रविवार, नवंबर 23, 2008

अत्यंत जटिल है जलदस्यु समस्या

ग्राफ़िक्स सौजन्य सीबीएसजलदस्यु समस्या सोमालिया के पास ही क्यों?
इसके दो प्रमुख कारण हैं- पहला सोमालिया में किसी प्रभावी सरकार का नहीं होना, और दूसरा सोमालिया से लगे समुद्र से होकर होने वाला विशद समुद्री व्यापार.

पहले कारण की बात करें तो पिछले दो दशकों से सोमालिया में सरकार नाम की कोई चीज़ नहीं है. सोमालिया के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग गुटों या गिरोहों के प्रभाव में हैं. अभी सोमालिया की जिस अंतरिम सरकार या Transitional Federal Government (TFG) को संयुक्तराष्ट्र संघ की मान्यता मिली हुई है, वो सच कहें तो राजधानी मोगादिशू पर भी पूरा नियंत्रण करने में नाकाम रही है. TFG को अमरीका की शह पर पड़ोसी देश इथियोपिया की सैनिक मदद मिली हुई है, लेकिन उसके बाद भी वह Union of Islamic Courts का सामना करने में सक्षम नहीं है. चरमपंथियों, मुल्लों और कुछ बड़े व्यवसायिओं के गुट Islamic Courts ने देश के बड़े भाग पर नियंत्रण कर रखा है. इससे अलग हुए एक अतिचरमपंथी धड़े अल-शबाब का भी देश के कुछ हिस्सों पर प्रभावी नियंत्रण है. लेकिन सोमालिया के कई बड़े हिस्से ऐसे हैं जो कि इन तीनों गुटों के नियंत्रण से भी बाहर हैं. इन हिस्सों में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला क़ानून चलता है जो कि करोड़ों डॉलर की नकदी और भारी-भरकरम असलहों से लैस समुद्री लुटेरों के लिए आदर्श स्थिति बनाता है.

बात करें दूसरे कारण की तो अराजक स्थिति वाले सोमालिया से लगते अदन की खाड़ी से होकर दुनिया का 8 प्रतिशत व्यापार होता है. सिर्फ़ तेल की बात करें तो दुनिया के तेल व्यापार का आठवाँ हिस्सा अदन की खाड़ी से होकर गुजरता है. इस आँकड़े में पूर्वी अफ़्रीकी तट से होकर गुजरने वाले मालवाहकों और तेल टैंकरों को भी शामिल कर लें, तो सोमाली समुद्री लुटेरों के पास लूटमार और अगवा करने के असीमित अवसर हैं.

इसके अलावा एक तीसरा महत्वपूर्ण कारण भी है- गृहयुद्ध में फंसे सोमालिया में न तो हथियारों की कमी है, और न ही जान हथेली लेकर चलने वाले लड़ाकों की. पारंपरिक रूप से समुद्र में मछली मार कर आजीविका चलाने वाले सोमाली कबीलों में बड़ी संख्या में ऐसे युवक भी हैं जो कि विकसित देशों के मछुआरों के अपने परंपरागत इलाक़े में नियमित अतिक्रमण के कारण बेरोज़गार हो गए हैं. स्थानीय समुद्र के बारे में पीढ़ियों से संग्रहित पारंपरिक जानकारियों और ख़ुद के अनुभव के कारण ऐसे युवक लुटेरों के किसी गिरोह के लिए ज्ञानेन्द्रियों का काम करते हैं.

लुटेरे बड़े-बड़े पोतों पर आसानी से क़ब्ज़ा कैसे कर लेते हैं?
दरअसल बड़े असैनिक पोतों पर क़ब्ज़ा करना बड़ा ही आसान होता है. उदाहरण के लिए सोमाली जलदस्युओं ने जिस सबसे बड़े पोत पर क़ब्ज़ा किया है वो सउदी अरब का सुपर-टैंकर सीरियस स्टार है. ऐसे सुपर-टैंकर VLCC या Very Large Crude Carriers की श्रेणी में आते हैं. आकार की बात करें तो ये एक विमानवाही पोत से तीन गुना बड़े आकार के होते हैं. लेकिन जब किसी VLCC पर पर्याप्त मात्रा में तेल लदा हो तो उसका डेक पानी से मात्र साढ़े तीन से चार मीटर ऊपर होता है. तेल से लदा एक सुपर-टैंकर बमुश्किल 15 से 20 नॉट प्रति घंटे की रफ़्तार से चलता है, लेकिन लुटेरों की स्पीडबोट इससे कहीं तेज़ी से चलती हैं. ऐसे में 10-20 हथियारबंद लुटेरे बिना किसी समस्या के महापोत के डेक पर पहुँच कर 20-25 की संख्या में मौजूद निहत्थे जहाज़कर्मियों को अपने क़ब्ज़े में लेकर जहाज़ को अगवा कर लेते हैं.

लुटेरों के काम करने के तरीक़े के बारे में कुछ बताएँ?
अभी तक आमतौर पर यही माना जाता है कि लुटेरे किसी ख़ास जहाज़ को निशाना बनाने के बजाय जो हाथ लग गया उसी को अगवा कर लेने की नीति पर चलते हैं. लेकिन अब विशेषज्ञों का मानना है कि सोमाली गिरोहों ने दुबई और जिबूति जैसे मुख्य बंदरगाहों पर अपने जासूस लगा रखे हैं जो उन्हें मालदार लक्ष्यों के बारे में सारी ज़रूरी जानकारी(क्या लदा है, कितने लोग हैं, क्या टाइमिंग है...आदि) अग्रिम मुहैय्या करा देते हैं. इसके अलावा किसी जहाज़ की राह पर इंटरनेट के ज़रिए नज़र रखना या जहाज़ विशेष की स्थिति की जानकारी ट्रांसमीट करने वाले AIS (automatic identification system)के संदेश को पकड़ना भी बिल्कुल आसान हो गया है.

