गुरुवार, सितंबर 29, 2005

भारत और पाकिस्तान की साझी विरासत

इस बात को न जाने कितने तरीक़े से, कितने अलग-अलग मुहावरों के साथ कहा गया होगा कि भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक मतभेद चाहे जितना भी हो दोनों तरफ़ की आम जनता की दिलचस्पी सिर्फ़-और-सिर्फ़ शांति और भाईचारे में है. और दोनों ओर की आबादी के बहुमत की इस आम राय की बुनियाद है- साझी विरासत.

संगीत के क्षेत्र में इस साझी विरासत का बेजोड़ नमूना देखने को मिला इसी सप्ताह मुंबई और कराची से प्रसारित एक साझे संगीत कार्यक्रम में. कार्यक्रम का नाम भी बिल्कुल ही सटीक था- सुर का रिश्ता. मुख्य कलाकार- शुभा मुदगल और आबिदा परवीन.
सौजन्य- बीबीसी की हिंदी और उर्दू सेवा.

कार्यक्रम में अन्य प्रमुख अतिथि थे- भारत से जावेद अख़्तर, गोविंद निहलानी और किरन खेर, जबकि पाकिस्तान से भी लेखक अनवर मक़सूद समेत कई प्रमुख हस्तियों ने संगीत की सुर-लहरी के बीच भारत-पाकिस्तान संबंधों पर विचार-विमर्श किया.

तो देर किस बात की. नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें और पौन घंटे(अफ़सोस कि दो घंटे के इस कार्यक्रम का पूरा वीडियो अभी अनुपलब्ध है) के लिए दुनियादारी से दूर सुरों की दुनिया में खो जाएँ.

सुर का रिश्ता- वीडियो देखने के लिए क्लिक करें

क्लिक करने से बात नहीं बनती हो तो निम्नांकित लिंक को ब्राउज़र में पेस्ट करें-
http://www.bbc.co.uk/urdu/meta/tx/vi/mumbai_joint_vi_nb.ram

गुरुवार, सितंबर 22, 2005

तूफ़ान अल्फ़ा, तूफ़ान बीटा

अमरीका में कैटरिना तूफ़ान की विभीषिका के दृश्य अभी टेलीविज़न स्क्रीन से हटे भी नहीं थे कि रीटा नामक तूफ़ान सुर्खियों में आ गया. हाल के वर्षों में पहले से कहीं ज़्यादा संख्या में समुद्री तूफ़ान आ रहे हैं, लेकिन इस साल तो हद ही हो गई है. वर्ष 2005 में अटलांटिक महासागर में इतने समुद्री तूफ़ान आ चुके हैं कि तूफ़ानों को नाम देने के काम का समन्वय करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन वर्ल्ड मिटिरोलॉजिकल ऑर्गेनाइज़ेशन(डब्ल्यूएमओ) के सामने अभूतपूर्व समस्या उठ खड़ी हुई है. उसे डर है कि कहीं पहले से निर्धारित नाम ख़त्म न हो जाएँ और तूफ़ानों के नाम अल्फ़ा, बीटा, गामा आदि रखने की नौबत नहीं आ जाए.

अटलांटिक महासागर में उठने वाले तूफ़ानों की बात करें तो पूरे साल के लिए अँगरेज़ी वर्णमाला के पहले अक्षर 'ए' से शुरू करके 'डब्ल्यू' तक 21 नाम रखे जाते हैं(इस तरह के 21 नामों वाले छह सालाना सेट बनाए गए हैं, जो कि क्रम से प्रयोग किए जाते हैं. क़्यू, यू, एक्स, वाई और ज़े वाले नामों को नहीं लिया गया है क्योंकि इन अक्षरों से ज़्यादा नाम नहीं बनते.). तूफ़ान जिस क्रम से आते हैं उसी तरह उनका नाम होता है. मिसाल के तौर पर इस वर्ष अटलांटिक महासागर में आए पहले तूफ़ान का नाम एरलिन था और आख़िरी तूफ़ान का नाम होगा--विल्मा. लेकिन किसी साल में अगर 21 से अधिक तूफ़ान आ जाएँ तो उन्हें ग्रीक वर्णमाला के अक्षरों के नाम से पुकारा जाता है-- जैसे अल्फ़ा, बीटा, गामा, डेल्टा आदि.

