शनिवार, जनवरी 27, 2007

हिंदी साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति

कमलेश्वर जी
आधुनिक भारत के महान साहित्यकारों में से एक कमलेश्वर जी हमारे बीच नहीं रहे. 27 जनवरी 2007 को उन्होंने अंतिम साँस ली.

कमलेश्वर जी संभवत: भारत के एकमात्र साहित्यकार थे जिन्हें विशुद्ध साहित्य और फ़िल्म, दोनों ही क्षेत्रों में पूरी सफलता मिली. साथ ही पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उन्होंने महती काम किया था.

कमलेश्वर जी ने अपनी रचनाओं में कस्बाई और महानगरीय ज़िंदगी, दोनों ही को बहुत बारीकी से उतारा है.

कमलेश्वर जी ने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में काम किया था, लेकिन कहानी की विधा से उन्हें विशेष लगाव था. कहानियों के अलावा उन्हें अपनी कृतियों में उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' बेहद पसंद था.

अभी-अभी उन्होंने इंदिरा गांधी के जीवन पर एक फ़िल्म की पटकथा पूरी की थी. अंतिम दिन तक वो लेखन से जुड़े रहे.

उनको श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत है पिछले साल डॉयचे वेले की नन्दिनी से उनकी बेबाक बातचीत का ऑडियो.

शनिवार, जनवरी 20, 2007

अमरीका को चुनौती, भारत को सीख

उपग्रहभेदी व्यवस्थादोगलेपन के लिए अमरीका को चिढ़ाने का काम कई देश कर सकते हैं और करते भी रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर चुनौती देने का काम दो देश ही कर सकते हैं- रूस और चीन. अमरीकी सामरिक नीतिकारों के लिए ताज़ा चुनौती चीन के तरफ़ से आई है, जो कि भारत के लिए सीख है.

प्रतिष्ठित पत्रिका एविएशन वीक ने 17 जनवरी को अपनी वेबसाइट पर यह रहस्योदघाटन कर सनसनी फैला दी कि चीन ने सप्ताह भर पहले एक उपग्रहभेदी मिसाइल का सफल परीक्षण किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने 11 जनवरी को अपने ही एक बुढ़ा चुके मौसम-उपग्रह को अंतरिक्ष में ही सफलतापूर्वक मार गिराया. चीन ने आधिकारिक रूप से इस बारे में कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन अमरीका तथा ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे उसके पिछलग्गों के खुल कर विरोध जताने से साफ़ है कि चीन स्टार-वॉर्स के क्षेत्र में अमरीका को चुनौती देने की दिशा में पहला क़दम बढ़ा चुका है.

अमरीका को अंतरिक्षीय युद्ध के क्षेत्र में चीन की प्रगति की भनक बहुत पहले लग चुकी थी और पेंटागन ने The Military Power of the People’s Republic of China 2005 नामक अपनी रिपोर्ट में इस बात का खुल का ज़िक्र भी किया था. लेकिन चूँकि रिपोर्ट में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया था, इसलिए तब इस बात का अनुमान नहीं लगाया जा सका था कि चीन को इतनी जल्दी सफलता मिल जाएगी.

इससे पहले किसी उपग्रहभेदी हथियार का परीक्षण अंतिम बार 1985 में अमरीका ने किया था. वह परीक्षण राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन के स्टार-वॉर्स के सपने को साकार करने के प्रयासों के तहत किया गया था. उसके बाद विभिन्न कारणों से (जिनमें से प्रमुख था आर्थिक कारण) अमरीका की अंतरिक्षीय युद्ध नीति में व्यापक बदलाव किया गया, और स्टार-वॉर्स के अपेक्षाकृत सीमित रूप वाले National Missile Defense(NMD) नामक योजना को आगे बढ़ाया गया. इसमें सारा ज़ोर अमरीकी हितों की ओर बढ़ने वाले किसी मिसाइल को रास्ते में ही मार गिराने पर है.