सोमाली समुद्री लुटेराएक बार अपना टार्गेट तय कर लेने के बाद लुटेरे किसी मच्छीमार पोत(आमतौर पर लूटा हुआ पोत) पर मछुआरों की भूमिका में अपने लक्ष्य के आसपास आते हैं. ऐसे मच्छीमार पोत पर वे अपना सारा असलहा और स्पीडबोट भी साथ लेकर चलते हैं. इसके बाद क्लाशनिकोफ़ राइफ़लों और ग्रेनेड लॉन्चरों(RPGs) से लैस लुटेरे अचानक तीन-चार स्पीड बोटों में लद कर लक्षित जहाज़ को चारों तरफ़ से घेर लेते हैं. जिस जहाज़ पर हमला किया गया उस पर लुटेरों को भगाने की कोई व्यवस्था नहीं होती है. ज़्यादा-से-ज़्यादा वे पानी की बौछार के ज़रिए लुटेरों को डेक पर आने से रोकने की नाकाम कोशिश भर ही की जाती है. दो हफ़्ते पहले एक निजी सुरक्षा कंपनी के जवानों ने पानी की बौछार के बजाय Magnetic Audio Devices के ज़रिए असहनीय शोर मचा कर कथित रूप से लुटेरों को भगाने का प्रदर्शन ज़रूर किया है, लेकिन समुद्री सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है ऐसे उपकरण लुटेरों के ख़िलाफ़ गारंटी बिल्कुल नहीं बन सकते हैं.

आँकड़ों की बात करें तो इस साल सोमाली लुटेरों ने कम-से-कम 90 जहाज़ों पर हमले किए हैं. इनमें से 39 जहाज़ों को अगवा किया गया. कुल 500 से ज़्यादा जहाज़कर्मियों को बंधक बनाया गया. फ़िरौती में मोटी रकम लेने के बाद ही जहाजों और उनके कर्मचारियों को छोड़ा गया. कीनिया के विदेश मंत्री ने कहा है कि लुटेरे इस साल 15 करोड़ डॉलर फ़िरौती में वसूल भी चुके हैं. इस समय भी सउदी सुपर-टैंकर समेत 15 जहाज़ और उनके 250 से ज़्यादा कर्मचारी लुटेरों की गिरफ़्त में फंसे हुए हैं. उल्लेखनीय है कि अभी तक एक भी बंधक को नुक़सान नहीं पहुँचाया गया है. हाँ ब्रितानी, फ़्रांसीसी और भारतीय नौसेना की कार्रवाइयों में कुछ लुटेरों के मारे जाने की ख़बरें ज़रूर प्रसारित की गई हैं.

शिपिंग कंपनियाँ अपने जहाज़ों और उस पर मौजूद कर्मचारियों की सुरक्षा की व्यवस्था क्यों नहीं करतीं?
एक तो जहाज़ और उस पर लदे माल का बीमा होने के कारण शिपिंग कंपनियों को सुरक्षा पर ध्यान देने की ज़्यादा ज़रूरत नहीं होती. उन्हें लगता है कभी-कभार एकाध मामले में फ़िरौती देनी पड़ भी गई तो क्या है! दूसरी बात ये कि शिपिंग कंपनियाँ जहाज़ों पर मील-दो मील तक नज़र रखने वाले CCTV कैमरे, हमला होते ही कंपनी मुख्यालय में ख़तरे की घंटी बजा देने वाले उपकरण या ज़्यादा-से-ज़्यादा जहाज़ के पीछे के कुछ किलोमीटर के इलाक़े पर भी नज़र रखने वाले रडार उपकरण लगवा सकते हैं. अव्वल इनसे सचमुच के मच्छीमार पोत और लुटेरों के मदर-शिप में अंतर कर पाना ही हमेशा संभव नहीं होगा, और यदि लुटेरों की गतिविधियाँ पता चल भी गईं तो उन्हें जहाज़ पर क़ब्ज़े करने से रोकना असंभव ही होगा.ग्राफ़िक्स सौजन्य बीबीसी
जहाज़ पर तैनात कर्मचारियों को हथियारबंद करने का पहले तो प्रावधान नहीं है(क्योंकि एक व्यापारिक जहाज़ अलग-अलग देशों की सीमा से होकर गुजरता है) और यदि मान लीजिए चार-पाँच सुरक्षा गार्ड तैनात कर दिए तो भी लुटेरों के मशीनगनों और रॉकेट लॉन्चरों के मुक़ाबले जब तक उन्हें तोप और हेलीकॉप्टर गनशिप जैसे साज़ोसमान नहीं दिए जाते हैं, बेचारे सुरक्षा गार्ड मुफ़्त में मारे जाएँगे!

अंतरराष्ट्रीय समुदाय मिलजुल कर कुछ क्यों नहीं करता, क्योंकि लुटेरों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी तो बाधित कर रखा है?
अंतरराष्ट्रीय समुदाय सचमुच में चिंतित है- ख़ास कर भारत, रूस, ब्रिटेन और अमरीका जैसे देशों की चिंता बहुत ज़्यादा है. या तो बड़ी मात्रा में इनका व्यापार अदन की खाड़ी से होकर चलता है, या इनके नागरिक शिपिंग के क्षेत्र में बड़ी संख्या में नौकरियों में हैं- ख़ास कर जहाज़ों पर. मुश्किल ये है कि आप सोमालिया की समुद्री सीमा में जाकर लुटेरों की मार-कुटाई करना चाहें तो सोमालिया में भले ही दशकों से सरकारविहीन अराजकता हो, अंतरराष्ट्री क़ानून किसी दूसरे देश को उसकी जलसीमा में घुस कर बेरोकटोक कार्रवाई करने की अनुमति नहीं देता. अंतत: 2 जून 2008 को पारित सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 1816 में अपने जहाज़ों या अपने व्यापार के हक़ में देशों को सोमालिया की जलसीमा में जाने की अनुमति ज़रूर दी गई है, लेकिन उसके साथ बहुत सारे किंतु-परंतु लगे हुए हैं. आप ख़ुद देखें प्रस्ताव का एक हिस्सा-
Acting under Chapter VII of the Charter of the United Nations, the Security Council,
7. Decides that for a period of six months from the date of this resolution, States cooperating with the TFG in the fight against piracy and armed robbery at sea off the coast of Somalia, for which advance notification has been provided by the TFG to the Secretary-General, may:
(a)Enter the territorial waters of Somalia for the purpose of repressing acts of piracy and armed robbery at sea, in a manner consistent with such action permitted on the high seas with respect to piracy under relevant international law; and
(b)Use, within the territorial waters of Somalia, in a manner consistent with action permitted on the high seas with respect to piracy under relevant international law, all necessary means to repress acts of piracy and armed robbery;
8. Requests that cooperating states take appropriate steps to ensure that the activities they undertake pursuant to the authorization in paragraph 7 do not have
the practical effect of denying or impairing the right of innocent passage to the ships of any third State;