इस साल अटलांटिक महासागर में कैटरिना और रीटा समेत 17 भयानक तूफ़ान उठ चुके हैं, यानि अभी साल ख़त्म होने में तीन महीने से ज़्यादा का वक़्त है और मात्र चार नाम स्टैन, टैमी, विन्सी और विल्मा ही शेष बचे हैं. ऐसे में डब्ल्यूएमओ को डर है कि नाम के लिए संभवत: पहली बार उसे अल्फ़ा, बीटा और गामा जैसे ग्रीक अक्षरों का उपयोग करना पड़ सकता है.

दुनिया का दो तिहाई से ज़्यादा हिस्सा जल का है और तूफ़ान पानी के कारण ही, ख़ास कर समुद्री जल के तापमान से संचालित होते हैं. ऐसे में दुनिया भर में पूरे साल कहीं न कहीं तूफ़ान उठते रहते हैं. डब्ल्यूएमओ ने पहले ही नामकरण की सुविधा के चलते दुनिया भर के समुद्री तूफ़ानों को तीन विशेष वर्ग में बाँट रखा है. उत्तरी प्रशांत महासागर में उठने वाले तूफ़ान टाइफ़ून कहे जाते हैं, अटलांटिक महासागर में उठने वाले तूफ़ान हरिकेन और बाकी विश्व(बंगाल की खाड़ी भी इसी वर्ग में आता है) में उठने वाले बड़े समुद्री तूफ़ान साइक्लॉन (चक्रवात) कहलाते हैं.

आख़िर तूफ़ानों को अलग-अलग नाम देने की ज़रूरत ही क्यों पड़ती है? इस बारे में डब्ल्यूएमओ का मानना है कि चूँकि साल भर में दुनिया में औसत 80 बड़े समुद्री तूफ़ान उठते हैं, इसलिए उनमें अंतर करने के लिए अलग-अलग नाम देना ज़रूरी बन जाता है. ऐसा मौसम के अध्ययन और संचार में सुविधा की दृष्टि से किया जाता है क्योंकि हर तूफ़ान के बनने की दशा अपने आप में विशिष्ट होती है. यदि 33 डिग्री नार्दर्न अटलांटिक हरिकेन के बदले किसी तूफ़ान को नैंसी या विम्पी कहा जाए तो ज़ाहिर है ये सबके लिए सुविधाजनक होगा.

उल्लेखनीय है कि पहले तूफ़ानों के नाम सिर्फ़ महिलाओं के नाम ही होते थे, लेकिन महिला अधिकारवादियों ने आपत्ति उठाई कि तबाही का नाम महिलाओं का नाम ही क्यों हो. आख़िरकार 1970 के दशक से तूफ़ानों के नामों में पुरुष नाम भी रखे जाने लगे.

एक और दिलचस्प बात है भयंकर तूफ़ानों के नामों की सेवानिवृति. यदि कोई तूफ़ान विशेष कुछ ज़्यादा ही विनाशकारी साबित हो तो उसे नामों के सालाना सेट से रिटायर कर दिया जाता है. उसकी जगह कोई और नाम रखा जाता है. जैसे 2001 में ओपल को रिटायर करके उसकी जगह ओल्गा नाम को शामिल किया गया. रिटायरमेंट की व्यवस्था इसलिए है कि लोग विनाशकारी तूफ़ान को हमेशा याद रख सकें. ऐसे में कोई संदेह नहीं की कैटरिना नाम भी तूफ़ानों की दोहराई जाने वाली सूची से हटा लिया जाएगा.

