रविवार, नवंबर 29, 2009

भारतीय पुलिस ने भी ख़रीदी है जादुई छड़ी?

ADE651ब्रिटेन में इन दिनों इराक़ युद्ध के बारे में एक जाँच आयोग की सुनवाई में ये बात एक बार फिर स्पष्ट हो रही है कि 11 सितंबर 2001 के हमलों से कई महीने पहले से ही अमरीका इराक़ पर हमले की योजना बना रहा था.

ज़ाहिर है अमरीकी सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा या ईरान को घेरने जैसे बड़े सामरिक लक्ष्यों पर विचार कर इराक़ पर हमले की योजना बनाई होगी. बड़े सामरिक लक्ष्य दीर्घावधि के होते हैं जो कि कई बार पूरे होते भी नहीं. लेकिन हमले का शिकार बने किसी देश को लूटे जाने का सिलसिला पहले ही दिन से शुरू हो जाता है. इराक़ में भी यही हो रहा है. इस लूट में मुख्य रूप से अमरीका और ब्रिटेन की सुरक्षा कंपनियाँ भाग ले रही हैं.

इसी महीने न्यूयॉर्क टाइम्स ने इराक़ को 8 करोड़ डॉलर का चूना लगाए जाने के एक विचित्र-किंतु-सत्य टाइप प्रकरण को उजागर किया था. उसके बाद में ब्रिटेन के गार्डियन और टाइम्स जैसे अख़बारों ने इस मामले में आगे छानबीन की. अब जाकर इराक़ी संसद की नींद टूटी है, और उसने पूरे मामले की जाँच की घोषणा की है.

मामला ब्रिटेन की एक निजी कंपनी का है जिसने इराक़ को ऐसी जादुई छड़ी की खेप बेची जो कि कथित रूप से बम, गोला-बारूद, हथियार, नशीले पदार्थ, अवैध हाथी दाँत जैसी तमाम चीजों का पाँच किलोमीटर तक की दूरी से पता लगा लेती है.

कथित चमत्कारी उपकरण को देखने से तो यही लगता है कि प्लास्टिक के एक हत्थे पर रेडियो वाला सामान्य टेलीस्कोपिक एंटीना लगा दिया गया हो. इस उपकरण का नाम है ADE651. इसकी अलग-अलग आकार और कथित क्षमता वाली डेढ़ हज़ार यूनिट इराक़ सरकार को बेची गई हैं, प्रति नग 60 हज़ार डॉलर तक के दाम में.

उल्लेखनीय है कि इराक़ में तैनात अमरीकी सेना ADE651 का इस्तेमाल नहीं करती है. वरिष्ठ अमरीकी सैनिक अधिकारियों ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि ये उपकरण किसी भी काम का नहीं है और 60 हज़ार डॉलर में तो गोला-बारूद का पता लगाने मे निपुण पाँच से आठ प्रशिक्षित कुत्ते खरीदे जा सकते हैं. जब अख़बार ने ये सुझाव इराक़ के बमरोधी पुलिस विभाग के प्रमुख मेजर जनरल जेहाद अल-जबीरी के सामने रखा तो उनका जवाब बेमिसाल था- "आप बग़दाद के 400 सुरक्षा चौकियों पर कुत्तों की तैनाती के बारे में सोच भी सकते हैं? शहर एक चिड़ियाघर में तब्दील हो जाएगा."

ADE651 बनाने वाली कंपनी ATSC का अपने उत्पाद के बारे में दावा गज़ब का है- 'ADE651 से बम, बंदूक, कारतूस, मादक पदार्थ, लाश यहाँ तक कि हाथी दाँत का भी पता चल सकता है. ये ज़मीन के नीचे, पानी में या दीवारों के पीछे छुपी इन चीज़ों का एक किलोमीटर दूर से पता लगा सकता है. जहाँ तक हवा की बात है तो इस उपकरण के ज़रिए नीचे ज़मीन से ही पाँच किलोमीटर ऊपर उड़ रहे विमान में इन चीज़ों का पता लगाया जा सकता है.'