इस बारे में सुरक्षा परिषद ने 7 अक्तूबर 2008 को एक और प्रस्ताव(संख्या 1836) पारित किया है, जिसमें कहा गया है- The Security Council calls upon States interested in the security of maritime activities to take part actively in the fight against piracy on the high seas off the coast of Somalia, in particular by deploying naval vessels and military aircraft, in accordance with international law, as reflected in the Convention;

लेकिन इन प्रस्तावों के बाद भी इस समस्या से पार पाना मुश्किल ही लगता है. भारत ने भले ही लुटेरों के एक मदरशिप को डुबोने सफलता हासिल की हो, लेकिन सच कहा जाए तो सोमाली लुटेरों से पार पाना अकेले भारतीय नौसेना के बूते की बात नहीं है. ऐसा विश्वास के साथ इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि अमरीका ने पहले अपने हाथ खड़े कर रखे हैं कि अकेले दम पर वह भी इस समस्या से नहीं निपट सकता है.

मौजूदा अंतरराष्ट्रीय क़ानून भारत या अमरीका की नौसेना को किसी तीसरे देश के नागरिकों को छुड़ाने के लिए किसी अन्य देश के जहाज़ पर कार्रवाई करने की अनुमति नहीं है. यहाँ तक कि यदि लुटेरे उन पर सीधे हमला नहीं कर रहे हों तो इन तीसरे पक्ष की सेनाओं को लुटेरों को मार गिराने का भी अधिकार नहीं है. सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 1816 ने भले ही सोमालिया की अंतरिम सरकार की स्वीकृति के साथ शुरुआती छह महीनों के लिए विदेशी नौसेनाओं को सोमाली जलसीमा में जाने की इजाज़त दे दी है, लेकिन सोमालिया के भीतर जाकर ज़मीनी कार्रवाई करने की अनुमति तो फिर भी नहीं दी गई है. ऐसी अनुमति मिले बिना इस समय सक्रिय सोमालिया के क़रीब 1000 समुद्री लुटेरों को पूरी तरह निष्क्रिय करना लगभग असंभव ही होगा.

एक और अनुत्तरित सवाल ये है कि यदि अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई में लुटेरे पकड़े जाते हैं तो उनका क्या किया जाएगा? क्योंकि सोमाली लुटेरों को सोमालिया की नाम भर की सरकार को सौंपा गया तो उन्हें बिना किसी मान्य न्यायिक प्रक्रिया से गुजारे सीधे मार डाले जाने की आशंका रहेगी. पकड़े गए लुटेरों के लिए अंतरराष्ट्रीय युद्धापराध न्यायालय जैसी कोई व्यवस्था भी नहीं है. न ही उनके लिए ग्वान्तानामो जैसी कोई जगह निश्चिंत की गई है. जिस देश की नौसेना सोमाली लुटेरों को समुद्र में पकड़ती है वो अपने देश के न्यायालय में भी नहीं ले जा सकता क्योंकि न तो उस देश का क़ानून इसकी इजाज़त देगा और न ही अंतरराष्ट्रीय संधियों में ऐसी कोई व्यवस्था है.

मलक्का जलडमरुमध्य और पूर्वी एशिया में जलदस्यु समस्या पर क्या क़ाबू नहीं पा लिया गया है?
हाँ, क़ाबू पा लिया गया है ऐसा कहा जा सकता है क्योंकि इस साल उस इलाक़े से इक्का-दुक्का घटनाओं की ही सूचनाएँ आई हैं. वहाँ इंडोनेशिया, सिंगापुर और मलेशिया की सरकारों ने मिलजुल कर(चीन सरकार के आशीर्वाद के साथ, क्योंकि उस मार्ग से होकर उसका खरबों डॉलर का व्यापार होता है) व्यापारिक जहाज़ों को सुरक्षा कवच मुहैय्या कराया. यहाँ जलदस्यु समस्या से प्रभावति मार्ग अपेक्षाकृत बहुत छोटा है. संकरा होने के कारण इस पर निगरानी भी आसान है. इन सबसे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि इस इलाक़े के लुटेरों के पास सोमालिया जैसा अराजक आधार शिविर भी उपलब्ध नहीं है, कि भाग कर वे वहाँ शरण ले लें. साथ ही जिन सरकारों ने इस जलमार्ग की सुरक्षा की ज़िम्मेवारी उठाई है, उनसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अक्षरश: पालन की ज़्यादा अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है.

इसकी तुलना में सोमाली लुटेरों की बात करें तो न सिर्फ़ अदन की खाड़ी, बल्कि हिंद महासागर के एक तिहाई हिस्से में वो जहाज़ों पर हमले कर चुके हैं. सउदी सुपर-टैंकर का उदाहरण ही देखें तो उस पर कीनिया तट से 450 मील दूर जाकर क़ब्ज़ा किया गया. इन लुटेरों से सीधे टकराव की नीति अपनाई गई तो डर ये है कि वे न सिर्फ़ ख़ून-ख़राबे पर उतर सकते हैं बल्कि पर्यावरणीय विभीषिका भी ला सकते हैं. कल्पना कीजिए यदि लाखों बैरल तेल से लदे सुपर-टैंकर में आग लगा दी जाती है, या सारा तेल समुद्र में बहा दिया जाता है!?