अब जबकि अमरीका को प्रभावित करने वाले अटलांटिक महासागर के तूफ़ानों के नाम के टोटे पड़ने की संभावना है, क्या हम उम्मीद करें कि जॉर्ज बुश को ग्लोबल वार्मिंग के ख़तरे का अंदाज़ा हो सकेगा और वे पर्यावरण प्रदूषण के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा मान्य क्योटो संधि में अमरीका को भी शामिल कर सकेंगे!

शुक्रवार, अगस्त 26, 2005

होम्योपैथी...क्या है सच?


इनसे मिलिए- ये हैं जेम्स रैण्डी. अमरीका के हैं. जादूगर हैं. कलाकार हैं. लेकिन इनकी असल ख़्याति होम्योपैथी से जुड़ी हुई है. दरअसल जेम्स रैण्डी ने खुला ऑफ़र दे रखा है कि वैज्ञानिक विधि से यह साबित कर दिखाओ कि होम्योपैथिक उपचार सचमुच में बीमारी दूर करता है, और ले जाओ 10 लाख डॉलर का पुरस्कार.

होम्योपैथिक दवाएँ वास्तव में दवाएँ हैं, या मात्र छलावा?- ये सवाल मेडिकल रिसर्च में लगे लोगों को एक अरसे से बहस में उलझाता रहा है. यह सवाल एक बार फिर नए सिरे से उछला है. उछले भी क्यों नहीं, जब प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लान्सेट इस पर सवाल उठा रहा हो.

अपने ताज़ा अंक में लान्सेट पत्रिका ने ब्रिटेन और स्विटज़रलैंड के विशेषज्ञों की एक संयुक्त टीम द्वारा किए गए 110 परीक्षणों की रिपोर्ट प्रकाशित की है.

अध्ययन टीम ने ये परीक्षण अस्थमा, एलर्जी और माँसपेशियों से जुड़ी बीमारियों समेत विभिन्न बीमारियों पर किए हैं. छोटे नमूने वाले सामान्य परीक्षणों में तो होम्योपैथिक और सामान्य अंग्रेज़ी दवाओं को ज़्यादा या कम असरदार पाया गया, लेकिन उच्च कोटि के परीक्षण में होम्योपैथिक दवाओं का वही असर देखा गया जो कि अक्रिय नकली गोलियों का था.

अध्ययन से जुड़े बर्न विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर मैथियस एगर के अनुसार कुछ लोगों ने होम्योपैथिक दवाओं के असरदार होने की बात की है वो इलाज़ के पूरे अनुभव के कारण ऐसा कहते होंगे क्योंकि होम्योपैथ डॉक्टर रोगी को पूरा समय देते हैं, उन पर ध्यान देते हैं.

सोसायटी ऑफ़ होम्योपैथ्स ने न सिर्फ़ लान्सेट की रिपोर्ट पर बल्कि अक्रिय नकली गोलियों के मुक़ाबले किसी दवा के असर के परीक्षण की प्रक्रिया पर ही सवाल उठा दिया है.

उल्लेखनीय है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में होम्योपैथिक दवाओं को गुण-रहित गोलियों से बेहतर माना गया है. लेकिन लान्सेट की मानें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का आधार पुराने और आसान परीक्षण हैं. मतलब उस पर पूरी तरह यक़ीन नहीं किया जा सकता है.

लेकिन सवाल यह भी है कि लान्सेट की रिपोर्ट को ही हूबहू क्यों स्वीकार किया जाए! यानी सवाल बना ही रहेगा कि होम्योपैथी एक चिकित्सा प्रणाली है या मात्र आस्था का एक रूप?

रविवार, अगस्त 14, 2005

रिलीज़ होते ही 'द राइज़िंग' को पुरस्कार


प्रस्तुत है जर्मन रेडियो को आमिर ख़ान के इंटरव्यू का ऑडियो.

फ़िल्म मंगल पांडे-द राइज़िंग पर दर्शकों की आरंभिक राय से तो यही लगता है कि आमिर ख़ान एक बार फिर आम लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं. और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहला पुरस्कार तो रिलीज़ होने के एक दिन बाद ही मिल गया. लोकार्नो में द राइज़िंग को एशियाई फ़िल्म वर्ग में ज्यूरी का विशेष पुरस्कार दिया गया है.