इस उपकरण की एक और विचित्र विशेषता है- 'इसे काम करने के लिए न किसी बैटरी की ज़रूरत होती है और न ही ऊर्जा के किसी अन्य प्रकार की.'

इतना ही नहीं ADE651 में कोई इलेक्ट्रॉनिक सर्किट भी नहीं है. इसके काम करने का तरीक़ा भी बड़ा सरल बताया गया है. एंटीना यूनिट तार के ज़रिए प्लास्टिक के डिब्बे से जुड़ा होता है जिसके खांचे में उस चीज़ के गुणों से युक्त(electromagnetic resonance) प्लास्टिक का एक कार्ड लगता है जिसकी कि तलाश की जानी हो. मतलब यदि बारूद का पता लगाना हो तो बारूद के विशेष भौतिक गुणों से युक्त कार्ड खांचे में डलेगा. बारूद वाले उदाहरण को ही आगे बढ़ाएँ तो आप एंटीना को सतह के क्षैतिज पकड़े रहें, बस. यदि एक किलोमीटर की दायरे में कहीं बारूद रहा तो एंटीना ख़ुद-ब-ख़ुद उस ओर झुक जाएगा!

ब्रितानी अख़बार टाइम्स का पत्रकार जब ATSC के कर्ताधर्ता पूर्व पुलिस अधिकारी जिम मैक्कॉर्मिक से मिलने गया तो उसने पत्रकार को ADE651 का इस्तेमाल करने दिया. लेकिन उपकरण उसके कार्यालय जैसी छोटी-सी जगह में छुपाए गए बारूद का पता लगाने में भी नाकाम रहा. रही बात इराक़ में ADE651 के 'असल प्रभाव' की तो उसके लिए पिछले महीने का एक उदाहरण ही काफ़ी होगा. 25 अक्तूबर को बग़दाद में एक आत्मघाती हमलावर ने तीन मंत्रालयों की इमारतों को ध्वस्त करते हुए 155 लोगों को मार डाला था. हमलावर ADE651 उपकरण से लैस एक चेकपोस्ट से हो कर दो टन बारूद से भरा ट्रक ले गया था! इसी तरह न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने दो लोगों को AK47 राइफ़लों और कारतूसों के साथ ADE651 का इस्तेमाल करने वाली नौ इराक़ी पुलिस चौकियों से होकर गुजारा, एक भी जगह जादुई छड़ी को हथियारों की हवा नहीं लगी.

अमरीकी जादूगर जेम्स रैंडी ने ADE651 की निर्माता कंपनी ATSC को खुली चुनौती दे रखी है कि वो वैज्ञानिक जाँच में ये दिखा दे कि उसका उपकरण सचमुच में बारूद का पता लगा लेता है तो वह उसे 10 लाख डॉलर देंगे. साल भर बीत चुका है लेकिन ATSC ने रैंडी की चुनौती को स्वीकार नहीं किया है. अब रैंडी ने चुनौती का दायरा और बढ़ा दिया है. उनका कहना है कि ADE651 और कुछ नहीं बल्कि शुद्ध जालसाज़ी है. यदि आप उनके इस विश्वास को ग़लत साबित कर सकें तो 10 लाख डॉलर का पुरस्कार आपका!

ये कोई संयोग नहीं है कि किसी भी विकसित देश की सेना या पुलिस इस उपकरण का इस्तेमाल नहीं करती. सिर्फ़ कुछ विकासशील देशों में ही इसे बेचा जा सका है. लंदन के टाइम्स अख़बार से बातचीत में ATSC के मालिक मैककॉर्निक ने अपने ग्राहकों में भारत की पुलिस का भी नाम गिनाया है. कंपनी की वेबसाइट अभी डाउन चल रही है, वरना ये जानना रोचक होगा कि भारत के किस राज्य की पुलिस ने जादुई छड़ी ख़रीदी है !