लेकिन हाथ-पर-हाथ धरे बैठा भी तो नहीं जा सकता?
इस समस्या का दीर्घावधि का एकमात्र समाधान है सोमालिया में एक मज़बूत सरकार की स्थापना. उदाहरण के लिए दो साल पहले जब वहाँ इस्लामी कोर्ट्स ने शासन पर पकड़ मज़बूत की थी तो जलदस्यु गिरोह बहुत दिनों तक सुसुप्तावस्था में जाने पर मजबूर हो गए थे. मुश्किल ये है कि सोमालिया में एक मज़बूत सरकार स्थापित करने के ईमानदार अंतरराष्ट्रीय प्रयास आज शुरू किए जाएँ, तो सार्थक परिणाम मिलने में पाँच से दस साल तक लग सकते हैं.

तब तक एक अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक गश्ती दस्ता बनाया जा सकता है, जिसकी बात अब खुल कर की भी जाने लगी है. ऐसा होने तक फ़ारस की खाड़ी और हिंद महासागर में सक्रिय नौसेनाओं वाले देश जहाजों को समूह में अदन की खाड़ी से पार कराने की ज़िम्मेवारी बारी-बारी से उठाएँ, जैसा कि पिछले दिनों रूस ने किया है.

इसके अतिरिक्त अदन की खाड़ी के दूसरे किनारे के देश यमन की भी मदद करने की ज़रूरत होगी. अभी जलदस्युओं से खदबदाते अपने 1100 मील लंबे तट पर पेट्रोलिंग के लिए उसके पास मात्र नौ गश्ती जहाज़ हैं.

एक तात्कालिक विकल्प की घोषणा की है सबसे बड़ी शिपिंग कंपनियों में से एक एपी-मोलर-मेर्स्क ने. उसने कहा है कि अदन की खाड़ी में स्थिति सुधरने तक वह अपने बड़े जहाज़ों को अफ़्रीका का चक्कर लगा कर आगे की यात्रा पर भेजेगा. लेकिन यहाँ याद रहे कि अफ़्रीकी महाद्वीप का चक्कर काट कर माल यूरोप या अमरीका पहुँचाने में 10 से 14 दिन की देरी होगी. और हर दिन की यात्रा पर शिपिंग कंपनियों को 30 से 40 हज़ार डॉलर का अतिरिक्त ख़र्चा उठाना पड़ेगा. ज़ाहिर है इस अतिरिक्त परेशानी और ख़र्चे का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर और अंतत: उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा!

रविवार, अक्टूबर 26, 2008

वित्तीय संकट और काला हंस

नसीम निकोलस तालेबविकसित देशों को पूरी तरह गिरफ़्त में ले चुके वैश्विक वित्तीय संकट को अब पूरी दुनिया महसूस कर रही है, लेकिन इस संकट को समझना अब भी बहुत दुष्कर माना जा रहा है. बड़े-बड़े अर्थशास्त्री और बाज़ार-विशेषज्ञ अभी तक ये तय नहीं कर पाए हैं कि वित्तीय संकट का असर अंतत: अर्थव्यवस्था के किन-किन हिस्सों में बुरी तरह महसूस किया जाएगा. कितने दिनों तक रहेगा ये संकट और वित्तीय बाज़ार में अरबों डॉलर झोंकने के सरकारों के क़दम का कब और कितना असर होगा, ये बताना इस वक़्त असंभव-सा लग रहा है.

लेकिन एक पूर्व बैंकर को कम-से-कम ये ज़रूर पता है कि मौजूदा संकट की आहट तक क्यों नहीं सुनी जा सकी. इस पूर्व बैंकर का नाम है- नसीम निकोलस तालेब. हालाँकि अब इनकी ख़्याति वित्तीय मामलों के जानकार के रूप में नहीं, बल्कि एक दार्शनिक के रूप में है. तालेब की इस पहचान के पीछे उनकी दो लोकप्रिय किताबों का हाथ है- Fooled by Randomness: The Hidden Role of Chance in Life and in the Markets और The Black Swan: The Impact of the Highly Improbable.

दोनों ही किताबों के मूल में है- जीवन के हर क्षेत्र में आकस्मिकता, अनियमितता और अनिश्चितता की भूमिका पर तालेब का बिल्कुल अलग नज़रिया. दोनों ही किताबों का बीसियों भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. दोनों ही किताबों के शीर्षक यानि 'fooled by randomness' और 'the black Swan' को अंग्रेज़ी भाषा के प्रचलित मुहावरों/कथनों में बिना किसी देरी के जगह मिल चुकी है.

तालेब का मानना है कि अत्यंत सीमित संख्या में घटने वाली अनपेक्षित घटनाओं से पता चल जाता है कि दुनिया में क्या कुछ चल रहा है. उनके अनुसार ये समझ लेने में ही हमारी भलाई है कि हम कितना कुछ कभी नहीं समझ सकेंगे. तालेब के प्रिय वाक्यों में से एक है- "हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, वह उससे बहुत अलग है जिसे कि हम दुनिया मानते हैं."

तालेब अपने इन्हीं सामान्य से लगने वाले सिद्धांतो के आधार पर बैंकरों और अर्थशास्त्रियों को पानी पी-पीकर कोसते हैं. हालाँकि पूर्व में एक सफल बैंकर होने के नाते उनके इस दृष्टिकोण में दर्शन के अलावा उनके अनुभव का भी हाथ निश्चय ही होगा. मौजूदा वैश्विक वित्तीय संकट के बारे में तालेब कहते हैं- "शेयर बाज़ारों में जो कुछ भी हो रहा है उसे समझने के लिए हमारे पास जो साधन हैं वे पिछली कुछ सदियो के दौरान विकसित हुए हैं. अब हमें नए साधन चाहिए. लेकिन तब तक हमें भारी नासमझी की क़ीमत चुकानी पड़ेगी."

इस नासमझी पर और रोशनी डालते हुए तालेब का कहते हैं, "इसमें हमारे इस विश्वास का हाथ है कि बैंकर और वित्तीय विश्लेषक ज्ञान के उच्चतम स्तर को प्राप्त कर चुके हैं. किसान पूरे भरोसे के साथ कहेंगे कि वो भविष्य का खाका नहीं खींच सकते, लेकिन वॉल स्ट्रीट के बैंकर दावे के साथ कहेंगे कि वे ऐसा कर सकते हैं."

