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गुरुवार, अगस्त 24, 2006

ख़त्म हुआ प्लूटो का राजयोग

प्लूटोआख़िरकार प्लूटो को ग्रहों की पंक्ति से बाहर निकाल ही दिया गया. छोटे उस्ताद एक-दो नहीं, बल्कि पूरे 75 साल तक आठ बड़ों के साथ बड़ा बन कर रहे.

प्लूटो की ग्रहदशा ख़राब की, प्राग में जुटे 75 देशों के खगोलविदों ने 24 अगस्त 2006 को, जब अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ की महासभा में ग्रह की परिभाषा पर सहमति बनी. नई कसौटी पर प्लूटो खरा नहीं उतर पाया.

आश्चर्य की बात है कि आज तक ग्रह की कोई सर्वमान्य या औपचारिक परिभाषा नहीं थी. प्राग में क़रीब ढाई हज़ार खगोलविदों के बीच मतदान के ज़रिए जिस परिभाषा पर अंतत: सहमति बनी है, उसमें सौरमंडल के किसी पिंड के ग्रह होने के लिए तीन मानक तय किए गए हैं-

1. यह सूर्य की परिक्रमा करता हो
2. यह इतना बड़ा ज़रूर हो कि अपने गुरुत्व बल के कारण इसका आकार लगभग गोलाकार हो जाए
3. इसमें इतना ज़ोर हो कि ये बाक़ी पिंडों से अलग अपनी स्वतंत्र कक्षा बना सके

...और तीसरी अपेक्षा पर प्लूटो खरा नहीं उतरता है, क्योंकि सूर्य की परिक्रमा के दौरान इसकी कक्षा नेप्चून की कक्षा से टकराती है.

अब प्लूटो ग्रह कहलाने का हक़दार नहीं रह गया है. लेकिन जब 1930 में प्लूटो को ढूँढा गया तो बड़े ही सम्मान के साथ उसे ग्रह का दर्जा दे दिया गया था. हालाँकि शुरू से ही खगोलविदों का एक वर्ग इसे, ख़ास कर इसके छोटे आकार के कारण (अपने चंदा मामा से भी छोटा), ग्रह माने जाने के ख़िलाफ़ था.

अक्तूबर 2003 में हब्बल टेलीस्कोप से खींचे गए एक चित्र के आधार पर पिछले साल 2003यूबी313 (अस्थाई नाम ज़ेना) की खोज के बाद तो प्लूटो को ग्रह की कुर्सी से गिराने वालों ने बक़ायदा अभियान शुरू कर दिया. दरअसल ज़ेना आकार और द्रव्यमान में प्लूटो से भी बड़ा है. हालाँकि उसकी कक्षा भी प्लूटो के समान ही बेतरतीब है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ की दुविधा ये थी कि या तो ज़ेना को दसवाँ ग्रह माने या फिर प्लूटो को ग्रह की श्रेणी से हटाए.

इतना ही नहीं, खगोलीय दूरबीनों की क्षमता लगातार बढ़ते जाने को देखते हुए ऐसी भी आशंकाएँ व्यक्त की जाने लगी थीं कि आने वाले वर्षों में प्लूटो जैसे दर्जनों और पिंड मिल सकते हैं जो कि ग्रहों के क्लब के दरवाज़े पर दस्तक देते मिलेंगे.

अभी पिछले हफ़्ते ही प्राग सम्मेलन में मौजूद खगोलविदों के बीच एक प्रस्ताव आया था कि ग्रहों की तीन श्रेणी बना दी जाए ताकि प्लूटो तो ग्रह बना रहे ही, तीन और पिंडों को ग्रह मान लिया जाए, यानि कुल एक दर्जन ग्रह! लेकिन प्लूटो को ग्रहों के समूह से बाहर निकालने का अभियान चलाने वाले सफल रहे और फ़ैसला ग्रहों की संख्या आठ करने के पक्ष में सामने आया.

तो आज से सौरमंडल में आठ ही ग्रह रह गए हैं- बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्चून.

बौने ग्रहों का एक नया वर्ग बनाया गया है, जिसमें हैं- प्लूटो, 2003यूबी313 और सीरेज़.

सीरेज़ सौरमंडल में मौजूद सबसे बड़ा एस्टेरॉयड या क्षुद्र ग्रह है, और इसकी विशेषता है इसका गोल आकार. जबकि 2003यूबी313 सौरमंडल के सुदूरवर्ती हिमपिंडों की पट्टी में स्थित एक गोलाकार पिंड है. मतलब बौने ग्रह की श्रेणी में भी शामिल होने के लिए भी किसी सौरपिंड का गोलाकार होना ज़रूरी है.

ग्रह नहीं होते हुए भी 75 साल तक ग्रहों के बीच बना रहा प्लूटो पता नहीं अपने में क्या-क्या रहस्य छुपाए हुए है. उसे क़रीब से परखने के लिए अमरीका का न्यू होराइज़न यान इसी साल जनवरी में अपनी लंबी यात्रा पर निकल चुका है. यदि सब कुछ ठीक से चला, तो यह यान 2015 में प्लूटो के पास होगा.

ग्रहों की दशा को मानव भला कब जान पाया है. खगोलविदों का एक अच्छा-ख़ासा वर्ग प्लूटो का दर्जा घटाए जाने को लेकर नाराज़ है. क्या पता भविष्य में नए सबूतों और नए तर्कों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ दोबारा प्लूटो को ग्रह मानने को तैयार हो जाए. लेकिन तब तक हम आने वाली पीढ़ी को ये बताते हुए झूठे गर्व का अनुभव करते रहेंगे कि- 'बच्चे, हमारे ज़माने में सौरमंडल में नौ ग्रह हुआ करते थे!'