सोमवार, अगस्त 31, 2009

विकल्प जिओ-इंजीनियरिंग के

राजमार्गों के दोनों ओर कृत्रिम पेड़ लगाने का विकल्पजिओ-इंजीनियरिंग या भू-यांत्रिकी अभी तक सिद्धांतों तक ही सीमित है. लेकिन पिछले हफ़्ते ब्रिटेन के इंस्टीट्यूशन ऑफ़ मेकेनिकल इंजीनियर्स(आईमेकई) की रिपोर्ट को देखने के बाद लगता है कि अभी से दशक भर के अंतराल में इसे व्यावहारिक धरातल पर उतारा जाना संभव है.

जिओ-इंजीनियरिंग यानि धरती के पर्यावरण को संभालने के लिए और हमें जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए बहुत ही बड़े पैमाने पर अपनाए जाने वाले अभियांत्रिकी केंद्रित विकल्प. आईमेकई के अनुसार इन विकल्पों का उद्देश्य होगा- वायुमंडल से बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों(मुख्यत: कार्बन डाइ ऑक्साइड) को निकालना या फिर धरती की जलवायु प्रणाली में पहुँचने वाले सूर्य के विकिरण की मात्रा में भारी कटौती संभव करना. अभी तक ऐसे किसी विकल्प को बड़े पैमाने पर नहीं अपनाया गया है. सच्चाई तो ये है कि अभी तक जिओ-इंजीनियरिंग को जलवायु परिवर्तन की समस्या से लड़ने के विकल्प के रूप में अपनाने पर व्यापक सहमति तक नहीं बन पाई है.

आईमेकई ने अपनी रिपोर्ट में दलील दी है कि जलवायु परिवर्तन पर हर महीने कहीं न कहीं हो रहे अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के बीच कार्बन उत्सर्जन सालाना 3 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है. ऐसे में जिओ-इंजीनियरिंग के विकल्प से बचने की कोशिश ख़तरनाक साबित हो सकती है.

आईमेकई के विशेषज्ञों ने सैंकड़ो जिओ-इंजीनियरिंग प्रस्तावों पर विचार करने के बाद तीन विकल्पों को व्यावहारिक और असरदार माना है- कृत्रिम पेड़ लगाना, छतों को सूर्यातप परावर्तक सतह के रूप में बदलना और शैवाल(अल्गी) आधारित ईंधन को आम प्रचलन में लाना.

कृत्रिम पेड़ देखने में भले ही बदसूरत मशीन जैसा दिखेंगे, लेकिन वायुमंडल के कार्बन डाइ ऑक्साइड को सोखने के काम में वे नैसर्गिक पेड़ों से हज़ार गुना बेहतर होंगे. आईमेकई के डॉ. टिम फ़ॉक्स का दावा है कि एक कृत्रिम पेड़ वायुमंडल से रोज़ 10 टन कार्बन अवशोषित कर सकेगा. यानि यदि ब्रिटेन में एक लाख कृत्रिम पेड़ लगा देने से पूरे देश के परिवहन-तंत्र द्वारा उत्सर्जित कार्बन डाइ ऑक्साइड को न्यूट्रल किया जा सकेगा, उसे वायुमंडल में पहुँचने से रोका जा सकेगा. एक आम सुझाव ये है कि जब कृत्रिम पेड़ लगाने पर सहमति बन जाए तो उन्हें राजमार्ग के दोनों ओर लगाया जाए. ऊपर के चित्र में एक कलाकार ने इसी परिकल्पना को दर्शाया है.

घरों में शैवाल आधारित ईंधनों के प्रयोग से भी वायुमंडल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा कम होगी, क्योंकि शैवाल प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए कार्बन डाइ ऑक्साइड को हरित तत्वों में बदलता है. अल्गी के ईंधन के उपयोग के बाद बचे अवशेष जैव-उर्वरक के रूप में इस्तेमाल किए जा सकेंगे.

जबकि सुझाए गए तीसरे उपाय के ज़रिए ग्लोबल वार्मिंग को सीधे कम किया जाएगा, क्योंकि चमकीली सतह वाली छतें बड़ी मात्रा में सूर्यातप को धरती की जलवायु में घर करने से रोकेंगी.