बैंकरों की आलोचना करते हुए तालेब कहते हैं कि काले हंसों के अस्तित्व के ख़िलाफ़ सट्टा लगाते हुए बैंक मौजूदा वित्तीय संकट में 10 खरब डॉलर गँवा चुके हैं, जो कि बैंकिंग के पूरे इतिहास में हुई कमाई से भी ज़्यादा है.

दरअसल तालेब अपने दार्शनिक सिद्धांतों को छोटे-छोट उदाहरणों या कथा-कहानियों के ज़रिए समझाना पसंद करते हैं. उनकी किताब The Black Swan: The Impact of the Highly Improbable के शीर्षक के पीछे भी उनका एक प्रिय उद्धरण है कि कैसे मध्यकाल में ये सर्वमान्य तथ्य था कि काले हंस होते ही नहीं हैं. इसलिए उन दिनों जिस चीज़ का अस्तित्व नहीं हो उसे काले हंस के रूपक से व्यक्त किया जाता था. लेकिन सत्रहवीं सदी में आकर जब ऑस्ट्रेलिय में काले हंस दिखे तो सैंकड़ो वर्षों की सर्वस्वीकृत मान्यता एक झटके में ख़त्म हो गई.

तालेब का कहना है कि ज़्यादातर लोग 'Mediocristan' में रहते हैं जोकि वास्तविकता का एक फ़र्जी मॉडेल है, जहाँ दुर्लभ घटनाएँ कभी नहीं घटती हैं. ऐसे लोग वास्तविक जटिल दुनिया से आँखें मूँदे रहते हैं. जबकि वास्तविकता जटिल दुनिया वाली ही है जहाँ दूरगामी प्रभावों वाली लेकिन बिना निश्चित पैटर्न वाली घटनाएँ नियमित रूप से घटती हैं. ऐसी दुर्लभ घटनाओं की श्रेणी में तालेब मौजूदा वित्तीय संकट के अलावा डॉटकॉम का बुलबुला फटने और 11 सितंबर के हमलों को भी शामिल करते हैं.

अर्थशास्त्र को एक विभीषिका बताते हुए तालेब कहते हैं कि पूरी दुनिया उन कुछ आर्थिक विचारों के आधार पर चलाई जा रही है, जो कि समग्र या पर्याप्त साबित नहीं हुए हैं. अर्थशास्त्रियों से तालेब को इतनी चिढ़ है कि वे अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार दिए जाने की परंपरा का खुल कर विरोध करते हैं. तालेब अर्थशास्त्र को 'बोगसगणित' और लाखों डॉलर बोनस के रूप में लेने वाले बैंकरों की पंडिताई को ज्योतिषशास्त्र के बराबर मानते हैं.

तालेब के सिद्धान्त न सिर्फ़ आमजनों के बीच लोकप्रिय हैं, बल्कि अपने को बड़ा तोप मानने वाली शख्सियतें भी उनका इस्तेमाल करती हैं. इराक़ पर हमले का आधार तैयार करते समय तत्कालीन अमरीकी रक्षा मंत्री डोनाल्ड रम्सफ़ील्ड ने तालेब के सरल विचारों का इस्तेमाल करते हुए एक बड़ा ही जटिल बयान दिया था- "There are known knowns. There are things we know that we know. There are known unknowns. That is to say, there are things that we now know we don't know. But there are also unknown unknowns. There are things we do not know we don't know."

तालेब का बताया परमसत्य- 'आकस्मिकता पर नियंत्रण असंभव है!'

शनिवार, सितंबर 20, 2008

गांधीजी चले चे ग्वेरा की राह

गांधीजी और चे ग्वेरा की सिर्फ़ इस बात को लेकर तुलना हो सकती है कि दोनों ने ही शोषण की व्यवस्था का विरोध किया, दोनों ने ही स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी. लेकिन इसके आगे शायद दोनों के बीच और कोई बड़ी समानता नहीं थी. मसलन गांधीजी अहिंसा के पुजारी थे, तो चे को हिंसा से कोई परहेज़ नहीं था, बल्कि उनका भरोसा सुभाषचंद्र बोस की तरह सशस्त्र संघर्ष में था. गांधीजी ने भले ही अत्याचारी शासकों के ख़िलाफ़ लड़ाई दक्षिण अफ़्रीका में शुरू की, लेकिन उनका संपूर्ण संघर्षमय जीवन भारत में ही बीता. दूसरी ओर चे ग्वेरा ने न सिर्फ़ पूरे लैटिन अमरीका महाद्वीप के लिए लड़ाइयाँ लड़ीं, बल्कि अफ़्रीका महाद्वीप में भी क्रांति के बीज बोने का प्रयास किया. इस तरह की कई और असमानताएँ ढूँढी जा सकती हैं.

लेकिन अब लगता है कि गांधीजी एक अन्य मामले में चे ग्वेरा को टक्कर देने की ओर बढ़ चले हैं. ये है मार्केटिंग की, मुक्त बाज़ार की दुनिया. ये विडंबना ही है कि बाज़ारवाद में चे ग्वेरा जैसे घनघोर साम्यवादी का बुरी तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. पता नहीं कितने विज्ञापनों में, कितने तरह के उत्पादों के लिए, कितने किस्म के विचारों के लिए चे की तस्वीरों का उपयोग किया जा चुका है. बाज़ारवाद गांधीवाद वाले गांधीजी को कहाँ तक ले जाता है ये तो वक़्त ही बताएगा, लेकिन संदेह नहीं कि शुरुआत हो चुकी है. गांधीजी अक्सर दुनिया के किसी कोने में किसी पोस्टर में, किसी विज्ञापन में अचानक दिख जाते हैं.

मॉर्निंग युसान पोस्टआजकल गांधीजी एक विज्ञापन को लेकर चर्चा में हैं. या ये कहें कि गांधीजी के चलते एक विज्ञापन चर्चा में है. विज्ञापन 28 अगस्त को डेनमार्क के अख़बार Morgenavisen Jyllands Posten ने छापा था. ये वही अख़बार है जिसमें प्रकाशित इस्लामी आतंकवाद विषयक कुछ कार्टूनों में पैगंबर मोहम्मद को दिखाए जाने पर दुनिया भर में हंगामा हुआ था. डेनमार्क सरकार एक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संकट में फंस गई थी. और, आज भी इस्लामी देशों में डेनिश नागरिकों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी होती है.

