रविवार, जनवरी 31, 2010

भारत के ग़लत नक़्शों के कुछ नमूने

भारत के ग़लत नक़्शे के विवाद की कुछ ख़बरें पढ़ने के बाद मैंने इस बारे में वेब पर कुछ देर सर्च किया. मुख्य तथ्य ये सामने आया कि पाकिस्तान और चीन की छोड़ दें तो भारत के मानचित्र का सर्वाधिक ग़लत चित्रण अमरीका करता है. वही अमरीका, आजकल जिसके साथ गाढ़ी मित्रता की मिसालें देते हुए भारत थकता नहीं है.

ये भी पता चला कि विदेशी प्रकाशनों और वेबसाइटों के अलावा भारत में भी राष्ट्र के मानचित्र को ग़लत दिखाने के अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं. कुछ ग़लतियाँ अनजाने में होती हैं, तो कुछ के पीछे विदेशी स्वामित्व वाली ग्राफ़िक्स कंपनियों की नादानी (या शरारत?) होती है.

ग़लत मानचित्रों पर नज़र डालने से पहले आइए देखते हैं भारत सरकार द्वारा स्वीकृत मानचित्र. (आगे के मानचित्रों में सीधे ग़लतियों तक पहुँचने के लिए कृपया इस सही नक़्शे के शिखर पर ग़ौर करें.)-


ग़लत मानचित्रों के कुछ नमूने -


(अमरीका के अन्य सरकारी विभागों, मीडिया संस्थानों और विश्विद्यालयों में भी इसी के जैसे भारतीय नक़्शे प्रचलित हैं.)




(भारत में ब्रितानी उच्चायोग ने इस नक़्शे वाले पेज पर नीचे जाकर एक डिस्क्लेमर का लिंक(डिस्क्लेमर नहीं, उसका लिंक!) दिया है जो कहता है- This map should not be considered an authority on the delimitation of international or other boundaries nor on the spelling or use of place and feature names. This map is not to be taken as necessarily representing the views of the UK Government on boundaries or political status. यदि भारत उत्तरी आयरलैंड को ब्रिटेन के बजाय आयरलैंड की सीमा में डाल कर ऐसा ही कोई लिंक लगा दे, तो ब्रितानी सरकार शायद चुप नहीं बैठेगी.)






(हालाँकि आईएफ़सीएम के 'लोगो' में सही नक़्शे के अंश का उपयोग किया गया है.)




शटरस्टॉक की वेबसाइट पर भारत के ग़लत नक़्शों के ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं. (सही नक़्शे की प्रतिकृतियाँ भी हैं.)

सोमवार, दिसंबर 28, 2009

पाब्लो नेरुदा का सागर प्रेम


पाब्लो नेरुदा को काम भावनाएँ जगाने वाली प्रेम कविताओं के लिए तो जाना जाता है ही, उनकी प्रसिद्धि प्रकृति के कवि के रूप में भी है.(समर्पित साम्यवादी पाब्लो नेरुदा एक कुशल राजनयिक भी रहे थे.)

नेरुदा की कविताओं को पढ़ने के बाद कोई संदेह नहीं रह जाता है कि कंकड़-पत्थर, घास-फूस, मिट्टी-पानी ही नहीं बल्कि प्रकृति की हर कृति में प्रेम का वास है. लेकिन संपूर्ण प्रकृति में पाब्लो नेरुदा को सर्वाधिक प्रभावित किया था समुद्रों ने.

पाब्लो नेरुदा के सागर प्रेम का सबूत है शंखों, सीपियों, कौड़ियों और घोंघों का उनका संग्रह. नोबेल पुरस्कार विजेता नेरुदा समुद्र के इस उपहार को 'मोतियों की जननी के लघु देश' की उपमा देते थे.

पाब्लो नेरुदा ने दो दशकों के दौरान सात समुद्रों की यात्रा कर शंख, सीपियों, कौड़ियों और घोंघों के 9000 से ज़्यादा शैल जमा किए. उन्होंने 1954 में अपना संग्रह चिली विश्वविद्यालय को सौंप दिया था.

पहली बार अब इस संग्रह से लिए गए 435 नमूनों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जा रहा है- स्पेन में मैड्रिड के सेरवाँतेस इंस्टीट्यूट में. यह प्रदर्शनी 24 जनवरी 2009 तक चलेगी. बाद में पाब्लो नेरुदा के इस संग्रह को उनके देश चिली में प्रदर्शित किया जाएगा.