रक्षात्मक उपाय के रूप में पेश की गई NMD योजना ही लगातार शक्तिशाली बनते जा रहे चीन को चिढ़ाने के लिए काफ़ी थी, क्योंकि अमरीका न सिर्फ़ जापान बल्कि ताइवान को भी अपने मिसाइलरोधी कवच के भीतर रखना चाहता है. ग़ौरतलब है कि चीन की नज़र में ताइवान एक विद्रोही प्रांत भर है, और उसका कहना है कि अंतत: ताइवान को चीन का हिस्सा बनना ही पड़ेगा.

चीन ने रूस के साथ मिल कर अंतरिक्ष को हथियार-रहित बनाने के लिए खुल कर अभियान चलाया है, लेकिन पिछले एक दशक के दौरान जब कभी भी इसके लिए किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते की संभावना बनी, अमरीका ने उसमें अड़ंगा लगाने में कोई देर नहीं की. इतना ही नहीं जैसा कि इस ब्लॉग में पिछले साल अप्रैल में विस्तार से ज़िक्र किया गया था, अमरीका ज़्यादा शोर मचाए बिना तरह-तरह के एंटी-सैटेलाइट(एसैट) हथियार बनाने में भी जुटा हुआ है. इन फ़्यूचरिस्टिक हथियारों से हर उस देश को ख़तरा होगा जो कि अमरीका के सुर में सुर मिलाने से इनक़ार करेंगे.

भविष्य में चीन भी निश्चय ही फ़्यूचरिस्टिक अंतरिक्षीय युद्ध लड़ने में सक्षम होगा, लेकिन उसके पहले सफल उपग्रहभेदी हथियार के पीछे बिल्कुल सरल सिद्धांत है- निशाने पर उपग्रह को लो, उसकी सही-सही अवस्थिति सुनिश्चित करो, और उसमें तेज़ गति से बैलिस्टिक मिसाइल टकरा दो. न बारूद, न बम, न लेज़र विकिरण, और न ही कोई आणविक हथियार...सिर्फ़, तेज़ टक्कर मारने वाली मिसाइल यानि Kinetic Kill Vehicle!!

मतलब दुश्मन के उपग्रहों को चकनाचूर करने के लिए चीन को सिर्फ़ अपनी टोही क्षमता पक्की करने की ज़रूरत होगी. इतना भर जानना होगा कि उपग्रह विशेष की अवस्थिति क्या है. बाक़ी, बैलिस्टिक मिसाइल को उपग्रह से टकराने की क्षमता का प्रदर्शन तो उसने कर ही दिया है.

चीन ने धरती से कोई 800 किलोमीटर दूर की कक्षा में स्थापित अपने एक बेकार होते जा रहे उपग्रह को सफलापूर्वक निशाना बनाया स्वविकसित KT-1 बैलिस्टिक मिसाइल से. लेकिन ऐसी ख़बरें भी हैं कि चीन KT-2 और KT-2A पर भी काम कर रहा है. इन बूस्टरयुक्त मिसाइलों के ज़रिए 20,000 किलोमीटर दूर मध्यवर्ती उपग्रहीय कक्षा ही नहीं, बल्कि 36,000 किलोमीटर दूर भूस्थिर कक्षा के उपग्रहों को भी निशाना बनाया जा सकेगा. यदि ऐसा हुआ, तो अमरीका के 40-50 उपग्रहों को निशाना बना कर चीन कुछ ही घंटों के भीतर अमरीकी सैन्य तंत्र को अंधा-गूंगा-बहरा बना सकेगा.

दरअसल हाल के वर्षों में किसी भी लड़ाई में उपग्रहों ने अमरीकी युद्ध मशीनरी के तंत्रिका-तंत्र की भूमिका निभाई है. तस्वीरें उतारने समेत अधिकतर ज़मीनी ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने का काम निचली कक्षाओं में स्थापित उपग्रहों के ज़रिए होता है. (चीनी परीक्षण की भेंट चढ़ा उपग्रह ऐसी ही कक्षा में था.) इससे आगे बढ़ें, तो अत्यंत सटीक क्रूज़ मिसाइलों और अन्य Smart Weapons की जान होते हैं GPS उपग्रह, जो कि धरती से 15,000 से 20,000 किलोमीटर दूर की कक्षा में होते हैं. और आगे बढ़ें तो अमरीका के हाईटेक युद्ध में तीन चौथाई से भी ज़्यादा सैनिक संचार 36,000 किलोमीटर दूर भूस्थिर कक्षा के उपग्रहों पर निर्भर करता है.