जिओ-इंजीनियरिंग को अपनाने की अपील करने के साथ ही आईमेकई ने आगाह किया है कि सिर्फ़ इसी के भरोसे नहीं रहा जा सकता. जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव ठीक किए जाने लायक़ स्थिति से आगे चले जाएँ, इससे बचने के लिए ज़रूरी है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के व्यावहारिक उपायों पर शीघ्र सहमति बनाई जाए. यानि जिओ-इंजीनियरिंग के ज़रिए ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को बिल्कुल ही ख़तरनाक स्थिति तक पहुँचने में थोड़ी देरी कराई जा सकती है, लेकिन यह उससे बचने की गारंटी बिल्कुल ही नहीं है.

समस्या ये भी है कि जिओ-इंजीनियरिंग पर अभी तक दुनिया भर के पर्यावरणवादी और विशेषज्ञ एकमत नहीं हो पाए हैं. उनकी मुख्य शिकायत ये है है कि ग्लोबल वार्मिंग की विभीषिका को अस्थाई से रूप से टालने में सक्षम कोई भी विकल्प हमें मूल समस्या की भयावहता से आँखें मूँदने की ओर धकेलेगा. उनको इस बात का भी डर है कि सिर्फ़ सैद्धांतिक स्तर पर परखे गए, या सिर्फ़ प्रयोगशाला के नियंत्रित माहौल में परीक्षण कर देखे गए विकल्पों को भूमंडल स्तर पर कार्यान्वित करने से कहीं अनजाने में कोई पर्यावरणनाशी भस्मासुर न पैदा हो जाए!

शुक्रवार, जुलाई 31, 2009

मिस्टर आइडिया

डोमिनिक विलकॉक्स को मीडिया में Ideas Man कहा जाता है, लेकिन वे अपने आपको एक सामान्य ज़िंदगी जीने वाला आम आदमी बताते हैं. ब्रिटेन में एडिनबरा कॉलेज ऑफ़ आर्ट और रॉयल कॉलेज ऑफ़ आर्ट से पढ़ाई करने वाले विलकॉक्स अपने अनुभव और अपनी कल्पना शक्ति के घालमेल से ऐसी चीज़ें और ऐसे विचार सामने लाते हैं कि सचमुच का आम आदमी दाँतों तले अंगुली दबा कर ज़रूर कह बैठे- अरे ये मैंने क्यों नहीं सोचा था!

विलकॉक्स ने अनेक आर्ट गैलरियों के साथ-साथ Nike और Esquire जैसे जानेमाने ब्रांडों को भी अपनी सेवाएँ दी हैं.

पिछले दिनों एक पत्रिका में मैंने डोमिनिक विलकॉक्स के बारे में पढ़ा और उनकी वेबसाइट पर जाकर उनकी कृतियों के नमूने देख कर यही लगा कि अभिनव विचार भी हास्य बोध के साथ प्रस्तुत किए जा सकते हैं. प्रस्तुत हैं उनकी कृतियों और परिकल्पनाओं की बानगी-

अम्ल-वर्षा से ख़ूबसूरती पाने वाला पौधा

लिटमस पौधा

आगंतुकों का हिसाब रखने वाली दरवाज़े की घंटी

आगंतुक सूचना पट

चौकोर पेंदे वाला जीन संवर्द्धित अंडा

चौकोर पेंदे वाला अंडा

डोमिनिक्स विलकॉक्स की ऐसी ही अन्य परिकल्पनाओं को उनकी इन वेबसाइटों पर जाकर देखा जा सकता है-

http://variationsonnormal.com/

http://www.dominicwilcox.com/bin.html

मंगलवार, जून 30, 2009

अपोलो अभियान के फ़ायदे और नुक़सान

नील आर्मस्ट्राँग : मानवता की छलाँग?आज से ठीक तीन हफ़्ते बाद अमरीका और विज्ञान में आस्था रखने वाले पूरी दुनिया के लोग चाँद पर मानव के क़दम पड़ने की 40वीं वर्षगांठ मनाएँगे. लेकिन ये मौक़ा उस गौरवशाली पल को याद करने के साथ-साथ इस बात पर पुनर्विचार करने का भी होगा कि अपोलो अभियान से क्या फ़ायदे हुए और क्या नुक़सान हुए.