अब इसी अख़बार ने तीन विज्ञापनों की एक सिरीज़ छापी है- गांधीजी, नेल्सन मंडेला और दलाई लामा के चित्रों के साथ आज़ादी लेते हुए. ये भी नहीं कहा जा सकता कि एक अच्छे उद्देश्य के लिए ऐसा किया गया है, क्योंकि मुख्य उद्देश्य है- अख़बार का, उसके खुलेपन का प्रचार करना. लेकिन इतना तो तय है कि गांधीजी या अन्य दो महापुरुषों के चित्रों को फ़ोटोशॉप करने के बाद भी अख़बार का उद्देश्य उनकी छवि बिगाड़ने का तो बिल्कुल ही नहीं रहा होगा. क्योंकि एक हाथ में बोतल(संभवत: बीयर की) लिए दूसरे हाथ से कोई मांस उत्पाद(संभवत: हॉटडॉग) भून रहे गांधीजी के चित्र के नीचे लिखा है- 'ज़िंदगी आसान होगी, यदि आप आवाज़ नहीं उठाओगे' इसी पंक्ति में आगे अख़बार की तस्वीर है. और पंक्ति ख़त्म हो रही है- 'बहस करो' के संदेश पर.

संदेश भले ही गांधीजी की छवि से मेल खाता हो, उनका चित्रण इसलिए अनुपयुक्त है कि गांधीजी शराब के घोर विरोधी और शाकाहार के ज़बरदस्त समर्थक थे. चूंकि गांधीजी राष्ट्रपिता भी हैं, सो भारत सरकार गांधीजी के इस व्यंग्यचित्र को लेकर अख़बार से शिकायत दर्ज़ कराने को बाध्य हुई. हालाँकि विरोध का स्वर नरम ही रखा गया.

अख़बार के विज्ञापन में गांधीजी"I would like to draw your attention to a picture of Mahatma Gandhi, which was published in Morgenavisen Jyllands-Posten on 28 August.

Mahatma Gandhi is depicted by a barbecue. In one hand he has a fork speared with a piece of meat. He has a bottle with a coloured liquid in the other hand.

According to the caption Mahatma was a person with strong opinions and strong beliefs. However the picture has distorted Mahatma's message. He was a vegetarian and had great esteem for animals. He never drank alcohol and warned of adverse health effects of alcohol."

-Yogesh Gupta, India's Ambassador to Denmark



अख़बार ने 30 अगस्त को भारतीय राजदूत की आपत्ति और साथ में अपनी सफ़ाई प्रकाशित की. अख़बार के संपादक ने खेद भी व्यक्त किया है, यदि शाकाहारी गांधीजी की छवि को लेकर कोई भ्रम फैला हो.

"It has never been our view of violating the memory of Mahatma Gandhi. On the contrary, we have chosen him with Nelson Mandela and the Dalai Lama as some of the new world history most beloved and respected people, yes, indeed almost icons.

This is a marketing campaign, which has just saluted the three men for their unique struggle for peace and freedom in the world. We are fully aware that Mahatma Gandhi was a vegetarian and will regret if we have helped to give a different impression."

-Jorn Mikkelsen, Chief Editor


कोपेनहागेन का गांधी तिराहाइसमें कोई संदेह नहीं कि Morgenavisen Jyllands Posten अख़बार को विवादों से कोई डर नहीं रहा है, बल्कि विवादास्पद मुद्दों पर बहस कराने में इसकी ख़ास दिलचस्पी रहती है. लेकिन जैसा कि संपादक के जवाब से साफ़ है, अख़बार को गांधीजी के महत्व का अहसास है. रही बात डेनमार्क की, तो वहाँ भारत की अच्छी छवि है. डेनमार्क गांधीजी को जानता है, और राजधानी कोपनहेगेन में एक तिराहे पर गांधीजी की मूर्ति भी स्थापित है.

मंगलवार, सितंबर 09, 2008

...इसलिए धरती नष्ट नहीं होगी!

लार्ज हैडरॉन कोलाइडर सुरंग का एक हिस्सापिछले कुछ महीनों से जैसे-जैसे अब तक के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग की उल्टी गिनती ने ज़ोर पकड़ी, इस प्रयोग के चलते ब्लैकहोल उत्पन्न होने और उसमें धरती के समा जाने की प्रलयवाणी भी तेज़ हो गई. और आज 10 सितंबर 2008 को फ़्रांस-स्विटज़रलैंड की सीमा पर एक भूमिगत प्रयोगस्थल में जब Large Hadron Collider को स्टॉर्ट किया जाएगा, तब जाकर शायद महाप्रलय का गीत गा रहे मीडिया को चैन आए कि अरे धरती तो पहले की ही तरह मस्त घूम रही है.

इस सारे शोर के केंद्र में है European Organization for Nuclear Research जिसे कि फ़्रेंच भाषा में इसके पुराने नाम Conseil Européen pour la Recherche Nucléaire के आधार पर आज भी CERN/सर्न के नाम से जाना जाता है.

सर्न यों तो उपनाभिकीय या Particle Physics के क्षेत्र में 1954 से काम कर रहा है, और अपने मुख्य अनुसंधान क्षेत्र में कई बेहतरीन उपलब्धियाँ हासिल करने के साथ-साथ हमें सूचना क्रांति संभव कराने वाला वर्ल्ड वाइड वेब(www) दे चुका है.

लेकिन आज लंदन से बेतिया और काठमांडू तक आमलोगों की सर्न में रूचि इसकी महामशीन Large Hadron Collider या LHC को लेकर है. इसके नाम से ही ज़ाहिर हो जाती है इसकी प्रकृति. ज़मीन के 100 मीटर नीचे 27 किलोमीटर परिधि वाली वृताकार महामशीन को Large तो कहा ही जाएगा. ये एक Collider है यानि टक्कर कराने वाला. इसमें टक्कर कराई जाएगी Hadrons की, यानि क़्वार्क से बने प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जैसे नाभिकीय पदार्थों की. बुधवार को जिस प्रयोग का शुभारंभ हो रहा है, वो प्रोटॉनों को टकराने के लिए है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि लगभग प्रकाश की गति से कराए जाने वाली इस महाभंजक टक्कर से ब्रह्मांड की बनावट जानने में मदद मिलेगी, अस्तित्व का कुछ अंदाज़ा लग सकेगा कि आख़िर शुरुआत कैसे हुई होगी.