चीन की ताज़ा सफलता निश्चय ही अमरीका के लिए चुनौती है. संभव है वो एक बार फिर बैलिस्टिक मिसाइलों को सीमित करने और अंतरिक्षीय युद्ध के डर को समाप्त करने के लिए एक नई अंतरराष्ट्रीय या बहुपक्षीय संधि पर बातचीत के लिए तैयार हो जाए. यदि ऐसा नहीं होता है...तो भारत जैसे चीन के पड़ोसी देश के पास एंटी-सैटेलाइट हथियार विकसित करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाएगा. जैसे, परस्पर विनाश की गारंटी देने वाले परमाणु हथियार भरोसेमंद सुरक्षा का उपाय माने जाते हैं, उसी तरह एंटी-सैटेलाइट मिसाइल भारतीय उपग्रहों की सुरक्षा की गारंटी बन सकेंगे.

शुक्रवार, दिसंबर 29, 2006

उत्पीड़न की अमरीकी शब्दावली

ग्वांतानामो बंदी शिविरआतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमरीका ने कई मान्य परंपराओं और सिद्धांतों को ताक पर रख दिया है. इनमें से एक है युद्धबंदियों और क़ैदियों के साथ मानवीय व्यवहार की सार्वभौम परंपरा.

क़ैदियों के उत्पीड़न का मामला अमरीकी अदालतों में नहीं आ पाए, इसके लिए विदेशी भूमि पर कई जेलें चलाई जा रही हैं. ग्वांतानामो जेल के बारे में तो काफ़ी कुछ सामने आ चुका है, लेकिन अमरीका संचालित अनेक गुप्त जेलों में क्या-क्या होता है, ये सिर्फ़ ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ही जानती है. इन जेलों से छूट पाए कुछ भाग्यशाली पूर्व क़ैदियों की मानें तो वहाँ अंतरराष्ट्रीय क़ायदे-क़ानूनों की कोई जगह नहीं है. क़ैदियों को प्रताड़ित किया जाता है और अमरीकी जेलरों ने इसके लिए अपनी सांकेतिक भाषा भी गढ़ रखी है. स्कॉट्स आल्मनाक 2007 नामक वार्षिक प्रकाशन में इस गुप्त भाषा के कुछ उदाहरण दिए गए हैं-

FUTILITY MUSIC
क़ैदियों के कमरे में लगातार घंटों तक तेज़ आवाज़ में ऐसा संगीत बजाना जो कि उनके लिए अबूझ हो. ख़ास कर वैसे गीतों को चुना जाता है जिनमें हिंसा, हमला आदि की बात हो. लगातार एक ही गीत को अनेक बार बजाने का भी तरीक़ा अपनाया जाता है. संगीत के अलावा जानवरों की आवाज़, डरावनी आवाज़, बच्चों के रोने की आवाज़ आदि का भी इस्तेमाल किया जाता है.

THE BLACK ROOM
बिना खिड़की या रोशनदान वाला कमरा जिसकी दीवारें काली होती हैं. यहाँ क़ैदियों की कुटाई की जाती हैं, उन्हें भद्दी-भद्दी ग़ालियाँ दी जाती हैं.

FORCED GROOMING
क़ैदियों के शरीर के बाल हटा देना. ख़ास कर मुसलमानों के ख़िलाफ़ ये तरीक़ा अपनाया जाता है, जिनके लिए दाढ़ी-मूँछ का धार्मिक महत्व है.

INTERNAL NUTRITION
भूख-हड़ताल कर रहे क़ैदियों को ज़बरदस्ती खाना खिलाना.