प्रस्तुत हैं नेरुदा के संग्रह से कुछ नमूने:-







रविवार, नवंबर 29, 2009

भारतीय पुलिस ने भी ख़रीदी है जादुई छड़ी?

ADE651ब्रिटेन में इन दिनों इराक़ युद्ध के बारे में एक जाँच आयोग की सुनवाई में ये बात एक बार फिर स्पष्ट हो रही है कि 11 सितंबर 2001 के हमलों से कई महीने पहले से ही अमरीका इराक़ पर हमले की योजना बना रहा था.

ज़ाहिर है अमरीकी सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा या ईरान को घेरने जैसे बड़े सामरिक लक्ष्यों पर विचार कर इराक़ पर हमले की योजना बनाई होगी. बड़े सामरिक लक्ष्य दीर्घावधि के होते हैं जो कि कई बार पूरे होते भी नहीं. लेकिन हमले का शिकार बने किसी देश को लूटे जाने का सिलसिला पहले ही दिन से शुरू हो जाता है. इराक़ में भी यही हो रहा है. इस लूट में मुख्य रूप से अमरीका और ब्रिटेन की सुरक्षा कंपनियाँ भाग ले रही हैं.

इसी महीने न्यूयॉर्क टाइम्स ने इराक़ को 8 करोड़ डॉलर का चूना लगाए जाने के एक विचित्र-किंतु-सत्य टाइप प्रकरण को उजागर किया था. उसके बाद में ब्रिटेन के गार्डियन और टाइम्स जैसे अख़बारों ने इस मामले में आगे छानबीन की. अब जाकर इराक़ी संसद की नींद टूटी है, और उसने पूरे मामले की जाँच की घोषणा की है.

मामला ब्रिटेन की एक निजी कंपनी का है जिसने इराक़ को ऐसी जादुई छड़ी की खेप बेची जो कि कथित रूप से बम, गोला-बारूद, हथियार, नशीले पदार्थ, अवैध हाथी दाँत जैसी तमाम चीजों का पाँच किलोमीटर तक की दूरी से पता लगा लेती है.

कथित चमत्कारी उपकरण को देखने से तो यही लगता है कि प्लास्टिक के एक हत्थे पर रेडियो वाला सामान्य टेलीस्कोपिक एंटीना लगा दिया गया हो. इस उपकरण का नाम है ADE651. इसकी अलग-अलग आकार और कथित क्षमता वाली डेढ़ हज़ार यूनिट इराक़ सरकार को बेची गई हैं, प्रति नग 60 हज़ार डॉलर तक के दाम में.

उल्लेखनीय है कि इराक़ में तैनात अमरीकी सेना ADE651 का इस्तेमाल नहीं करती है. वरिष्ठ अमरीकी सैनिक अधिकारियों ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि ये उपकरण किसी भी काम का नहीं है और 60 हज़ार डॉलर में तो गोला-बारूद का पता लगाने मे निपुण पाँच से आठ प्रशिक्षित कुत्ते खरीदे जा सकते हैं. जब अख़बार ने ये सुझाव इराक़ के बमरोधी पुलिस विभाग के प्रमुख मेजर जनरल जेहाद अल-जबीरी के सामने रखा तो उनका जवाब बेमिसाल था- "आप बग़दाद के 400 सुरक्षा चौकियों पर कुत्तों की तैनाती के बारे में सोच भी सकते हैं? शहर एक चिड़ियाघर में तब्दील हो जाएगा."

ADE651 बनाने वाली कंपनी ATSC का अपने उत्पाद के बारे में दावा गज़ब का है- 'ADE651 से बम, बंदूक, कारतूस, मादक पदार्थ, लाश यहाँ तक कि हाथी दाँत का भी पता चल सकता है. ये ज़मीन के नीचे, पानी में या दीवारों के पीछे छुपी इन चीज़ों का एक किलोमीटर दूर से पता लगा सकता है. जहाँ तक हवा की बात है तो इस उपकरण के ज़रिए नीचे ज़मीन से ही पाँच किलोमीटर ऊपर उड़ रहे विमान में इन चीज़ों का पता लगाया जा सकता है.'

इस उपकरण की एक और विचित्र विशेषता है- 'इसे काम करने के लिए न किसी बैटरी की ज़रूरत होती है और न ही ऊर्जा के किसी अन्य प्रकार की.'