21 जुलाई 1969 को जब नील आर्मस्ट्राँग ने चाँद की सतह पर क़दम रखा तो निसंदेह वह मानव के अब तक के सबसे साहसिक अन्वेषण अभियान का उदाहरण था. पहली बार किसी व्यक्ति ने दूसरी दुनिया में क़दम रखा था. अंतरिक्ष में मानव के पहुँचने के आठ साल के भीतर धरती से ढाई लाख मील दूर चाँद पर जाना-आना संभव हो सकना, हर तरह से एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी. तभी तो अपोलो 11 के लैंडर मॉड्यूल ईगल से नीचे चाँद की सतह पर उतर कर जब आर्मस्ट्राँग ने 'One small step for man; one giant leap for mankind.' कहा तो तब पूरी दुनिया उनसे सहमत थी. नील आर्मस्ट्राँग के ही साथ चाँद पर गए थे बज़ एल्ड्रिन, और बाद के अपोलो अभियानों में 10 अन्य अमरीकियों ने चाँद पर क़दम रखे. लेकिन दर्ज़न भर लोगों को चाँद पर पहुँचाने का क्या परिणाम निकला?

सबसे पहले चाँद पर मानव को पहुँचाने की परियोजना की लागत की बात करें तो 1960 के दशक में अपोलो अभियान पर अमरीका ने 24 अरब डॉलर ख़र्च किए थे, यानि आज की परिस्थिति में लगभग एक ख़रब डॉलर. ये इतनी बड़ी रकम थी कि कई साल तक अमरीका के बजट का लगभग 5 प्रतिशत भाग अपोलो अभियान पर ख़र्च हो रहा था. स्पेस-सूट से लेकर रॉकेट इंजन तक बनाने में क़रीब 4 लाख कर्मचारियों ने योगदान दिया. चूंकि पूरी परियोजना को देश की गरिमा से, सोवियत संघ से दो क़दम आगे रहने के अमरीका के सामर्थ्य से जोड़ दिया गया था, इसलिए इन कर्मचारियों में से हज़ारों ने सामान्य काम के घंटों से दोगुना तक का समय बिना कोई अतिरिक्त पैसे के श्रमदान के रूप में दिया. परियोजना से इस क़दर भावनात्मक (और शारीरिक)रूप से जुड़े होने के कारण सैंकड़ो कर्मचारी हृदयाघात की लपेट में आकर असमय भगवान के प्यारे हो गए.

लेकिन अपोलो अभियान की कुल उपलब्धि क्या रही? मुख्य उपलब्धियों में अंतरिक्ष की होड़ में अमरीका की सोवियत संघ पर जीत और ब्रह्मांड के अन्वेषण को लेकर पूरी दुनिया के बढ़े आत्मविश्वास को गिनाया जा सकता है. इसके अलावा अपोलो अभियान से जुड़ी कुछ रोचक जानकारियाँ भी हैं:- चाँद के लिए कुल नौ अपोल मिशन रवाना हुआ. इनमें से कुल छह मिशन चाँद की सतह तक पहुँचने का था. कुल 24 अंतरिक्ष यात्रियों ने इन चंद्र अभियानों में भाग लिया, जिनमें से तीन दो-दो बार मिशन में शामिल हुए. कुल 12 अंतरिक्ष यात्री चाँद पर उतरे (जिनमें से 9 अभी जीवित हैं). ये बारह के बारह अमरीकी थे. इनमें से मात्र एक वैज्ञानिक था.