फ़िल्म की जो भी आलोचनाएँ सामने आई हैं वो उसमें ज़बरदस्ती ठूँसे गए मसाले को लेकर ही. मसलन लटके-झटके वाले गाने. हीरा नामक वेश्या का किरदार. सती बनाई जा रही महिला और उसे बचाने वाले अंग्रेज़ अधिकारी के बीच प्रेम-संबंध.

लेकिन यदि फ़िल्म के संदेश की बात करें तो ऊपर उल्लिखित मसाले के बावज़ूद निर्देशक केतन मेहता साफ संदेश देने में सफल रहे हैं. उन्होंने दिखा दिया कि ग्लोबलाइज़ेशन और मुक्त व्यापार व्यवस्था का दुष्परिणाम किस हद तक हो सकता है. उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त जाति-प्रथा जैसी कई कुरीतियों पर भी चोट की है.

इसमें कोई शक नहीं कि फ़िल्म का मुख्य आकर्षण है आमिर ख़ान की सधी हुई अदाकारी. टोबी स्टीवेंस के अभिनय को भी खुल कर सराहना मिली है.

गुरुवार, अगस्त 11, 2005

हॉलीवुड स्तर का भारतीय कलाकार

आमिर ख़ान हिंदी सिनेमा या बॉलीवुड के मौजूदा कलाकारों में से सबसे अलग हैं. उनसे हाल ही में ही मिलने का मौक़ा मिला. बिल्कुल सीधे-सरल और सच्चे व्यक्ति लगे. किसी तरह का बनावटीपन नहीं.

काम के प्रति उनके समर्पण की बात करें तो उसकी मिसाल कम-से-कम भारत में तो नहीं ही है. अब जैसे 12 अगस्त 2005 को रिलीज़ हो रही द राइज़िंग (दो अलग-अलग नामों से प्रदर्शित) को ही लें. मंगल पांडे के किरदार से न्याय करने के लिए उन्होंने न सिर्फ़ डेढ़ साल तक बाल और मूँछ बढ़ाई(पहेली में शाहरूख़ की तरह नकली मूँछ नहीं) बल्कि बदन को डंड-बैठक टाइप(सलमान की तरह दवाई-पोषित माँसपेशियाँ नहीं) बनाने के लिए उन्होंने ख़ूब कसरतें भी कीं(ऊपर की तस्वीर में ख़ुद देखें). ये तो हुई किरदार के शारीरिक रूप की बात. मंगल पांडे के मन में उतरने के लिए उन्होंने दर्जनों किताबें पढ़ीं. (हालाँकि जैसा कि उन्होंने बताया कि मंगल पांडे की ज़िंदगी के बारे ज़्यादा प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है.)

एक बार में एक फ़िल्म में ही काम करने के अपने उसूल पर वह हमेशा ही क़ायम रहे हैं.

रही बात उनके व्यक्तिगत जीवन में पिछले कुछ वर्षों में हुई उथल-पुथल की, तो वो इसे भी ईमानदारी से स्वीकार करते हैं.

ऐसे में द राइज़िंग में टोबी स्टीवेन्स जैसे अंग्रेज़ी के मँजे हुए कलाकार पर भारी साबित हुए हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. अधिकतर फ़िल्म समीक्षक ही नहीं, आम दर्शक भी मानते हैं कि आमिर ख़ान पहले भारतीय अभिनेता हैं जो हॉलीवुड के बड़े से बड़े पेशेवर कलाकारों को टक्कर देने में सक्षम हैं.

काश हॉलीवुड के किसी निर्माता को आमिर ख़ान की क्षमताओं का अंदाज़ा लग पाए. तब दुनिया सॉफ़्टवेयर और ऑफ़शोरिंग के अलावा अभिनय के क्षेत्र में भी भारतीय प्रतिभा का लोहा मान सकेगी.