इतना ही नहीं ADE651 में कोई इलेक्ट्रॉनिक सर्किट भी नहीं है. इसके काम करने का तरीक़ा भी बड़ा सरल बताया गया है. एंटीना यूनिट तार के ज़रिए प्लास्टिक के डिब्बे से जुड़ा होता है जिसके खांचे में उस चीज़ के गुणों से युक्त(electromagnetic resonance) प्लास्टिक का एक कार्ड लगता है जिसकी कि तलाश की जानी हो. मतलब यदि बारूद का पता लगाना हो तो बारूद के विशेष भौतिक गुणों से युक्त कार्ड खांचे में डलेगा. बारूद वाले उदाहरण को ही आगे बढ़ाएँ तो आप एंटीना को सतह के क्षैतिज पकड़े रहें, बस. यदि एक किलोमीटर की दायरे में कहीं बारूद रहा तो एंटीना ख़ुद-ब-ख़ुद उस ओर झुक जाएगा!

ब्रितानी अख़बार टाइम्स का पत्रकार जब ATSC के कर्ताधर्ता पूर्व पुलिस अधिकारी जिम मैक्कॉर्मिक से मिलने गया तो उसने पत्रकार को ADE651 का इस्तेमाल करने दिया. लेकिन उपकरण उसके कार्यालय जैसी छोटी-सी जगह में छुपाए गए बारूद का पता लगाने में भी नाकाम रहा. रही बात इराक़ में ADE651 के 'असल प्रभाव' की तो उसके लिए पिछले महीने का एक उदाहरण ही काफ़ी होगा. 25 अक्तूबर को बग़दाद में एक आत्मघाती हमलावर ने तीन मंत्रालयों की इमारतों को ध्वस्त करते हुए 155 लोगों को मार डाला था. हमलावर ADE651 उपकरण से लैस एक चेकपोस्ट से हो कर दो टन बारूद से भरा ट्रक ले गया था! इसी तरह न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने दो लोगों को AK47 राइफ़लों और कारतूसों के साथ ADE651 का इस्तेमाल करने वाली नौ इराक़ी पुलिस चौकियों से होकर गुजारा, एक भी जगह जादुई छड़ी को हथियारों की हवा नहीं लगी.

अमरीकी जादूगर जेम्स रैंडी ने ADE651 की निर्माता कंपनी ATSC को खुली चुनौती दे रखी है कि वो वैज्ञानिक जाँच में ये दिखा दे कि उसका उपकरण सचमुच में बारूद का पता लगा लेता है तो वह उसे 10 लाख डॉलर देंगे. साल भर बीत चुका है लेकिन ATSC ने रैंडी की चुनौती को स्वीकार नहीं किया है. अब रैंडी ने चुनौती का दायरा और बढ़ा दिया है. उनका कहना है कि ADE651 और कुछ नहीं बल्कि शुद्ध जालसाज़ी है. यदि आप उनके इस विश्वास को ग़लत साबित कर सकें तो 10 लाख डॉलर का पुरस्कार आपका!

ये कोई संयोग नहीं है कि किसी भी विकसित देश की सेना या पुलिस इस उपकरण का इस्तेमाल नहीं करती. सिर्फ़ कुछ विकासशील देशों में ही इसे बेचा जा सका है. लंदन के टाइम्स अख़बार से बातचीत में ATSC के मालिक मैककॉर्निक ने अपने ग्राहकों में भारत की पुलिस का भी नाम गिनाया है. कंपनी की वेबसाइट अभी डाउन चल रही है, वरना ये जानना रोचक होगा कि भारत के किस राज्य की पुलिस ने जादुई छड़ी ख़रीदी है !

सोमवार, अगस्त 31, 2009

विकल्प जिओ-इंजीनियरिंग के

राजमार्गों के दोनों ओर कृत्रिम पेड़ लगाने का विकल्पजिओ-इंजीनियरिंग या भू-यांत्रिकी अभी तक सिद्धांतों तक ही सीमित है. लेकिन पिछले हफ़्ते ब्रिटेन के इंस्टीट्यूशन ऑफ़ मेकेनिकल इंजीनियर्स(आईमेकई) की रिपोर्ट को देखने के बाद लगता है कि अभी से दशक भर के अंतराल में इसे व्यावहारिक धरातल पर उतारा जाना संभव है.

जिओ-इंजीनियरिंग यानि धरती के पर्यावरण को संभालने के लिए और हमें जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए बहुत ही बड़े पैमाने पर अपनाए जाने वाले अभियांत्रिकी केंद्रित विकल्प. आईमेकई के अनुसार इन विकल्पों का उद्देश्य होगा- वायुमंडल से बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों(मुख्यत: कार्बन डाइ ऑक्साइड) को निकालना या फिर धरती की जलवायु प्रणाली में पहुँचने वाले सूर्य के विकिरण की मात्रा में भारी कटौती संभव करना. अभी तक ऐसे किसी विकल्प को बड़े पैमाने पर नहीं अपनाया गया है. सच्चाई तो ये है कि अभी तक जिओ-इंजीनियरिंग को जलवायु परिवर्तन की समस्या से लड़ने के विकल्प के रूप में अपनाने पर व्यापक सहमति तक नहीं बन पाई है.

