, सितंबर 10, 2007

नए राष्ट्रों की नई खेप

अलग राष्ट्र के गठन की माँग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से उठती ही रहती है. कहीं संघीय सरकार की पकड़ से छूटने की हसरत होती है, तो कहीं अपने समुदाय के बेहतर विकास और सुरक्षा की बात होती है, तो कहीं बिछुड़े हिस्से से जुड़ने की लालसा. नवराष्ट्र के सृजन के लिए विभिन्न समुदाय या तो हिंसक-अहिंसक आंदोलनों को ज़रिया बनाते हैं, या फिर जनमत संग्रह जैसे क़ानूनी रास्तों को अपनाते हैं.

अंग्रेज़ी की पत्रिका Monocle ने उन दस इलाक़ों पर रोशनी डाली है, जो कि निकट भविष्य में सारे अधिकारों से सुसज्जित नए राष्ट्रों के रूप में सामने आ सकते हैं. आइए देखें नवसृजित संप्रभु राष्ट्रों की सूची में शामिल होने की संभावना लिए ये इलाक़े कौन-कौन से हैं-

1. फ़लस्तीन- पश्चिम एशिया या मध्य-पूर्व के संकट का समाधान एक संप्रभु फ़लस्तीनी राष्ट्र की स्थापना से ही संभव हो सकता है. लेकिन दो फ़लस्तीनी धड़ों फ़तह और हमास के बीच के भारी मनमुटाव को देखते हुए एक संयुक्त फ़लस्तीन की जगह दो अलग-अलग राष्ट्रों के उदय की संभावना ज़्यादा बन रही है. ये होंगे पूर्वी फ़लस्तीन यानि फ़तह के नियंत्रण वाला पश्चिम तट, और पश्चिमी फ़लस्तीन या हमास के नियंत्रण वाला गज़ा इस्लामी गणतंत्र. यदि ऐसा हुआ तो शायद इसराइल भी इन राष्ट्रों को परोक्ष रूप से मान्यता दे देगा, क्योंकि एक की जगह दो फ़लस्तीनी राष्ट्रों का वज़ूद उसकी सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर विकल्प साबित हो सकता है.

2. शिन्जियांग- पश्चिमोत्तर चीन के इस इलाक़े के लोगो ने 60 साल पहले भी पूर्वी तुर्केस्तान के नाम से अलग राष्ट्र की माँग ज़ोरशोर से रखी थी. यहाँ कि मुस्लिम उइग़ुर लोग अपनी माँग को लेकर हिंसा पर भी उतारू रहे हैं. लेकिन मौजूदा चीन सरकार आज़ादी की माँग करने वाले इन आंदोलनकारियों को आतंकवादी घोषित कर चुकी है. लेकिन जैसा कि अल्जीरिया में फ़्रांस को सबक मिला था, कि जब आतंकवाद उफ़ान पर होता है तो कितनी भी निष्ठुर सेना हो, उसकी नाक में दम किया जा सकता है.

3. दक्षिणी कैमरून- फ़्रांसीसी भाषी कैमरून के दो अंग्रेज़ीभाषी प्रांतों में एक अलग राष्ट्र की माँग को लेकर एक अहिंसक आंदोलन चल रहा है. कैमरून में तानाशाही जैसा शासन चलाने वाले पॉल बिया अहिंसक आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ दमनकारी क़दम उठाते रहे हैं. यदि दमन बढ़ा या जारी रहा, तो स्वंत्रता की माँग के ज़ोर पकड़ने की पूरी संभावना है.

4. संयुक्त कोरिया गणतंत्र- ये नवस्वतंत्र नहीं बल्कि दो स्वतंत्र राष्ट्रों के संयोग से बनने वाला नवसृजित राष्ट्र होगा. कम्युनिस्ट उत्तर कोरिया की आर्थिक परेशानियों ने उसे परमाणु कार्यक्रम छोड़ने के अमरीकी प्रस्ताव को स्वीकार करने पर मज़बूर किया है. यदि आर्थिक मुश्किलें आगे भी जारी रहती हैं, और वह शरारत के बजाय सहयोग पर राज़ी हो जाता है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि उसका पड़ोसी दक्षिण कोरिया उसे उसी तरह आत्मसात करने पर गंभीरता से विचार करेगा- जैसा कि पश्च्मी जर्मनी ने 1990 में पूर्वी जर्मनी को आत्मसात किया था.