SLEEP ADJUSTMENT
क़ैदियों की नींद के पैटर्न को तहस-नहस कर देना.

WATER BOARDING
किसी क़ैदी को पानी में एक तख़्ते पर लिटा कर छोड़ देना. बीच-बीच में तख़्ते को कुछ देर के लिए पानी के भीतर डुबोना.

WATER PITT
एक टंकी जिसमें इतना पानी भरा गया हो कि किसी क़ैदी को डूबने से बचने के लिए अपने पंजों पर उचक कर खड़ा रहना पड़े.

ATTENTION SLAP
क़ैदी को पीड़ा पहुँचाने और डराने के उद्देश्य से मारा गया झापड़.

MOCK BURIAL(FAKE EXECUTION)
क़ैदियों को झूठा एहसास दिलाना कि बस अब उसका प्राणांत होने ही वाला है.

PRIDE AND EGO DOWN
क़ैदी के स्वाभिमान को चकनाचूर करने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडे, जैसे-मुसलमान क़ैदी के आगे कुरान की तौहीन करना.

STRESS POSITIONS
क़ैदियों को घंटों तक ऐसी जगह रखना, जहाँ वो न तो ठीक से खड़े हो पाएँ, और न ही ठीक से बैठ पाएँ.

REMOVAL OF COMFORT ITEMS
क़ैदियों से वैसी चीज़ें छीन लेना जो कि उन्हें सुकून देती हों, जैसे- सिगरेट, नमाज़ पढ़ने के लिए काम आने वाली चटाई, क़ुरान आदि.

EXPLOIT PHOBIAS
क़ैदियों के मन में बसे डर को उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना. जैसे- कोई क़ैदी कुत्ते से डरता हो तो उस पर कुत्ते छोड़ना.

उल्लेखनीय है कि अमरीका War on Terrorism के तहत पकड़े गए लोगों को जिनीवा संधि के तहत युद्धबंधियों को मिलने वाली सुविधाएँ नहीं देता है. अमरीका की दलील है कि पकड़े गए लोग युद्धबंदी नहीं बल्कि Illegal Enemy Combatants हैं. जब जून 2006 में ग्वांतानामो बे बंदी शिविर के तीन क़ैदियों ने आत्महत्या कर ली तो वहाँ तैनात एक जेलर ने इसे अमरीका के ख़िलाफ़ Asymmetrical Warfare की कार्रवाई बताया था.

शुक्रवार, दिसंबर 15, 2006

थोरियम युग में छा जाएगा भारत

थोरियम अयस्कभविष्य में ऊर्जा संकट की आशंका से पूरी दुनिया जूझ रही है, और डर के इस माहौल में एक बार फिर से थोरियम पॉवर की चर्चा फ़ैशन में आ गई है. इसे भविष्य का परमाणु ईंधन बताया जा रहा है. थोरियम के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम की तुलना में यह कहीं ज़्यादा स्वच्छ, सुरक्षित और 'ग्रीन' है. और, इन सब आशावादी बयानों में भारत का भविष्य सबसे बेहतर दिखता है क्योंकि दुनिया के ज्ञात थोरियम भंडार का एक चौथाई भारत में है.

अहम सवाल ये है कि अब तक थोरियम के रिएक्टरों का उपयोग क्यों नहीं शुरू हो पाया है, जबकि इस तत्व की खोज हुए पौने दो सौ साल से ऊपर बीत चुके हैं? इसका सर्वमान्य जवाब ये है- थोरियम रिएक्टर के तेज़ विकास के लिए विकसित देशों की सरकारों और वैज्ञानिक संस्थाओं का सहयोग चाहिए, और इसके लिए वे ज़्यादा इच्छुक नहीं हैं. सबको पता है कि यूरेनियम और प्लूटोनियम की 'सप्लाई लाईन' पर कुछेक देशों का ही नियंत्रण है, जिसके बल पर वो भारत जैसे बड़े देश पर भी मनमाना शर्तें थोपने में सफल हो जाते हैं. इन देशों को लगता है कि थोरियम आधारित आणविक ऊर्जा हक़ीक़त बनी, तो उनके धंधे में मंदी आ जाएगी, उनकी दादागिरी पर रोक लग सकती है...और भारत जैसा देश परमाणु-वर्ण-व्यवस्था के सवर्णों की पाँत में शामिल हो सकता है.

थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर के विकास में खुल कर अनिच्छा दिखाने वालों में यूरोपीय संघ सबसे आगे है. शायद ऐसा इसलिए कि ज्ञात थोरियम भंडार में नार्वे के अलावा यूरोप के किसी अन्य देश का उल्लेखनीय हिस्सा नहीं है. (वैसे तो, रूस में भी थोरियम का बड़ा भंडार नहीं है, लेकिन वहाँ भविष्य के इस ऊर्जा स्रोत पर रिसर्च जारी है. शायद, थोरियम रिएक्टरों के भावी बाज़ार पर रूस की नज़र है!)

यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन(CERN) ने थोरियम ऊर्जा संयंत्र के लिए ज़रूरी एडीएस रिएक्टर(accelerator driven system reactor) के विकास की परियोजना शुरू ज़रूर की थी. लेकिन जब 1999 में एडीएस रिएक्टर का प्रोटोटाइप संभव दिखने लगा तो यूरोपीय संघ ने अचानक इस परियोजना की फ़ंडिंग से हाथ खींच लिया.

यूनीवर्सिटी ऑफ़ बैरगेन के इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़िजिक्स एंड टेक्नोलॉजी के प्रोफ़ेसर एगिल लिलेस्टॉल यूरोप और दुनिया को समझाने की अथक कोशिश करते रहे हैं कि थोरियम भविष्य का ऊर्जा स्रोत है. उनका कहना है कि वायुमंडल में कार्बन के उत्सर्जन को कम करने के लिए ऊर्जा खपत घटाना और सौर एवं पवन ऊर्जा का ज़्यादा-से-ज़्यादा दोहन करना ज़रूरी है, लेकिन ये समस्या का आंशिक समाधान ही है. प्रोफ़ेसर लिलेस्टॉल के अनुसार भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ़ परमाणु ऊर्जा ही दे सकती है, और बिना ख़तरे या डर के परमाणु ऊर्जा हासिल करने के लिए थोरियम पर भरोसा करना ही होगा.

उनका कहना है कि थोरियम का भंडार यूरेनियम के मुक़ाबले तीन गुना ज़्यादा है. प्रति इकाई उसमें यूरेनियम से 250 गुना ज़्यादा ऊर्जा है. थोरियम रिएक्टर से प्लूटोनियम नहीं निकलता, इसलिए परमाणु बमों के ग़लत हाथों में पड़ने का भी डर नहीं. इसके अलावा थोरियम रिएक्टर से निकलने वाला कचरा बाक़ी प्रकार के रिएक्टरों के परमाणु कचरे के मुक़ाबले कहीं कम रेडियोधर्मी होता है.

प्रोफ़ेसर एगिल लिलेस्टॉल के बारे में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन की थोरियम रिएक्टर परियोजना में वो उपप्रमुख की हैसियत से शामिल थे. उनका कहना है कि मात्र 55 करोड़ यूरो की लागत पर एक दशक के भीतर थोरियम रिएक्टर का प्रोटोटाइप तैयार किया जा सकता है. लेकिन डर थोरियम युग में भारत जैसे देशों के परमाणु ईंधन सप्लायर बन जाने को लेकर है, सो यूरोपीय संघ के देश थोरियम रिएक्टर के विकास में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे.

ख़ुशी की बात है कि भारत अपने बल पर ही थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा के लिए अनुसंधान में भिड़ा हुआ है. भारत की योजना मौजूदा यूरेनियम आधारित रिएक्टरों को हटा कर थोरियम आधारित रिएक्टर लगाने की है. कहने की ज़रूरत नहीं कि भारत को इसमें सफलता ज़रूर ही मिलेगी.

रविवार, नवंबर 26, 2006

पेंटागन को हिंदी से प्यार हो गया!