अपोलो 8 से देखा गया अद्भुत दृश्य : धरती का उदयचार साल की अवधि में चाँद पर गए बारहों अमरीकी या तो अपने माँ-बाप की पहली या एकमात्र संतान थे. इन चंद्रयात्रियों ने जाने-अनजाने चाँद पर यंत्रों और उपकरणों के रूप में 118 टन सामान छोड़ा (हवा, पानी या जीवाणुओं के बिना सारी चीज़ें 40 साल बाद भी शायद हूबहू उसी हालत में होंगी जिस रूप में इन्हें वहाँ छोड़ा गया था). बदले में वे चाँद से कंकड़-पत्थर के रूप में कुल क़रीब 343 किलोग्राम वज़न उठा कर लाए जिनका अभी तक अध्ययन किया जा रहा है. हालाँकि आलोचकों के अनुसार इनसे जितनी जानकारियाँ मिल सकती थीं वो कब की मिल चुकी हैं. सर्वप्रमुख जानकारी ये थी कि अरबों साल पहले कोई एस्टेरॉयड धरती से टकराया था, जिससे अपार मात्रा में उत्पन्न धूल-गुबार अंतरिक्ष में पहुँचा जो अंतत: जमने के बाद चाँद बना.

इसी तरह एक लेज़र दर्पण प्रयोग भी 40 साल से लगातार जारी है. दरअसल आर्मस्ट्राँग और एल्ड्रिन ने चाँद पर एक दर्पण रख छोड़ा था जिस पर टेक्सस के मैकडोनल्ड लेज़र रेन्जिंग स्टेशन के वैज्ञानिक लेज़र किरणें परावर्तित करा के चंद्रमा की कक्षा की माप लेते हैं. इस अध्ययन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये जानकारी है कि चाँद हर साल धरती से ढाई इंच दूर खिसकता जा रहा है. लेकिन इसी हफ़्ते सरकार ने मैकडोनल्ड लेज़र रेन्जिंग स्टेशन के वैज्ञानिकों को सालाना सवा लाख डॉलर की लागत वाले इस प्रयोग को रोकने की सूचना दी है. (हालाँकि दर्पण तो चाँद पर आगे भी रहेगा ही, सो किसी अन्य प्रयोगशाला वाले ज़रूरत पड़ने पर लेज़र प्रयोग कर सकेंगे.)

अब फिर से मूल सवाल पर आते हैं कि आर्मस्ट्राँग ने मानवता की जिस छलाँग की बात की थी, क्या वो छलाँग लग पाई? जवाब है- बिल्कुल नहीं. सच्चाई तो ये है कि अपोलो अभियान के लिए विकसित ज़्यादातर प्रौद्योगिकी उसके बाद के अभियानों में काम नहीं आ सकी. राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी ने जब 1961 में दशक भर के भीतर चाँद पर मानव को उतारने का भरोसा दिलाया था तब तक अमरीका को कुल 20 मिनट की मानव अंतरिक्ष यात्रा का अनुभव था. ऐसे में नासा अंतरिक्ष संस्था की सारी ऊर्जा केनेडी के सपने को साकार करने में लगा दी गई. इसके लिए मुख्य तीन साधन- सैटर्न V रॉकेट, अपोलो कैप्सूल और चंद्र मॉड्यूल- इस तरह डिज़ायन किए गए कि उनका किसी अन्य प्रकार के अंतरिक्ष अभियान के लिए फ़ायदा नहीं उठाया जा सकता था.

अपोलो की जगह मानव को अंतरिक्ष में भेजने के काम में लगाए गए अंतरिक्ष शटल मौत का वाहन साबित हुए. दो शटल दुर्घटनाओं में भारतीय मूल की कल्पना चावला समेत कुल 14 अंतरिक्ष यात्री काल के गाल में समा गए. अंतरिक्ष शटलों को अगले साल सेवामुक्त किया जा रहा है. उसके बाद क्या होगा ये कहा नहीं जा सकता है क्योंकि राष्ट्रपति बराक ओबामा मानव को अंतरिक्ष अभियानों पर भेजने को लेकर ज़्यादा उत्साहित नहीं दिखते हैं. हाँ इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि मौजूदा अंतरिक्ष शटलों को रिटायर किए जाने के बाद कम-से-कम कुछ समय के लिए अमरीका के पास अंतरिक्ष में यात्री भेजने के लिए अपना कोई साधन नहीं होगा, क्योंकि डिज़ायन किए जा रहे नए रॉकेट 2016 तक ही(यदि ओबामा प्रशासन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश प्रशासन की इस योजना को पूरा समर्थन दे पाया) तैयार हो सकेंगे.