5. कुर्दिस्तान- इराक़ पर अमरीकी हमले का एकमात्र अच्छा परिणाम है वहाँ के कुर्द लोगों की ख़ुशहाली. इराक़ी कुर्द इलाक़ा आमतौर पर हिंसारहित है, वहाँ के राजनीतिक आपसी रंजिशों को ताक पर रख चुके हैं, उनका अपना एयरलाइंस अंतरराष्ट्रीय उड़ाने भर रहा है. कुर्दों को तुर्की सेना की धमकियाँ मिलती रहती हैं, लेकिन यूरोपीय संघ में शामिल होने की आकांक्षा रहते तुर्की कोई परेशानी खड़ा करने से बचेगा. वैसे भी कुर्द पहले इराक़ी इलाक़े में राष्ट्र की नींव डालना चाहेंगे, और संयुक्त कुर्दिस्तान की माँग को आगे के लिए टाल देंगे. ईरान भी अपने परमाणु कार्यक्रम संबंधी अंतरराष्ट्रीय दबाव से जूझने पर ध्यान केंद्रित किए हुए है. अमरीकी हमेशा के लिए इराक़ में रहेगा नहीं, तो ऐसे में एक आज़ाद कुर्दिस्तान की संभावना भरी पूरी लगती है.

6. सोमालीलैंड- सोमालीलैंड सोमालिया को वह हिस्सा है जो कभी ब्रिटिश प्रभुत्व में हुआ करता था. यों तो सोमालीलैंड ने 1991 में आज़ादी का ऐलान कर दिया था, लेकिन उसे अभी भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता का इंतज़ार है. लेकिन हाल के दिनों में सोमालीलैंड ने अपनी अलग सरकार, अलग सेना और अलग न्यायपालिका का गठन कर लिया है. अपनी करेंसी और अलग पासपोर्ट भी जारी किया है. ऐसे में लगता है कि कुछ अफ़्रीकी सरकारें उसे मान्यता देने पर ज़रूर ग़ौर कर रही होंगी.

7. कोसोवा- कोसोवो या कोसोवा पिछले आठ वर्षों से संयुक्तराष्ट्र के संरक्षण में है. यूगोस्लाव नेता स्लोबोदान मिलोसेविच की सेनाओं ने कोसोवो की अल्बानियाई मूल की जनता पर भारी अत्याचार किया था. संयुक्तराष्ट्र ने कोसोवो को एक अलग संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने का एक प्रस्ताव सुरक्षा परिषद के समक्ष रखा है. ज़ाहिर है सर्बिया और रूस को इस प्रस्ताव पर आपत्ति है, और रूस को तो सुरक्षा परिषद में वीटो का भी अधिकार है. ऐसे में आज़ादी की राह में अड़चनें आ सकती हैं. लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय में कोसोवो की आज़ादी को लेकर आमतौर पर सहमति हो तो लगता नहीं कि कोसोवो राष्ट्र की स्थापना को रोका जा सकेगा. और इसका नाम कोसोवा होगा, कोसोवो नहीं. क्योंकि पहला अल्बानियाई उच्चारण है, जबकि दूसरा सर्ब उच्चारण.

8. ताइवान- वैसे तो ताइवान का एक अलग राष्ट्र के रूप में अस्तित्व है, लेकिन आधिकारिक रूप से उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मान्यता नहीं मिली है. क्योंकि चीन उसे अपना अभिन्न हिस्सा मानता है. लेकिन ताइवान के राष्ट्रवादी नेता आज़ादी की खुली घोषणा करने को तैयार बैठे हैं. ऐसा हुआ तो सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या चीन ताइवान के ख़िलाफ़ सैनिक कार्रवाई करने के विकल्प को चुनता है, और चुनता ही है तो क्या अमरीकी ताइवान के समर्थन में आगे आता है.

9. शियास्तान- सिद्धान्तत: इसका कोई कारण नहीं दिखता कि क्यों इराक़ का दक्षिणी शहर बसरा भी दुबई की तरह संपन्न नहीं हो सकता. ब्रिटेन को शिया बहुल दक्षिणी इराक़ में टिके रहने में ज़्यादा लाभ नहीं दिख रहा, जबकि अमरीका को भी इस कबाइली इलाक़े के आंतरिक खींचतान का सिरदर्द ईरान को देने में ज़्यादा ऐतराज़ नहीं होगा.

10. स्कॉटलैंड- स्वतंत्र स्कॉटलैंड की हामी स्कॉटिश नेशनल पार्टी स्कॉटलैंड की क्षेत्रीय संसद में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई है. पार्टी आज़ादी के मुद्दे पर जनमत संग्रह की बात औपचारिक रूप से उठा भी चुकी है. यदि जनमत संग्रह होता है, और उसमें आज़ादी के पक्ष में फ़ैसला आता है, तो स्वतंत्र स्कॉटलैंड की स्थापना को ज़्यादा दिन तक टाल पाना संभव नहीं होगा. यहाँ उल्लेखनीय है कि इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की क्रिकेट और फ़ुटबॉल की टीमें अलग-अलग हैं. इतना ही नहीं, ब्रिटेन में दो तरह की पाउंड करेंसी भी चलती है, जिनमें से एक है- स्कॉटिश पाउंड. हालाँकि बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के पाउंड और रॉयल बैंक ऑफ़ स्कॉटलैंड के पाउंड के लेनदेन या प्रचलन में कोई अंतर नहीं है.