यूटी ऑस्टिन टॉवरइस आलेख का शीर्षक हो सकता है बहुतों को अटपटा लगे. ख़ास कर उन लोगों को जो हिंदी से प्रेम तो करते हैं, लेकिन इसकी स्वीकार्यता को लेकर चिंतित भी हैं. लेकिन विश्वास कीजिए, अमरीकी रक्षा विभाग पेंटागन को हिंदी से प्यार हो गया है.

हालाँकि इस आशय की ख़बर भारत के अंग्रेज़ीदाँ मीडिया की उपेक्षा का शिकार बन गई. कोई आश्चर्य भी नहीं, जो उन्होंने हिंदी के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते महत्व को रेखांकित करती इस ख़बर की ज़्यादा चर्चा नहीं की. गूगल करने से पता चलता है कि अमरीकी मीडिया ने इसे ख़ासा महत्व दिया.

आपको शायद याद हो कि कुछ महीने पहले अपने एक भाषण में अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अमरीकियों से अंग्रेज़ी के अलावा जिन गिनीचुनी विदेशी भाषाओं में दक्षता हासिल करने की अपील की थी, उनमें हिंदी का भी नाम था. बुश ने इस घोषणा के साथ हिंदी को 'राष्ट्रीय सुरक्षा भाषा पहल' में शामिल करने की घोषणा भी की थी.(उस समय भी भारत के अंग्रेज़ीदाँ मीडिया टीकाकारों ने बुश के इस भाषण को ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया था.)

लेकिन बुश ने वास्तव में बहुत गंभीरता से अपनी बात रखी थी. इसका प्रमाण है बुश के गृह प्रांत के विश्वविद्यालय यूनीवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस की घोषणा कि वह हिंदी(और उर्दू) भाषा के एक चार-वर्षीय कोर्स की शुरूआत करने जा रहा है. इस 'Hindi and Urdu Flagship Program' नामक विशेष कोर्स(विश्वविद्यालय में इन भाषाओं के सामान्य कोर्स चार दशकों से जारी हैं) के तहत हिंदी के छात्रों को तीन साल अमरीका में और एक साल भारत में रह कर पढ़ाई करनी होगी.

लेकिन पूरी ख़बर का मूल तत्व ये है कि यूनीवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस के इस विशेष हिंदी-उर्दू कार्यक्रम के लिए सात लाख डॉलर का पूरा बजट अमरीकी रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से आएगा. अमरीका में पेंटागन संचालित कार्यक्रमों में से एक है- राष्ट्रीय सुरक्षा शिक्षा कार्यक्रम. इस कार्यक्रम के तहत अमरीकियों को राष्ट्रीय और वैश्विक सुरक्षा की दृष्टि से अहम विदेशी भाषाओं में दक्षता प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं. (अमरीकी सरकार कहे या नहीं, उसकी इस पहल के पीछे एक उद्देश्य भारत के सुपरफ़ास्ट आर्थिक विकास का ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाना भी है.)

कहने की ज़रूरत नहीं कि भारत और पाकिस्तान दोनों के परमाणु ताक़त के रूप में स्थापित होने, और दोनों के अमरीका से निकट संबंध होने के कारण अमरीका के लिए हिंदी और उर्दू की अहमियत बहुत बढ़ जाती है. (भारत के आर्थिक ताक़त के रूप में उभरने के कारण भी सामरिक दृष्टि से हिंदी का महत्व बढ़ा है. दूसरी ओर पाकिस्तान के अल-क़ायदा का अभ्यारण्य होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से उर्दू का महत्व बढ़ा है.)

यूनीवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस ने अगले सत्र से शुरू अपने विशेष हिंदी कोर्स के प्रचार के लिए टेक्सस के विद्यालयों में हिंदी भाषा की कार्यशालाएँ लगाने की शुरुआत भी कर दी है. विशेष कोर्स का पहला सत्र भले ही दस छात्रों से शुरू किया जाएगा, लेकिन निश्चय ही यह एक अहम शुरुआत होगी.