इस महत्वपूर्ण प्रयोग से मिनी-ब्लैकहोल बनने और उसमें धीरे-धीरे सब कुछ, यहाँ तक कि पूरी धरती समा जाने की अफ़वाह कहाँ से शुरू हुई पता लगाना मुश्किल है. हालाँकि इसमें जर्मनी के Tubingen University में सैद्धांतिक रसायन विज्ञान के प्रोफ़ेसर ओट्टो ई रोज़लर का नाम प्रमुखता से आता है. प्रो. रोज़लर ने ये बताने की कोशिश की, कि कैसे सर्न के LHC प्रयोग के दौरान मिनी-ब्लैकहोल का निर्माण हो सकता है, जो कि संभव है पैदा होने के बाद स्वत: ख़त्म न हो और लगातार बढ़ता जाए. ये तो सब जानते हैं कि ब्लैकहोल अपनी महागुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण सब कुछ डकार सकता है. प्रकाश तक बाहर नहीं आ पाता है उसकी पकड़े, और इसीलिए तो वो ब्लैक है, अप्रकाशित है, अबूझ है.

प्रो. रोज़लर अपने सिद्धांत से इतने संतुष्ट नज़र आते हैं कि उन्होंने सर्न के LHC प्रयोग को रुकवाने के लिए यूरोपीय मानवाधिकार अदालत का दरवाज़ा तक जा खटखटाया. दुहाई दी ज़िंदगी जीने के अधिकार की. प्रो.रोज़लर के अलावा उनके जैसे कुछ अन्य वैज्ञानिकों के साथ-साथ कुछ शुद्ध षड़यंत्रदर्शियों ने भी प्रयोग स्थगित कराने के लिए क़ानूनी पेंच लगाए. लेकिन सौभाग्य से इनमें से किसी का दाँव चल नहीं पाया.

मेरे समान ही बहुसंख्य लोग इस बात से आश्वस्त हैं कि गड़बड़ी की आशंका नहीं के बराबर है. आश्वस्त कराने में सर्न के प्रेस बयानों से ज़्यादा उन भौतिकविदों की भूमिका रही है जो LHC परियोजना से सीधे तौर पर जुड़े हुए भी नहीं हैं.

सबसे पहले बात करें मशहूर भौतिकविद प्रोफ़ेसर स्टीफ़न हॉकिंग की. पिछले दिनों छपी 'द बिग बैंग मशीन' नामक एक पुस्तिका के प्राक्कथन में प्रो.हॉकिंग कहते हैं-

प्रोफ़ेसर स्टीफ़न हॉकिंग"कुछ लोगों ने मुझसे पूछा है कि क्या LHC से कोई विनाशकारी या अकल्पनीय परिणाम निकल सकता है. निश्चय ही स्थानकाल से जुड़े कुछ सिद्धांतों में कहा गया है कि नाभिकीय पदार्थों की महाटक्कर में सूक्ष्म ब्लैकहोल उत्पन्न हो सकते हैं. यदि ऐसा होता भी है, तो मेरे ही द्वारा प्रतिपादित एक सिद्धांत के अनुसार ऐसे ब्लैकहोल उपनाभिकीय पदार्थों का विकिरण करते हुए विलीन हो जाएँगे. यदि LHC में ब्लैकहोल दिखे तो ये भौतिकी के लिए ये एक नए काल की शुरुआत होगी, और संभव है अपने सिद्धांत के साबित होने पर मैं नोबेल पुरस्कार भी जीत जाऊँ. लेकिन कम-से-कम मुझे इसकी कोई उम्मीद नज़र नहीं आती."

न्यूयॉर्क के सिटी यूनीवर्सिटी मे सैद्धांतिक भौतिकी के प्रोफ़ेसर और Physics of the Impossible नामक किताब के लेखक प्रो. मिशियो काकु कहते हैं-

"इसी तरह मानव जाति के समाप्त होने का डर पैदा किया गया था 1910 में. तब मीडिया ने सही रिपोर्टिंग की थी कि धरती एक अन्य ब्रह्मांडीय पिंड के संपर्क में आने वाला है जो कि ज़हरीली गैसों से भरा है. बात धरती के हैली पुच्छल तारे की गैसीय पूँछ से होकर गुजरने की थी. मीडिया में ये ख़बर आनी शुरू होते ही प्रलय की भविष्यवाणियाँ करने वाले लोग जहाँ-तहाँ नज़र आने लगे. मीडिया ने सही रिपोर्ट ज़रूर दी थी, लेकिन रिपोर्ट अधूरी थी. ये नहीं बताया गया था कि धूमकेतु की पूँछ इतनी झीनी है कि उसकी गैसें और अन्य तमाम पदार्थ सूटकेस के आकार के किसी बर्तन में समा जाएँ. यानि गैसों के ज़हरीली होने के बाद भी धरती के जीवों पर उसका कोई असर नहीं होगा. अंतत: ऐसा ही हुआ. हैली आया और गया, धरती को खरोंच तक लगाए बिना."

प्रो. मिशियो काकु"हैली धूमकेतु वाले मामले की तरह ही इस बार भी मीडिया ने सही जानकारी दी कि LHC प्रयोग में सूक्ष्म ब्लैक़होल बन सकते हैं. मीडिया ने ब्लैकहोल की भयावह ताक़त का भी तार्किक ब्यौरा दिया. लेकिन इस मामले में भी मीडिया ने अधूरी तस्वीर पेश की. मीडिया इस बात को दबा गया कि प्रकृति में उपनाभिकीय पदार्थ कहीं बड़ी मात्रा में और कहीं ज़्यादा ऊर्जा के साथ उत्पन्न होते रहते हैं, जिसकी किसी मानवीय प्रयोग में कल्पना भी नहीं की जा सकती है. नैसर्गिक रूप से सतत पैदा होते रहते उपनाभिकीय पदार्थ ब्रह्मांड के विशाल चुंबकीय और विद्युत क्षेत्रों से गुजर कर अतिशय ऊर्जावान बौछारों के रूप में अरबों वर्षों से धरती से टकरा रहे हैं."