आईमेकई ने अपनी रिपोर्ट में दलील दी है कि जलवायु परिवर्तन पर हर महीने कहीं न कहीं हो रहे अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के बीच कार्बन उत्सर्जन सालाना 3 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है. ऐसे में जिओ-इंजीनियरिंग के विकल्प से बचने की कोशिश ख़तरनाक साबित हो सकती है.

आईमेकई के विशेषज्ञों ने सैंकड़ो जिओ-इंजीनियरिंग प्रस्तावों पर विचार करने के बाद तीन विकल्पों को व्यावहारिक और असरदार माना है- कृत्रिम पेड़ लगाना, छतों को सूर्यातप परावर्तक सतह के रूप में बदलना और शैवाल(अल्गी) आधारित ईंधन को आम प्रचलन में लाना.

कृत्रिम पेड़ देखने में भले ही बदसूरत मशीन जैसा दिखेंगे, लेकिन वायुमंडल के कार्बन डाइ ऑक्साइड को सोखने के काम में वे नैसर्गिक पेड़ों से हज़ार गुना बेहतर होंगे. आईमेकई के डॉ. टिम फ़ॉक्स का दावा है कि एक कृत्रिम पेड़ वायुमंडल से रोज़ 10 टन कार्बन अवशोषित कर सकेगा. यानि यदि ब्रिटेन में एक लाख कृत्रिम पेड़ लगा देने से पूरे देश के परिवहन-तंत्र द्वारा उत्सर्जित कार्बन डाइ ऑक्साइड को न्यूट्रल किया जा सकेगा, उसे वायुमंडल में पहुँचने से रोका जा सकेगा. एक आम सुझाव ये है कि जब कृत्रिम पेड़ लगाने पर सहमति बन जाए तो उन्हें राजमार्ग के दोनों ओर लगाया जाए. ऊपर के चित्र में एक कलाकार ने इसी परिकल्पना को दर्शाया है.

घरों में शैवाल आधारित ईंधनों के प्रयोग से भी वायुमंडल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा कम होगी, क्योंकि शैवाल प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए कार्बन डाइ ऑक्साइड को हरित तत्वों में बदलता है. अल्गी के ईंधन के उपयोग के बाद बचे अवशेष जैव-उर्वरक के रूप में इस्तेमाल किए जा सकेंगे.

जबकि सुझाए गए तीसरे उपाय के ज़रिए ग्लोबल वार्मिंग को सीधे कम किया जाएगा, क्योंकि चमकीली सतह वाली छतें बड़ी मात्रा में सूर्यातप को धरती की जलवायु में घर करने से रोकेंगी.

जिओ-इंजीनियरिंग को अपनाने की अपील करने के साथ ही आईमेकई ने आगाह किया है कि सिर्फ़ इसी के भरोसे नहीं रहा जा सकता. जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव ठीक किए जाने लायक़ स्थिति से आगे चले जाएँ, इससे बचने के लिए ज़रूरी है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के व्यावहारिक उपायों पर शीघ्र सहमति बनाई जाए. यानि जिओ-इंजीनियरिंग के ज़रिए ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को बिल्कुल ही ख़तरनाक स्थिति तक पहुँचने में थोड़ी देरी कराई जा सकती है, लेकिन यह उससे बचने की गारंटी बिल्कुल ही नहीं है.

समस्या ये भी है कि जिओ-इंजीनियरिंग पर अभी तक दुनिया भर के पर्यावरणवादी और विशेषज्ञ एकमत नहीं हो पाए हैं. उनकी मुख्य शिकायत ये है है कि ग्लोबल वार्मिंग की विभीषिका को अस्थाई से रूप से टालने में सक्षम कोई भी विकल्प हमें मूल समस्या की भयावहता से आँखें मूँदने की ओर धकेलेगा. उनको इस बात का भी डर है कि सिर्फ़ सैद्धांतिक स्तर पर परखे गए, या सिर्फ़ प्रयोगशाला के नियंत्रित माहौल में परीक्षण कर देखे गए विकल्पों को भूमंडल स्तर पर कार्यान्वित करने से कहीं अनजाने में कोई पर्यावरणनाशी भस्मासुर न पैदा हो जाए!