अपोलो 17 की उड़ानअपोलो अभियान की नाकामियों के पीछे अमरीकी सरकार के साथ-साथ, अमरीकी मीडिया और अमरीकी जनता की भी भूमिका रही है. दरअसल अपोलो 11 अभियान की शानदार सफलता के बाद अचानक अमरीकियों की दिलचस्पी चंद्र अभियानों में नहीं रह गई. उदाहरण के लिए एक ओर जहाँ 16 जुलाई 1969 को अपोलो 11 की उड़ान का साक्षी होने 10 लाख से ज़्यादा लोग केप कैनेवरल में जमा हुए थे, वहीं अप्रैल 1970 में अपोलो 13 अभियान का टीवी कवरेज़ 'डोरिस डे शो' के पक्ष में रद्द कर दिया गया.(हालाँकि अपोलो मिशन में गड़बड़ियाँ सामने आने पर टीवी कवरेज़ दोबारा शुरू किया गया.)सोवियत संघ पीछे रह गया था, इतना मात्र से ही अमरीका संतुष्ट था. दो साल बाद अपोलो 18, अपोलो 19 और अपोलो 20 अभियान रद्द कर दिया गया. यानि मानव को अंतिम बार अपोलो 17 अभियान में चाँद पर उतारा गया.

कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि अपोलो 11 अभियान की सफलता ने सुदूर अंतरिक्ष में मानव को भेजने की संभावनाओं को कई दशकों के लिए पीछे धकेल दिया. सौभाग्य से चाँद एक बार फिर मानव को अपनी ओर बुलाने में सफल होता दिख रहा है. ख़ुशी की बात ये भी है कि इस बार अमरीका के साथ-साथ यूरोप, जापान, चीन और भारत भी चाँद की ओर हाथ बढ़ाते हुए उचक रहे हैं!

रविवार, मई 31, 2009

ग्लोबल वार्मिंग का मुक़ाबला सफ़ेदी पोत के

स्टीफ़न चूग्लोबल वार्मिंग की समस्या से पार पाने के लिए तरह-तरह के ऊपाय बताए जाते हैं, जैसे- जैव ईंधन का कम प्रयोग, जल विद्युत और नाभिकीय ऊर्जा को बढ़ावा, सस्ते और टिकाऊ सौर-पैनलों का विकास आदि-आदि. लेकिन अमरीका के ऊर्जा मंत्री डॉ. स्टीफ़न चू ने ग्लोबल वार्मिंग को कम करने का जो रास्ता सुझाया है वो सबसे रोचक है. चू साहब का कहना है कि लोग अपने घर की छतों को सफ़ेद रंग से रंग दें, और शहरों के फ़ुटपाथों को हल्के रंग का बना दिया जाए तो ग्लोबल वार्मिंग में पर्याप्त कमी की जा सकती है.

स्टीफ़न चू कोई जॉर्ज बुश टाइप बुद्धिजीवी नहीं हैं, बल्कि वे एक जाने-माने वैज्ञानिक हैं. उनके नाम 1997 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी है. इसलिए उनकी बातों को दुनिया ओबामा प्रशासन की नीति के साथ-साथ गंभीर वैज्ञानिक विचार के तौर पर भी लेती है.

छतों पर सफ़ेदी पोतने का चू का सुझाव पिछले हफ़्ते लंदन में आया जहाँ वे जलवायु परिवर्तन की समस्या पर 20 नोबेल विजेता वैज्ञानिकों की बैठक से पहले मीडिया को संबोधित कर रहे थे.

डॉ. चू का कहना है कि छतों और फ़ुटपाथों को सफ़ेद या हल्के रंग का रूप देने से ऊर्जा का संरक्षण होने के साथ-साथ एक बड़े क्षेत्र से सूर्य के प्रकाश को सीधे परावर्तित करना संभव होगा.