"इसके अलावा LHC में यदि ब्लैकहोल पैदा भी हुए तो वे उपनाभिकीय स्तर के यानि इलेक्ट्रॉन या प्रोटॉन के आकार से तुलना करने लायक़ होंगे. इसमें कितनी कम ऊर्जा होगी उसका अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि यदि LHC को सैंकड़ो वर्षों तक लगातार चलाया गया तो भी इससे पैदा हुए असंख्य सूक्ष्म ब्लैकहोल मिल कर भी एक बल्ब जलाने लायक़ ऊर्जा नहीं पैदा कर सकेंगे."

"यों तो LHC में उत्पन्न उपनाभिकीय पदार्थों में खरबों इलेक्ट्रॉन वोल्ट की ऊर्जा होगी, लेकिन उनके बीच ब्लैकहोल पैदा हुए तो भी अधिकतम प्रति सेकेंड एक की दर से. उनका आकार इतना छोटा होगा कि उससे किसी तरह का ख़तरा हो ही नहीं सकता."

"ये भी बात ग़ौर करने की है कि LHC में पैदा कोई भी ब्लैकहोल बिल्कुल अस्थिर होगा, जिसका तत्काल विलोप हो जाएगा. ऐसे ब्लैकहोल परस्पर मिल कर बड़ा होते जाने के बजाय विकिरण छोड़ते हुए एक-दूसरे दूर जाएँगे और अंतत: अपनी मौत मर जाएँगे, जैसा कि प्रो. स्टीफ़न हॉकिंग का सिद्धांत कहता है."

"यदि LHC में कोई सूक्ष्म ब्लैकहोल पैदा हुआ तो उसके धरती के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में आने की भी संभावना नगण्य ही है. ऐसा हुआ तो भी वो सूक्ष्म ब्लैकहोल तुरंत अपनी मौत मर जाएगा, विलीन हो जाएगा."

"वेर्नर हाइज़नबर्ग के अनिश्चितता के सिद्धांत के अनुसार कुछ भी घटित होने की अतिक्षीण संभावना हमेशा रहती है. यानि इस असत्यापित क़्वांटम सिद्धांत के अनुसार तो LHC के प्रयोग के दौरान आग उगलने वाले ड्रैगन भी पैदा हो सकते हैं. लेकिन वास्तविकता के धरातल पर विचार करें तो ऐसा होने के आसार कम-से-कम इस ब्रह्मांड के रहते तो नहीं ही हैं."

प्रलयवादियों अभी करो इंतज़ार

प्रो. स्टीफ़न हॉकिंग और प्रो. मिशियो काकु के समझाने से भी यदि कोई प्रलयवादी नहीं मानता हो, तो उसके लिए एक और तथ्य ये कि आज LHC को सिर्फ़ चालू किया जा रहा है.
हिग्स बोसॉन की कल्पनाजिस परियोजना को पूरा करने में दो दशक से ज़्यादा लगे हों, भला उसमें पहले ही दिन मुख्य प्रयोग करने की बात की कल्पना भी कैसे की जा सकती है. पहले कुछ हफ़्ते तो ये देखने में ही गुजरेंगे कि लाखों कलपुर्ज़ों में से एक-एक ठीक से काम कर रहा है कि नहीं. फिर धीरे-धीरे प्रोटॉन धारा की गति बढ़ाई जाएगी. पूरी ऊर्जा यानि 14 TeV या टेट्राइलेक्ट्रॉनवोल्ट की ऊर्जा के साथ प्रोटॉन-प्रोटॉन टक्कर का समय आने में अभी महीनों लगेंगे. उस समय जहाँ दुनिया भर के भौतिकविद कथित ईश्वरीय कण या हिग्स बोसॉन उत्पन्न होने की उम्मीद करेंगे, वहीं प्रलयवादियों का मिनी-ब्लैकहोल का भय चरम स्थिति में होगा. यानि हर तरह से समझाने के बावजूद नहीं मानने वाले प्रलयवादियों को भी तब तक के लिए चिंतामुक्त रहना चाहिए.

इंडियन कनेक्शन

यहाँ एक भारतीय के रूप में उल्लेख करना ज़रूरी है कि सर्न परियोजना में अपेक्षाकृत छोटे स्तर पर ही सही, भारतीय वैज्ञानिकों का भी योगदान है. और, जिस ईश्वरीय कण 'हिग्स बोसॉन' की उम्मीद की जा रही है उसमें बोसॉन को महान भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस का नाम मिला है. जबकि हिग्स ब्रितानी वैज्ञानिक पीटर हिग्स के नाम से आया है. वैज्ञानिक आशा लगाए बैठे हैं कि यदि अभी तक मात्र सिद्धांत के रूप में मौजूद 'हिग्स बोसॉन' प्राप्त होता है, तो उसके रूप में क़्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों की ग़ायब कड़ी मिल जाएगी. इससे न सिर्फ़ ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में जानकारी का दायरा अचानक बहुत बढ़ जाएगा, बल्कि कई अधूरे क़्वांटम सिद्धांतों को भी पूरा किया जा सकेगा.

शुक्रवार, अगस्त 29, 2008

आज़ादी से पहले का वृहद भारत

प्रस्तुत है अविभाजित भारत का एक विस्तृत मानचित्र. आज जबकि कश्मीर के बहाने भारत के और टुकड़े करने की खुल कर माँग की जाने लगी हो, अप्रैल 1946 का यह मानचित्र पहले से कहीं ज़्यादा संग्रहणीय हो जाता है.

(कृपया बड़े आकार में देखने के लिए मानचित्र पर क्लिक करें.)

भारत 1946 मेंसौजन्य:नेशनल ज्यॉग्राफ़िक