अपनी बात को विस्तार देते हुए चू ने कहा, "यदि कोई भवन वातानुकूलित है तो उसकी छत पर सफ़ेदी करने के बाद ये पहले से कहीं ज़्यादा ठंडा हो सकेगा. यानि उस भवन में 10 से 15 प्रतिशत कम बिजली की ज़रूरत होगी."

"इसी तरह छतों-फ़ुटपाथों पर सफ़ेदी पोत कर आप धरती की परावर्तक सतह का स्वरूप बदल सकते हैं. इसे ज़्यादा परावर्तक बना सकते हैं. ताकि सूर्य का प्रकाश नीचे आए और तुरंत वापस अंतरिक्ष में जाए. धरती पर ग्रीनहाउस की स्थिति में योगदान दिए बिना."

अमरीकी ऊर्जा मंत्री ने आगे कहा, "आपको अभी हँसी आ रही हो, लेकिन यदि आप सारे मकानों की छतों पर सफ़ेदी पोत दें, और यदि सारे फ़ुटपाथों को भी काले के बजाय कंक्रीट टाइप रंग का बना दें, और ऐसा एकरूपता से करें...तो ऐसे में कार्बन उत्सर्जन में इतनी कमी हो सकेगी जितनी कि दुनिया की सारी कारें 11 वर्षों की अवधि में उत्सर्जित करती हैं. ऐसे समझें कि मानो 11 साल तक एक भी कार न चली हो."

डॉ. स्टीफ़न चू सफ़ेदी के दायरे को छतों और फ़ुटपाथों से भी आगे बढ़ा कर कारों को भी उसके भीतर लाना चाहते हैं. उनका कहना है- "यदि सभी कारों को सफ़ेद या हल्के रंगों में रंग दिया जाए तो अच्छा-ख़ासा पैसा बचाया जा सकता है क्योंकि तब उनकी एयरकंडीशनिंग की डाउनसाइज़िंग हो सकेगी. इससे एयरकंडीशनिंग ज़्यादा असरदार भी हो जाएगी, और ऊर्जा का अपेक्षाकृत कम उपयोग करना पड़ेगा."

चू साहब अपनी इस तरक़ीब को 'जियोइंजीनियरिंग' का एक बढ़िया उदाहरण बताते हैं. हालाँकि इस बात का जवाब उनके पास नहीं है कि चारों ओर सफ़ेद-सफ़ेद ही दिखने से मानव सौंदर्य बोध का क्या होगा! इसके अलावा सपाट छतों की तो कोई बात नहीं, लेकिन जहाँ तक यूरोप की बात है तो वहाँ के छप्परनुमा छतों के रंग-रूप को लेकर कई देशों में स्थानीय नियम-क़ानूनों में प्रावधान बने हुए है. अधिकांश स्थानीय निकाय उन छतों की सफ़ेदी की इजाज़त नहीं देते जो कि राह चलते नज़र आती हों.

मान लीजिए दुनिया भर की सरकारें ज़्यादातर छतों की सफ़ेदी पर सहमत हो भी जाती हैं तो क्या ये सचमुच में ग्लोबल वार्मिंग की समस्या का प्रभावी समाधान है? आप ख़ुद विचार करें, यदि आपको बता दिया जाए कि धरती की सतह का मात्र डेढ़ प्रतिशत शहरों और महानगरों के रूप में है.

यहाँ ये उल्लेखनीय है कि ऊर्जा मंत्री के रूप में स्टीफ़न चू के कई फ़ैसलों की पर्यावरणवादियों ने जलवायु को नुक़सान पहुँचाने वाला बताते हुए आलोचना की है. इन फ़ैसलों में अमरीका में नए कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों के निर्माण पर रोकटोक हटाना, हाइड्रोजन ईंधन चालित वाहनों के विकास के लिए सरकारी फ़ंडिंग में कटौती, परमाणु कचरा भंडारण की एक योजना के लिए फ़ंडिंग ख़त्म करना आदि. चू का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने का सबसे प्रभावी और आसान तरीक़ा है- ऊर्जा दक्षता. भवनों के बेहतर डिज़ायन और छतों-फ़ुटपाथों की पुताई इसी ऊर्जा दक्षता के अंतर्गत आते हैं.